कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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षष्ठ लम्बक | १४५
चौथा तरंग
मदनवेग विद्याधर की कथा
तदनन्तर अपने घर को गई हुई सोमप्रभा को पीछे की ओर से देखने के लिए, राजमार्ग
के किनारे, अपने भवन की छत पर खड़ी कलिङ्गसेना को दैवयोग से समीप-स्थित मदनवेग
नामक विद्याधरों के युवक सरदार ने देखा ॥१२॥
अपने अनुपम रूप से तीनों लोकों को जीतनेवाली कामरूपी ऐन्द्रजालिक की जादुई छड़ी
के समान उस कलिङ्गसेना के रूप को देखकर मदनवेग स्तब्ध हो गया ॥१३॥
जहाँ मानव कन्या का ऐसा रूप है, वहाँ विद्याधरियों और अप्सराओं की क्या कथा ॥१४॥
अतः यदि वह मेरी स्त्री न हुई, तो मेरे जीवन से क्या लाभ ? किन्तु मैं विद्याधर होकर
मानवी का संग कैसे कर सकता हूँ ॥१५॥
ऐसा सोचकर उसने प्रज्ञप्ति नामक विद्या का ध्यान किया। वह विद्या मूर्तीव उपस्थित
होकर मदनवेग से इस प्रकार कहने लगी- ॥१६॥
'वास्तव में यह कन्या मानुषी नहीं है। यह शापच्युत अप्सरा है, जो राजा कलिङ्गसेन
के यहाँ उत्पन्न हुई है ॥१७॥
ऐसा सुनकर मदनवेग अपने घर गया और सब कार्यों से विरक्त होकर काम-पीड़ित हो
सोचने लगा ॥१८॥
यदि मैं इसका स्वेच्छापूर्वक अपहरण करूँ तो यह मेरे लिए उचित नहीं है। प्रच्छन्नरूप
स्त्रियों का हरण करना यश-मृत्यु कहलाता है यह शास्त्र-मत मिला है ॥१९॥
अतः इसकी प्राप्ति के लिए मुझे शिवजी की आराधना करनी चाहिए क्योंकि कल्याण
शिव के अधीन होता है और दूसरा कोई उपाय नहीं ॥२०॥
ऐसा निश्चय करके वह दूर स्थित आश्रम पर्वत पर जाकर एक पैर से खड़े होकर और
निराहार रहकर तप करने लगा ॥२१॥
तदनन्तर शीघ्र ही उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर और रूप देकर शिवजी मदनवेग
से इस प्रकार कहने लगे- ॥२२॥
'यह कलिङ्गसेना मेरी पत्नी के अर्थी वत्सराज के लिए नियत है। इसके पूर्व भी
अन्यजन्मान्तर में इसने मन्दिर से राजा... ॥२३॥
यह कन्या देव का राजा उत्पन्न करने के वर इसे बताया है। किन्तु उस वरदानकी अन्यत्र
रूप के वर में नष्ट कर के दूर कभी होगा ॥२४॥