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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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षष्ठ लम्बक १६३
वहाँ एकत्र सभी जन इस अद्भुत रहस्य को जानकर आनन्द से इस प्रकार कहने
लगे ॥१८९॥
राजा ने भी कहा—'इसने पति के लिए इतना कष्ट उठानेवाली सीतादेवी को भी
जीत किया ॥१९०॥
इसलिए मुझे प्राणदान देनेवाली यह मेरी धर्म-बहिन है। इस प्रकार कहते हुए राजा से
कीर्तिसेना कहने लगी—॥१९१॥
'महाराज आप द्वारा दिया गया जो प्रमोपहार गाँव हाथी आदि आपके हाथ मेरा
है, यह सब आप मेरे पति को दे दें। राजा ने भी प्रसन्न होकर देवसेन का पट्ट बन्धन
किया ॥१९२ १९३॥
तदनन्तर वह देवसेन राजा द्वारा दिये हुए और व्यापार द्वारा अर्जित धनराशि से धनी
होकर, अपनी माता को छोड़कर कीर्तिसेना की प्रशंसा करता हुआ उसी वसुदत्तपुर में रहने
लगा ॥१९४॥
कीर्तिसेना अपने असाधारण चरित्र से प्रसिद्ध होकर अपने पति के पुण्य फलों की शरीर
धारिणी मूर्ति के समान विपुल ऐश्वर्य का उपभोग करती हुई सास के दुःख से छूटकर, सुखपूर्वक
रहने लगी ॥१९५॥
इस प्रकार विधि के भीषण विधानों को सहन करके आपत्ति-काल में भी अपने चरित्र-बल
की रक्षा करनेवाली सच्चरित्र स्त्रियाँ अपने आत्मबल से रक्षित होकर अपना तथा अपने पति दोनों
का कल्याण करती हैं॥१९६॥
इसलिए हे राजकुमारी सास और ननद के कारण स्त्रियों को ऐसी-ऐसी दुर्घटनाओं का
लक्ष्य (शिकार) होना पड़ता है। इसलिए मैं तुम्हारे लिए ऐसा पतिगृह चाहती हूँ जहाँ पापिन
सास और दुष्टा ननद न हों ॥१९७॥
असुरराज मयासुर की पुत्री सोमप्रभा के मुँह से इस ज्ञान रसायक अद्भुत कथा को सुनकर
मनुजेन्द्रपुत्री कलिङ्गसेना अत्यन्त प्रसन्न हुई ॥१९८॥
इस प्रकार विचित्र कथा का अन्त देखकर ही मानों सूर्य भगवान् के अस्ताचल पर चले
जाने पर, सोमप्रभा भी उत्कण्ठिता कलिङ्गसेना का आलिङ्गन करके अपने भवन को गई ॥१९९॥
तृतीय तरंग समाप्त