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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

११२- भगवान् वासुदेवद्वारा प्रयागके माहात्म्यका वर्णन

  • अध्याय १०८ * | ३६७
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एक सौ आठवाँ अध्याय

प्रयागमें अनशन-व्रत तथा एक मासतकके निवास (कल्पवास)-का महत्त्व

युधिष्ठिर उवाचयुधिष्ठिरने पूछा— भगवन्! आपने जो प्रयागके माहात्म्यका वर्णन किया है, उसे सुनकर प्रयागका कीर्तन करनेसे अब मेरा हृदय विशुद्ध हो गया है। अब मुझे यह बतलाइये कि प्रयागमें अनशन (उपवास) करनेसे कैसा फल प्राप्त होता है और उसके प्रभावसे समस्त पापोंसे मुक्त होकर मनुष्य किस लोकमें जाता है?॥ १-२॥
एतच्छ्रुत्वा प्रयागस्य यत् त्वया परिकीर्तितम्।<br>विशुद्धं मेऽद्य हृदयं प्रयागस्य तु कीर्तनात्॥ १<br>अनाशकफलं ब्रूहि भगवंस्तत्र कीदृशम्।<br>यं च लोकमवाप्नोति विशुद्धः सर्वकिल्बिषैः॥ २
मार्कण्डेय उवाचमार्कण्डेयजीने कहा— ऐश्वर्यशाली राजन्! प्रयागतीर्थमें जो श्रद्धालु विद्वान् इन्द्रियोंको वशमें करके अनशन-व्रतका पालन करता है, उसे जो फल प्राप्त होता है, वह सुनो। राजेन्द्र! वह सर्वाङ्गसे सम्पन्न, नीरोग और पाँचों कर्मेन्द्रियोंसे स्वस्थ रहता है। चलते समय उसे पग-पगपर अश्वमेध-यज्ञके फलकी प्राप्ति होती है। वह अपने पहलेके दस और पीछे होनेवाले दस कुलोंका उद्धार कर देता है तथा सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर परमपदको प्राप्त हो जाता है॥ ३-५॥
शृणु राजन् प्रयागे तु अनाशकफलं विभो।<br>प्राप्नोति पुरुषो श्रीमान् श्रद्दधानो जितेन्द्रियः॥ ३<br>अहीनाङ्गोऽप्यरोगश्च पञ्चेन्द्रियसमन्वितः।<br>अश्वमेधफलं तस्य गच्छतस्तु पदे पदे॥ ४<br>कुलानि तारयेद् राजन् दश पूर्वान् दशापरान्।<br>मुच्यते सर्वपापेभ्यो गच्छेत् तु परमं पदम्॥ ५
युधिष्ठिर उवाचयुधिष्ठिरने पूछा— प्रभो! आप मुझे जो धर्मका माहात्म्य बतला रहे हैं, उसके अनुसार एक ओर तो थोड़े ही प्रयत्नसे महान् धर्मकी प्राप्ति होती है और दूसरी ओर वह धर्म अश्वमेध-सदृश अनेकों उत्तम व्रतोंके अनुष्ठानसे मिलता है। (इस विषमताको लेकर मेरे मनमें महान् संदेह उत्पन्न हो गया है, अतः) मेरे इस संदेहका निवारण कीजिये; क्योंकि मेरे मनमें महान् आश्चर्य हो रहा है॥ ६-७॥
महाभाग्यं हि धर्मस्य यत् त्वं वदसि मे प्रभो।<br>अल्पेनैव प्रयत्नेन बहून् धर्मानवाप्नुते॥ ६<br>अश्वमेधैस्तु बहुभिः प्राप्यते सुव्रतैरिह।<br>इमं मे संशयं छिन्धि परं कौतूहलं हि मे॥ ७
मार्कण्डेय उवाचमार्कण्डेयजीने कहा— राजन्! पूर्वकालमें पद्मयोनि ब्रह्माने ऋषियोंके निकट जिसका वर्णन किया था, उसे कहते समय मैंने भी सुना था। (वही इस समय बतला रहा हूँ।) प्रयागका मण्डल पाँच योजन विस्तारवाला है। उसकी भूमिमें प्रवेश करते ही पग-पगपर अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त होता है। जो मनुष्य प्रयागमण्डलमें अपने प्राणोंका परित्याग करता है, वह बीती हुई सात पीढ़ियोंका तथा आनेवाली चौदह पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है। ऐसा जानकर मनुष्यको सदा प्रयागके सेवनमें तत्पर होना चाहिये।
शृणु राजन् महावीर यदुक्तं पद्मयोनिना।<br>ऋषीणां संनिधौ पूर्वं कथ्यमानं मया श्रुतम्॥ ८<br>पञ्चयोजनविस्तीर्णं प्रयागस्य तु मण्डलम्।<br>प्रविष्टमात्रे तद्भूमावश्वमेधः पदे पदे॥ ९<br>व्यतीतान् पुरुषान् सप्त भविष्यांश्च चतुर्दश।<br>नरस्तारयते सर्वान् यस्तु प्राणान् परित्यजेत्॥ १०<br>एवं ज्ञात्वा तु राजेन्द्र सदा श्रद्धापरो भवेत्।

३६८ * मत्स्यपुराण *


| अश्रद्दधानाः पुरुषाः पापोपहतचेतसः।<br>प्राप्नुवन्ति न तत्स्थानं प्रयागं देवरक्षितम्॥ ११<br><br>युधिष्ठिर उवाच<br>स्नेहाद् वा द्रव्यलोभाद् वा ये तु कामवशं गताः।<br>कथं तीर्थफलं तेषां कथं पुण्यफलं भवेत्॥ १२<br>विक्रयी सर्वभाण्डानां कार्याकार्यमजानतः।<br>प्रयागे का गतिस्तस्य तन्मे ब्रूहि पितामह॥ १३<br><br>मार्कण्डेय उवाच<br>शृणु राजन् महागुह्यं सर्वपापप्रणाशनम्।<br>मासमेकं तु यः स्नायात् प्रयागे नियतेन्द्रियः॥ १४<br>शुचिस्तु प्रयतो भूत्वाहिसंकः श्रद्धयान्वितः।<br>मुच्यते सर्वपापेभ्यः स गच्छेत् परमं पदम्॥ १५<br>विश्रम्भघातकानां तु प्रयागे शृणु यत् फलम्।<br>त्रिकालमेव स्नायीत आहारं भैक्ष्यमाचरेत्।<br>त्रिभिर्मासैः स मुच्येत प्रयागे नात्र संशयः॥ १६<br>अज्ञानेन तु यस्येह तीर्थयात्रादिकं भवेत्।<br>सर्वकामसमृद्धस्तु स्वर्गलोके महीयते।<br>स्थानं च लभते नित्यं धनधान्यसमाकुलम्॥ १७<br>एवं ज्ञानेन सम्पूर्णः सदा भवति भोगवान्।<br>तारिताः पितरस्तेन नरकात् सपितामहाः॥ १८<br>धर्मानुसारि तत्त्वज्ञ पृच्छतस्ते पुनः पुनः।<br>त्वत्प्रियार्थं समाख्यातं गुह्यमेतत् सनातनम्॥ १९<br><br>युधिष्ठिर उवाच<br>अद्य मे सफलं जन्म अद्य मे तारितं कुलम्।<br>प्रीतोऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि दर्शनादेव ते मुने॥ २०<br>त्वद्दर्शनात् तु धर्मात्मन् मुक्तोऽहं चाद्य किल्बिषात्।<br>इदानीं वेद्मि चात्मानं भगवन् गतकल्मषम्॥ २१ | राजेन्द्र! जिनमें श्रद्धा नहीं है तथा जिनका चित्त पापोंसे आच्छादित हो गया है, ऐसे पुरुष देवताओंद्वारा सुरक्षित उस प्रयागतीर्थमें नहीं पहुँच पाते॥ ८—११॥<br><br>युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! प्रयागमें जाकर जो लोग स्नेहसे अथवा धनके लोभसे कामनाके वशीभूत हो जाते हैं, उन्हें कैसे तीर्थ-फलकी प्राप्ति होती है तथा किस प्रकारका पुण्यफल मिलता है? जो कर्तव्य और अकर्तव्यके ज्ञानसे विहीन पुरुष वहाँ सभी प्रकारके पात्रोंका व्यापार करता है, उसकी क्या गति होती है? यह सब मुझे बतलाइये॥ १२-१३॥<br><br>मार्कण्डेयजीने कहा— राजन्! यह प्रसङ्ग तो परम गोपनीय एवं समस्त पापोंका विनाशक है, इसे बतला रहा हूँ, सुनो, जो मनुष्य जितेन्द्रिय, श्रद्धायुक्त और अहिंसाव्रती होकर पवित्रभावसे नियमपूर्वक एक मासतक प्रयागमें स्नान करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है और परमपदको प्राप्त कर लेता है। अब विश्वासघात (रूप पाप) करनेवालोंको प्रयागमें आनेपर जो फल मिलता है, उसे सुनो, वह यदि प्रयागमें तीनों (प्रातः, मध्याह्न, सायं) वेलामें स्नान करे और भिक्षा माँगकर भोजन करे तो निस्संदेह तीन महीनेमें उस पापसे मुक्त हो सकता है। जो मनुष्य अनजानमें ही प्रयागकी यात्रा आदि कार्य कर बैठता है, वह भी सम्पूर्ण कामनाओंसे परिपूर्ण होकर स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है तथा धनधान्यसे परिपूर्ण अविनाशी पदको प्राप्त कर लेता है। इसी प्रकार जो जान-बूझकर नियमानुसार प्रयागकी यात्रा करता है, वह भोगोंसे सम्पन्न हो जाता है तथा अपने प्रपितामह आदि पितरोंका नरकसे उद्धार कर देता है। तत्त्वज्ञ! तुम्हारे बारंबार पूछनेके कारण मैंने तुम्हारा प्रिय करनेके लिये इस धर्मानुकूल परम गोपनीय एवं सनातन (अविनाशी) विषयका वर्णन किया है॥ १४—१९॥<br><br>युधिष्ठिर बोले— मुने! आपके दर्शनसे आज मेरा जन्म सफल हो गया और आज मैंने अपने कुलका उद्धार कर दिया। मुझे अत्यन्त प्रसन्नता हुई है तथा मैं अनुगृहीत हो गया हूँ। धर्मात्मन्! आपके दर्शनसे आज पापसे मुक्त हो गया हूँ। भगवन्! अब मैं अपनेको पापरहित अनुभव कर रहा हूँ॥ २०-२१॥ |