कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
तृतीय लम्बक १४१
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तृतीय लम्बक १४१
उस वैश्य के स्वीकार करने पर जहाज के स्वामियों ने इसे रस्सियों से दोनों ओर से
कसकर बाँध दिया ॥१३१॥
इस प्रकार बँधा हुआ विदूषक समुद्र में उतर पड़ा। धीर पुरुष मौका आने पर कभी
हिम्मत नहीं हारते ॥१३२॥
ध्यान करते ही उपस्थित होने वाले खड्ग को हाथ में लिये हुए विदूषक जहाज के नीचे
पानी में गोता लगाकर गया ॥१३३॥
वहाँ उसने एक विशालकाय सोये हुए पुरुष को देखा जिसकी जाँघों में फँसकर जहाज
रुक गया था ॥१३४॥
विदूषक ने तलवार से उसकी विशाल जंघा काट डाली और रुकावट हटने से जहाज
चल पड़ा ॥१३५॥
यह देखकर उस दुष्ट (बेईमान) बनिये ने पोतित धन के लोभ से उसके शरीर से
बँधी रस्सियों को काट डाला और वह वैश्य अपचरित्र के समान छूटे हुए जहाज से महान् लोभ
के समान समुद्र के पार पहुँच गया ॥१३६॥
रस्सियों के कट जाने से समुद्र के बीच निराधार तैरता हुआ धीर विदूषक
मन में निस्तब्ध सोचने लगा कि इस पापी बनिये ने यह क्या किया। अथवा क्या
कहा जाय ? धन के लोभ में अन्धे मनुष्य उपकार को देखने या समझने में समर्थ नहीं
होते ॥१३७॥
दुर्गा ! अब यह समय पछताने का नहीं है तैरने का ताँता देने पर छोटी-सी विपत्ति भी दूर
नहीं की जा सकती यह तो भीषण विपत्ति है ॥१३८॥
ऐसा सोचकर वह उस जलेचर का बेड़ा जो उसने अन्दर सोए हुए पुरुष की काट दी
थी ॥१३९॥
दोनों हाथों से कटे का भाग लेकर उसी जाँघ के सहारे विदूषक ने समुद्र को पार कर लिया।
सच है साहसी का दैव भी सहायता देता है ॥१४०॥
रात के समय समुद्र के पार आए हुए हत्थाण्ड के समान उस धीर विदूषक का अन्धकार
वाणी ने कहा—॥१४१॥