कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
चतुर्थ लम्बक. ४४७
चतुर्थ लम्बक. ४४७
यह आदेश सुनकर उत्पन्न हुए अपने पिता के यहाँ मैं पुत्र-रूप में उत्पन्न हुआ। मेरा नाम
समुद्रदत्त है और यह मित्रराज मेरा स्वयं वरण किया हुआ कठिन समय का मित्र
है॥१२१-१२२॥
संक्षेप में यह मेरा जन्म है। ऐसा कहकर मेरे चुप हो जाने पर लज्जा से नीचे की ओर
मुँह करके वह कन्या कहने लगी—'यह ठीक है। आज मैंने स्वप्न में शिवजी की पूजा की तो
उन्होंने प्रसन्न होकर वरदान दिया कि तुम प्रातःकाल ही अपने वर (पति) को प्राप्त
करोगी॥१२१ १२२॥
इसलिए तुम्हीं मेरे पति और तुम्हारा यह मित्र मेरा भाई है। इस प्रकार वाणी-रूपी
अमृत से वह कन्या मेरा अभिनन्दन करके चुप हो गई॥१२३॥
तदनन्तर विधिवत् विवाह के लिए उससे परामर्श करके मैंने मित्र के साथ अपने घर
चलने का निश्चय किया॥१२४॥
तब उस कन्या ने संकेत मात्र से अपने वाहन सिंह को पास बुलाया और समुद्रदत्त से कहा
कि वायुपुत्र! आप सिंह पर सवार हों॥१२५॥
मैं भी अपने मित्र भीम के साथ उस सिंह पर बैठा और गोद में अपनी प्रियतमा को बैठा
लिया॥१२६॥
वहाँ से गरुड़मन्त्राख्य हारण में अपनी पत्नी और मित्र के साथ सिंह पर बैठा हुआ घर
की ओर चला और शबर लोग उसे मार्ग बताते हुए चले॥१२७॥
ग्रीष्म के बाधा से मारे गये पथिक के समान जीवन रक्षा करते हुए हमलोग समय
से उसी नगरी में पहुँचे॥१२८॥
उस नगरी में सिंह पर चढ़े और पत्नी के साथ मुझे आते हुए देखकर आश्चर्यचकित वर्णिकपुत्र
नागरिक ने मेरे पिता से कहा॥१२९॥
वे सब प्रसन्न होकर बाहर आये। हमलोगों को आते और सिंह से उतरकर उनके चरणों में प्रणाम
करते हुए देखकर उन्होंने अत्यधिक प्रसन्नता दिखाई॥१३०॥
अनुक्रम से उन्होंने मेरा उस पत्नी का भी कन्या का प्रणाम करते हुए देखकर और उस
देश को न जाने वन्दनमाला के (दिखायी) दिये जैसे ... न मानते॥१३१॥
वे प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। वहीं रहकर सब आभरण भूषण उतार उद्यान
में नगर की प्रशंसा करने पर ... बना दिया॥१३२॥
मदन से दुःखे देखकर उस कन्या ने अपने पिता को यह बात कहलवाकर भेज दी कि उस
वीर का कन्या के साथ विधिवत् विवाह किया जाय॥१३३॥
तदालोक्य च सोऽकस्माद् मवूवधूबाहनस्तदा।
सिंह सर्वेषु पश्यत्सु सम्पन्नः पुरुषाकृतिः ॥१३४॥
किमेतदिति विभ्रान्ते जने तत्र स्थितेऽखिले।
स दिव्यवस्त्राभरणो नमन्नामबमब्रवीत् ॥१३५॥
अह चित्राङ्गदो नाम विद्याधर इय च मे।
सुता मनोवती नाम कन्या प्राणाधिकप्रिया ॥१३६॥
एतामङ्क सदा कृत्वा विपिनेन भ्रमन्नहम्।
प्राप्तवानेकदा गङ्गां भूरितीरतपोवनाम् ॥१३७॥
तपस्विमज्जनत्रासात्तस्या मध्येन गच्छतः।
अपतत् मम वक्षात्त पुष्पमाला तदम्भसि ॥१३८॥
ततोऽकस्मात्समुत्थाय नारवोऽन्तर्जलस्थितः।
पृष्ठे यया पतितया क्रुद्धो मामशपन्मुनिः ॥१३९॥
औद्धत्येनामुना पाप गच्छ सिंहो भविष्यसि।
हिमाचल गतश्चैतां सुतां पृष्ठेन वक्ष्यसि ॥१४०॥
यदा च मानुषेणेषा सुता ते परिणेष्यते।
तदा तद्दर्शनादेव शापादस्माद् विमोक्ष्यसे ॥१४१॥
इत्थमह मुनिना शप्तः सिहीभूय हिमाधरु।
अतिष्ठ तनयामेतां हरपूजापरां वहन् ॥१४२॥
अनन्तर यथा चरनाच्छबराधिपतिरिखम्।
सम्प्राप्त सर्वकल्याण तथा प्रविदितम्ब ते ॥१४३॥
तस्माद्यामि भद्र वस्तीर्णः शापो मयैष सः।
इत्युक्त्वा सोऽभ्युदपतत्सद्यो विद्याधरो नमः ॥१४४॥
ततस्तद्विस्मयाक्रान्तो मन्दरस्वजनान्भवः।
श्लाघ्यसम्बन्धहृष्टो मे पिताकार्षीन्महोत्सवम् ॥१४५॥
को हि निर्व्याजमित्राणां चरित चिन्तयिष्यसि।
मुहृत्सु मव तृप्यन्ति प्राजैरप्युपकृतय ये ॥१४६॥
इति चात्र न को माम सकमत्वाग्मभ्यधात्।
ध्याय ध्यायमुदार तच्छबराधिपचेष्टितम् ॥१४७॥
राजापि तत्परा मुदृष्या नयस्तस्य सम्मतः।
भतुष्यदस्मरत्नहेम शबराधिपत परम् ॥१४८॥
शुद्धश्च तस्मै मल्पित्रा द्राणित महस्रैव च।
मतपमन्वीराउय रननोपायनतायिना ॥१४९॥