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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

चतुर्थ लम्बक ४३३

Page 476Permalink

चतुर्थ लम्बक ४३३
जीमूतवाहन¹ की कथा
पार्वती का पिता और पर्वतों का राजा हिमालय नाम का पर्वत है, जो गौरी का ही
पिता नहीं, गौरीपति शिवजी का भी गृह (श्वशुर) है॥१६॥
उस पर्वत में विद्याधरों² का निवास है। अतः उस महान् पर्वत पर जीमूतकेतु नाम का
विद्याधरों का राजा निवास करता था॥१७॥
उसके घर के उद्यान में कुल-परम्परा से एक उद्यान था, जो अपने नाम के अनुसार मनोरथ
पूर्ण करने में प्रसिद्ध था॥१८॥
किसी समय राजा जीमूतकेतु ने उद्यान में उस कल्पवृक्ष के समीप जाकर देवता-स्वरूप
उस वृक्ष से प्रार्थना की—॥१९॥
'हे देवस्वरूप, हमलोग सदा से तुम्हारे द्वारा अपना मनोरथ सिद्ध करते आए हैं। इसलिए
मुझ पुत्रहीन को पुत्र प्रदान करो'॥२०॥
तब कल्पवृक्ष ने कहा—'हे राजन्! तुम्हें पूर्वजन्म का स्मरण करनेवाला, प्राणियों का
हित करनेवाला और दानवीर पुत्र उत्पन्न होगा'॥२१॥
यह सुनकर प्रसन्न उस राजा ने यह समाचार रानी को सुनाकर उसे भी प्रसन्न
किया॥२२॥
तदनन्तर शीघ्र ही राजा जीमूतकेतु के यहाँ पुत्र उत्पन्न हुआ और पिता ने उसका नाम
जीमूतवाहन रखा॥२३॥
प्राणियों पर दया के साथ-साथ वह महात्मा बालक धीरे-धीरे बढ़ने लगा॥२४॥
एक बार युवराज पद को प्राप्त वह परोपकारी जीमूतवाहन एकान्त में सेवा से प्रसन्न
पिता से बोला—'पिताजी! इस संसार में जो कुछ भी है, वह सब नश्वर (नाशवान्) है।
स्थिर रहनेवाला केवल महान् व्यक्तियों का निर्मल यश ही है॥२५॥
यदि परोपकार से उत्पन्न यह यश है, तो फिर उदारव्यक्तियों के लिए प्राणों से प्यारा
धन क्या है? ॥२६॥
सम्पत्ति बिजली के समान चञ्चल तथा आँखों की ज्योति को कष्ट देनेवाली चञ्चल और
पुरुष को हानि पहुँचानेवाली वस्तु है॥२७॥


१ यही श्रीहर्ष के नागानन्द नाटक की आधारभूत कथा है।
२ मन्त्र-तन्त्र-विद्याओं के द्वारा बने हुए देवताओं की एक जाति।
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