कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
तृतीय लम्बक ३८१
तृतीय लम्बक ३८१
वहाँ राजद्वार पर सन्ध्या अग्निहोत्र आदि के मन्त्र पढ़कर और अपना फलभूर्ति नाम
सुनाकर बोला—'कल्याणकारी कल्याण प्राप्त करता है और अशुभकर्ता अशुभ प्राप्त
करता है। कानों में आश्चर्य उत्पन्न करनेवाले ये वचन बोलने लगा ॥४०-४१॥
उसे बार-बार ऐसा कहते हुए सुनकर चकित हुए राजा आदित्यप्रभ ने उसे अन्दर
बुलवाया ॥४२॥
वह फलभूर्ति भीतर राजा के समीप आकर भी बार-बार वही वाक्य कहने लगा
जिसे सुनकर राजा और उसके समीप बैठे हुए व्यक्ति हँसने लगे। इस प्रकार प्रसन्न राजा ने
उसे अच्छे-अच्छे वस्त्र गहने और अनेक गाँव पुरस्कार में दिये। बड़ों की प्रसन्नता झूठी (व्यर्थ)
नहीं होती ॥४३-४४॥
इस प्रकार यश की कृपा से निर्धन फलभूर्ति ने राजा द्वारा दी गई विभूति प्राप्त की
और सदा इसी प्रकार बकता हुआ राजा का प्रेमपात्र बन गया। राजाओं का मन विलास का
सदा रसिक होता है। क्रमशः वह फलभूर्ति (सामग्रतः) धीरे-धीरे राज्य में रनिवास में और
सर्वत्र ही राजप्रिय होने के कारण सम्मानित हुआ ॥४५-४७॥
किसी समय राजा आदित्यप्रभ वयस में शृंगार खेलकर एकाएक रनिवास में चला
गया। द्वारपाल की घबराहट से शंकित राजा ने रानी के भवन में प्रवेश करते ही रानी
कुवलयावली को देव-पूजा में संलग्न देखा ॥४८-४९॥
राजा ने वहाँ उठे हुए धूपाकाशी जालें सूँघे हुए, मोटा सिन्दूर का तिलक लगाये हुए,
जप से फड़कते हुए ओष्ठावाली रंग-बिरंगे बड़े-से मण्डल के भीतर बैठी हुई तथा रक्त मद्य और
नरमांस से उग्र बलि देती हुई नयी रानी को देखा ॥५०-५१॥
रानी भी राजा के सहसा आ जाने पर घबराहट में थोथी बहकने लगी राजा के पूछने
पर अभय प्रार्थना करके बोली—'महाराज ! तुम्हारी उन्नति के लिए ही यह पूजन कर रही हूँ।
इस पूजा की प्राप्ति और सिद्धि का वृत्तान्त सुनो ॥५२-५३॥
रानी कुवलयावली द्वारा कही गई कथा
अपने पिता के घर में जब मैं कन्या (अविवाहिता) थी तब एक बार वसन्तोत्सव
के समय कुल-उद्यान में बैठी हुई सखियों ने आकर कहा—'इस हमारे उद्यान में केतकी झुरमुट
में सिद्धदाता वरदानी पद्मावती की मूर्ति है। वह भक्तों की मनोकामना पूर्ण करने ॥५४-५५॥