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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

१६० कथासरित्सागर

१६० कथासरित्सागर
विक्रीणानश्च तत्तत्र राजनामाङ्कमापणे ।
वष्टभ्य राजपुरुषैर्निन्ये राजकुलं च सः॥८४॥
कुतस्त्वयेदं कटकं सम्प्राप्तमिति तत्र सः।
राज्ञा सहस्रानीकेन स्वयं शोकादपृच्छत ॥८५॥
अथोदयाद्रौ सर्पस्य ग्रहणात्प्रभृति स्वकम्।
कटकप्राप्तिवृत्तान्तं शबरः स जगाद तम् ॥८६॥
तच्छ्रुत्वा शबराद्दृष्ट्वा दयितावलयं च तम्।
विचारडोलामारोहत् सहस्रानीकभूपतिः ॥८७॥
क्षीणः शापः स ते राजन्नुदयाद्रौ च सा स्थिता।
जमदग्न्याश्रमे भार्या सपुत्रा ते मृगावती ॥८८॥
इति दिव्या तदा वाणी नन्दयामास तं नृपम्।
विप्रयोगनिदाघार्तं वारिधारेव बर्हिणम् ॥८९॥
अथोरुकष्टाद् दीर्घे कथमपि दिनेऽस्मिन्नवसिते
तमश्वाग्रं कृत्वा शबरमपरेद्युः स नृपतिः ।
सहस्रानीकस्तां सरभसमवाप्तुं प्रियतमां ।
प्रतस्थे तत्सैन्यं । सममुदयशैलाग्रमपदम् ॥९०॥
इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे कथामुखलम्बके
प्रथमस्तरङ्गः।

द्वितीयस्तरङ्गः
गत्वाथ दूरमध्वानं राजा वसतिमग्रहीत् ।
दिने तस्मिंस्त कस्मिंश्चिदरण्यसरस्तटे ॥१॥
शयनीयगतः श्रान्तस्तत्र संचारमागतम्।
माय सङ्गतकं नाम जगाद शनकैर्नृपः ॥२॥
कथामाख्याहि मे काञ्चिद्धृदयस्य विनोदिनीम्।
मृगावतीमुखाम्भोजदर्शनोत्सवकाङ्क्षिणः ॥३॥
अथ सङ्गतकोऽवादीद्यत् किं तप्यसे वृथा।
आसन्न एव देव्यास्ते क्षीणशापः समागमः ॥४॥
संयोगा विप्रयोगाश्च भवन्ति बह्वो नृणाम्।
तथा चात्र कथामेकां कथयामि शृणु प्रभो ॥५॥

उस (कंकण) पर राजा का नाम लिखा होने के कारण सिपाही उसे पकड़कर राजभवन
में ले गये ॥८४॥
राजभवन में 'तुमने यह कड़ा कहाँ पाया' इस प्रकार शोक-संतप्त राजा सहस्रानीक ने
उस सँपेरे से पूछा ॥८५॥
राजा के पूछने पर सँपेरे भील ने उदय पर्वत पर साँप पकड़ने से लेकर यहाँ तक का सारा
वृत्तान्त राजा से कह सुनाया ॥८६॥
भील द्वारा यह समाचार जानकर और पत्नी के उस कंकण को पहचानकर राजा सहस्रानीक
विचारों के हिंडोले में झूलने लगा ॥८७॥
'राजन् ! तुम्हारा शाप नष्ट हो गया है। तुम्हारी रानी मृगावती पुत्र के साथ उदय पर्वत
पर जमदग्नि के आश्रम में है। इस प्रकार की आकाशवाणी ने वियोग की अग्नि में जलते हुए राजा
को इस प्रकार आनन्दित कर दिया जैसे ग्रीष्मकाल की बौछार मयूर को आनन्दित कर
देती है ॥८८-८९॥
तदनन्तर प्रिया-मिलन की उत्कण्ठा से वीर्घीभूत उस दिन के किसी प्रकार बीतने पर दूसरे
दिन प्रातःकाल बेचैन राजा सहस्रानीक प्रियतमा को प्राप्त करने के लिए उसी सँपेरे (भील)
को पथ-प्रदर्शक बनाकर अपनी सेनाओं के साथ उदयाचल के आश्रम की ओर चला ॥९०॥
प्रथम तरग समाप्त

द्वितीय तरग

उस दिन राजा (सहस्रानीक) कुछ दूर रास्ता चलकर किसी जंगली तालाब के किनारे
पड़ाव डालकर ठहर गया ॥१॥
उस शिविर में सन्ध्या के समय सेवा के लिए आये हुए घंटक नामक कथा कहने-
(कहानी सुनाने) वाले सेवक १ से राजा ने कहा ॥२॥
मृगावती के मुखकमल का दर्शन करने के लिए उत्सुक मेरे मन को बहलानेवाली कोई
कथा (कहानी) सुनाओ ॥३॥
तब घंटक ने कहा—'राजन् ! क्यों व्यर्थ संताप करते हो। शाप के नष्ट होते ही
तुम्हारा महारानी के साथ समागम सुनिश्चित है ॥४॥
हे स्वामिन् ! जीवन में मनुष्य को अनेक संयोग और वियोग हुआ करते हैं। इस सम्बन्ध
में तुमको मैं एक कहानी सुनाता हूँ सुनो ॥५॥


१ प्राचीन समय में राजाओं के यहाँ ऐसे सेवक होते थे जो रात के समय राजाओं के
शरीर-पैर आदि दबाते हुए मनोरंजक कहानियाँ सुनाते थे ताकि राजा को शीघ्र और अच्छी नींद
आ जाय। अनु