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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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षष्ठ लम्बक १९५
दैवयोग से वह उसके साथ अपने रूप की संगति चाहने लगी अर्थात् उस पर
अनुरक्त हो गई। तदनन्तर उसने अपने मनोभाव को सन्देश रूप में सखी द्वारा उसके पास
भेजा श्लेष सुनकर साहस की शंका करते हुए और न चाहते हुए भी राजकुमारी की सखी ने उससे
भवित कर दिया ॥७४-७५॥
हे भद्र यह सामने जो एकान्त मन्दिर देख रहे हो इसमें तुम रात को राजकुमारी के
आने की प्रतीक्षा करना। इस प्रकार का उससे निश्चय करके सखी ने राजकुमारी तेजस्वती से कह
दिया। तेजस्वती भी सूर्य को देखती हुई बैठी रही अर्थात् रात्रि-आगमन की प्रतीक्षा करने
लगी ॥७६-७७॥
वह पुरुष सखी से निश्चय करके भी भय से कहीं भाग गया। सच है मेंढक कमलिनी
के नेकर का स्वाद नहीं जान सकता ॥७८॥
राजवंश में उत्पन्न भीमदत्त नामक एक युवा राजकुमार पिता के मर जाने पर पिता के
मित्र विषमसिंह के पास दैवयोग से इसी सायंकाल वहाँ (उज्जैन में) आया ॥७९॥
वह सुन्दर युवा भाई-बन्धुओं द्वारा राज्य-हरण कर लेने के कारण दुःखित और अकेला
उज्जैन पहुँचा था। उस समय (सायंकाल) राजा से मिलना उचित न जानकर वह उसी शून्य
या एकान्त मन्दिर में ठहर गया जिसमें राजकुमारी की सखी ने उसके प्रेमी पुरुष को आने का
संकेत दिया था ॥८०-८१॥
रात्रि में प्रेम से अन्धी राजकुमारी ने उस मन्दिर में बैठे हुए राजपुत्र को धोखे से अपना
पति बना लिया ॥८२॥
उस बुद्धिमान् राजकुमार ने भी चुपचाप उसका प्रेमाभिनन्दन किया क्योंकि वह उसकी
भावी राज्यलक्ष्मी की सूचना दे रही थी ॥८३॥
तब राजकुमारी ने उसे छल से प्राप्त होने पर भी अत्यन्त सुन्दर देखकर अपने को दैव
वशिन (ठगाई हुई) नहीं समझा ॥८४॥
तदनन्तर इधर-उधर की बात और आदरयुक्त प्रगल्भ करके राजकुमारी अपने भवन
को गई और राजपुत्र ने वहीं रात्रि व्यतीत की ॥८५॥
प्रातःकाल राजपुत्र राजभवन में जाकर द्वारपाल से सूचना दिलाकर राजा के समीप
पहुँचा और उससे परिचित हुआ ॥८६॥
राजपुत्र के राज्यापहरण आदि दुःखों को सुनकर राजा ने उसके शत्रुदमन के लिए
सहायता करना स्वीकार किया। साथ ही पहले से ही देने के लिए तैयार उस अपनी कन्या को
उसे देने के लिए भी राजा ने विचार किया और मन्त्रियों से अपना विचार कहा ॥८७-८८॥
अनन्तर राजकुमारी की अन्तरंग गतियों से भली भाँति परिचित कराई गई रानी ने
भी राजा से कन्या का सारा वृत्तान्त कह सुनाया ॥८९॥