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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

पंचम लम्बक ५७

पंचम लम्बक ५७
तदुपरान्त वह शिव और माधव परस्पर मिलकर पुरोहित का धन उड़ाते हुए स्वतन्त्र
रूप से रहने लगे ॥१७६॥
कुछ समय के पश्चात् पुरोहित रत्न और आभूषण बेचकर रुपये लेने के लिए जौहरी के
बाजार में गया और उन आभूषणों में से एक कड़ा या हाथ का कंगन बेचने लगा ॥१७७॥
वहाँ पर रत्नपरीक्षक जौहरियों ने उसको परीक्षा करके पुरोहित से कहा—'यह कौन
चतुर कारीगर है जिसने इस नकली माल को बनाया है ॥१७८॥
भिन्न-भिन्न रंगों में रँगे हुए कांच और स्फटिक के टुकड़ों को पीतल में ऐसा जड़ दिया
गया है कि वे सच्चे रत्न-से प्रतीत होते हैं। किन्तु ये सब नकली रत्न हैं असली एक भी
नहीं ॥१७९॥
यह सुनकर घबराया हुआ पुरोहित घर से सब आभूषणों को लेकर माधव को दिखाने
के लिए उसके पास ले गया ॥१८०॥
यह देखकर माधव बोला कि 'यह तो तुम्हारे ही सब असली गहन या आभूषण हैं।
तुमने असली आभूषण पहले ही निकाल लिये और नकली बनवाकर रख दिये ॥१८१॥
यह सुनकर पुरोहित पर मानो वज्रपात-सा हुआ और वह तुरन्त शिव के पास जाकर
कहने लगा कि अपने आभूषण ले लो और मेरा धन मुझे दे दो ॥१८२॥
उत्तर में शिव ने कहा—अब मेरे पास तुम्हारा धन कहाँ रह गया वह तो मैंने इतने
समय तक खा डाला' ॥१८३॥
इस प्रकार झगड़ते हुए वे दोनों शिव और पुरोहित माधव को साथ लेकर राजा के पास
गये। राजा से पुरोहित ने प्रार्थना की—महाराज ! पीतल में विशेष प्रकार से जड़े हुए काँच
और स्फटिक के रंगीन टुकड़ों से बने हुए नकली आभूषणों से मुझे ठगकर शिव ने मेरा सर्वस्व
नष्ट किया' ॥१८४-१८५॥
तब शिव ने राजा से कहा—'राजन् ! मैं बाल्यावस्था से ही तपस्वी ब्रह्मचारी रहा।
इसी ने आग्रह करके मुझ पर दान लेने के लिए बाध्य किया। मैंने इस सम्बन्ध में अपनी मूर्खता
(अनभिज्ञता) बताते हुए इससे उसी समय कह दिया था कि मैं रत्न और सोने के सम्बन्ध
में सर्वथा अनभिज्ञ हूँ और मुझे इनका कुछ पता नहीं। इस सम्बन्ध में मुझ जैसा समझो
करो ॥१८६-१८८॥
'मैं तुम्हारे कथन से तृप्त हो गया हूँ'—इसने इस बात को स्वीकार किया था। इसीलिए
मैंने दान लेकर उसे उसी समय इसे सौंप दिया था ॥१८९॥

गताजन पुरीतं गच्छन्तो मुञ्चन य प्रभो।
भिदन पादयोरत्र त्यक्तसङ्गिस मिष॥१२०॥
पन्था पदं गणय्य परं प्रानाय्यत प्रभु।
तव शिर गतालोकात्तन्नाम स च मापय ॥१२१॥
परमान्ति मान्येऽन्यमरण्यो ममान च।
न गृहीतं मदा किञ्चिद् भरता वा विस्रज्य वा॥१२२॥
पश्चात् पश्चादनुव्रज्य मामाहारं विधत्सन्।
मनः संशय मानीत महा भाग विनिर्गमन्॥१२३॥
यद्य दो यन्मदत्तं म च स्नानि तानि यद्।
शङ्कितानिस्ततोऽनानां प्रवनात्तु स पश्यन्॥१२४॥
निर्व्याजं भजन मानं च प्रत्यया मम।
दत्तः पञ्चादिशोऽस्मि दशगणविपुस्तगम् ॥१२५॥
जन्निप्रवणस्त्वामस्याय यद माधवा
व्रजन् मागंणां चा गदा तस्य सुधार षा॥१२६॥
परम तत्त्वं विनिश्चयाधस्त्वं नित्यन्तः बार
परिहृत्य समार्गात् सनार्थमन्चितः॥१२७॥
पुराण्डि माथ दत्तो जरितार्थो विरञ्चितः।
काल वि मानं रघुतिस्यानपङ्किलः॥१२८॥
तो व पृथ्वी मन्वाग मन्दानु विरमादशे।
ऽनेकशतसहस्रान्तर्भावितानो विमृष्टः॥१२९॥
एव मन्वान सविद्वान कर्म नयम्।
अनाशानैः १ पूर्णां कातश पावन २४॥ ॥
लब्धं लब्धं कस्यैचिद् दर्शितं वपुः।
राजोऽथ कस्यचित् तस्मै व्यभाष्ट विलोकिनः ॥२५॥
स महामुनेः रूपं दृष्ट्वा सुदृष्टवान्।
किञ्चिदुवाच तत् सर्वं शृणुध्वं सविस्तरम् विदाः ॥ ॥
रतिवर्मसुतो राजा रतिषेणोऽभवत् पुरा।
विदेह विषये पूर्वं नगरे पुरसञ्चये ॥
पुरन्दर इवासीत् सौन्दर्येण समो नृणाम्।
प्रियंवदस्य नृपतेः प्रियंवदाभवत् सुता ॥