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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

प्रारंभिक भूमिका व विषय-सूची

प्रकाशक
बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्
पटना - ३
l
©
सर्वस्वात्व प्रकाशकाधीन
प्रथम संस्करण : शकाब्द १८८२ खृष्टाब्द १९६
मूल्य दस रुपये मात्र
मुद्रक
सम्मेलन मुद्रणालय
प्रयाग

वक्तव्य
परिषद् के लक्ष्य और उद्देश्य में भारतीय और भारतीयेतर भाषाओं के साहित्यिक
सांस्कृतिक शास्त्रीय वैज्ञानिक आदि विषयक ग्रन्थों को विशुद्ध हिन्दी-भाषा में अनूदित कर
प्रकाशित करना भी रहा है और इस दिशा में परिषद् ने अबतक राजशेखर की संस्कृत के साहित्य
शास्त्रविषयक 'काव्यमीमांसा' डॉ पिशल द्वारा जर्मन भाषा में लिखित 'कम्परेटिव ग्रामर
ऑफ़ दि प्राकृत लैंग्वेजेज' ('प्राकृत भाषाओं का व्याकरण' के नाम से अनूदित) फ्रेंच भाषा में
मारिस मेटर्लिंक-लिखित 'ल्वासे ब्यू' तथा अँगरेजी में लिखित और कलकत्तों के ही द्वारा रूपा
न्तरित 'वैभवत' और 'संस्कृतविदग्धा एक अनुशीलन' के हिन्दी-अनुवाद प्रकाशित किये हैं और
उपर्युक्त अनुवाद-ग्रन्थों का अच्छा समादर भी हुआ है। प्रस्तुत ग्रंथ महाकवि सोमदेवभट्ट-कृत 'कथा
सरित्सागर' नामक बृहत् ग्रंथ के प्रथम खण्ड का मूल संस्कृत-सह हिन्दी-अनुवाद प्रकाशित करते
हुए हमें हर्ष हो रहा है। उक्त कथा-सरित्सागर का अनुवाद पण्डित केदारनाथ शर्मा सारस्वत ने
किया है किन्तु सम्पूर्ण ग्रंथ का अनुवाद वे अपने जीवन में पूरा न कर सके। हमें खेद है कि अचानक
ही उनका देहावसान हुआ और उन्हें अपने अनुवाद के प्रथम खण्ड का प्रकाशन देखने का अवसर
न मिल सका। उन्होंने प्रकाशन की सुगमता के उद्देश्य से सम्पूर्ण ग्रंथ को तीन खण्डों में विभक्त
किया था। सम्पूर्ण ग्रंथ १८ लम्बकों में विभक्त है। उनमें केवल ६ लम्बकों का यह प्रथम खण्ड
अभी प्रकाश में आ रहा है अन्य ६ लम्बकों का दूसरा खण्ड शीघ्र ही प्रेस में दिया जायगा और
शेष ६ लम्बकों का अनुवाद किसी योग्य संस्कृत-हिन्दी के विद्वान से करा कर प्रकाशित करके
इस बृहत् ग्रंथ का काम समाप्त किया जायगा। जिस दिन उपर्युक्त तीनों खण्ड प्रकाश में आ
जायेंगे उस दिन हमें विशेष प्रसन्नता होगी।
इस ग्रंथ की भूमिका संस्कृत-हिन्दी के ख्यातिप्राप्त विद्वान डॉ वासुदेवशरण अग्रवाल
(पुरातत्त्व-विभाग हिन्दू-विश्वविद्यालय वाराणसी) ने लिखने की कृपा की है। आपने अपनी
भूमिका में मूल ग्रंथ के सम्बन्ध में जैसा विद्वत्तापूर्ण विवेचन प्रस्तुत किया है उससे ग्रंथ की उपयोगिता
और सर्वप्रियता ही सिद्ध होती है। हम परिषद् की ओर से इस कृपापूर्ण सहयोग के लिए आपका
आभार स्वीकार करते हैं। साथ ही स्वर्गीय सारस्वतजी की आत्मा की शान्ति के लिए ईश्वर
से प्रार्थी हैं।
पाठक-समाज प्रस्तुत ग्रंथ का मूल-सह अनुवाद पढ़कर आनन्द का अनुभव करेगा ऐसा
हमारा विश्वास है।
बैद्यनाथ पाण्डेय
१ ५ ५ संपादक

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भूमिका
कथासरित्सागर कहानी-साहित्य का शिरोमणि ग्रन्थ है। इसे काश्मीर में पंडित सोमदेव
ने त्रिगर्त या कुल्लू-काँगड़ा के राजा की पुत्री काश्मीर के राजा अनन्त की रानी सूर्यमती के मनो-
विनोद के लिए ई १०६३ और १०८१ के बीच में लिखा। ग्रन्थ में २१३८८ पद्य हैं और लेखक
ने उसे १२४ तरंगों में बाँटा है। इसका एक दूसरा विभाग लम्बकों में है जिनकी संख्या १८ है।
यह ग्रन्थ अपने वर्तमान रूप में अनेक छोटी-बड़ी कहानियों का संग्रह है। सोमदेव ने यथार्थ ही
इसे कथा-रूपी सरिताओं का सागर कहा है। अपने ग्रन्थ के आरम्भ में उन्होंने मूल्यवान् सूचना के
रूप में लिखा है—
बृहत्कथायाः सारस्य संग्रहं रचयाम्यहम्।
(प्रथम तरंग श्लोक तीन)
इसी सूचना को अन्तिम प्रशस्ति में इस प्रकार विशद रूप से कहा है—
नानाकथामृतमयस्य बृहत्कथायाः सारस्य सज्जनमनोम्बुधिपूर्णचन्द्रः ।
सोमेन विप्रवरभूरिगुणाभिरामरामात्मजेन विहितः खलु संग्रहोऽयम् ॥
अर्थात्—कथासरित्सागर अनेक कथाओं के अमृत की खान बृहत्कथा नामक ग्रन्थ का
सार है। बृहत्कथा पैशाची भाषा का ग्रन्थ था जिसकी रचना गुणाढ्य ने सातवाहन राजाओं के
समय में प्रथम-द्वितीय शती के लगभग की थी। आन्ध्र-सातवाहन-युग में स्थल-जल-मार्गों पर
अनेक सार्थवाह पोताधिपति एवं सांयात्रिक व्यापारी रात-दिन चहल-पहल रखते थे। टकटक
करके तारों से भरी हुई लम्बी रातों में उनके मनोविनोद के लिये अनेक कहानियों की रचना
स्वाभाविक थी जिनमें उन्हीं के देशान्तर-भ्रमण से उत्पन्न अनुभवों का अमृत निचोड़ा जाता था।
पूर्व से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक के पहाड़ों और जंगलों एवं गाँवों और नगरों की तिल-तिल
भूमि को अपने पैरों से रूँदते हुए उनके चरण सदा रौंदते रहते थे। इसी प्रकार पूर्व और पश्चिम
के समुद्रों पर उनके प्रवहण सरपट छूटते थे। सातवाहन-नरेशों की मुद्राओं पर अंकित जलयानों
के चित्र उस काल के सामुद्रिक व्यापार और द्वीपान्तर-संनिवेश की सूचना देते हैं। उसी के
प्रयत्नों से बृहत्तर भारत का वह रूप सम्पन्न हो पाया जिसे मत्स्यपुराण के लेखक ने बारह द्वीपों
और एकान्त रत्नों से निर्मित 'नानापण्य महार्णव' कहकर प्रणाम किया है (द्वादशार्णववां
द्वीप चैकादशापरस्तन मत्स्य २४८।२२-२६)। उन्हीं उद्यमी सार्थों और नाविकों के अनुभवों की
बहुमुखी सामग्री को गुणाढ्य ने अपनी विलक्षण प्रतिभा से बृहत्कथा के साँचे में ढाल दिया था।

गुणाढ्य के विस्तृत भौगोलिक क्षितिज में पूर्व के महोदधि और पश्चिम के रत्नाकर समुद्रों के
इस पार और उस पार के भूखंडों की अनेक कथाएं सम्मिलित थीं इसकी सूचना बृहत्कथा की कई
उत्तरकालीन वाचनाओं से प्राप्त होती है। बृहत्कथा के रूप में गुणाढ्य ने जो साहित्यिक सत्र
विक्रमीय प्रथम शती के लगभग आरम्भ किया था वह वाङ्मय का सहस्र सम्वत्सर सत्र बन गया
और संस्कृत-प्राकृत के कई प्रतिभाशाली रचयिताओं ने उसमें भाग लिया। सोमदेव का कथासरित्-
सागर बृहत्कथा के विकास की अन्तिम कड़ी है। वह बृहत्कथा की काश्मीरी वाचना है, जिसमें
सोमदेव की प्रतिभाशालीनी लेखनी ने यथेष्ट परिवर्तन किए हैं।
कथासरित्सागर के स्वरूप के यथार्थ परिचय के लिये बृहत्कथा और उसकी वाचनाओं
के विषय में जानना आवश्यक है। उद्योतन सूरि द्वारा विरचित (७७९ ई.) कुवलयमालाकहा
प्राकृत-भाषा का अति उत्कृष्ट कथा-ग्रन्थ अभी प्रकाश में आया है। उसके आरम्भ में बृहत्कथा
को 'वड्डकहा' कहते हुए लिखा है—
पयलक्कतायमणिलया सिक्खाविउकइपयस्त सुहयं वा।
ककलासब्भो गुणड्डो सरसई जस्स वड्ढकहा ॥
(कुवलयमाला पृ० ३ पंक्ति २१)
'बृहत्कथा क्या है साक्षात् सरस्वती है। गुणाढ्य स्वयं ब्रह्मा हैं। यह बृहत्कथा सब कलाओं
की खान है। कविजन इसे पढ़कर शिक्षित बनते हैं। उस समय बृहत्कथा की प्रशंसा में इससे
अधिक और क्या कहा जा सकता था ? उद्योतन सूरि से लगभग डेढ़ सौ वर्ष पूर्व बाण ने लिखा था—
समुद्दीपितकन्दर्पा कृतगौरीप्रसाधना।
हरलीलेव लोकस्य विस्मयाय बृहत्कथा॥
बाण के उल्लेख से यह ज्ञात होता है कि उसके समय तक बृहत्कथा कामकथा के रूप में
ही सुरक्षित थी। यही उसका मूल रूप था। 'कृतगौरीप्रसाधना' से सूचित होता है कि बृहत्कथा
का आरम्भिक पाठ शिव-पार्वती के संवाद के रूप में था अर्थात् पार्वती ने शिवजी से कथा सुनाने
की प्रार्थना की और उत्तर में शिवजी ने जो कथा सुनाई, वही बृहत्कथा हुई। सोमदेव ने कथासरित्
सागर की पहली तरंग में इस भूमिका का उल्लेख किया है। तिलकमंजरी के कर्त्ता धनपाल ने
(११वीं शती) बृहत्कथा की उपमा उस समुद्र से दी है जिसकी एक-एक बूँद से अन्य कितनी ही
कथाओं की रचना हुई—
सत्यं बृहत्कथाम्भोधेर्बिन्दुमादाय संस्कृताः।
तेनेतरकथाकन्थाः प्रतिभान्ति तदग्रतः॥
आचार्य हेमचन्द्र ने काव्यानुशासन की स्वोपज्ञवृत्ति में कथाओं के भेद बताते हुए बृहत्कथा
का उल्लेख किया है (दम्भाङ्किताऽमृतान्निर्गताऽहम्नराचरितवद् बृहत्कथा च ८ सू ८)।

गुणाढ्य-कृत मूल बृहत्कथा अब प्राप्य नहीं है। ज्ञात होता है सोमदेव के बाद उस महान्
ग्रन्थ का लोप हो गया। किन्तु कालक्रम से बृहत्कथा के जो रूपान्तर बने उनमें चार अबतक प्राप्त
हैं। पहला बुधस्वामी-कृत बृहत्कथाश्लोकसंग्रह है। इसकी रचना संस्कृत में लगभग पाँचवीं शती
में हुई। इसमें २८ सर्ग हैं, पर ग्रन्थ अपूर्ण रहा। इसके कर्ता बुधस्वामी ने गुप्तकालीन स्वर्ण-युग
की संस्कृति के साँचे में बृहत्कथा को ढालने का यत्न किया। विद्वान् इसे बृहत्कथा की पैशाची
वाचना मानते हैं। बृहत्कथाश्लोकसंग्रह का देवनागरी-लिपि में मूल संस्करण और फ्रेंच-अनुवाद
फीकाकोत ने पेरिस से प्रकाशित कराया था।
बुधस्वामी के प्रायः साथ ही या संभवतः १ वर्ष के भीतर बृहत्कथा का एक प्राकृत
संस्करण जैन परम्परा में संघदासगणि ने वसुदेव हिण्डी के नाम से तैयार की। मूल बृहत्कथा में
नरवाहनदत्त नायक था। वह वत्सराज उदयन का पुत्र था। कालिदास ने लिखा है कि मालवा के
गाँवों में वहाँ के बड़े-बूढ़े उदयन की कहानी कहने में चतुर थे। उदयन से सम्बन्धित यह कहानी
केवल वासवदत्ता और उदयन की प्रेम-कहानी तक सीमित न रही होगी। उतना अंश तो कथा-
सरित्सागर के आरम्भ में ही है, किन्तु उदयन की कहानी का पूरा चक्र था। उसके ही पेटे में
उसके पुत्र नरवाहनदत्त के विवाह की अनेक कथाएँ भी थीं। पुत्र ने पिता के पद-चिह्नों पर चलते
हुए अपने जीवन में अनेक प्रेम-परिणयों का ठाट विकसित किया। नरवाहनदत्त के अनेक
विवाहों के वर्णन करने के कारण मूल बृहत्कथा का स्वरूप कामकथा या शृंगारकथा जैसा था।
नरवाहनदत्त देशान्तरों का भ्रमण करते हुए जहाँ जाता वहीं उसकी यात्रा का पर्यवसान एक
विवाह के रूप में होता था। जैसे व्यापारी धन कमाकर सकुशल लौट आने पर सिद्ध यात्री
बनते हैं वैसे ही नरवाहनदत्त के चरित में द्वीपान्तर-पर्यटन की सिद्ध यात्रा एक नई रानी के साथ
विवाह के रूप में होती है।
कथासरित्सागर में जहाँ एक ओर अपने नाम के अनुसार १२४ तरंगों का विभाग है
वहीं उसके १८ लम्बक भी हैं। यह लम्बक शब्द अपने मूल स्रोत की ओर संकेत करता है।
लम्बक का मूल संस्कृत रूप लम्भक था। एक विवाह द्वारा एक स्त्री की प्राप्ति 'लम्भ' कहलाती
थी और उसी की कथा के लिए लम्भक शब्द प्रयुक्त हुआ। तदनुसार ही अलंकारवती लम्भक,
शशांकवती लम्भक इत्यादि अलग-अलग कथाओं के नाम पड़ होंगे। हेमचन्द्र ने अपने काव्यानुशासन
की टीका में स्पष्ट शब्दों में बृहत्कथा को लम्भों में विभक्त कहा है। वही लम्भक का मूल रूप ज्ञात
होता है। वादीभसिंह-कृत गद्य-चिन्तामणि में नायक द्वारा पत्नी की प्राप्ति का वर्णन करनेवाले
कथाखण्डों को लम्भ कहा है। स्मरण रखने की बात है कि वसुदेव हिण्डी के विभागों में तो लम्भक
शब्द है किन्तु बुधस्वामी-कृत बृहत्कथाश्लोकसंग्रह में ग्रन्थ का विभाग सर्गों में हुआ है अर्थात्
वह एक सर्गबद्ध रचना है, पर वहाँ भी प्रत्येक कथा के अन्त में 'लाभ' शब्द आया है। ज्ञात होता है
कि लम्भ या उसी के प्राकृत रूप लम्भ का प्रयोग गुप्तकाल में होने लगा था। सुबन्धु-कृत वासवदत्ता
में जिसकी रचना चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के कुछ बाद पाँचवीं शताब्दी के आरम्भ में हुई, बृहत्कथा
को लम्भों से युक्त कहा है—बृहत्कथालम्बैरिव सालभञ्जिकासन्निधैः अर्थात् बृहत्कथा के लम्भों

  • ८ -

वा परिच्छेदों में शालभञ्जिका या स्त्रियों की कथाएँ थीं। दशरूपक के कर्त्ता धनंजय ने जो मालव
राज मुंज का सभासद था रामायण के साथ बृहत्कथा का उल्लेख किया है। इससे यह अनुमान
किया गया है कि शायद रामायण की तरह बृहत्कथा की रचना भी सर्गों में हुई हो पर इस अनुमान
के लिए पर्याप्त कारण नहीं है और यही सम्भावना अधिक प्रतीत होती है कि मूल पैशाची
बृहत्कथा में ही कथाओं के विभाग को लम्भ या लम्भक जैसे मिलते-जुलते शब्द से सूचित किया
गया था और उसी परम्परा में बना लम्भक शब्द सुबन्धु के समय में प्रयुक्त होने लगा था।
बृहत्कथा के मूल स्वरूप पर प्रकाश डालने के लिए संघदासगणि-कृत वसुदेव हिण्डी की
प्राप्ति उल्लेखनीय घटना है। 'हिण्डी' शब्द का अर्थ परिभ्रमण या पर्यटन है। संघदासगणि ने
जो वसुदेव हिण्डी लिखी उसमें उन्होंने यद्यपि बृहत्कथा को ही आधार बनाया था किन्तु ग्रन्थ के
ठाट और उद्देश्य में काफी परिवर्तन किए। जहाँ बृहत्कथा लौकिक कामकथा थी वहाँ संघदास ने
वसुदेव हिण्डी को धर्मकथा का रूप दिया और जैनधर्म की प्रभावना करनेवाले कितने ही प्रसंगों
को उसमें यथास्थान सम्मिलित किया। इससे भी अधिक महत्त्व का परिवर्तन कथा के नायक का
बदल डालना था। पैशाची बृहत्कथा में वत्सराज उदयन के पुत्र नरवाहनदत्त के विवाहों की
कहानियाँ थीं किन्तु संघदास ने अन्धकवृष्णि-वंश के प्रसिद्ध पुरुष वसुदेव को अपना नायक बनाया।
वसुदेव हिण्डी में २९ लम्भक हैं और यह महाराष्ट्री प्राकृत भाषा में गद्य-शैली में है
जिसमे कुछ मिलाकर लगभग ११ हजार श्लोक प्रमाण की सामग्री है। वसुदेव हिण्डी के भी जैन
परम्परा में दो रूप मिलते हैं। पहला ग्रन्थ तो यही संघदासगणि का रचा हुआ है। इसे प्रथम
खण्ड कहते हैं। किन्तु इसी का एक दूसरा खण्ड उपलब्ध है जो मध्यम खण्ड के नाम से प्रसिद्ध है।
उसकी रचना धर्मदासगणि ने अपने पूर्ववर्ती संघदासगणि की रचना को आगे बढ़ाते हुए
लगभग दो शती बाद की। उसकी भूमिका में धर्मदास ने कहा है—'कृष्ण के पिता वसुदेव ने
१०० वर्ष तक परिभ्रमण किया और अनेक विद्याधरों एवं राजाओं की कन्याओं से विवाह
किया। संघदासगणि ने वसुदेव के केवल २९ विवाहों का वर्णन किया था। शेष ७१ विवाहों की
कथा उसने विस्तार-भय से छोड़ दी थी। उसे मध्यम या बीच के लम्भकों के साथ कथासूत्र मिलाते
हुए मैं कह रहा हूँ।'
धर्मदासगणि-कृत मध्यम वसुदेव हिण्डी में ७१ लम्भक १७ श्लोकों में पूर्ण हुए हैं।
यह बड़ा ग्रन्थ अभी तक अप्रकाशित है इसलिये इसकी कहानियों के विषय में विशेष कुछ नहीं
१ सुव्वइ य किल वसुदेवेणं वाससतं परिब्भमंतिएं इमम्मि भरहे विज्जाधरिवरवइत्ति
बालदुक्खंवाससंभवाणं कन्याणं सतं परिणीतं तत्थ य सामावियपमावियाणं रोहिणीपञ्चउवसायाणं
एगुणतीस लम्भता संघदासवायरएणं उवणिबद्धा। एगसत्तरिं च वित्थारभीएणा कहामज्झे
छड्डिया। तो हुं भो सोहयसिगारकहापसंसणं असहमागं आयरियसयाते अवधारेऊणं
पवयणणुरागेणं आयरियमिओएण य तेंति लब्भित्थलक्खणमग्गं गंधव्वएणे जग्गुत्तउत्तो हे। तं सुणह
इतो पुव्वकहाणुसारेण चेव।