कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
७२६ कथासरित्सागर
७२६ कथासरित्सागर
स एको जाग्रदेवांसीदमनुष्यगृहाश्रयात्।
स्वपन्त्यज्ञा हि निश्चेष्टाः कुतो निद्रा विवेकिनाम्॥६०॥
तावच्च तत्र पुरुषः कोऽप्येको निभृतं युवा।
अभ्यन्तरगृहं तस्याः प्रविवेशान्तिकं स्त्रियाः॥६१॥
तेन साकं च सा रेमे चिरं गुप्ताभिभाषिणी।
रतिश्रान्तौ च तौ दैवान्निद्रां द्वावपि जग्मतुः॥६२॥
तच्च दीपप्रकाशेन सर्वं द्वारान्तरेण सः।
विष्णुदत्तो विलोक्यैवं सनिर्वेदमचिन्तयत्॥६३॥
कष्टं क्व प्रविष्टाः स्मो दुश्चारित्र्याः स्त्रिया गृहम्।
ध्रुवं ज्ञातोऽयमेतस्या न कौमारः पतिः पुनः ॥६४॥
नान्यथा हि भवेदेषा सशङ्कनिभृता गतिः।
मया चपलचित्तेयमादावेव न लक्षिता॥६५॥
अन्यालाभात् प्रविष्टाः स्मः किं त्वत्रान्योन्यसाक्षिणः।
इत्येवं चिन्तयन् शब्दं जनानां सोऽशृणोद् बहिः॥६६॥
ददर्श प्रविशन्तं च स्वस्थानस्थानितानुगम्।
युवानमभिपश्यन्तं सशङ्गं शवराधिपम् ॥६७॥
के यूयमिति पृच्छन्तं मत्वा गृहपतिं स तम्।
भीताः पान्थाः स्म इत्याह विष्णुदत्तः पुलिन्दकम्॥६८॥
स चान्तः शबरो गत्वा दृष्ट्वा भार्यां तथास्थिताम्।
चिच्छेद तस्य सुप्तस्य तज्जारस्यासिना शिरः ॥६९॥
भार्या तु निगृहीता न तेन सा नापि बोधिता।
भुवि न्यस्तासिनान्यत्र पर्यङ्के सुप्तमेव तु ॥७०॥
तद्बुद्ध्वा सप्रतीपेक्षं विष्णुदत्तो व्यचिन्तयत्।
युक्तं स्त्रीति न यद्भार्या हता जारहरो हतः॥७१॥
किं तु क्रूरमेदं कर्म यन्नेनात्र सुप्यते।
विस्रब्धं तदहो चित्रं वीर्यमुद्रिक्तचेतसाम्॥७२॥
इत्यत्र चिन्तयत्येव विष्णुदत्ते प्रबुध्य सा।
कुस्त्री ददर्श जारं स्वं हतं सुप्तं च तं पतिम् ॥७३॥
उत्थाय च गृहीत्वा तत्स्कन्धे जारकबन्धनम्।
हस्तेनैकेन चादाय तच्छिरः सा विनिर्ययौ ॥७४॥
एक वही विष्णुदत्त अकेला जागता रहा क्योंकि जिस घर में वह ठहरा था उसमें एक
उस युवती के अतिरिक्त दूसरा कोई पुरुष न था। मुग्ध जन निश्चेष्ट होकर सो जाते हैं किन्तु
विचारशीलों को नींद कहाँ ? ॥६०॥
इसी बीच कोई एक युवा व्यक्ति छिपे तौर से उस स्त्री की कोठरी में स्त्री के पास
गया ॥६१॥
गुप्त रूप से बातें करती हुई वह स्त्री उस पुरुष के साथ रमण करने लगी। कुछ समय
पश्चात् रति की श्रान्ति एवं घोर नींद से विवश होकर वे दोनों सो गये ॥६२॥
विष्णुदत्त दरवाजे की दरार से दीपक के प्रकाश से प्रकाशित उस कोठरी में यह सब
देखता रहा और दुःखी होकर सोचने लगा—॥६३॥
कष्ट है कि हमलोग इस दुराचारिणी स्त्री के घर में आ गये। निश्चय है कि यह इसका
विवाहित पति नहीं है। यदि विवाहित पति होता तो इसकी गति इस प्रकार सशंक और छिपी न
होती। मैंने पहले ही समझ लिया था कि यह स्त्री वंचका है। इस प्रकार सोचते-सोचते उसने
घर के बाहर कुछ मनुष्यों के शब्द सुने ॥६४-६५॥
उसने अपनी-अपनी जगहों पर तैनात अनुचरों के साथ तलवार लेकर आते हुए
भीलों के युवा सरदार को देखा ॥६६॥
'तुम कौन कौन हो'—ऐसा पूछते हुए भीलराज से विष्णुदत्त ने कहा—'हमलोग पथिक
(बटोही) हैं ॥६८॥
तदनन्तर अन्दर आकर और इस प्रकार प्रेमी (जार) के साथ सोई हुई देखकर
भीलराज ने पत्नी के उस प्रेमी का सिर तलवार से काट डाला ॥६९॥
किन्तु स्त्री को न मारा और न जगाया। वह तलवार को भूमि पर रखकर पलंग पर
सो गया ॥७०॥
दीप से प्रकाशित घर में इस घटना को देखकर विष्णुदत्त ने सोचा इसने उचित ही किया
कि स्त्री समझकर पत्नी को नहीं मारा और उसका हरण करनेवाले को मार डाला ॥७१॥
किन्तु यह आश्चर्य है कि ऐसा कर्म करके भी यह विश्वासपूर्वक सो रहा है। बड़े
हुए मनवालों का ऐसा पराक्रम अवश्य आश्चर्यजनक होता है ॥७२॥
विष्णुदत्त यह सोच ही रहा था कि उस दुष्टा स्त्री ने जागकर जार को मरा हुआ और
पति को सोता हुआ देखा ॥७३॥
और, पलंग से उठकर अपने यार के शव को कन्धे पर रखकर एक हाथ से उसके सिर को
लेकर वह घर से बाहर निकली ॥७४॥