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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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कीर्तिसेना ने कहा—'ठीक है।' तब वह ग्वाला पुरुष-वेशधारिणी कीर्तिसेना को वसुदत्त
पुर में ले गया॥१६१॥
ग्वाले ने वहाँ जाकर दुःखित द्वारपाल से सब कुछ निवेदन किया और उस शुभलक्षणा को
उसे सौंप दिया॥१६१॥
द्वारपाल ने भी राजा से निवेदन किया और उसकी आज्ञा से उस सर्वांगसुन्दरी को वह
राजा के पास ले गया॥१६२॥
रोगाक्रान्त राजा वसुदत्त भी उस अद्भुत वैद्य को देखकर प्रसन्न और विश्वस्त हो
गया॥१६३॥
'यदि तुम मेरे इस रोग को दूर करोगे तो मैं तुम्हें इस राज्य का आधा भाग दे दूँगा॥१६४॥
स्वप्न में मैंने देखा है कि एक स्त्री मेरे शरीर पर से काला कम्बल हटा रही है।
इससे समझता हूँ कि तुम निश्चय ही मेरी बीमारी दूर करोगे'॥१६५॥
यह सुनकर कीर्तिसेना कहने लगी—'राजन् आज तो दिन चला गया। अतः कल
तुम्हारा रोग दूर करूँगा अधीर न होना'॥१६६॥
ऐसा कहकर उसने राजा के सिर पर गाय का घी मलवाया उससे उसे नींद आ गई
और तीव्र वेदना कम हो गई॥१६७॥
'वैद्य के रूप में यह कोई देवता आया है'—इस प्रकार कहकर सभी राजपुरुष उसकी
प्रशंसा करने लगे॥१६८॥
महारानी ने भी अनेक प्रकार से उसका स्वागत-सम्मान किया और रात को उस वैद्य
के लिए पृथक् सोने का प्रबन्ध कर दिया॥१६९॥
दूसरे दिन मध्याह्न में मन्त्रियों और राजाओं के सामने ही रादासी से भुनी हुई उस
आश्चर्यजनक युक्ति से कीर्तिसेना ने कान के मार्ग से सभी चोचरों या कनखजूरों को बाहर निकाल
दिया और घी-दूध आदि से राजा को हृष्ट-पुष्ट बना दिया॥१७०-१७२॥
समग्र राजा के रोगमुक्त और स्वस्थ होने पर और घड़े में उन जीवों को देखकर किसे
आश्चर्य नहीं हुआ? ॥१७३॥

कथासरित्सागर

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कथासरित्सागर
राजा च स विलोक्यैतान्कृमीन्मूर्धनिर्गतान् ।
सत्रास दध्यौ मुमुदे मेने जन्म निजं पुनः ॥१७४॥
कृतोत्सवश्च स स्नातः कीर्त्तिसेनांमपूजयत् ।
तामनादृतराज्यार्धां ग्रामहस्त्यश्वकाञ्चनैः ॥१७५॥
देवी च मन्त्रिणश्चैतां हेम्ना वस्त्रैरपूरयन् ।
प्रभुप्राणप्रदोऽस्माकं पूज्यो भिषगसाविति ॥१७६॥
सा च तस्यैव राज्ञस्तान् हस्तेऽर्प्यान्सम्प्रति न्यधात् ।
कञ्चित्कालं व्रतस्थोऽहमित्युक्त्वा भर्त्रपेक्षिणी ॥१७७॥
ततः सम्भाव्यमानात्र सर्वैः कान्यप्यहानि सा ।
यावत्पुरुपवनेन कीर्त्तिसेनावतिष्ठते ॥१७८॥
तावच्छश्राव लोकात्तं वल्लभीतः समागतम् ।
सार्थवाहं पथा तेन देवसेनं निजं पतिम् ॥१७९॥
पुरि सत्राष तं सार्थं प्राप्तं बुद्ध्वैव सान्त्वनात् ।
भर्त्तरि तमपश्यच्च मयूरीव नवाम्बुदम् ॥१८० ॥
क्लिन्नेनेव चिरोत्सुक्यसन्तापप्रविलायिना ।
दत्तानन्दवाष्पेण पादयोस्तस्य चापतत् ॥१८१॥
सोऽपि प्रत्यभ्यजानाच्च वेषच्छन्नां निरूप्य ताम् ।
भर्त्ता भास्करकरांकश्यां दिवा मूर्त्तिमिवैन्दवीम् ॥१८२॥
तस्य तद्वदनेन्दु च चन्द्रकान्तस्य पद्वतः ।
देवसेनस्य हृदयं चित्रं न गलति स्म यत् ॥१८३॥
अथास्यां कीर्त्तिसेनायामेवं प्रकटीतात्मनि ।
किमेतदिति साश्चर्य स्थिते तस्मिंश्च तत्पतौ ॥१८४॥
विस्मिते च वणिग्ग्रामे तद्बुद्ध्वैव सविस्मयः ।
स राजा वसुदत्तांश्च स्वयमेव किलाययौ ॥१८५॥
तत पृष्टा च सा कीर्त्तिसेना पत्युः पुरार्यविप्रम् ।
स्वश्वश्रूद्भवशिश्रोतान्तं स्ववृत्तान्तमवर्णयत् ॥१८६॥
देवसेनश्च तच्छ्रुत्वा तद्गतां स स्वमातरि ।
पराङ्मुखो भवतक्रोधशमाविष्मयपर्हुवान् ॥१८७॥
भर्तृभक्तिरपारण्डा धीर्महाद्भूतशिता ।
धर्मगारययः साध्व्या जयन्ति मतिहेतयः ॥१८८॥

षष्ठ लम्बक १८१

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षष्ठ लम्बक १८१

[Text]
राजा भी अपने मस्तक से निकले हुए उन कीड़ों को देखकर स्वस्थ हुआ-सा सोचने लगा
और प्रसन्न हुआ। उसने अपना पुनर्जन्म माना ॥१७४॥
तदनन्तर उत्सव करके स्नान किये हुए राजा ने कीर्तिसेना की पूजा की। भेंट में आधा
राज्य लेने से इन्कार कर देने पर कीर्तिसेना को राजा ने गाँव हाथी घोड़े और सोने आदि से
सन्तुष्ट किया ॥१७५॥
महारानी और मन्त्रियों ने अपनी-अपनी ओर से स्वर्ण और वस्त्रों के उपहारों के ढेर लगा
दिये क्योंकि वह उनके प्रभु को प्राणदान करनेवाला पूज्य वैद्य था ॥१७६॥
पति की प्रतीक्षा करती हुई कीर्तिसेना ने उनके दिए हुए उपहारों को उन्हें ही लौटाते
हुए कहा कि मैं अभी व्रत में हूँ इसलिए अभी न लूँगी ॥१७७॥
इस प्रकार सभी से सम्मानित वह कीर्तिसेना पुरुष के वेष में कुछ समय तक वहीं ठहर
गई ॥१७८॥
वहाँ ठहरे हुए उसने लोगों से सुना कि उसका पति व्यापारी देवसेन बल्भी से उसी मार्ग
होकर आ गया ॥१७९॥
उस व्यापारिक-दल को नगरी में आया हुआ जानकर वह दल की ओर गई।
मयूरी जैसे मेघ को देखती है, उसी प्रकार उसने उस दल में अपने पति को
देखा ॥१८०॥
चिरकालीन उत्कण्ठा के मन्मथ से गिरते हुए आँसुओं का अर्घ्य देकर वह पति के चरणों
में गिर पड़ी ॥१८१॥
उस (पति) ने भी उसे देखा और पुरुष के वेष में छिपी हुई उसे उसी प्रकार पहचाना
जिस प्रकार चन्द्रमा दिन में सूर्य की किरणों से दृष्टिगोचर होता है ॥१८२॥
कीर्तिसेना के मुखचन्द्र को देखकर चन्द्रकान्त के समान देवसेन का हृदय पिघल नहीं गया
यही आश्चर्य है ॥१८३॥
तदनन्तर कीर्तिसेना के इस प्रकार स्वरूप को प्रकट कर देने पर उसके पतिदेव देवसेन
के आश्चर्य-चकित हो जाने पर और व्यापारियों के दल के भी यह जानकर विस्मित हो जाने पर
सहित राजा बहुदल भी नृत्य करने सा लगा ॥१८४-१८५॥
राजा से पूछी गई कीर्तिसेना ने पति के सामने ही सास की दुश्चरित्रता के अपने सारे
वृत्तान्त को कह सुनाया ॥१८६॥
उधर पति देवसेन यह सब सुनकर क्रोध आश्चर्य तथा विस्मय और हर्ष से भरा हुआ
अपनी भार्या से लिपट गया ॥१८७॥
जिसने पतिव्रत-रूपी रक्षा कर रखी हुई शक्ति रूपी कलत्र में गुण एवं धर्म-रूपी रत्नों
के भण्डारे कीर्तिसेना रूप में स्थित प्राप्त करली ॥१८८॥
२४

१८२ कथासरित्सागर

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१८२ कथासरित्सागर
इति तत्र मिथोऽवादीदाकर्ण्य तदद्भुतम्।
चरितं कीर्तिसेनायाः सानन्दः सकलो जनः ॥१८९॥
राजाप्युवाच पत्यर्थमायितक्लेशयानया।
सीतादेव्यपि रामस्य परिक्लेदावहा जिता ॥१९०॥
तत्सा धर्मभगिनी मम प्राणप्रदायिनी।
इत्युक्तवन्तं तं भूपं कीर्तिसेनाथ चाब्रवीत् ॥१९१॥
देव त्वत्प्रीतिदायो यस्तव हस्ते मम स्थितः।
ग्रामहस्त्यश्वरत्नादिः स मे भर्त्रे समर्प्यताम् ॥१९२॥
एवमुक्तस्तया राजा दत्वा ग्रामादि तस्य तत्।
तद्भर्तुर्देवसेनस्य प्रीतः पट्टं बबन्ध सः ॥१९३॥
अथ नरपतिदत्तसर्वणिन्याजिताैध
प्रसभभरितकोपो देवसेनो धनाद्यैः।
परिवृतजननीकः संस्तुवन् कीर्तिसेनां
कृतवसतिरमुष्मिन्नेव तस्थौ पुरे सः ॥१९४॥
मुदितमपगतपापदवधुकं कीर्तिसेना-
व्यसमचरितकथ्यख्यातिरासाध तत्र।
न्यवसत्सिसभोगैश्वर्यभागान्तिकस्था
मुक्कतफलसमृद्धिर्देवदेव भर्तुः ॥१९५॥
एवं विपत्सु विधुरस्य विधेर्नियोग
मापत्सु रक्षितचरित्रधना हि साध्यः।
गुप्ताः स्वसत्वविभवेन महत्सनेन
कल्याणमादधति पत्युरथारमनश्च ॥१९६॥
इत्थं च पार्थिवकुमारि भवन्ति दोषा-
श्वश्रूननान्दृविहिता बहवो वधूनाम्।
तद्भर्तृवेश्म तव तावदधर्मयेद्ध्वं
श्वश्रूर्न यत्र न च यत्र शठा ननान्दा ॥१९७॥
इतीवमानन्दिकमाद्भुतं सा मुक्ताश्रितम्पासुरराजपुत्र्या।
सोमप्रभाया मनुजेन्द्रपुत्री कलिङ्गसेना परितुष्यति स्म ॥१९८॥
ततो विचित्नार्थकथावसानं दृष्ट्वैव गन्तुं मिहिरे प्रवृत्ते।
सोत्कां समालिङ्ग्य कलिङ्गसेना सोमप्रभा स्वं भवनं जगाम ॥१९९॥
इति महाकविश्रीसोमदेवेनभट्टविरचिते कथासरित्सागरे
मदनमञ्चकालम्बके तृतीयस्तरङ्गः।

षष्ठ लम्बक १६३

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षष्ठ लम्बक १६३
वहाँ एकत्र सभी जन इस अद्भुत रहस्य को जानकर आनन्द से इस प्रकार कहने
लगे ॥१८९॥
राजा ने भी कहा—'इसने पति के लिए इतना कष्ट उठानेवाली सीतादेवी को भी
जीत किया ॥१९०॥
इसलिए मुझे प्राणदान देनेवाली यह मेरी धर्म-बहिन है। इस प्रकार कहते हुए राजा से
कीर्तिसेना कहने लगी—॥१९१॥
'महाराज आप द्वारा दिया गया जो प्रमोपहार गाँव हाथी आदि आपके हाथ मेरा
है, यह सब आप मेरे पति को दे दें। राजा ने भी प्रसन्न होकर देवसेन का पट्ट बन्धन
किया ॥१९२ १९३॥
तदनन्तर वह देवसेन राजा द्वारा दिये हुए और व्यापार द्वारा अर्जित धनराशि से धनी
होकर, अपनी माता को छोड़कर कीर्तिसेना की प्रशंसा करता हुआ उसी वसुदत्तपुर में रहने
लगा ॥१९४॥
कीर्तिसेना अपने असाधारण चरित्र से प्रसिद्ध होकर अपने पति के पुण्य फलों की शरीर
धारिणी मूर्ति के समान विपुल ऐश्वर्य का उपभोग करती हुई सास के दुःख से छूटकर, सुखपूर्वक
रहने लगी ॥१९५॥
इस प्रकार विधि के भीषण विधानों को सहन करके आपत्ति-काल में भी अपने चरित्र-बल
की रक्षा करनेवाली सच्चरित्र स्त्रियाँ अपने आत्मबल से रक्षित होकर अपना तथा अपने पति दोनों
का कल्याण करती हैं॥१९६॥
इसलिए हे राजकुमारी सास और ननद के कारण स्त्रियों को ऐसी-ऐसी दुर्घटनाओं का
लक्ष्य (शिकार) होना पड़ता है। इसलिए मैं तुम्हारे लिए ऐसा पतिगृह चाहती हूँ जहाँ पापिन
सास और दुष्टा ननद न हों ॥१९७॥
असुरराज मयासुर की पुत्री सोमप्रभा के मुँह से इस ज्ञान रसायक अद्भुत कथा को सुनकर
मनुजेन्द्रपुत्री कलिङ्गसेना अत्यन्त प्रसन्न हुई ॥१९८॥
इस प्रकार विचित्र कथा का अन्त देखकर ही मानों सूर्य भगवान् के अस्ताचल पर चले
जाने पर, सोमप्रभा भी उत्कण्ठिता कलिङ्गसेना का आलिङ्गन करके अपने भवन को गई ॥१९९॥
तृतीय तरंग समाप्त

३८४ कथासरित्सागर

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३८४ कथासरित्सागर

चतुस्त्रिंशस्तरङ्गः
मदनवेगनाम्नो विद्याधरस्य कथा
अथ स्वसद्म यातायाः पदव्यां मार्गमवेक्षितुम् ।
सोमप्रभायाः स्नेहेन मार्गहर्म्याग्रमास्थिताम् ॥१॥
कलिङ्गसेनामारक्तां ददर्श गगनागतः ।
दैवान्मदनवेगाख्यो युवा विद्याधराधिपः ॥२॥
स तां दृष्ट्वैव रूपेण जगत्त्रितयमोहिनीम् ।
क्षोभं जगाम कामेन्द्रजालिकस्येव पिच्छिकाम् ॥३॥
अलं विद्याधरस्त्रीभिः का कथाप्सरसामपि ।
यत्रेदृशमेतस्या मानुष्या रूपमद्भुतम् ॥४॥
तदेषा यदि मे न स्याद् भार्या किं जीवितेन तत् ।
कथं च मानुषीसङ्गं कुर्यां विद्याधरोऽपि सन् ॥५॥
इत्यालोच्य स दध्यौ च विद्यां प्रज्ञप्तिसञ्ज्ञिकाम् ।
सा चाविर्भूय साकारा तमेवमवदत्तदा ॥६॥
तत्त्वतो मानुषी नैवैषा शापच्युताप्सराः ।
जाता कलिङ्गदत्तस्य गृहे सुभग ! भूपतेः ॥७॥
इत्युक्ते विद्यया सोऽथ हृष्टो गत्वा स्वधामनि ।
विद्याधरोऽन्यविमुखः कामार्तः समचिन्तयत् ॥८॥
हठाद्यदि हराम्‍येतां तदेतन्मे न युज्यते ।
स्त्रीणां हठोपभोगे हि मम शापोऽस्ति मृत्युदः ॥९॥
तदेतत्प्राप्तये शम्भुराराध्यस्तपसा मया ।
तपोऽधीनानि हि श्रेयांस्युपायोऽन्यो न विद्यते ॥१०॥
इति निश्चित्य चान्येद्युर्गत्वा ऋष्यमपर्वतम् ।
एकपादस्थितस्तप्ते निराहारस्तपांसि सः ॥११॥
अथ तुष्टोऽचिरात्तीव्रैस्तपोभिर्वत्सदर्शनः ।
एवं मदनवेगं तमादिदेशाम्बिकापतिः ॥१२॥
एषा कलिङ्गसेनाख्या ख्याता रूपेण भूतले ।
कन्या नास्याश्च भर्त्तापि सदृशो रूपसम्पदा ॥१३॥
एकस्तु वत्सराजोऽस्ति स चैतामभिवाञ्छति ।
किं तु बान्धववशाया भीत्या प्रार्थयते स्फुटम् ॥१४॥

षष्ठ लम्बक | १४५

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षष्ठ लम्बक | १४५

चौथा तरंग
मदनवेग विद्याधर की कथा

तदनन्तर अपने घर को गई हुई सोमप्रभा को पीछे की ओर से देखने के लिए, राजमार्ग
के किनारे, अपने भवन की छत पर खड़ी कलिङ्गसेना को दैवयोग से समीप-स्थित मदनवेग
नामक विद्याधरों के युवक सरदार ने देखा ॥१२॥
अपने अनुपम रूप से तीनों लोकों को जीतनेवाली कामरूपी ऐन्द्रजालिक की जादुई छड़ी
के समान उस कलिङ्गसेना के रूप को देखकर मदनवेग स्तब्ध हो गया ॥१३॥
जहाँ मानव कन्या का ऐसा रूप है, वहाँ विद्याधरियों और अप्सराओं की क्या कथा ॥१४॥
अतः यदि वह मेरी स्त्री न हुई, तो मेरे जीवन से क्या लाभ ? किन्तु मैं विद्याधर होकर
मानवी का संग कैसे कर सकता हूँ ॥१५॥
ऐसा सोचकर उसने प्रज्ञप्ति नामक विद्या का ध्यान किया। वह विद्या मूर्तीव उपस्थित
होकर मदनवेग से इस प्रकार कहने लगी- ॥१६॥
'वास्तव में यह कन्या मानुषी नहीं है। यह शापच्युत अप्सरा है, जो राजा कलिङ्गसेन
के यहाँ उत्पन्न हुई है ॥१७॥
ऐसा सुनकर मदनवेग अपने घर गया और सब कार्यों से विरक्त होकर काम-पीड़ित हो
सोचने लगा ॥१८॥
यदि मैं इसका स्वेच्छापूर्वक अपहरण करूँ तो यह मेरे लिए उचित नहीं है। प्रच्छन्नरूप
स्त्रियों का हरण करना यश-मृत्यु कहलाता है यह शास्त्र-मत मिला है ॥१९॥
अतः इसकी प्राप्ति के लिए मुझे शिवजी की आराधना करनी चाहिए क्योंकि कल्याण
शिव के अधीन होता है और दूसरा कोई उपाय नहीं ॥२०॥
ऐसा निश्चय करके वह दूर स्थित आश्रम पर्वत पर जाकर एक पैर से खड़े होकर और
निराहार रहकर तप करने लगा ॥२१॥
तदनन्तर शीघ्र ही उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर और रूप देकर शिवजी मदनवेग
से इस प्रकार कहने लगे- ॥२२॥
'यह कलिङ्गसेना मेरी पत्नी के अर्थी वत्सराज के लिए नियत है। इसके पूर्व भी
अन्यजन्मान्तर में इसने मन्दिर से राजा... ॥२३॥
यह कन्या देव का राजा उत्पन्न करने के वर इसे बताया है। किन्तु उस वरदानकी अन्यत्र
रूप के वर में नष्ट कर के दूर कभी होगा ॥२४॥

१८६ कथासरित्सागर

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१८६ कथासरित्सागर
एषापि रूपरुचा तं श्रुत्वा सोमप्रमामुखात् ।
स्वयंवराय वत्सेशं राजपुत्र्यभिवाञ्छति ॥१५॥
तत्र यावद्विवाहोऽस्या न भवस्तावदन्तरम् ।
कृत्वा कामासहस्यथ रूपं वत्सेश्वरस्य तत् ॥१६॥
गत्वा गान्धर्वविधिना भार्या कुर्याद् भवानिमाम् ।
एवं कलिङ्गसेनासौ तव सत्येति सुन्दरी ॥१७॥
इत्यादिष्टः स राज्ञेन प्रणिपत्याथ तं ययौ ।
गृहं मन्मथवेगः स्वं काञ्चनगिरेस्तटम् ॥१८॥
अत्रान्तरे प्रतिदिनं गच्छन्त्या निजमन्दिरम् ।
प्रतिप्रभातमायान्त्या यन्त्रेण व्योमगामिना ॥१९॥
तया तक्षशिलापुर्यां सा सोमप्रभया सह ।
कलिङ्गसेना क्रीडन्ती तां जगादैकां रहः ॥२०॥
सखि वाच्यं न कस्यापि त्वया यत्ते ब्रवीम्यहम् ।
विवाहो मम सम्प्राप्त इति जाने यत शृणु ॥२१॥
इह मां याचितुं दूता प्रेषिता बहुभिर्नृपैः ।
ते च तातेन सङ्गत्य तथैव प्रेषिता इतः ॥२२॥
यस्तु प्रसनजिन्नाम श्रावस्त्यामस्ति भूपतिः ।
तदीयः केवलं दूतः सादरं तेन सत्कृतः ॥२३॥
मन्निमित्तं चान्बधाय्यैतत्तमन्वे मङ्गलं नृपः ।
स तावस्य वयाम्बायाः कुलीन इति सम्मतः ॥२४॥
स हि तत्र कुले जातो यत्राम्बाम्बालिकात्रिकाः ।
पितामह्याः कुरुणां च पाण्डवानां च जज्ञिरे ॥२५॥
तत्प्रसेनजिते तस्मै सखि दत्तास्मि साम्प्रतम् ।
तातेन राज्ञे श्रावस्त्यां नगर्यामिति निश्चयः ॥२६॥
एतत्कलिङ्गसेनायाः श्रुत्वा सोमप्रभा शुचा ।
मुञ्चन्तीबाष्प हारं सद्यो धारायुपाऽपतत् ॥२७॥
जगाद चैतां पृच्छन्तीं वयस्यामश्रुकारणम् ।
दृष्टनिक्षेपभूलोका सा मयासुरपुत्रिका ॥२८॥
वरो रूपं कुलं शीलं वित्तं चेति वरस्य यत् ।
मुख्यं सखि तदार्थं वयोवर्णादिकं तत ॥२९॥

षष्ठ लम्बक १८७

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षष्ठ लम्बक १८७
सौन्दर्य की शोभिन यह कलिङ्गसेना भी सोमप्रभा के मुख से वत्सराज की रूप प्रशंसा
सुनकर उसे स्वय वरण करना चाहती है॥१५॥
इसलिए जब तक इसका विवाह नहीं होता इसी बीच शीघ्रता करते हुए तुम वत्सराज
का रूप बनाकर इससे गांधर्व विवाह कर लो। 'इस प्रकार सुन्दरी कलिङ्गसेना तुम्हारी
हो जायगी' ॥१६-१७॥
शिवजी से ऐसा आदेश पाकर और उन्हें प्रणाम करके मदनवेग कालकूट पर्वत पर, अपने
घर, चला गया॥१८॥
इसी बीच प्रतिदिन यन्त्रचालित वायुयान से रात को अपने घर आती हुई और प्रातःकाल
उज्जयिनी आती हुई और खेलती हुई सोमप्रभा से कलिङ्गसेना ने एकबार कहा॥१९-२०॥
कलिङ्गसेना के विवाह की कथा
'सखि ! मैं तुमसे जो कहती हूँ वह किसी से कहना नहीं। मैंने सुना है कि मेरे विवाह का
समय आ गया है। मुझ माँगने के लिए अनेक राजाओं ने दूत भेजे हैं। किन्तु, मेरे पिता ने
उन्हें वहाँ से लौटा दिया है॥२१-२२॥
किन्तु श्रावस्ती नगरी का राजा प्रसेनजित् है। केवल उसी के दूत को मेरे पिता ने
विशेष रूप से सत्कृत किया ॥२३॥
मेरी माता से भी सम्मति कर ली है। कुलीन होने के कारण वह मेरे माता-पिता को
सम्मत है॥२४॥
वह उस कुल में उत्पन्न हुआ है जिसमें कौरवों और पांडवों की अम्बा अम्बालिका आदि
दादियाँ उत्पन्न हुईं ॥२५॥
हे सखि इस समय मुझे पिता ने श्रावस्ती नगरी में उस प्रसेनजित् को ही दे दिया है ॥२६॥
कलिङ्गसेना से यह सुनकर सोमप्रभा आँसुओं का हार बनाती हुई रोने लगी ॥२७॥
सखी के रोने का क रण पूछने पर समस्तभूलोक को देखती हुई सोमप्रभा कहने लगी-॥२८॥
अवस्था रूप कुल चरित्र आदि जो वर में ढूँढे जाते हैं, उनमें सर्वप्रथम अवस्था ही
है। वंश आदि उसके बाद की गिनती में किये जाते हैं ॥२९॥

१८८ कथासरित्सागर

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१८८ कथासरित्सागर
प्रसेनजिच्च प्रवया स दृष्टो नृपतिर्मया।
जातीपुष्पस्य जात्येव जीर्णस्यास्य कुलेन किम् ॥३०॥
हिमशुभ्रेण तेन त्व हेमन्तेनेव पद्मिनी।
परिम्लानाम्बुजमुखी युक्त्त्या शाष्या भविष्यसि ॥३१॥
अतो जातो विषादो मे प्रहर्षस्तु भवेन्मम।
यदि स्याद् वत्सराजस्ते कल्याण्युदयन पति ॥३२॥
तस्य नास्ति हि रूपेण लावण्येन कुलेन च।
शौर्येण च विभूत्या च तुल्योऽन्यो नृपतिर्भुवि ॥३३॥
तेन चेद्युज्यसे भर्त्रा सदृशेन कृशोदरि।
धातु फलति लावण्यनिर्माणं तदिदं त्वयि ॥३४॥
इति सोमप्रभाक्ॢप्तैर्वाक्यैम्र्मैन्त्रैरिवेरितम्।
ययौ कलिङ्गसेनाया मनो वत्सेश्वर प्रति ॥३५॥
ततश्च सा तां पप्रच्छ राजकन्या समारमजाम्।
कथं स वत्सराजाख्य सखि किं वंशसम्भवः ॥३६॥
कथं चोदयनो नाम्ना त्वया मे कथ्यतामिति।
साथ सोमप्रभावादीच्छृणु तत्सखि वच्मि ते ॥३७॥
वत्स इत्यस्ति विख्यातो देशो भूमेर्विभूषणम्।
पुरी तत्रास्ति कौशाम्बी द्वितीयेवामरावती ॥३८॥
तस्यां स कुरुते राज्य यतो वत्सेश्वरस्ततः।
वंश च तस्य कल्याणि कीर्त्यमानं मया शृणु ॥३९॥
पाण्डवस्यार्जुनस्याभूदभिमन्युः किलात्मजः।
चक्रव्यूहभिदा येन नीता कुरुचमू क्षयम् ॥४०॥
तस्मात्परीक्षिदभवद्राजा भरतवंशभृत्।
सर्पसत्रप्रणेताभूत्ततोऽपि जनमेजयः ॥४१॥
ततोऽभवच्छतानीकः कौशाम्बीमप्युवास सः।
यश्च देवासुररणे दैत्यान्हत्वा व्यपद्यत ॥४२॥
तस्माद्राजा जगद्धाता सहस्रानीक इत्यभूत्।
यः पात्रेणेवितरमो दिवि चक्रे गतागतम् ॥४३॥
तस्य देव्यां मृगावत्यामसाबुदयनोऽजनि।
भूषणं धतिनो वंशे जगन्नेत्रोत्सवो नृपः ॥४४॥

षष्ठ लम्बक १८९

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षष्ठ लम्बक १८९
राजा प्रगतजित् को मैंने देखा है। वह वृद्ध है। मरप्राय हुए जाती (मालती) के पुष्प
के समान उस वृद्ध की जाति या कुल से क्या करना है ॥३१॥
हिम के समान श्वेत उस वृद्ध के संसर्ग मलिन मुखवाली तू ऐसी लगेगी जैसे हेमन्त में
हिम से मारी हुई कमलिनी शोचनीय हो जाती है ॥३२॥
इसलिए सब गए हुआ। प्रसन्नता तो तब हो जब हे कल्याणि वस्सराज उदयन तेरा
पति हो ॥३३॥
रूप से लावण्य से कुल से शौर्य से और ऐश्वर्य से उनके समान पृथ्वी पर दूसरा राजा
नहीं है ॥३३॥
हे पुत्रक! कमलनाक्षी यदि तू अपने समान उस पति से युक्त हो जाय तो विधाता का
तुझमें सौन्दर्य उत्पन्न करना सफल हो जाय' ॥३४॥
इस प्रकार सोमप्रभा के यन्त्रों के समान वाक्यों से प्रेरित कलिंगसेना का मन वत्सेश्वर
पर चला गया ॥३५॥
तब राजकन्या ने सोमप्रभा से पूछा— सखि वह वत्सराज किस वंश में उत्पन्न हुआ है
और उसका नाम उदयन कैसे हुआ ? तब सोमप्रभा बोली— सखि कहती हूँ सुनो' ॥३६–३७॥
वत्सराज की संक्षिप्त कथा
इस भूमि का भूषण वत्स नाम का देश है। उसमें दूसरी इन्द्रपुरी के समान कौशाम्बी
नाम की नगरी है ॥३८॥
उस नगरी में वत्सेश्वर राज्य करता है। अब मैं उसके वंश का वर्णन करती
हूँ सुनो ॥३९॥
पाण्डु के पुत्र अर्जुन का लड़का अभिमन्यु हुआ। चक्रव्यूह का भेदन करनेवाले जिस
अभिमन्यु ने कौरवों की सेना का संहार किया था ॥४०॥
उस अभिमन्यु द्वारा भरत-वंश को चलानेवाला परीक्षित नाम का पुत्र उत्पन्न हुआ।
परीक्षित् से सर्पसत्र (नागयज्ञ) करनेवाला पुत्र राजा जनमेजय हुआ। जनमेजय से शतानीक
नाम का राजा हुआ जिसने कौशाम्बी को अपनी राजधानी बनाया और जो देवासुर-संग्राम में
दैत्यों को मारता हुआ स्वयं भी मारा गया ॥४१ ४२॥
उस शतानीक से संसार में प्रशंसनीय सहस्रानीक नाम का राजा हुआ जो इन्द्र के रथ
भेजने पर भूमि से स्वर्ग में यातायात किया करता था ॥४३॥
उस सहस्रानीक की रानी मृगावती के गर्भ से उदयन नाम का कुलभूषण और संसार की
आँखों को आनन्द देनेवाला राजा हुआ ॥४४॥
८७

६२ कथासरित्सागर

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६२ कथासरित्सागर
नाम्नो निमित्तमप्यस्य शृणु सा हि मृगावती।
अन्तर्वत्नी सती राज्ञो जनन्यस्य सजन्मना ॥४५॥
उत्पन्नरुधिरस्नानदोहदा पापभीरुणा।
भर्त्रा रचितलाक्षादिरसवापीकृताप्लवा ॥४६॥
पक्षिणा तार्क्ष्यवंश्येन निपतत्यामिषक्षुधया।
नीत्वा विधिवशात्त्यक्ता जीवन्त्येवोदयाचले ॥४७॥
तत्र चाश्वासिता भूयो भर्तृसङ्गमवादिना।
जमदग्न्यर्षिणा दृष्टा स्थितासौ तत्र चाश्रमे ॥४८॥
अवज्ञाजनितैर्ष्यायाः कश्चित्काल हि तादृशः।
शापस्तिलोत्तमातोऽभूत्तद्भर्तुस्तद्वियोगकृत् ॥४९॥
दिवसे सा च तत्रैव जमदग्न्याश्रमे सुतम्।
उदयाद्रौ प्रसूते स्म द्यौरिन्दुमिव नूतनम् ॥५०॥
असावदमनो जात सार्वभौमो महीपतिः।
जनिष्यते च पुत्रोऽस्य सर्वविद्याधराधिपः ॥५१॥
इत्युच्चार्याम्बराद् वाणीमशरीरां तदा सुखम्।
प्रागोदयन इत्यस्य देवैरुदयजं कृतम् ॥५२॥
सोऽपि शापान्तबद्ध्याशः काल मात्रस्थितोधितः।
कृच्छ्रात् सहस्रानीकस्तां विनानेपीन्मृगावतीम् ॥५३॥
प्राप्ते शापावसाने तु शबराद् विधियोगतः।
उदयाद्रेश्रपायातात् प्राप्याभिज्ञानमात्मनः ॥५४॥
आवेदितार्थस्तत्पाल गगनोद्भूतया गिरा।
दावरं तं पुरस्कृत्य जगामेवोद्याश्रमम् ॥५५॥
तत्र वाञ्छितमसिद्धिमिव प्राप्य मृगावतीम्।
भार्यामुदयनं तं च मनोरथमिवात्मजम् ॥५६॥
तौ गृहीत्वाय कौशाम्बीमागत्यैवाभिपिञ्चतान्।
यौवराज्ये तनूजं सं तद्गुणोत्कषतोषितः ॥५७॥
योगंधरायणादींश्च तस्मै मन्त्रिसुतान् ददौ।
तेनाप्तभागे शुशुभे भोगा भार्यामिवस्थिरम् ॥५८॥
आत्मारराज्यं राज्यं च तमवान्यनं सुतम्।
शुद्धं स भार्यागच्छित्वा ययौ राजा महापथम् ॥५९॥

षष्ठ लम्बक ६६१

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षष्ठ लम्बक ६६१
अब इसके उदयन नाम का कारण भी सुनो—एक बार सहस्रानीक की रानी और उदयन
की माता मृगावती गर्भवती हुई। गर्भावस्था में उसे रुधिर से भरी बावली में स्नान करने की
इच्छा हुई, तो पाप से भीत राजा सहस्रानीक ने लाक्षा आदि के लाल रंग से बावली भरवा दी।
उसमें स्नान की हुई रानी में मांस के टुकड़े का भ्रम करके गरुड़-वंश के पक्षी ने उसे
उठा लिया और ले जाकर उदयाचल पर्वत पर उसे जीते ही छोड़ दिया॥४५-४७॥
वहाँ पर उसे पुत्र पति-मिलन की आशा दिलानेवाले जामदग्न्य ऋषि ने रानी को धैर्य
प्रदान किया और उसे अपने आश्रम में ले गये॥४८॥
दिन पूरे होने पर रानी ने उसी आश्रम में पुत्र को इस प्रकार उत्पन्न किया जैसे आकाश
नवीन चन्द्र को उत्पन्न करता है॥४९॥
अपमान से क्रुद्ध तिलोत्तमा ने उसके पति को शाप दिया था जो इस रूप में दोनों का वियोग
दुःख देनेवाला हुआ॥५०॥
'यह उदयन सारी पृथ्वी का चक्रवर्ती राजा हुआ और इसका पुत्र समस्त विद्याधरों का
चक्रवर्ती राजा होगा'॥५१॥
इस प्रकार की आकाशवाणी के कारण और उदयपर्वत पर जन्म लेने के कारण इसका
नाम उदयन हुआ॥५२॥
मातलि (इन्द्र के सारथी) द्वारा परिचय कराया गया और शाप का अन्त होने की आशा
बाँधे हुए राजा सहस्रानीक ने मृगावती के बिना चौदह वर्ष वियोग में व्यतीत किये॥५३॥
शाप का अन्त होने पर, दैववश उदयाचल से आये हुए एक भील से परिचय पाकर और
आकाशवाणी से प्रेरित होकर सहस्रानीक उसी भील को पथ प्रदर्शक बनाकर उदयाचल पर
गया॥५४-५५॥
वहाँ पर मूर्तिमती वाञ्छित सिद्धि के समान मृगावती पत्नी तथा मनोराज्य के समान पुत्र
उदयन को पाकर और उन्हें लेकर राजा कौशाम्बी आया। और, कौशाम्बी आते ही उदयन के
गुणों से सन्तुष्ट होकर उसे युवराज-पद पर प्रतिष्ठित कर दिया॥५६-५७॥
और यौगन्धरायण आदि अपने मन्त्रियों के पुत्रों को उनके मन्त्रिमण्डल में प्रतिष्ठित कर
दिया। उदयन के राज्य-भार सँभाल लेने पर राजा महारानी के साथ सांसारिक सुखों का उपभोग
करता रहा। वृद्धावस्था में समस्त राज्य-भार उदयन को देकर राजा महाप्रस्थान को चला
गया॥५८-५९॥

१९२ कथासरित्सागर

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१९२ कथासरित्सागर
एवं स पित्र्यं राज्यं तत्प्राप्य जित्वा ततोऽखिलाम् ।
यौगन्धरायणसखः प्रशास्त्युदयनो महीम् ॥६०॥
इत्याशु कथयित्वा सा कथां सोमप्रभा रहः ।
सखीं कलिङ्गसेनां तां पुनरेवमभाषत ॥६१॥
एवं वत्सपुरे राजत्वाद्वत्सराजः सुगात्रि सः ।
पाण्डवान्वयसम्भूत्या सोमवंशोद्भवस्तथा ॥६२॥
नाम्नाप्युदयनः प्रोक्तो देवरूप्यजन्मना ।
रूपेण चात्र संसारे कन्दर्पोऽपि न तादृशः ॥६३॥
स एकस्तव तुल्योऽस्ति पतिस्त्रैलोक्यसुन्दरि ।
स च वाञ्छति लावण्यल्ब्धस्तां प्राप्सिता ध्रुवम् ॥६४॥
किं तु चण्डमहासेनमहीपतितनूद्भवा ।
अस्ति वासवदत्ताख्या तस्याग्रमहिषी सति ॥६५॥
तया स न वृतस्त्यक्त्वा बान्धवानतिरक्तया ।
उपायेङ्गितवेदीनां कन्यानां धुतसञ्जयः ॥६६॥
नरवाहनदत्ताख्यस्तस्यां जातोऽस्य चात्मजः ।
आदिष्टः किल देवैर्या भावी विद्याधराधिपः ॥६७॥
अतस्तस्याः स वत्सेशो विमत्त्वां नेह याचते ।
सा च दृष्टा मया न त्वां स्पर्धते रूपसम्पदा ॥६८॥
एवमुक्तवतीं तां च सखीं सोमप्रभां तदा ।
कलिङ्गसेना वत्सशंगोत्सुका निजगाद सा ॥६९॥
जानेऽहमेतदवस्थायाः पित्रोः सख्यं तु किं मम ।
सर्वज्ञा सुप्रभावा च त्वमेवात्र म गतिः ॥७०॥
दैवायत्तमिदं कार्यं तथा चात्र कथां शृणु ।
सोमप्रभा तामित्युक्त्वा शशंसान्ये कथामिमाम् ॥७१॥
तेजस्वत्याः कथा
राजा विक्रमसेनाख्य उज्जयिन्यामभूत्पुरा ।
तस्य तेजस्वतीत्यासीद्रूपेणाप्रतिमा सुता ॥७२॥
तस्याह्यभिमतः कश्चिद्याच्या नाभूद्वरो नृपः ।
एकदा च ददर्श पुरुषं सा स्वहर्म्यगा ॥७३॥

षष्ठ लम्बक १९१

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षष्ठ लम्बक १९१
पिता के राज्य को पाकर और फिर सारी पृथ्वी को जीतकर उदयन यौगन्धरायण
के साथ पृथ्वी का शासन कर रहा है ॥६॥
इस प्रकार शीघ्र ही उदयन की कथा कलिङ्गसेना को एकान्त में सुनाकर सखी सोमप्रभा
फिर कहने लगी—'इस प्रकार वत्सदेशों में राज्य करने के कारण वह वत्सराज कहा जाता है
और पांडवों के वंश में उत्पन्न होने के कारण सोमवंशोद्भव भी वह कहा जाता है ॥६१-६२॥
उदयाचल पर जन्म होने से देवताओं ने उसका नाम उदयन रखा है। इस समय संसार
में उसके समान सुन्दर कामदेव भी नहीं है॥६३॥
हे त्रैलोक्यसुन्दरी वही एक तेरे समान उपयुक्त पति है। उसकी बड़ी महारानी वासव-
दत्ता है, जो चण्डमहासेन की कन्या है। उसने अपने बन्धुओं को छोड़कर स्वतन्त्रता से उदयन
का वरण किया है। इस प्रकार उस (वासवदत्ता) ने उषा शकुन्तला आदि कन्याओं की लज्जा
का अपहरण कर लिया है ॥६४-६६॥
उदयन से वासवदत्ता में नरवाहनदत्त नाम का पुत्र उत्पन्न हुआ है, जिसे देवताओं ने
भावी विद्याधर-चक्रवर्ती होने का आदेश दिया है। इसीलिए वासवदत्ता से डरता हुआ उदयन
तुम्हारी माँग नहीं करता। वह वासवदत्ता मैंने देखी है। वह तुम्हारी रूप-सम्पत्ति की तुलना
नहीं कर सकती' ॥६७-६८॥
ऐसा कहती हुई सखी सोमप्रभा को वत्सराज उदयन के प्रति उत्सुक कलिङ्गसेना बोली ॥६९॥
'माता-पिता से विवश मैं क्या कर सकती हूँ। सबको जाननेवाली और प्रभावशालिनी
तू ही एकमात्र मेरी गति है ॥७०॥
यह कार्य तो दैव के अधीन है। इस सम्बन्ध में एक कथा कहती हूँ सुनो। ऐसा कहकर
सोमप्रभा ने उसे यह कथा सुनाई ॥७१॥
तेजस्वती की कथा
पूर्वकाल में उज्जयिनी में विक्रमसेन नाम का एक राजा हुआ। उसकी एक असाधारण
रूपवती तेजस्वती नाम की कन्या थी ॥७२॥
उसे कोई भी राजा वरण के लिए अभिमत नहीं हुआ। एक बार उसने अपने भवन पर
बैठे हुए एक पुरुष को देखा ॥७३॥

६९४ कथासरित्सागर

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६९४ कथासरित्सागर

तेन स्वाकृतिना दैवात् सङ्गतिं वाञ्छति स्म सा।
स्वाभिप्रायं च सन्दिश्य तस्मै स्वां व्यसृजत्सखीम् ॥७४॥
सा गत्वा तत्सखी तस्य पुंसः साहसरङ्गिनः।
अनिच्छतोऽपि प्रार्थ्यैव यत्नात् सङ्केतकं व्यधात् ॥७५॥
एतद्देवगृहं भद्र विविक्तं पश्यसीह यत्।
अत्र रात्रौ प्रतीक्षेथा राजपुत्र्यास्तवागमम् ॥७६॥
इत्युक्त्वा सा तमामन्त्र्य गत्वा तस्मै तदभ्यधात्।
तेजस्वत्यै ततः सापि तस्थौ सूर्यावलोकिनी ॥७७॥
पुमांश्च सोऽनुमान्यापि भयाद्यत्नात्पलाय्येतः ययौ।
न भेकः पद्मिनीकिञ्जल्कास्वादकोविदः ॥७८॥
अत्रान्तरे च कोऽप्यात्र राजपुत्रः कुलोद्गतः।
मृते पितरि तन्मित्रं राजानं द्रष्टुमाययौ ॥७९॥
स चात्र सायं सम्प्राप्तः सोमदत्ताभिधो युवा।
दायादहृतराज्यादिरेकाकी कान्तदर्शनः ॥८०॥
विवेश दैवात्तमेव नेतुं देवकुले निशाम्।
राजपुत्र्याः सखी यत्र पुंसः सङ्केतमादिशत् ॥८१॥
तं तत्र स्थितमभ्येत्य राजपुत्र्यविभाव्य सा।
निशायामनुरागाच्च स्वयंवरपतिं व्यधात् ॥८२॥
सोऽप्यभ्यनन्दत् तूष्णीं तां प्राप्तो विधिसमर्पिताम्।
संसूचयन्तीं भाविन्या राजलक्ष्म्याः समागमम् ॥८३॥
ततः क्षणाद्राजसुता सा विलोक्यैवमेव तम्।
कमनीयतमं मेने धातारमानुकूल्यितम् ॥८४॥
अनन्तरं कथां कृत्वा यथास्वं संविदा तयोः।
एषा स्वमन्दिरमगादन्यस्तत्रानयन्निशाम् ॥८५॥
प्रातर्गत्वा प्रतीहारमुखेनावेद्य नाम च।
राजपुत्रः परिज्ञातो राज्ञः प्राविशदन्तिकम् ॥८६॥
तत्रोत्सराज्याहारादिदुर्गतस्य स कुलाङ्कुरः।
अङ्गीचक्रे सहायत्वं राजा तस्यारिमर्दने ॥८७॥
मतिं चक्रे च तां तस्मै दातुं प्राणशिरोमणिं सुताम्।
मन्त्रिभ्यश्च तज्ज्ञेभ्योऽभिप्रायं शशंस सः ॥८८॥
अथैतन्मै च राज्ञे तं सुतावृत्तान्तमभ्यधात्।
दत्ता स्वाद्यापिता पूर्वं सर्वैराजसमीयुषा ॥८९॥

षष्ठ लम्बक १९५

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षष्ठ लम्बक १९५
दैवयोग से वह उसके साथ अपने रूप की संगति चाहने लगी अर्थात् उस पर
अनुरक्त हो गई। तदनन्तर उसने अपने मनोभाव को सन्देश रूप में सखी द्वारा उसके पास
भेजा श्लेष सुनकर साहस की शंका करते हुए और न चाहते हुए भी राजकुमारी की सखी ने उससे
भवित कर दिया ॥७४-७५॥
हे भद्र यह सामने जो एकान्त मन्दिर देख रहे हो इसमें तुम रात को राजकुमारी के
आने की प्रतीक्षा करना। इस प्रकार का उससे निश्चय करके सखी ने राजकुमारी तेजस्वती से कह
दिया। तेजस्वती भी सूर्य को देखती हुई बैठी रही अर्थात् रात्रि-आगमन की प्रतीक्षा करने
लगी ॥७६-७७॥
वह पुरुष सखी से निश्चय करके भी भय से कहीं भाग गया। सच है मेंढक कमलिनी
के नेकर का स्वाद नहीं जान सकता ॥७८॥
राजवंश में उत्पन्न भीमदत्त नामक एक युवा राजकुमार पिता के मर जाने पर पिता के
मित्र विषमसिंह के पास दैवयोग से इसी सायंकाल वहाँ (उज्जैन में) आया ॥७९॥
वह सुन्दर युवा भाई-बन्धुओं द्वारा राज्य-हरण कर लेने के कारण दुःखित और अकेला
उज्जैन पहुँचा था। उस समय (सायंकाल) राजा से मिलना उचित न जानकर वह उसी शून्य
या एकान्त मन्दिर में ठहर गया जिसमें राजकुमारी की सखी ने उसके प्रेमी पुरुष को आने का
संकेत दिया था ॥८०-८१॥
रात्रि में प्रेम से अन्धी राजकुमारी ने उस मन्दिर में बैठे हुए राजपुत्र को धोखे से अपना
पति बना लिया ॥८२॥
उस बुद्धिमान् राजकुमार ने भी चुपचाप उसका प्रेमाभिनन्दन किया क्योंकि वह उसकी
भावी राज्यलक्ष्मी की सूचना दे रही थी ॥८३॥
तब राजकुमारी ने उसे छल से प्राप्त होने पर भी अत्यन्त सुन्दर देखकर अपने को दैव
वशिन (ठगाई हुई) नहीं समझा ॥८४॥
तदनन्तर इधर-उधर की बात और आदरयुक्त प्रगल्भ करके राजकुमारी अपने भवन
को गई और राजपुत्र ने वहीं रात्रि व्यतीत की ॥८५॥
प्रातःकाल राजपुत्र राजभवन में जाकर द्वारपाल से सूचना दिलाकर राजा के समीप
पहुँचा और उससे परिचित हुआ ॥८६॥
राजपुत्र के राज्यापहरण आदि दुःखों को सुनकर राजा ने उसके शत्रुदमन के लिए
सहायता करना स्वीकार किया। साथ ही पहले से ही देने के लिए तैयार उस अपनी कन्या को
उसे देने के लिए भी राजा ने विचार किया और मन्त्रियों से अपना विचार कहा ॥८७-८८॥
अनन्तर राजकुमारी की अन्तरंग गतियों से भली भाँति परिचित कराई गई रानी ने
भी राजा से कन्या का सारा वृत्तान्त कह सुनाया ॥८९॥

तथा च कथयाम्येतां राजन्नत्र कथां शृणु।

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असिद्धानिष्टसिद्धेष्टकार्यतानीयविस्मितम् ।
सततस्तं तम राजानमेको मन्त्री तदाब्रवीत् ॥८९॥
विधिरेव हि जागर्त्ति मन्द्यानामर्थसिद्धिषु ।
असञ्चेतयमानानां सद्भूत्य स्वामिनामिव ॥९०॥
तथा च कथयाम्येतां राजन्नत्र कथां शृणु।

हरिशर्मणो ब्राह्मणस्य कथा

बभूव हरिशर्माख्यः कोऽपि ग्रामे क्वचिद्द्विजः ॥९२॥
स दरिद्रश्च मूर्खश्च भृत्यभावेन दुःखितः ।
पूर्वदुष्कृतभोगाय जातोऽतिबहुबालकः ॥९३॥
सकुडुम्बो भ्रमन् भिक्षां प्राप्यैकं नगरं क्रमात् ।
स्थितये स्थूलदत्तस्य गृहस्य स महाधनम् ॥९४॥
गवादिरक्षकान् पुत्रान् भार्यां कर्मकरीं निजाम् ।
तस्य कृत्वा गृहाभ्यर्णे प्रैष्यं कुर्वन्नुवास सः ॥९५॥
एकदा स्थूलदत्तस्य सुतापरिणयोत्सवः ।
तस्याभूदागतानेकजन्यायात्राजनाकुलः ॥९६॥
सदा च हरिशर्मानि तद्गृहे सकुतुम्बकः ।
आप्लुष्टमांसादिभोजनान्यो ववध सः ॥९७॥
तद्वेलां वीक्षमाणोऽप्य स्मृतः केनापि नात्र सः ।
ततोऽत्राहारनिर्विण्णो भार्यामियब्रवीन्निशि ॥९८॥
दारिद्र्यादिह मौर्ध्यान्च ममेत्थभगौरवम् ।
तदत्र कृत्रिम युक्त्या विज्ञानं प्रमुनग्म्यहम् ॥९९॥
येनास्य स्थूलदत्तस्य भवय गौरवास्पदम् ।
त्व प्राप्तेऽवसरे चास्मै शानिन मां निवेदय ॥१००॥
इत्युक्त्वा तां विधिस्स्यात्र धिया गुप्ते जने ह्य ।
स्थूलदत्तगृहात्तन्न जहे जामातृवाहनम् ॥१०१॥
दूरं प्रच्छन्नमेतेन स्थापितं प्रास्तरञ्च खम् ।
इतस्ततो विधिस्वत्तोऽप्यध्यन्वं जन्या न एभिरे ॥१०२॥
अथाम दूखविश्रस्त ह्यश्वोरगवेषिजम् ।
हरिशर्मवधूरस्य स्थूलदत्तमभाष सा ॥१०३॥
भर्त्ता मनीयो विज्ञानी ज्योतिर्विद्यादिशोधिवः ।
अन्य वा सम्भयरयेनं किमर्थ म न पृच्छयते ॥१०४॥

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११८ कथासरित्सागर

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११८ कथासरित्सागर
तच्छ्रुत्वा स्थूलदत्तस्तं हरिशर्माणमाह्वयत् ।
प्रभो विस्मृतो हृतेऽश्वे तु स्मृतोऽस्म्यद्येति वादिनम् ॥१०५॥
विस्मरं न क्षमस्वेति प्रार्थितं ब्राह्मणं च सः ।
पप्रच्छ केनापहृतो हयो नः कथ्यतामिति ॥१०६॥
हरिशर्मा ततो मिथ्या रेखाः कुर्वन्नुवाच सः ।
हतो दक्षिणसीमान्ते चोरैः संस्थापितो ह्ययम् ॥१०७॥
प्रच्छन्नस्थो दिनान्ते च दूरं यावन्न नीयते ।
तावदानीयतां गत्वा त्वरितं स तुरङ्गमः ॥१०८॥
तच्छ्रुत्वा धावितैः प्राप्य क्षणात्स बहुभिर्नरैः ।
आनिन्येऽश्वः प्रशंसद्भिर्विज्ञानं हरिशर्मणः ॥१०९॥
ततो ज्ञानीति सर्वेण पूज्यमानो जनेन सः ।
उवास हरिशर्मात्र स्थूलदत्ताश्रिमः सुखम् ॥११०॥
अथ गच्छत्सु दिवसेष्वत्र राजगृहान्तरात् ।
हेमरत्नानि चौरेण भूरि केनाप्यनीयत ॥१११॥
नाज्ञायत यदा चौरस्तदा ज्ञानिप्रसिद्धितः ।
आनाययामास नृपो हरिशर्माणमाशु तम् ॥११२॥
स धानीतः क्षिपन् कालं वक्ष्ये प्रातरिति ब्रुवन् ।
वासके स्थापितो भ्रान्तखिन्नो राज्ञासुरक्षितः ॥११३॥
तत्र राजकुले चासीन्नाम्ना जिह्वेति चेटिका ।
यया भ्रात्रा समं तच्च नीतमभ्यन्तराद्धनम् ॥११४॥
सा गत्वा निशि तत्रास्य वासके हरिशर्मणः ।
जिह्वासया ददौ द्वारि कर्णं तज्ज्ञानशङ्किता ॥११५॥
हरिशर्मा च तत्कालमेकतोऽभ्यन्तरे स्थितः ।
निजां जिह्वां निनिन्दैव मपाविज्ञातवादिनीम् ॥११६॥
मापल्लम्पटया जिह्वे ! किमिदं विहितं त्वया ।
दुराचारे सहस्व स्वमिदानीमिह निग्रहम् ॥११७॥
तच्छ्रुत्वा ज्ञानिनानेन ज्ञातास्मीति भयेन सा ।
जिह्वाख्या चेटिका युक्त्या प्रविश्य तदन्तिकम् ॥११८॥
पतिस्वा पादयोस्तस्य ज्ञानिप्रच्छन्नमब्रवीत् ।
प्रत्यप्सि सा जिह्वाहं त्वया ज्ञातार्थहारिणी ॥११९॥