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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

६६ कथासरित्सागर

६६ कथासरित्सागर
शनै सोऽपि विपत्सिन्धौ स्थातुमिच्छन् स्वकर्मणि।
मत्स्यार्थी देवदासस्तं श्वशुरं याचितुं ययौ ॥२०॥
प्राप्तश्च सन्ध्यासमयं सत्पुरं पौण्ड्रवर्धनम्।
रजोरूक्ष विवस्त्र च वीक्ष्यात्मानमचिन्तयत् ॥२१॥
ईदृशः प्रविशामीह कथं श्वशुरवेश्मनि।
वरं हि मानिनो मृत्युर्न दैन्यं स्वजनाग्रतः ॥२२॥
इत्यालोक्यापणे गत्वा स क्वापि विपणेर्बहिः।
नक्तं सङ्कुचितस्तस्थौ तत्काल कमलोपमः ॥२३॥
क्षणाच्च तस्यां विपणौ प्रविशन्तं व्यलोकयत्।
युवानं वणिजं कञ्चिदुद्घाटितकवाटकम् ॥२४॥
क्षपान्तरे स तत्रैव निश्शब्दपदमागताम्।
द्रुतमन्तःप्रविष्टां च स्त्रियमेकां ददर्श सः ॥२५॥
ज्वलत्प्रदीपे यावच्च ददौ दृष्टिं तदन्तरे।
प्रत्यभिज्ञातवांस्तावत्तां निजानेव गेहिनीम् ॥२६॥
ततः सोऽङ्कितद्वारो भार्यां तामन्यगामिनीम्।
दृष्ट्वा दुःखाग्निदग्धो देवदासो व्यचिन्तयत् ॥२७॥
धनहीनेन देहोऽपि ह्रीयते स्त्रीषु का कथा।
निसर्गेनियतं वासां विद्युतामिव चापलम् ॥२८॥
सैवेयं सा विपत्सूता व्यसनार्णवपातिनाम्।
गतिः सद्यः स्वतन्त्रायाः स्त्रियाः पितृगृहे स्थितेः ॥२९॥
इति सञ्चिन्तयंस्तस्या भार्याया स बहिः स्थितः।
रतान्तविस्रम्भजुषं कथालापमिवाशृणोत् ॥३०॥
उपेत्य च ददौ द्वारि स कर्णं सापि तत्क्षणम्।
इत्यब्रवीदुपपतिं पापा सा वणिजं रहः ॥३१॥
शृण्विदं कथयाम्यद्य रहस्यं तेऽनुरागिणी।
मद्दर्त्तुर्वीरवर्मस्य पुराऽभूत्प्रपितामहः ॥३२॥
स्वगृहस्याङ्गणं तेन चत्वारः स्वर्णपूरिताः।
कुम्भाश्चतुर्षु कोणेषु निगूढा स्थापिता भुवि ॥३३॥
तवेकस्याः स्वभार्यायाः स चक्रे विदितं तदा।
तद्भार्या चान्तकाले सा स्नुषायै तदबोधयत् ॥३४॥
सापि स्नुषायै मञ्छ्वश्र्वै मञ्छ्वशूरोब्रवीच्च मे।
इत्ययं मत्पतिगृहस्यैष बभूवक्रममुपागतम् ॥३५॥

तृतीय लम्बर १६१
कुछ दिनों तक स्वयं कष्ट पाता हुआ और कुछ व्यापार के लिए श्वशुर से धन पाने की
इच्छा से देवदास उनके पास गया॥१२॥
और मैला-कुचैला धूल से भरा हुआ वह सायंकाल पौण्ड्रवर्धन नगर में पहुँचा। अपनी ऐसी
स्थिति देखकर सोचने लगा कि इस हालत में ससुराल कैसे जाऊँ। दरिद्र व्यक्ति के लिए मर
जाना अच्छा है, किन्तु अपने सम्बन्धियों के आगे दीनता प्रदर्शन उचित नहीं ॥२१-२२॥
ऐसा सोचकर वह बाजार में आकर किसी दूकान के बाहर चौंतरे पर रात में कमल के
समान सिमटकर पड़ा रहा॥२३॥
कुछ ही देर बाद उसने दूकान का दरवाजा खोलकर उसमें घुसते हुए किसी युवक वैश्य
को देखा। कुछ ही समय के बाद एक पांथा आई हुई और जल्दी से दूकान में घुसी किसी स्त्री को
देखा ॥२४-२५॥
दूकान के अन्दर जलते हुए दीप के प्रकाश से दरवाजे की दरार से जब उसने अन्दर झाँका
तब अपनी पत्नी को देखा और पहचान लिया॥२६॥
अन्दर से द्वार बन्द करके अन्य पुरुष के संसर्ग में अपनी पत्नी को देखकर उस पर मानों
वज्रपात-सा हुआ और वह सोचने लगा॥२७॥
बुरे व्यसनों के समूह में पड़े हुए पुरुष के लिए ऐसी विपत्तियाँ सुलभ हैं। धनहीन
व्यक्ति शरीर को भी बेच देता है, स्त्रिया की तो बात ही क्या जिसका जीवन स्वभावतः
विद्युत् के समान चंचल होता है? ॥२८॥
पिता के घर में रहनेवाली स्वतन्त्र स्त्री की यही गति होती है॥२९॥
ऐसा सोचता वह बाहर बैठा हुआ अपनी स्त्री तथा उसके उपपति का गुप्त वार्तालाप
सुनने लगा॥३०॥
उसने दूकान के द्वार पर जाकर कान लगाया तो वह पापिन स्त्री एकान्त
में उस अपने उपपति वैश्य से कह रही थी कि तेरे प्रति मेरा प्रेम है, इसलिए कहती हूँ
सुनो॥३१॥
मेरे पति का परदादा वीरवर्मा था उसने अपने घर के आँगन के चारों कोनों में सोने की
अशर्फियों से भरे चार घड़े छिपाकर गाड़े हैं। यह बात उसने अपनी एक स्त्री से कही थी उस स्त्री ने
मरने के समय उसकी बहू (पतोहू) से बता दी। उसने अपनी बहू (मेरी सास) को यह बतलाया
और मेरी सास ने मुझसे कहा। इस प्रकार मेरे पति के कुल में सासों के द्वारा इस धन की
जानकारी के लिए परम्परा चल रही है॥३२-३५॥
४१

स्वभर्तुस्तच्च न मया दरिद्रस्यापि वर्णितम् ।
स हि द्यूतरतो द्वेष्यस्त्वं तु मे परमः प्रियः ॥३६॥
तत्तत्र गत्वा मद्भर्तुः सकाशात्तद्गृहं धनैः ।
क्रीत्वा तत्प्राप्य च स्वर्णमिहैत्य भज मां सुखम् ॥३७॥
एवमुक्तः कुटिलया स तयोपपतिर्वणिक् ।
सुतोष तस्य मन्वानो निधिं लब्ध्यमयत्नतः ॥३८॥
देवदासोऽपि कुभ्रूवाक्शल्यैस्तैर्हृदिहतः ।
कीलितामिव तत्काल धनाशां हृदये दधौ ॥३९॥
जगाम च ततः सद्यः पुरं पाटलिपुत्रकम् ।
प्राप्य च स्वगृहं लब्ध्वा निधानं स्वीचकार तत् ॥४०॥
अथाजगाम स वणिक्त्तद्भार्याच्छन्नकामुकः ।
तमत्र ददृशे वाणिज्यव्याजान्न निधिलोलुपः ॥४१॥
देवदाससकाशाच्च क्रीणाति स्म स तद्गृहम् ।
देवदासोऽपि मूल्येन भूयसा तस्य तद्ददौ ॥४२॥
ततो गृहस्थितिं कृत्वा युक्त्या श्वशुरवेश्मनः ।
स देवदासः शीघ्रं तामानाय स्वगेहिनीम् ॥४३॥
एवं कृते च तद्भार्याकामुकः स वणिक्शठः ।
असम्पन्निधिरभ्येत्य देवदासमुवाच तम् ॥४४॥
एतद्भवद्गृहं जीर्णं मह्यं न खलु रोचते ।
तद्देहि मे निजं मूल्यं स्वगृहं स्वीकुरुष्व च ॥४५॥
इति जल्पंश्च स वणिग् देवदासश्च विब्रुवन् ।
उभौ विवादमत्तौ तौ राजाग्रेमुपजग्मतुः ॥४६॥
तत्र स्वभार्यावृत्तान्तं यदास्यविषदुःसहम् ।
देवदासो नरेन्द्राय कृत्स्नमद्गिरति स्म तम् ॥४७॥
तत्तदाभाष्य तद्भार्यां तत्त्वं चान्विच्य भूपतिः ।
अदण्डयत् सर्वस्वं वणिजं परदारिकम् ॥४८॥
देवदासोऽपि तुष्टभूः त्यक्त्वा तां क्षिप्रमागिराम् ।
अन्यां च परिणीयाथ तस्थौ लब्धनिधिः सुखम् ॥४९॥


१ वरदारामङ्गदनमन्वन्थि खण्डम् ।