कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
षष्ठ लम्बक ६२७
षष्ठ लम्बक ६२७
दूसरे दिन सम्मति करके बनिये की उस बहिन ने अपनी भाभी (नव वधू) के साथ
एक देव-मन्दिर में प्रवेश किया। मन्दिर के भीतर पहले ही से प्रविष्ट हम दोनों में से
उसने मेरे मित्र को भाभी का वेष धारण कराया और उसी वेष में उसे भाई के घर ले
गई। मैं उस पुरुष-वेष में स्थित वणिक की वधू के साथ मन्दिर से निकलकर क्रमशः उज्जैन
आ गया ॥१९४-१९८॥
उसकी ननद भी घर में विवाहोत्सव के कारण लोगों के मद्यपान करके सो जाने पर
इसके साथ रात में निकल भागी और यहाँ आने पर हम दोनों मिले ॥१९९-२ ॥
इस प्रकार हम दोनों ने नवयौवना और स्वयं प्रेम से आसक्त ननद-भाभी को प्राप्त
किया ॥२ १॥
महाराज अब हम दोनों विश्राम के लिए प्रत्येक स्थान पर शंका कर रहे हैं।
ऐसा गुप्त साहस करने पर भला किसका चित्त शान्त रह सकता है ? ॥२ २-२ ३॥
धन रखने के स्थान और धन कमाने के उपाय सोचते हुए हम दोनों को दूर से आपने
देखा ॥२ ४॥
तदनन्तर गुप्तचर के सन्देह से आपने हम दोनों को पकड़वाकर बँधवा दिया। आज
आपके पूछने पर सारा समाचार हमने स्पष्ट रूप से आपसे कह दिया। अब महाराज की जो
इच्छा हो। ऐसा कहने पर राजा विक्रमसिंह ने दोनों से कहा- 'मैं तुम पर प्रसन्न हूँ। भय
मत करो। इसी नगर में रहो। मैं ही तुमको पर्याप्त धन दूँगा' ॥२ ५-२ ६॥
ऐसा कहकर राजा ने उनको पर्याप्त जीविका दे दी। तदनन्तर वे दोनों अपनी-अपनी
स्त्रियों के साथ वहाँ सुखपूर्वक रहने लगे ॥२ ७॥
इस प्रकार उच्च महात्माओं न बहिष्कृत सदोष क्रियाओं में भी पुरुषों को सफलता
प्राप्त होती है। और, साहस करनेवाले बुद्धिमान् पुरुषों पर प्रसन्न होकर राजा इस प्रकार
दानी हो वरता है ॥२ ८॥
इत्यैहिकेन च पुराविहितेन चापि
स्वेनैव कर्मविभवेन शुभाशुभेन।
शश्वद्भवत्यनुरूपविचित्रभोगः
सर्वो हि नाम ससुरासुर एष सर्गः॥२१०॥
तत्स्वप्नवृत्तनियतो नभसश्च्युता या
ज्वाला त्वयास्तदन्तर विशतीह दृष्टा।
सा कापि देवि सुरजातिरसंशयं ते
गर्भं कुतोऽपि खलु कर्मवशात्प्रपन्ना॥२११॥
इति निजभर्तुर्वदनाच्छ्रुत्वा नृपतेः कलिङ्गदत्तस्य।
देवी तारादत्ता प्राप सगर्भा परं प्रमदम्॥२१२॥
इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे
मदनमञ्चुका लम्बके प्रथमस्तरङ्गः।
द्वितीयस्तरङ्गः
कलिङ्गसेनाया जन्मकथा
ततः कलिङ्गदत्तस्य राज्ञो गर्भभराल्लसा।
राज्ञी तक्षशिलायां सा तारादत्ता शनैरभूत्॥१॥
उदेष्यच्चन्द्रलेखां च प्राचीमनुचकार सा।
आसन्नप्रसवा पाण्डुमुखी तरलताविका॥२॥
जज्ञे च तस्या नचिरादनन्यसदृशी सुता।
वेधसः सर्वसौन्दर्यसर्गवर्णकसन्निभा॥३॥
ईदृक्पुत्रो न किं जात इतीव स्नेहालिने।
रक्षाप्रदीपास्तत्कान्तिजिता विच्छायतां ययुः॥४॥
पिता कलिङ्गदत्तश्च जातां तां तादृशीमपि।
दृष्ट्वा तद्रूपपुत्राशावैकल्याद्विमना अभूत्॥५॥
दिष्ट्या तामपि सम्भाव्य स पुत्रेच्छुरदूयत।
शोककन्दः क्व कन्या हि क्वानन्दः कायदात्सुतः॥६॥
ततश्चेतोविनोदाय खिन्नो निर्गत्य मन्दिरात्।
ययौ नानाजनाकारं विहारं स महीपतिः॥७॥
तत्रैकदेशे शुश्राव धर्मपाठकभिक्षुणा।
जनमध्योपविष्टेन कथ्यमानमिदं वचः॥८॥