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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

७६८ कथासरित्सागर

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७६८ कथासरित्सागर

कस्त्वया सदृशो नीतावन्यो देवाद् बृहस्पते।
अमृतसेकोऽप्य रक्षन्मन्त्रो राज्यशासिनः॥१६३॥
सोऽहं कलिङ्गसेनाया जिज्ञासिष्ये गतिं सदा।
बुद्ध्या शक्त्यापि चेत्युक्त्वा ततो योगेश्वरो ययौ॥१६४॥
तत्कालं सा च हर्म्याग्रं पर्यटन्तं स्वहर्म्यगा।
कलिङ्गसेना वत्सशं दृष्ट्वा दृष्ट्वा स्म साम्यति॥१६५॥
तन्मनाः स्मरसन्तप्ता मृणालाङ्कुरहारिणी।
सा श्रीखण्डाङ्गरागा च न लेभे निर्वृतिं क्वचित्॥१६६॥
अत्रान्तरे स सो पूर्वं दृष्ट्वा विद्याधराधिपः।
तस्थौ मदनवेगाख्यो गाढानङ्गशरादितः॥१६७॥
सम्प्राप्तमे तपः कृत्वा वरे शम्भोर्निशाचरात्।
सान्यासक्ताप्यवेक्षस्था सुतं प्राप्स्यस्य नामवत्॥१६८॥
यतस्तेनान्तरं लब्धुमसो विद्याधराधिपः।
रजनीषु दिवि भ्राम्यन्नासीत्तन्मन्दिरोपरि॥१६९॥
संस्मृत्य तु तमादेशं तपस्तुष्टस्य धूर्जटेः।
एकस्या निशि वत्सेशरुपं चक्रे स्वविद्यया॥१७०॥
तद्रूपश्च विवेशास्य मन्दिरं द्राग्यवन्तिनः।
कालक्षेपाक्षमो गुप्तं मन्त्रिणां स इवागतः॥१७१॥
कलिङ्गसेनाप्युत्तस्थौ तं दृष्ट्वोत्कम्पविह्वला।
न सोऽयमिति सा रात्रेर्वार्यमाणेव भूयणे॥१७२॥
ततो वत्सेशरूपेण क्रमाद् विश्वास्य तेन सा।
भार्या मदनवेगेन गान्धर्वेविधिना कृता॥१७३॥
सत्कार्ल च प्रविष्टस्तद्दृष्ट्वा योगावलक्षितः।
योगेश्वरो विषण्णोऽभूद् वत्सेशालोकनभ्रमात्॥१७४॥
योगन्धरायणाद्येषाद् गत्वोक्तवा तन्निवेशतं।
युक्त्या कामव्यवस्थाया वत्सशं वीक्ष्य पार्श्वगम्॥१७५॥
बुञ्जे मन्त्रिवरोक्त्यैव रूपं सुप्तस्य भेदितुम्।
कलिङ्गसेना प्रच्छन्नशायिनं सोऽन्यमत्युत॥१७६॥
गत्वा कलिङ्गसेनायाः सुप्तायाः शयनीयके।
सुप्तं मदनवेगं तं स्वरूपे स्थितमैक्षत॥१७७॥

'नीति में बृहस्पति के सिवा तुम्हारे समान और कौन है। तुम्हारी सम्मति राज्य-रूपी
वृक्ष के लिए अमृत-सिंचन के समान है' ॥१६३॥
अब मैं कलिङ्गसेना की गतिविधि का बुद्धि और शक्ति दोनों से ही जानने का प्रयत्न
करूंगा। ऐसा कहकर योगेश्वर चला गया ॥१६४॥
उस समय अपने भवन में बैठी हुई कलिङ्गसेना राजमहल, उद्यान आदि में भ्रमण करते
हुए वत्सराज को देख-देखकर तड़प रही थी ॥१६५॥
वत्सममय हृदयवाली कलिङ्गसेना मृणाल (कमलनाल) के अंगद (भुजा के आभूषण)
से मनाहार लगा रही थी और चन्दन का लेप करने पर भी विरहाग्नि से शान्ति प्राप्त नहीं कर
पा रही थी ॥१६६॥
इसी बीच मदनवेग नाम का वह विद्याधरों का राजा पहले से ही कलिङ्गसेना को देखकर
कामबाणों की गम्भीर वेदना का अनुभव कर रहा था ॥१६७॥
उसकी प्राप्ति के लिए तप करके शिवजी से वर लाभ कर लेने पर भी दूसरे पर आसक्त
और दूसरे वेश में गई हुई कलिङ्गसेना अब उसके लिए सहज में ही पान योग्य नहीं रह
गई थी ॥१६८॥
इसीलिए अवसर की प्रतीक्षा में विद्याधरों का वह राजा रात्रियों में आकाश में विचरण
करता हुआ एक बार कलिङ्गसेना के निवास भवन के ऊपर आया ॥१६९॥
और तपस्या से सन्तुष्ट शिवजी के उस आदेश का स्मरण करके एक बार रात के समय
अपनी विद्या के बल से वत्सराज का रूप और वेष बनाकर द्वारपाल से प्रणाम किया जाता हुआ
कलिङ्गसेना के मन्दिर में गया। मानों मन्त्रियों द्वारा किए गए कालक्षेप को सहन न करके राजा
गुप्त रूप में स्वयं ही आ गया हो ॥१७०-१७१॥
उसे देखकर कामव्यथा से व्याकुल कलिङ्गसेना उठी। उसके उठने पर झनझनाते उसके
आभूषण मानों यह कह रहे थे कि यह वह (वत्सराज) नहीं है ॥१७२॥
तदनन्तर वत्सराज का रूप धारण किए हुए उस विद्याधर ने धीरे-धीरे उसे विश्वास
दिलाकर गान्धर्व विधान से अपनी पत्नी बना लिया ॥१७३॥
उसी समय अन्दर घुसा हुआ और अपनी विद्या के प्रभाव से अलक्षित योगेश्वर वत्सराज
को देखकर भ्रम से चकित रह गया ॥१७४॥
और, वत्सराज को यौगन्धरायण के पास बैठा हुआ देखकर उनके आदेश से उसे यह
सब वृत्तान्त कहने के लिए उसके पास गया ॥१७५॥
मन्त्री के कहने से कलिङ्गसेना के गुप्त प्रेमी का वास्तविक रूप देखने के लिए वह पुनः लौट
आया ॥१७६॥
और सोई हुई कलिङ्गसेना के पास आकर उस पर सोये हुए मदनवेग के वास्तविक रूप
को उसने देखा ॥१७७॥
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