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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

१०२- स्नान और तर्पणकी विधि

* अध्याय १०० *३४३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
इति भक्तिस्तदा जाता दम्पत्योस्तु नराधिप।<br>तत्प्रसङ्गात् समभ्यर्च्य केशवं लवणाचलम्।<br>शय्या च पुष्पप्रकरैः पूजिताभूच्च सर्वतः ॥ २१नरेश्वर! उस समय तुम दोनों पति-पत्नीके मनमें ऐसी भक्ति उत्पन्न हुई और इसी अर्चाके प्रसङ्गमें तुम्हारे उन पुष्पोंसे भगवान् केशव और लवणाचलकी अर्चना सम्पन्न हुई तथा शेष पुष्प-समूहोंसे तुम दोनोंद्वारा शय्याको भी सब ओरसे सुसज्जित किया गया॥ १५—२१॥
अथानङ्गवती तुष्टा तयोर्धनशतत्रयम्।<br>दीयतामादिदेशाथ कलधौतशतत्रयम् ॥ २२<br>न गृहीतं ततस्ताभ्यां महासत्त्वावलम्बनात्।<br>अनङ्गवत्या च पुनस्तयोरन्नं चतुर्विधम्।<br>आनीय व्याहृतं चात्र भुज्यतामिति भूपते ॥ २३<br>ताभ्यां तु तदपि त्यक्तं भोक्ष्यावः श्वो वरानने।<br>प्रसङ्गादुपवासेन तवाद्य सुखमावयोः ॥ २४<br>जन्मप्रभृति पापिष्ठौ कुकर्माणौ दृढव्रते।<br>प्रसङ्गात् तव सुश्रोणि धर्मलेशोस्तु नाविह ॥ २५<br>इति जागरणं ताभ्यां तत्प्रसङ्गादनुष्ठितम्।<br>प्रभाते च तया दत्ता शय्या सलवणाचला ॥ २६<br>ग्रामांश्च गुरवे भक्त्या विप्रेभ्यो द्वादशैव तु।<br>वस्त्रालङ्कारसंयुक्ता गावश्च कनकान्विताः ॥ २७<br>भोजनं च सुहृन्मित्रदीनान्धकृपणैः समम्।<br>तच्च लुब्धकदाम्पत्यं पूजयित्वा विसर्जितम् ॥ २८तुम्हारी इस क्रियासे अनङ्गवती बहुत प्रसन्न हुई। उस समय उसने तुम दोनोंको इसके बदले तीन सौ अशर्फियाँ देनेका आदेश दिया, पर तुम दोनोंने बड़ी दृढ़तासे उस धन-राशिको अस्वीकार कर दिया—नहीं लिया। भूपते! तब अनङ्गवतीने तुम्हें (भक्ष्य, भोज्य, लेह्य, चोष्य) चार प्रकारका अन्न लाकर दिया और कहा—'इसे भोजन कीजिये', किंतु तुम दोनोंने उसका भी त्याग कर दिया और कहा—'वरानने! हमलोग कल भोजन कर लेंगे। दृढ़व्रते! हम दोनों जन्मसे ही पापपरायण और कुकर्म करनेवाले हैं; पर इस समय तुम्हारे उपवासके प्रसङ्गसे हम दोनोंको भी विशेष आनन्द प्राप्त हो रहा है।' उसी प्रसङ्गमें तुम दोनोंको धर्मका लेशांश प्राप्त हुआ था और उसी प्रसङ्गमें तुम दोनोंने रातभर जागरण भी किया। (दूसरे दिन) प्रातःकाल अनङ्गवतीने भक्तिपूर्वक अपने गुरुको लवणाचलसहित शय्या और अनेकों गाँव प्रदान किये। उसी प्रकार उसने अन्य बारह ब्राह्मणोंको भी सुवर्ण, वस्त्र, अलंकारादि सहित बारह गायें प्रदान कीं। तदनन्तर सुहृद्, मित्र, दीन, अन्धे और दरिद्रोंके साथ तुम लुब्धक-दम्पतिको भोजन कराया और विशेष आदर-सत्कारके साथ तुम्हें विदा किया॥ २२—२८॥
स भवाँल्लुब्धको जातः सपत्नीको नृपेश्वरः।<br>पुष्करप्रकरात् तस्मात् केशवस्य च पूजनात् ॥ २९<br>विनष्टाशेषपापस्य तव पुष्करमन्दिरम्।<br>तस्य सत्त्वस्य माहात्म्यादलोभतपसा नृप ॥ ३०<br>प्रादात्तु कामगं यानं लोकनाथश्चतुर्मुखः।<br>संतुष्टस्तव राजेन्द्र ब्रह्मरूपी जनार्दनः ॥ ३१राजेन्द्र! वह सपत्नीक लुब्धक तुम्हीं थे, जो इस समय राजराजेश्वरके रूपमें उत्पन्न हुए हो। उस कमल-समूहसे भगवान् केशवका पूजन होनेके कारण तुम्हारे सारे पाप नष्ट हो गये तथा दृढ़ त्याग, तप एवं निर्लोभिताके कारण तुम्हें इस कमलमन्दिरकी भी प्राप्ति हुई है। राजन्! तुम्हारी उसी सात्त्विक भावनाके माहात्म्यसे, तुम्हारे थोड़े-से ही तपसे ब्रह्मरूपी भगवान् जनार्दन तथा लोकेश्वर ब्रह्मा भी संतुष्ट हुए हैं। इसीसे तुम्हारा पुष्कर-मन्दिर स्वेच्छानुसार जहाँ-कहीं भी जानेकी शक्तिसे युक्त है।
साप्यनङ्गवती वेश्या कामदेवस्य साम्प्रतम्।<br>पत्नी सपत्नी संजाता रत्याः प्रीतिरिति श्रुता।<br>लोकेष्वानन्दजननी सकलामर्पूजिता ॥ ३२वह अनङ्गवती वेश्या भी इस समय कामदेवकी पत्नी रति* के सौतरूपमें उत्पन्न हुई है। यह इस समय प्रीति नामसे विख्यात है और समस्त लोकोंमें सबको आनन्द प्रदान करती तथा सम्पूर्ण

* हरिवंश, अन्य पुराणों तथा कथासरित्सागरादिमें भी रति और प्रीति—ये कामदेवकी दो पत्नियाँ कही गयी हैं। किंतु उसकी दूसरी पत्नी प्रीतिकी उत्पत्तिकी पूरी कथा यहीं है।

३४४ * मत्स्यपुराण *


तस्मादुत्सृज्य राजेन्द्र पुष्करं तन्महीतले।<br>गङ्गातटं समाश्रित्य विभूतिद्वादशीव्रतम्।<br>कुरु राजेन्द्र निर्वाणमवश्यं समवाप्स्यसि॥ ३३देवताओंद्वारा सत्कृत है। इसलिये राजराजेश्वर! तुम उस पुष्कर-गृहको भूतलपर छोड़ दो और गङ्गातटका आश्रय लेकर विभूतिद्वादशी-व्रतका अनुष्ठान करो। उससे तुम्हें निश्चय ही मोक्षकी प्राप्ति हो जायगी॥ २९–३३॥
नन्दिकेश्वर उवाच<br>इत्युक्त्वा स मुनिर्ब्रह्मंस्तत्रैवान्तरधीयत।<br>राजा यथोक्तं च पुनरकरोत् पुष्पवाहनः॥ ३४<br>इदमाचरतो ब्रह्मन्नखण्डव्रतमाचरेत्।<br>यथाकथञ्चित् कमलैर्द्वादश द्वादशीर्मुने॥ ३५<br>कर्तव्याः शक्तितो देया विप्रेभ्यो दक्षिणाऽनघ।<br>न वित्तशाठ्यं कुर्वीत भक्त्या तुष्यति केशवः॥ ३६<br>इति कलुषविदारणं जनाना-<br>मपि पठतीह शृणोति चाथ भक्त्या।<br>मतिमपि च ददाति देवलोके<br>वसति स कोटिशतानि वत्सराणाम्॥ ३७**नन्दिकेश्वर बोले—**ब्रह्मन्! ऐसा कहकर प्रचेता मुनि वहीं अन्तर्हित हो गये। तब राजा पुष्पवाहनने मुनिके कथनानुसार सारा कार्य सम्पन्न किया। ब्रह्मन्! इस विभूतिद्वादशी-व्रतका अनुष्ठान करते समय अखण्ड व्रतका पालन करना आवश्यक है। मुने! जिस किसी भी प्रकारसे हो सके, बारहों द्वादशियोंका व्रत कमलपुष्पोंद्वारा सम्पन्न करना चाहिये। अनघ! अपनी शक्तिके अनुसार ब्राह्मणोंको दक्षिणा भी देनेका विधान है। इसमें कृपणता नहीं करनी चाहिये; क्योंकि भक्तिसे ही भगवान् केशव प्रसन्न होते हैं। जो मनुष्य लोगोंके पापोंको विदीर्ण करनेवाले इस व्रतको पढ़ता या श्रवण करता है, अथवा इसे करनेके लिये सम्मति प्रदान करता है वह भी सौ करोड़ वर्षोंतक देवलोकमें निवास करता है॥ ३४–३७॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे विभूतिद्वादशीव्रतं नाम शततमोऽध्यायः॥ १००॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें विभूतिद्वादशी-व्रत नामक सौवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १००॥


एक सौ एकवाँ अध्याय

साठ व्रतोंका विधान और माहात्म्य

नन्दिकेश्वर उवाच<br>अथातः सम्प्रवक्ष्यामि व्रतषष्टिमनुत्तमाम्।<br>रुद्रेणाभिहितां दिव्यां महापातकनाशिनीम्॥ १<br>नक्तमब्दं चरित्वा तु गवा सार्धं कुटुम्बिने।<br>हैमं चक्रं त्रिशूलं च दद्याद् विप्राय वाससी॥ २<br>शिवरूपस्ततोऽस्माभिः शिवलोके स मोदते।<br>एतद्देवव्रतं नाम महापातकनाशनम्॥ ३<br>यस्त्वेकभक्तेन क्षिपेत् समो हैमवृषान्वितम्।<br>धेनुं तिलमयीं दद्यात् स पदं याति शाङ्करम्।<br>एतद् रुद्रव्रतं नाम पापशोकविनाशनम्॥ ४**नन्दिकेश्वर बोले—**नारदजी! अब मैं उन साठ सर्वोत्तम व्रतोंका वर्णन कर रहा हूँ, जो साक्षात् शंकरजीद्वारा कथित, दिव्य एवं महापातकोंके विनाशक हैं। जो मनुष्य एक वर्षतक रात्रिमें एक बार भोजन कर स्वर्णनिर्मित चक्र और त्रिशूल तथा दो वस्त्र गौके साथ कुटुम्बी ब्राह्मणको दान करता है, वह शिवस्वरूप होकर शिवलोकमें हमलोगोंके साथ आनन्द मनाता है। यह महापातकोंका विनाश करनेवाला 'देवव्रत' है। जो मनुष्य एक वर्षतक दिनमें एक बार भोजन कर स्वर्णनिर्मित वृषसहित तिलमयी धेनुका दान करता है, वह शिवलोकको प्राप्त होता है। यह पाप एवं शोकका क्षयकारक 'रुद्रव्रत' है।
* अध्याय १०१ *३४५
श्लोकअर्थ
यस्तु नीलोत्पलं हैमं शर्करापात्रसंयुक्तम्।<br>एकान्तरितनक्ताशी समान्ते वृषसंयुतम्।<br>स वैष्णवं पदं याति नीलव्रतमिदं स्मृतम्॥ ५<br>आषाढादिचतुर्मासमभ्यङ्गं वर्जयेन्नरः।<br>भोजनोपस्करं दद्यात् स याति भवनं हरेः।<br>जनप्रीतिकरं नृणां प्रीतिव्रतमिहोच्यते॥ ६<br>वर्जयित्वा मधौ यस्तु दधिक्षीरघृतैक्षवम्।<br>दद्याद् वस्त्राणि सूक्ष्माणि रसपात्रैश्च संयुतम्॥ ७<br>सम्पूज्य विप्रमिथुनं गौरी मे प्रीयतामिति।<br>एतद् गौरीव्रतं नाम भवानीलोकदायकम्॥ ८जो मनुष्य एक दिनके अन्तरसे रातमें एक बार भोजन करके वर्षकी समाप्तिके अवसरपर शक्करसे पूर्ण पात्रसहित स्वर्णनिर्मित नील कमलको वृषभके साथ दान करता है वह विष्णुलोकको जाता है; यह 'नीलव्रत' कहा जाता है। जो मनुष्य आषाढ़से लेकर चार मासतक शरीरमें तेल नहीं लगाता और भोजनकी सामग्री दान करता है वह श्रीहरिके लोकको जाता है। इस लोकमें यह मनुष्योंमें प्रत्येक व्यक्तिको प्रिय लगनेवाला 'प्रीतिव्रत' नामसे कहा जाता है। जो मनुष्य चैत्रमासमें दही, दूध, घी और शक्करका त्याग कर देता है और 'गौरी मुझपर प्रसन्न हों'—इस भावनासे ब्राह्मण-दम्पतिकी भलीभाँति पूजा करके रसपूर्ण पात्रोंके साथ महीन वस्त्रोंका दान करता है (वह गौरीलोकमें जाता है)। गौरीलोककी प्राप्ति करानेवाला यह 'गौरीव्रत' है॥ १—८॥
पुष्यादौ यत्रयोदश्यां कृत्वा नक्तमथो पुनः।<br>अशोकं काञ्चनं दद्यादिक्षुयुक्तं दशाङ्गुलम्॥ ९<br>विप्राय वस्त्रसंयुक्तं प्रद्युम्नः प्रीयतामिति।<br>कल्पं विष्णुपदे स्थित्वा विशोकः स्यात् पुनर्नरः।<br>एतत् कामव्रतं नाम सदा शोकविनाशनम्॥ १०पुनः जो मनुष्य पुष्यनक्षत्रसे युक्त त्रयोदशी तिथिको रातमें एक बार भोजन कर (दूसरे दिन) दस अङ्गुल लम्बा सोनेका अशोक-वृक्ष बनवाकर उसे वस्त्र और गन्नेके साथ 'प्रद्युम्न मुझपर प्रसन्न हों' इस भावनासे ब्राह्मणको दान करता है, वह एक कल्पतक विष्णुलोकमें निवास करके पुनः शोकरहित हो जाता है। सदा शोकका विनाश करनेवाला यह 'कामव्रत' है।
आषाढादिव्रतं यस्तु वर्जयेन्नखकर्तनम्।<br>वार्त्ताकं च चतुर्मासं मधुसर्पिर्घटान्वितम्॥ ११<br>कार्तिक्यां तत्पुनर्हेमं ब्राह्मणाय निवेदयेत्।<br>स रुद्रलोकमाप्नोति शिवव्रतमिदं स्मृतम्॥ १२जो मनुष्य चौमासेमें—आषाढ़ पूर्णिमासे लेकर कार्तिकतक नख (बाल) नहीं कटवाता और भाँटा नहीं खाता, पुनः कार्तिकी पूर्णिमाको मधु और घीसे भरे हुए घड़ेके साथ स्वर्णनिर्मित भाँटा ब्राह्मणको दान करता है वह रुद्रलोकको प्राप्त होता है। इसे 'शिवव्रत' कहा जाता है।
वर्जयेद् यस्तु पुष्पाणि हेमन्तशिशिरावृतू।<br>पुष्पत्रयं च फाल्गुन्यां कृत्वा शक्त्या च काञ्चनम्॥ १३<br>दद्याद् विकालवेलायां प्रीयेतां शिवकेशवौ।<br>दत्त्वा परं पदं याति सौम्यव्रतमिदं स्मृतम्॥ १४जो मनुष्य हेमन्त और शिशिर-ऋतुओंमें पुष्पोंको काममें नहीं लेता और फाल्गुनमासकी पूर्णिमा तिथिको अपनी शक्तिके अनुकूल सोनेके तीन पुष्प बनवाकर उन्हें सायंकालमें 'भगवान् शिव और केशव मुझपर प्रसन्न हों'—इस भावनासे दान करता है, वह परमपदको प्राप्त होता है। यह 'सौम्यव्रत' कहलाता है।
फाल्गुन्यादितृतीयायां लवणं यस्तु वर्जयेत्।<br>समान्ते शयनं दद्याद् गृहं चोपस्करान्वितम्॥ १५<br>सम्पूज्य विप्रमिथुनं भवानी प्रीयतामिति।<br>गौरीलोके वसेत् कल्पं सौभाग्यव्रतमुच्यते॥ १६जो मनुष्य फाल्गुनमासकी आदि तृतीया तिथिको नमक खाना छोड़ देता है तथा वर्षान्तके दिन 'भवानी मुझपर प्रसन्न हों'—इस भावनासे द्विज-दम्पतिकी भलीभाँति पूजा करके गृहस्थीके उपकरणोंसे युक्त गृह और शय्या दान करता है, वह एक कल्पतक गौरीलोकमें निवास करता है। इसे 'सौभाग्यव्रत' कहा जाता है।
संध्यामौनं नरः कृत्वा समान्ते घृतकुम्भकम्।<br>वस्त्रयुग्मं तिलान् घण्टां ब्राह्मणाय निवेदयेत्॥ १७<br>सारस्वतं पदं याति पुनरावृत्तिदुर्लभम्।<br>एतत् सारस्वतं नाम रूपविद्याप्रदं व्रतम्॥ १८जो मनुष्य संध्याकी वेलामें मौन रहनेका नियम पालन कर वर्षकी समाप्तिमें घृतपूर्ण घट, दो वस्त्र, तिल और घंटा ब्राह्मणको दान करता है, वह पुनरागमनरहित सारस्वत-पदको प्राप्त होता है। सौन्दर्य और विद्या प्रदान करनेवाला यह