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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।

१४* मत्स्यपुराण *

| प्रवृत्तासु पुराणीषु धर्म्यासु ललितासु च।<br>कथासु शौनकाद्यास्तु अभिनन्द्य मुहुर्मुहुः॥ ६<br><br>कथितानि पुराणानि यान्यस्माकं त्वयानघ।<br>तान्येवामृतकल्पानि श्रोतुमिच्छामहे पुनः॥ ७<br><br>कथं ससर्ज भगवाँल्लोकनाथश्चराचरम्।<br>कस्माच्च भगवान् विष्णुर्मत्स्यरूपत्वमाश्रितः॥ ८<br><br>भैरवत्वं भवस्यापि पुरारित्वं च केन हि।<br>कस्य हेतोः कपालित्वं जगाम वृषभध्वजः॥ ९<br><br>सर्वमेतत् समाचक्ष्व सूत विस्तरशः क्रमात्।<br>त्वद्वाक्येनामृतस्येव न तृप्तिरिह जायते॥ १०<br><br>सूत उवाच<br><br>पुण्यं पवित्रमायुष्यमिदानीं शृणुत द्विजाः।<br>मात्स्यं पुराणमखिलं यज्जगाद गदाधरः॥ ११<br><br>पुरा राजा मनुर्नाम चीर्णवान् विपुलं तपः।<br>पुत्रे राज्यं समारोप्य क्षमावान् रविनन्दनः॥ १२<br><br>मलयस्यैकदेशे तु सर्वात्मगुणसंयुतः।<br>समदुःखसुखो वीरः प्राप्तवान् योगमुत्तमम्॥ १३<br><br>बभूव वरदश्चास्य वर्षायुतशते गते।<br>वरं वृणीष्व प्रोवाच प्रीतः स कमलासनः॥ १४<br><br>एवमुक्तोऽब्रवीद् राजा प्रणम्य स पितामहम्।<br>एकमेवाहमिच्छामि त्वत्तो वरमनुत्तमम्॥ १५<br><br>भूतग्रामस्य सर्वस्य स्थावरस्य चरस्य च।<br>भवेयं रक्षणायालं प्रलये समुपस्थिते॥ १६<br><br>एवमस्त्विति विश्वात्मा तत्रैवान्तरधीयत।<br>पुष्पवृष्टिः सुमहती खात् पपात सुरार्पिता॥ १७ | पुराणसम्बन्धिनी धार्मिक एवं सुन्दर कथाओंके प्रसङ्गमें इस दीर्घसंहिता (अर्थात् मत्स्यपुराण)-के विषयमें इस प्रकारकी जिज्ञासा प्रकट की—'निष्पाप सूतजी! आपने हमलोगोंके प्रति जिन पुराणोंका वर्णन किया है, उन्हीं अमृततुल्य पुराणोंको पुनः श्रवण करनेकी हमलोगोंकी अभिलाषा है। मुने! ऐश्वर्यशाली जगदीश्वरने कैसे इस चराचर विश्वकी सृष्टि की तथा उन भगवान् विष्णुको किस कारण मत्स्यरूप धारण करना पड़ा? साथ ही शंकरजीको भी भैरवत्व एवं पुरारित्वकी पदवी किस निमित्तसे प्राप्त हुई? तथा वे वृषभध्वज कपालमालाधारी कैसे हो गये? सूतजी! इन सबका क्रमशः विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये; क्योंकि इस विषयमें आपके अमृत-सदृश वचनोंको सुननेसे तृप्ति नहीं हो रही है॥ ५-१०॥<br><br>सूतजी कहते हैं—द्विजवरो! पूर्वकालमें भगवान् गदाधरने जिस मत्स्यपुराणका वर्णन किया था, इस समय उसीका विवरण (आपलोग) सुनें। यह पुण्यप्रद, परम पवित्र और आयुवर्धक है। प्राचीनकालमें सूर्यपुत्र महाराज (वैवस्वत) मनुने*, जो क्षमाशील, सम्पूर्ण आत्मगुणोंसे सम्पन्न, सुख-दुःखको समान समझनेवाले एवं उत्कृष्ट वीर थे, पुत्रको राज्य-भार सौंपकर मलयाचलके एक भागमें जाकर घोर तपका अनुष्ठान किया था। वहाँ उन्हें उत्तम योगकी प्राप्ति हुई। इस प्रकार उनके तप करते हुए करोड़ों वर्ष व्यतीत होनेपर कमलासन ब्रह्मा प्रसन्न होकर वरदातारूपमें प्रकट हुए और राजासे बोले—'वर माँगो!' इस प्रकार प्रेरित किये जानेपर वे महाराज मनु पितामह ब्रह्माको प्रणाम करके बोले—'भगवन्! मैं आपसे केवल एक सर्वश्रेष्ठ वर माँगना चाहता हूँ। (वह यह है कि) प्रलयके उपस्थित होनेपर मैं सम्पूर्ण स्थावर-जङ्गमरूप जीवसमूहकी रक्षा करनेमें समर्थ हो सकूँ।' तब विश्वात्मा ब्रह्मा 'एवमस्तु—ऐसा ही हो' कहकर वहीं अन्तर्धान हो गये। उस समय आकाशसे देवताओंद्वारा की गयी महती पुष्पवृष्टि होने लगी॥ ११-१७॥ |


* भागवतादिके अनुसार ये सत्यव्रत राजा हैं, जो आगे वैवस्वत मनु हुए हैं।

  • अध्याय १ * | १५
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संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
कदाचिदाश्रमे तस्य कुर्वतः पितृतर्पणम्।<br>पपात पाण्योरुपरि शफरी जलसंयुता ॥ १८<br>दृष्ट्वा तच्छफरीरूपं स दयालुर्महीपतिः।<br>रक्षणायाकरोद् यत्नं स तस्मिन् करकोदरे ॥ १९एक समयकी बात है, आश्रममें पितृ-तर्पण करते हुए महाराज मनुकी हथेलीपर जलके साथ ही एक मछली आ गिरी। उस मछलीके रूपको देखकर वे नरेश दयार्द्र हो गये तथा उसे उस कमण्डलुमें डालकर उसकी रक्षाका प्रयत्न करने लगे।
अहोरात्रेण चैकेन षोडशाङ्गुलविस्तृतः।<br>सोऽभवन्मत्स्यरूपेण पाहि पाहीति चाब्रवीत् ॥ २०एक ही दिन-रातमें वह (वहाँ) मत्स्यरूपसे सोलह अङ्गुल बड़ा हो गया और 'रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये' यों कहने लगा।
स तमादाय मणिके प्राक्षिपज्जलचारिणम्।<br>तत्रापि चैकरात्रेण हस्तत्रयमवर्धत ॥ २१तब राजाने उस जलचारी जीवको मिट्टीके एक बड़े घड़ेमें डाल दिया। वहाँ भी वह एक (ही) रातमें तीन हाथ बढ़ गया।
पुनः प्राहार्तनादेन सहस्रकिरणात्मजम्।<br>स मत्स्यः पाहि पाहीति त्वामहं शरणं गतः ॥ २२पुनः उस मत्स्यने सूर्यपुत्र मनुसे आर्तवाणीमें कहा—'राजन्! मैं आपकी शरणमें हूँ; मेरी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये।'
ततः स कूपे तं मत्स्यं प्राहिणोद् रविनन्दनः।<br>यदा न माति तत्रापि कूपे मत्स्यः सरोवरे ॥ २३<br>क्षिप्तोऽसौ पृथुतामागात् पुनर्योजनसम्मिताम्।<br>तत्राप्याह पुनर्दीनः पाहि पाहि नृपोत्तम ॥ २४तदनन्तर उन सूर्य-नन्दन (वैवस्वत मनु)-ने उस मत्स्यको कुएँमें रख दिया, परंतु जब वह मत्स्य उस कुएँमें भी न अँट सका, तब राजाने उसे सरोवरमें डाल दिया। वहाँ वह पुनः एक योजन बड़े आकारका हो गया और दीन होकर कहने लगा—'नृपश्रेष्ठ! मेरी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये।'
ततः स मनुना क्षिप्तो गङ्गायामप्यवर्धत।<br>यदा तदा समुद्रे तं प्राक्षिपन्मेदिनीपतिः ॥ २५तत्पश्चात् मनुने उसे गङ्गामें छोड़ दिया। जब उसने वहाँ और भी विशाल रूप धारण कर लिया, तब भूपालने उसे समुद्रमें डाल दिया।
यदा समुद्रमखिलं व्याप्यासौ समुपस्थितः।<br>तदा प्राह मनुर्भीतः कोऽपि त्वमसुरेश्वरः ॥ २६<br>अथवा वासुदेवस्त्वमन्य ईदृक् कथं भवेत्।<br>योजनायुतविंशत्या कस्य तुल्यं भवेद् वपुः ॥ २७जब उस मत्स्यने सम्पूर्ण समुद्रको आच्छादित कर लिया, तब मनुने भयभीत होकर उससे पूछा—'आप कोई असुरराज तो नहीं हैं? अथवा वासुदेव भगवान् हैं, अन्यथा दूसरा कोई ऐसा कैसे हो सकता है? भला, इस प्रकार कई करोड़ योजनोंके समान विस्तारवाला शरीर किसका हो सकता है?
ज्ञातस्त्वं मत्स्यरूपेण मां खेदयसि केशव।<br>हृषीकेश जगन्नाथ जगद्धाम नमोऽस्तु ते ॥ २८केशव! मुझे ज्ञात हो गया कि 'आप मत्स्यका रूप धारण करके मुझे खिन्न कर रहे हैं। हृषीकेश! आप जगदीश्वर एवं जगत्के निवासस्थान हैं, आपको नमस्कार है।'
एवमुक्तः स भगवान् मत्स्यरूपी जनार्दनः।<br>साधु साध्विति चोवाच सम्यग्ज्ञातस्त्वयानघ ॥ २९तब मत्स्यरूपधारी वे भगवान् जनार्दन यों कहे जानेपर बोले—'निष्पाप! ठीक है, ठीक है, तुमने मुझे भलीभाँति पहचान लिया है।
अचिरेणैव कालेन मेदिनी मेदिनीपते।<br>भविष्यति जले मग्ना सशैलवनकानना ॥ ३०भूपाल! थोड़े ही समयमें पर्वत, वन और काननोंके सहित यह पृथ्वी जलमें निमग्न हो जायगी।
नौरियं सर्वदेवानां निकायेन विनिर्मिता।<br>महाजीवनिकायस्य रक्षणार्थं महीपते ॥ ३१इस कारण पृथ्वीपते! सम्पूर्ण जीव-समूहोंकी रक्षा करनेके लिये समस्त देवगणोंद्वारा इस नौकाका निर्माण किया गया है।
स्वेदण्डजोद्भिदो ये वै ये च जीवा जरायुजाः।<br>अस्यां निधाय सर्वांस्ताननाथान् पाहि सुव्रत ॥ ३२सुव्रत! जितने स्वेदज, अण्डज और उद्भिज्ज जीव हैं तथा जितने जरायुज जीव हैं, उन सभी अनाथोंको इस नौकामें चढ़ाकर तुम उन सबकी रक्षा करना।
युगान्तवाताभिहता यदा भवति नौर्नृप।<br>शृङ्गेऽस्मिन् मम राजेन्द्र तदेमां संयमिष्यसि ॥ ३३राजन्! जब युगान्तकी वायुसे आहत होकर यह नौका डगमगाने लगेगी, उस समय राजेन्द्र! तुम उसे मेरे इस सींगमें बाँध देना।