कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
प्रथम लम्बक १९
प्रथम लम्बक १९
यह सुनकर राजा सुशर्मा ने ब्राह्मण के शाप के भय से उस युवा को स्त्री समझकर सुरक्षित
कन्या के महल में रखवा दिया॥८०॥
पंचशिख के चले जाने पर वह ब्राह्मण-कुमार देवदत्त अपनी प्रियतमा के भवन में स्त्री-वेश
धारण करके रहता हुआ अत्यन्त विश्वासपात्र बन गया॥८१॥
एक बार रात को उसे अत्यन्त उत्सुक देखकर देवदत्त ने अपने को प्रकट करके गान्धर्व
विधि से उससे विवाह कर लिया॥८२॥
वह राजकन्या जब गर्भिणी हो गई, तब उस ब्राह्मण ने पंचशिख-यक्ष को स्मरण किया
और स्मरण करते ही वह आ गया तब देवदत्त को गुप्त रूप से ले गया॥८३॥
तब प्रातःकाल पंचशिख पहले के समान ब्राह्मण का वेश बनाकर और उस जवान के
स्त्री-वेष को हटाकर राजा सुशर्मा के पास जाकर बोला—'राजन् ! आज मुझे लड़का मिल गया।
अब मेरी स्नुषा (पतोहू) को लौटा दो' ॥८४-८५॥
जब राजा को यह पता चला कि वह ब्राह्मण-स्नुषा कहीं भाग गई तब वह ब्राह्मण के
शाप के भय से मन्त्रियों को बुलाकर परामर्श करने लगा॥८६॥
राजा ने मन्त्रियों से कहा—'यह ब्राह्मण नहीं कोई देवता है, जो मेरी परीक्षा लेने या
वंचना के लिए आया है। देखा जाता है, प्रायः ऐसी बातें सर्वदा हुआ करती हैं' ॥८७॥
राजा शिबि की कथा
इसी प्रकार प्राचीन युग में परम तपस्वी, दयालु, दाता धीर एवं समस्त प्राणियों को अभय
देनेवाला शिबि नामक राजा हुआ। उसकी परीक्षा के लिए स्वयं इन्द्र ने बाज का रूप धारण
करके कबूतर-रूपधारी धर्म का पीछा किया॥८८-८९॥
कबूतर ने बाज के भय से राजा शिबि की गोद में शरण ली। तब बाज मनुष्य की बोली
में राजा से बोला—॥९० ॥
'राजन् ! यह कबूतर मेरा भक्ष्य है। मैं भूखा हूँ। यदि तुम इसे नहीं छोड़ते
तो मुझे मरा हुआ समझो। इस प्रकार मेरी हिंसा करके तुम्हें कौन-सा धर्म प्राप्त
होगा ? ॥९१॥
तब शिबि ने उससे कहा कि 'यह मेरी शरण में आ गया है, इसलिए इसे अब छोड़ नहीं
सकता। तुम्हारी क्षुधा-निवृत्ति के लिए इसके समान दूसरा मांस देता हूँ' ॥९२॥
बाज ने कहा— यदि ऐसी बात है, तो अपना मांस मुझे दो।' राजा ने भी प्रसन्न हो
'ऐसा ही सही' —यह कहकर इसकी बात को स्वीकार किया॥९३॥
राजा जैसे-जैसे अपना मांस काटकर तराजू पर चढ़ाता था वैसे-ही-वैसे कबूतर भारी
होता जाता था॥९४॥