कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
कथामुख नामक द्वितीय लम्बक
कथामुख नामक द्वितीय लम्बक
(मङ्गल-श्लोक का अर्थ ग्रन्थारम्भ के प्रथम पृष्ठ पर देखना चाहिए)
प्रथम तरंग
राजा सहस्रानीक की कथा
पार्वती के प्रथम आलिङ्गन के समय उत्पन्न शिवजी के स्वेद-कण आपकी रक्षा करें जो
स्वेद-कण ऐसे मालूम होते हैं मानो कामदेव ने शिवजी के नेत्र की अग्नि के भय से उनपर बाणत्रास
छोड़ा हो¹॥१॥
कैलास में शिवजी के मुख से पुण्यवन्त गण को पृथ्वी पर वररुचि के रूप में अवतीर्ण पुण्य
गण से काणभूति को काणभूति से गुणाढ्य को और गुणाढ्य से राजा सातवाहन को क्रमशः
प्राप्त इस विद्याधर-कथा² रूपी अमृत को सुनिए ॥२-३॥
स्वर्ग के अभिमान को दूर करने के लिए विधाता द्वारा उसी के समान पृथ्वी पर निर्माण
किया गया वत्स नामक देश है ॥४॥
उस देश के मध्यभाग में अत्यन्त समृद्ध कौशाम्बी नाम की नगरी भूमि की कर्णिका
(कर्णभूषण) के समान है॥५॥
उस नगरी में पाण्डव-वंश में उत्पन्न शतानीक नामक राजा राज्य करता था जो जनमेजय
का पुत्र परीक्षित का पौत्र और अभिमन्यु का प्रपौत्र था। इस वंश का आदि पुरुष अर्जुन था
जिसने शिवजी के स्तम्भ के समान बाहुदण्डों का पराक्रम देखा था ॥६-७॥
उस शतानीक की दो रानियाँ थीं। एक (पृथ्वी) रत्नों को उत्पन्न करती थी किन्तु
दूसरी ने पुत्र को उत्पन्न नहीं किया ॥८॥
१ शिवजी के तृतीय नेत्र की अग्नि-ज्वाला से कामदेव भस्म हो गया था। अतः पुनः
उनके संगम के समय उसने आग बुझाने के लिए अग्नि-विरोधी बाणशस्त्र का रचना आवश्यक
समझा जो जलमय है। नववधू के नव समागम में स्वेद का अधिक मात्रा में होना स्वाभाविक है।
अतः, कवि ने उस पर जलमय बाणशस्त्र की सुन्दर उत्प्रेक्षा की है।
२ श्रद्धेय और प्रामाणिक व्यक्तियों द्वारा कही गई बातें आदरणीय होती हैं ऐसी
शिष्ट-परम्परा है। उसी के अनुसार इस विद्याधर-कथा की प्रामाणिकता के लिए गुणाढ्य ने उसकी
शृङ्खलापूर्ण परम्परा की सूचना दी है कि यह कथा मेरी कल्पित नहीं प्रत्युत इसका उद्गम भगवान्
शिव के मुख से हुआ है।—अनु.
एकदा मृगयासङ्गाद् भाग्यवशाच्चास्य भूपतेः ।
अभूच्छाण्डिल्यमुनिना समं परिचयो वने ॥९॥
सोऽप्य पुत्रार्थिनो राज्ञः कौशाम्बीमेत्य साक्षितम् ।
मन्त्रपूतं चरं राज्ञीं प्राधायन्मुनिसत्तमः ॥१०॥
सनस्तस्य सुतो जज्ञे सहस्रानीकसंज्ञकः ।
शुशुभे स पिता तेन विनयन गुणो यथा ॥११॥
यवराज्ञं क्रमात्कृत्वा शतानीकोऽथ तं सुतम् ।
सम्भोगैरैव राजाभून्न तु भूभारखिन्नधीः ॥१२॥
अथासुरैः समं युद्धे प्राप्ते साहाय्यकञ्च्छया ।
दूतमस्त्यं विमुञ्चोभूदिन्द्रो यत्प्रण मातलिः ॥१३॥
सतां युगन्धराख्यस्य हस्ते धूपम्य मन्त्रिणः ।
सुप्रतीकाभिधानस्य मुख्यमन्तान्तरस्य च ॥१४॥
समर्प्य पुत्रं राज्यं च निहन्तुममुरान् रणे ।
शक्रान्तिकं शतानीकः सह मातलिना ययौ ॥१५॥
अगुणन् यमदंष्ट्रानीन्यहन्प्रत्यति यागवे ।
हत्वा तत्रत्यं गत्वाशं प्राप भूत्युं स भूपतिः ॥१६॥
मातन्यानोयवेहं च देवी तं नृपमन्वगात् ।
राज्यलक्ष्मीश्च तत्पुत्रं सहस्रानीकमश्रयत् ॥१७॥
पित्र्यं तस्मिन्गतान्द्रे पित्र्यं सिंहासनं नृपः ।
भरन् शक्ता गजा दिक्षु भनिमाययुः ॥१८॥
सन्तं चरा गृह्णन्तु वियोगिप्रशयोगतम् ।
न्यस्य गङ्गाशनात्स विनाय प्रत्यं मातलिम् ॥१९॥
स तत्र मन्दनं दक्षान् क्रीडन् कामिनीगणान् ।
दृष्ट्वा वियोगिनिभार्यार्थी राजा शर्मविवाविन्दत् ॥२०॥
विद्याधामभिश्राय गन्धर्वाणां यागवे ।
गन्धर्वश्च विशाखः प्रादुर्बभूव तव योगतः ॥२१॥
उत्पन्ना किरिणो भार्या तुल्या सा पूर्वनिर्मिता ।
इयं च शृणु वृत्तान्तमथ स वक्तुमारभत् ॥२२॥
मृगावतीविवाहप्रबन्धः
पुरं त्रिभुवने श्लाघ्यामलकाख्यं जगत्त्रयम् ।
रिपुभ्यो नाम यस्याश्च ममरूश्चाप्युपागमत् ॥२३॥