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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

तृतीय लम्बक २४९

Page 290Permalink

तृतीय लम्बक २४९
यह सुनकर राजा ने विश्वस्त ब्राह्मणों को कन्या को देखने के लिए भेजा कि जाकर
देखो कि कन्या सुलक्षणा और विवाह के योग्य है या नहीं। ब्राह्मणों ने वहाँ जाकर जैसे ही
उन्मादिनी को देखा वैसे ही वे स्वयं उस पर आसक्त होकर लुब्ध हो गये। उन्होंने
सोचा कि इसे पाकर राजा इसपर आसक्त होकर राज्य-कार्य करना भी छोड़ देगा। अतः
इससे क्या लाभ ? ॥६८-७०॥
सावधानतापूर्वक ऐसा सोचकर ब्राह्मणों ने राजा से झूठ कह दिया कि 'महाराज! कन्या
कुलक्षणा है' ॥७१॥
इस प्रकार राजा ने उसे छोड़ दिया। इस कारण वणिक् ने अपमान से कुपिता
कन्या का राजा के सेनापति से विवाह कर दिया ॥७२॥
एक बार अपने घर में बैठी हुई उस कन्या ने ऊपर से जाते हुए राजा को जानकर
खिड़की से अपने रूप को दिखा दिया ॥७३॥
राजा विश्व-वशीकरण औषधि के समान उस सुन्दरी को देखकर कामवश से पागल-सा
हो गया ॥७४॥
अपने घर जाकर और पहले स्वयं छोड़ी हुई उस वैश्य-कन्या का पता पाकर व्याकुल
राजा गहरे कामज्वर से पीड़ित हो गया ॥७५॥
इस वृत्तान्त को जानकर सेनापति ने राजा से कहा कि 'वह आपकी दासी है
परस्त्री नहीं है। अतः आप उसे स्वीकार करें। मैं उसे देवमन्दिर में छोड़ देता हूँ। आप
उसे वहीं से ग्रहण कर लें।' ॥७६॥
सेनापति के द्वारा इस प्रकार दण्डवत्पूर्वक प्रार्थित राजा बोला—'यदि तू उसे त्याग देगा
तो भी मैं परस्त्री को ग्रहण न करूँगा। यदि तू ऐसा करेगा तो तेरा धर्म नष्ट होगा और
मैं तुझे स्त्री-परित्याग करने के कारण दण्ड भी दूँगा।' ऐसा सुनकर सभी मंत्री घर गये और
राजा कामवेदना से मर गया ॥७७-७९ ॥
वह राजा धैर्यवान् और विवेकी होने पर भी जिस प्रकार उन्मादिनी के बिना मर गया
उसी प्रकार कामवेदना के बिना उदयन की क्या स्थिति होगी ? ॥८० ॥
१ प्राचीन काल में मन्दिरों को देवदासी भेंट करने की प्रथा थी। विशेष रूप से कन्याओं
को भेंट किया जाता था। कहा जाता है कि गीतगोविन्द के कर्त्ता जयदेव की भार्या पद्मावती भी
इसी प्रकार देवताओं को भेंट की गई कन्या थी। दक्षिण के संडोवा मन्दिर में, उड़ीसा के जगन्नाथ
के मन्दिर में, गुजरात के बहुचरा तथा कालिका के मन्दिर में अभी कुछ दिन पहले तक यह प्रथा
थी। दक्षिण भारत में मात्र मठनायकों को भी कन्याएँ भेंट की जाती थीं, किन्तु यह प्रथा अनर्थकारी
होने से अब प्रायः समाप्त सी हो रही है।
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