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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

में १८ लम्बक हैं और उनके नाम भी सोमदेव के लम्बकों से मिलते हैं।

  • १९ -

रामायण और महाभारत का संक्षेप भी रामायणमंजरी और भारतमंजरी नामक ग्रंथों में किया।
उनका अवदानकल्पलता ग्रंथ भी प्रसिद्ध है। कला-विलास देशोपदेश नर्ममाला और समय
मातृका ग्रंथों में क्षेमेन्द्र की प्रतिभा का उत्कृष्ट रूप प्राप्त होता है। क्षेमेन्द्र-कृत बृहत्कथामंजरी
में १८ लम्बक हैं और उनके नाम भी सोमदेव के लम्बकों से मिलते हैं।
बृहत्कथा की अंतिम वाचना सोमदेव-कृत कथासरित्सागर है। सोमदेव ने अपनी
प्रारंभिक प्रतिज्ञा में कहा है—
'मेरे सामने जैसा मूल था वैसा ही मैंने यह ग्रंथ रचा है। तनिक-सा फेर-फार भी नहीं किया।
हाँ केवल औचित्य और एक दूसरे के साथ अन्वय या जोड़ मिलाने का ध्यान यथाशक्ति रक्खा गया
है। इसमें काव्य का अंश मैंने इतना ही जोड़ा है जिससे कहानी के रस का विघात न हो। पांडित्य
के यश के लोभ से मेरा यह प्रयत्न नहीं है। मेरा उद्देश्य यह है कि अनेक कथाओं का समूह सरलता
से स्मृति में रक्खा जा सके।'
कथा की उत्पत्ति के संबंध में सोमदेव ने लिखा है—'एक बार शिव ने पार्वती से सात
विद्याधर चक्रवर्तियों की आश्चर्यमयी कथाओं का वर्णन किया। यद्यपि शिव की वार्ता एकान्त में
हुई थी किन्तु उनके अनुचर पुष्पदन्त ने वे कहानियां सुन लीं और अपनी पत्नी जया को उन्हें सुना
दिया। जया ने उन कहानियों को अपनी सहेलियों से कहा। जब यह बात पार्वतीजी के कान में
पड़ी तो उन्होंने रुष्ट होकर पुष्पदन्त को मर्त्यलोक में जन्म लेने का शाप दिया। पुष्पदन्त के भाई
माल्यवान् ने उसकी ओर से क्षमायाचना की तो उसे भी वैसा ही दंड मिला। पुष्पदन्त की पत्नी
जया पार्वतीजी की परिचारिका थी। जब पार्वतीजी ने अपनी सखी को शोक से दुःखी देखा तो
उन्हें करुणा आ गई और उन्होंने अपने शाप का परिहार करते हुए कहा कि पुष्पदन्त का विन्ध्य
पर्वत में काणभूति नामक एक पिशाच से मिलना होगा। उसे अपने पूर्व जन्मों की स्मृति बनी
रहेगी और जब वह काणभूति को ये कथाए सुनायेगा तब उसकी शाप-मुक्ति होगी। माल्यवान्
भी जब काणभूति से इन बृहत्कथाओं को सुनकर लोक में इनका प्रचार कर चुकेगा तब वह पुनः
स्वर्ग में लौट आएगा। इस विधान के अनुसार पुष्पदन्त ने कौशाम्बी में वररुचि-कात्यायन के
रूप में जन्म लिया और वह महान् वैयाकरण एवं नन्द-वंश के अंतिम राजा योगानन्द का मंत्री
हुआ। अंत में वह वनवासी हो गया और विन्ध्याचल की विन्ध्यवासिनी देवी की यात्रा में काणभूति
से उसकी भेंट हुई। तब उसे अपने पूर्व जन्म की स्मृति हुई और उसने काणभूति को वे सात


१ यथामूलं तथैवैतन्न मनागप्यतिक्रमः।
ग्रन्थविस्तरसंक्षेपमात्रं भाषा च भिद्यते॥
औचित्यान्वयरक्षा च यथाशक्ति विधीयते।
कथारसाविघातेन काव्यांशस्य च योजना॥
वैदग्ध्यख्यातिलोभाय मम नैवायमुद्यमः।
किन्तु नाना कथाजालस्मृतिसौकर्यसिद्धये॥ कथासरित्सागर १।१०-१२।

  • २० -

बृहत्कथाएं सुनाई। इतना करने के बाद वह शापमुक्त होकर स्वर्ग चला गया। उसके भाई माल्य-
वान् ने भी मृत्युलोक में प्रतिष्ठान पुरी में गुणाढ्य के रूप में जन्म लिया और वह वहाँ के राजा
सातवाहन का मंत्री बना। गुणदेव और नन्दिदेव उसके दो शिष्य थे। उन्हें लेकर वह काणभूति
के पास आया। वहाँ काणभूति से उसे पिशाच भाषा में सात बृहत्कथाएं प्राप्त हुईं और उसने
प्रत्येक को एक-एक लाख श्लोकों में अपने रक्त से लिखा। अपने शिष्यों की सलाह से उसने उन्हें
राज सातवाहन के पास इस विचार से भेजा कि राजा उनकी रक्षा करेगा। पर पिशाचों की भाषा
में लिखी हुई कहानियों को राजा ने पसन्द नहीं किया। इस समाचार से गुणाढ्य को बहुत दुःख
हुआ और उसने अपनी छः कहानियां जला डालीं। अपने शिष्यों का अनुरोध मानकर केवल
सातवीं कहानी बची रहने दी। उस कथा को सुनकर जंगल के जीव भी मोहित हो गए। जब
राजा सातवाहन को यह ज्ञात हुआ तब उसे पश्चात्ताप हुआ और उसने गुणाढ्य के स्थान पर जाकर
बचे हुए कथाभाग को उससे ले लिया। उसने गुणदेव और नन्दिदेव की सहायता से उसका
अध्ययन किया और कथा की उत्पत्ति का वर्णन करनेवाला अंश स्वयं उसमें जोड़ा।¹

नेपाल-माहात्म्य (अध्याय २७-२९) में इस कहानी का रूप थोड़ा भिन्न है। आरंभ में
शिव-पार्वती के संवाद का उल्लेख है। पार्वती ने शिव से नई कहानी सुनाने की प्रार्थना की। शिव
एकान्त में सब द्वार बन्द करके सुनाने लगे। पर उनके भुङ्गी नामक गण ने भौरे का रूप रखकर और
भीतर जाकर वे कहानियां सुन लीं और अपनी पत्नी विजया को उन्हें सुना दिया। किसी दिन
जब पार्वती ने कहानियां अपनी सखियों को सुनाने लगीं तो विजया को वे पहले से ज्ञात थीं।
पार्वती ने यह जानना चाहा कि किसने यह अपराध किया था। शिव ने ध्यान धरकर देखा और
भुङ्गी को शाप दिया। भुङ्गी ने क्षमा-याचना की। तब शिव ने क्षमा करते हुए कहा—इसे मर्त्यलोक
में जन्म लेना होगा और सुनी हुई कथाओं को नौ लाख श्लोकों में लिखना होगा। फिर उसे एक लिंग
की प्रतिष्ठा करनी होगी और तब वह कैलास को लौटने का अधिकारी होगा। इस उल्लेख से
भी ज्ञात होता है कि बृहत्कथा मूल में एक शृंगार-कथा थी। पर नेपाल-माहात्म्य के इस उल्लेख
में कथा का सुननेवाला भुङ्गी नामक गण था। भुङ्गी ने गुणाढ्य के रूप में मथुरा में जन्म लिया।
वह बचपन में अनाथ हो गया और तब उज्जयिनी चला आया। उज्जयिनी में मदन नामक राजा
राज्य करते थे उनकी रानी लीलावती गौड़देश के राजा की पुत्री थी। उज्जयिनी में सर्ववर्मन्
नाम के महान् पण्डित राजसभा में थे। वे गुणाढ्य की प्रतिभा से प्रभावित हुए और उन्होंने उसे
भी राजा की सभा का सदस्य बनवा दिया। एक दिन राजा अपनी रानियों के साथ जल-विहार
कर रहा था। तब उसने 'मोदक' शब्द का अशुद्ध प्रयोग किया। गुणाढ्य ने १२ वर्ष में उसे
व्याकरण की शिक्षा देने की बात कही। पर सर्ववर्मन ने केवल दो ही वर्षों में उसे व्याकरण में
पण्डित बना देने को कहा। गुणाढ्य और सर्ववर्मन में इसके लिए स्पर्द्धा हुई, और सर्ववर्मन ने
कलाप-व्याकरण की रचना करके दो ही वर्षों में राजा को व्याकरण का ज्ञान करा दिया। गुणाढ्य


१ कृष्णमाचार्य संस्कृत-साहित्य का इतिहास पृष्ठ ४१४-४१५।

– २१ –

को संस्कृत-भाषा में न बोलने का आदेश हुआ। वह एक ऋषि के आश्रम में जाकर रहने लगा।
वहाँ उसे पुलस्त्य ऋषि ने पैशाची भाषा में अपनी कथाएँ लिख डालने का परामर्श दिया और यह
भी कहा कि ग्रंथ-समाप्ति के बाद वह नेपाल में शिवलिंग की स्थापना करके शाप-विमुक्त होकर
मर्त्य-योनि से छूटेगा। गुणाढ्य गेरू से पेड़ की पत्तियों पर कथा लिखने लगा। वह उन्हें उच्चस्वर
में पढ़ता जाता था जिसे सुनकर जंगल के पशु-पक्षी मोहित हो गए। यह बात राजा ने सुनी
और जंगल में जाकर सब कुछ अपनी आँखों से देखा। उसने गुणाढ्य से सभा में लौट जाने का
अनुरोध किया पर गुणाढ्य ने उसे स्वीकार न किया और कहा—'मैंने सौ लाख श्लोकों में पैशाची
भाषा में इस कथा की रचना की है। आप इसकी रचना संस्कृत में कराएँ। मैं तो अब नेपाल
जाऊँगा। तब उसने नेपाल जाकर पशुपतिनाथ शिव के दर्शन किए। वहीं रहनेवाले मुनियों
को एकत्र करके उसने भृङ्गीश्वर शिव की स्थापना की और वहाँ से वह कैलाश चला गया।
कथासरित्सागर के आरंभ में सोमदेव ने उसके स्वरूप और वर्ण्य विषयों का अच्छा
परिचय दिया है।
मैं बृहत्कथा के सार का संग्रह कर रहा हूँ। इसमें पहला लम्बक कथापीठ है। उसके बाद
दूसरा कथामुख है। तीसरे लम्बक का नाम लावानक है। चौथे लम्बक में नरवाहनदत्त का जन्म
है। उसके बाद पाँचवें लम्बक का नाम चतुर्दारिका है। छठा लम्बक मदनमंचुका और सातवाँ रत्न
प्रभा नाम का है। आठवें लम्बक का नाम सूर्यप्रभा है। नवाँ अलंकारवती लम्बक है। दसवाँ
शक्तियशस् लम्बक और ग्यारहवाँ वेला लम्बक है। बारहवाँ शशांकवती और तेरहवाँ मदिरा
वती लम्बक है। उसके बाद पंच नामक चौदहवाँ लम्बक और पन्द्रहवाँ महाभिषेक लम्बक है।
उसके बाद १६वाँ सुरतमंजरी लम्बक सत्रहवाँ पद्मावती लम्बक और अट्ठारहवाँ विषमशील
लम्बक है।
कथाओं को कहने की दृष्टि से सोमदेव का अपना पद है। उसकी प्रवाहमयी शैली की
रोचकता को दूसरा कोई नहीं पहुँच पाता। सी एच टॉनी (C. H. Tawney) कृत
कथासरित्सागर के अंग्रेजी-अनुवाद की भूमिका में पेंजर ने सोमदेव के ग्रंथ की प्रशंसा में
लिखा है—
'जब हम इस ग्रंथ को देखते हैं तब इसमें आई हुई हर प्रकार की कथाओं को देखकर मन
आश्चर्य से भर जाता है। ईसवी-सन् से सैकड़ों वर्ष पहले की जीवजन्तु-कथाएं इसमें हैं। द्य लोक
और पृथ्वी के निर्माण-संबंधी ऋग्वेदकालीन कथाएं भी यहाँ हैं। उसी प्रकार रक्तपान करने
वाले बेतालों की कहानियां सुन्दर काव्यमयी प्रेम-कहानियां और देवता मनुष्य एवं असुरों के युद्ध
की कहानियां भी इस संग्रह में हैं। यह न भूलना चाहिए कि भारतवर्ष कथा-साहित्य की सच्ची
भूमि है जो इस विषय में ईरान और अरब से बढ़ चढ़कर है। भारत के इतिहास की कथा भी
तो उसी प्रकार की एक कहानी है। इसका अतिशयोक्तिपूर्ण रूप इन आख्यानों से कम रोचक
नहीं है।
'इन कहानियों का संग्रह करनेवाला लेखक सोमदेव विलक्षण प्रतिभाशाली पुरुष था।

~ २२ ~

कवियों में उसकी प्रतिभा कालिदास से दूसरे स्थान पर आती है। स्पष्ट रोचक और मन को
खींच लेनेवाले ढंग से कहानी कहने की उसमें वैसी ही अद्भुत शक्ति थी जैसी कहानियों के विषयों
की व्यापकता और विविधता है। मानवी प्रकृति का परिचय भाषा-शैली की सरलता वर्णन
का सौन्दर्य और शक्ति एवं चातुर्य-भरी उक्तियां इन सब की रचना अत्यन्त प्रभावपूर्ण है।
दूसरी ओर जैसा कि प्रायः पूर्वी (विशेषतः भारतीय) कहानियों में मिलता है यहाँ
एक विशेषता यह भी है कि नई-नई कहानियां पहली कहानियों के पेटे में समाई हुई हैं और आश्चर्य
जनक वेग से एक के बाद दूसरी कहानी उभरती हुई सामने आती चली जाती है। तब पाठक
अभिलाषा करता है कि कोई सूत्र सहायक बनकर उसे कथाओं के इस भूल-भुलैये से उसका उद्धार
करे। इस संस्करण के सम्पादक ने इस प्रकार का एक सहायक सूत्र सावधानी के साथ तैयार
किया है और कहानियों पर संख्याओं के अंक डाल दिए गए हैं।
"कथासरित्सागर अलिफ लैला की कहानियों से प्राचीनतर ग्रंथ है और अलिफ लैला
की अनेक कहानियों के मूल रूप इसमें हैं। इसके द्वारा न केवल ईरानी और तुर्की लेखकों को
बल्कि बोकेशिओ चौसर एवं लां फौतिन एवं अन्य अनेक लेखकों के द्वारा पश्चिमी संसार को भी
अनेक कल्पनाएं प्राप्त हुई हैं। सोमदेव ने सोचा कि जैसे हिमालय से आई हुई अनेक धाराएं
आगे-पीछे बहती हुई समुद्र में ही पहुँच जाती हैं वैसे ही छोटी-बड़ी सभी कहानियां उनके इस महान्
ग्रंथ में इकट्ठी हो जायें और वह सच्चे अर्थ में कहानी-रूपी नदियों का सागर बन जाय।
कथासरित्सागर के रूप में कल्पना ने एक ऐसे महान् कथा-सागर की सृष्टि की है कि उसमें
अद्भुत कन्याओं और उनके साहसी प्रेमियों राजाओं और नगरों राजतन्त्र एवं षड्यन्त्र जादू
और टोने छल और कपट हत्या और युद्ध रक्तपायी बेताल पिशाच यक्ष और प्रेत पशु-पक्षियों
की सच्ची और गढ़ी हुई कहानियां एवं भिखमंगि साधु, विदग्धक जुआरी वेश्या विट और कुट्टनी
इन सभी की कहानियां एकत्र हो गई हैं। ऐसा यह कथासरित्सागर भारतीय कल्पना
जगत् का दर्पण है जिसे सोमदेव भविष्य की पीढ़ियों के लिए छोड़ गए हैं।"
कथासरित्सागर की वर्तमान संघटना और लम्बकों के क्रम की तात्विक आलोचना
करते हुए श्रीकीय ने जो लिखा है वह भी ध्यान देने योग्य है—
"कथासरित्सागर में मूल ग्रंथ के कथा-क्रम में परिवर्तन किया गया है और इस परिवर्तन
का अभिप्राय कथा के रस की रक्षा करना है। यह बात ग्रंथ के क्रम की वस्तु-स्थिति के बिलकुल
अनुकूल है। पहले पाँच लम्बकों में कोई परिवर्तन नहीं है। शेष लम्बकों में सोमदेव पर काव्य
के प्रभाव की रक्षा करने की अभिलाषा की प्रधानता थी। स्पष्टतया इसी कारण ने सोमदेव को
पंच और महाभिषेक नामक लम्बकों के मध्य की खाई को दूर करने के लिए विवश किया। उनके
ग्रंथ में उक्त दोनों लम्बकों का संक्रमण निर्दोष है। पंच नामक लम्बक का अन्त राजकुमार के
इस निर्णय से होता है कि उसे एक भावी सम्राट् के राज्याभिषेक के लिए आवश्यक रत्नों को प्राप्त
करना है। अगले लम्बक में यह प्रस्ताव आगे बढ़ता है। यह कुछ ऐसे आकस्मिक ढंग से होता है
जिसे सोमदेव बिलकुल मिटा नहीं सके हैं। परन्तु इससे सोमदेव रसमग्ना सर्वव्यापकी और

  • २६ -

शक्तियशस् नामक तीन लम्बकों को यथास्थान रख सके। साथ ही इससे काव्य के प्रारम्भिक
भाग में इस दृष्टि से कि वह अत्यधिक भारी न हो जाये पूर्णतः आमूल परिवर्तन भी स्पष्टतः
आवश्यक हो गया। इसके लिए जिस समाधान का आश्रय लिया गया वह इन तीन लम्बकों को
जिनका संबंध राजकुमार के सम्राट् होने से पहले के वृत्तान्तों से है पञ्च नामक लम्बक के प्रथम
रखने में तथा पद्मावती और विषमशील नामक दो लम्बकों को जिनका संबंध नायक से न होकर
केवल उन कथाओं से था जो उसको सुनाई गई थीं और इसी कारण जिनको औचित्य के साथ
एक परिशिष्ट के रूप में रखा जा सकता था ग्रन्थ के प्रारम्भिक विषय से हटा देने में था। पञ्च
नामक लम्बक के पहले आनेवाले विषय का क्रम कलापूर्ण ढंग से रक्खा गया है क्योंकि उसमें
मुख्यतया प्रासंगिक उपकथाओं से संबंध रखनेवाले लम्बकों को नायक के आकस्मिक होते हुए
भी महत्त्वयुक्त कार्यों को देनेवाले लम्बकों के बीच-बीच में रखने का प्रयत्न किया गया है।
जैसा कि पाँचवें लम्बक के अनन्तर जिसका संबंध प्रासंगिक कथाओं से है मदनमंचुका (६)
नामक महत्त्व का लम्बक दिया गया है। इसके अनन्तर रत्नप्रभा (७) है। अलंकारवती (९) से
पहले आनेवाला लम्बक 'सूर्यप्रभ' (८) मूर्त्त केवल उपकथाओं से सम्बन्ध रखता है।
आकस्मिक कथाओं से सम्बद्ध शक्तियशस् (१०) सहज ही अलंकारवती के अनन्तर आता है।
तदनन्तर वेला (११) शशांकवती (१२) मदिरावती (१३) और पूर्णतः महत्त्वयुक्त पंच तथा
महाभिषेक (१४ और १५) आते हैं। तदनन्तर, परिशिष्ट रूप में सुरतमंजरी पद्मावती और
विषमशील (१६ १८) दिए हुए हैं। एक लम्बक के वास्तविक विषय में एक परिवर्तन आवश्यक
था। क्षेमेन्द्र में और संभवतः मूल ग्रन्थ में भी वेला का संबंध केवल प्रासंगिक उपकथाओं से ही नहीं
था उसके अंत में मदनमंचुका के तिरोहित होने का आवश्यक अंश सम्मिलित था। उसी के
आधार पर हम अगले लम्बकों में सूचित राजा के शोक को समझ सकते हैं। परन्तु, इस प्रकार
का वर्णन रत्नप्रभा अलंकारवती और शक्तियशस् इन लम्बकों के संबंध में सोमदेव की योजना
से मेल नहीं खाता था इसी कारण उक्त आवश्यक अंश को हटा देना पड़ा तो भी सोमदेव के लिए
अपने क्रम में पंच से पहले के लम्बकों में मदनमंचुका के पहले से ही तिरोहित हो जाने के यत्र-तत्र
चिन्हों को हटा देना संभव नहीं था। ¹

जैसा कीथ ने लिखा है कि प्रयत्न करने पर भी सोमदेव एक सुसंघटित ग्रंथ की रचना
में सफल नहीं हुए, परन्तु कथासरित्सागर के उत्कर्ष का आधार उसके वस्तु की संघटना पर नहीं
है। उसका आधार इस ठोस वस्तुस्थिति पर है कि सोमदेव ने सरस और अकृत्रिम रहते हुए
आकर्षक और सुन्दर रूप में ऐसी कथाओं की बड़ी भारी संख्या को प्रस्तुत किया है जो नितान्त
विभिन्न रूपों में—मनोविनोदकारक अथवा भयानक अथवा प्रेम-संबंधी अथवा कष्ट और त्रास
के अद्भुत दृश्यों के प्रति हममें अनुराग उत्पन्न करने के लिए आश्चर्यजनक अथवा हास्योत्पादक थी


१ कीथ, संस्कृत-साहित्य का इतिहास श्रीमन्मङ्गलदेव शास्त्री कृत हिन्दी-अनुवाद
पृ ३१४-३१५।

यहाँ पृष्ठ का लिप्यंतरण प्रस्तुत है:

परिचित कहानियों का सादृश्य उपस्थित करनेवाले रूपों में—हमारे लिए अत्यंत रुचिकर हैं।
क्षेमेन्द्र में कहीं अत्यधिक संक्षेप और कहीं अस्पष्टता के कारण कहानियों का सारा आकर्षण और
रोचकता ही नष्ट हो जाती है। ठीक इसके विपरीत पंचतंत्र के लेखक की तरह सोमदेव प्रतिभा के
धनी हैं। वे पाठक के मन को थकाए बिना सावधानी से अभीष्ट अर्थ का प्रकथन कर सकते हैं।
उनकी कहानियों का रुचिकर रूप कभी नहीं छीजता। (कीथ वही पृष्ठ ३३५)
कथासरित्सागर में कहानियों का एक बढ़िया गुच्छा बेतालपंचविंशति नामक पच्चीस
कहानियों का है (कथासरित्सागर, तरंग ७५-९९)। क्षेमेन्द्र की बृहत्कथामंजरी में भी ये
कहानियां हैं (९।२।११९-१२२१)। सोमदेव की अपेक्षा क्षेमेन्द्र का वर्णन संक्षिप्त और अलंकार-
रहित है। क्षेमेन्द्र में जहाँ केवल १२१९ श्लोक हैं वहीं सोमदेव में २१९५।$^१$ प्रश्न होता है कि
बेताल-विक्रम की ये कहानियां मूल बृहत्कथा में थीं या नहीं। इस विषय में हर्टेल और एजर्टन का
मत है जो सम्भाव्य है कि मूल बृहत्कथा में बेतालपंचविंशति की कहानियां विद्यमान न थीं।
नरवाहनदत्त के उपाख्यान से स्पष्टतः उनका कोई वास्तविक संबंध नहीं जान पड़ता। कीथ के
अनुसार बेतालपंचविंशति के उपाख्यानों पर बौद्ध प्रभाव स्पष्ट है।
पंचतंत्र की भी बहुत-सी कहानियां कथासरित्सागर में बिखरी हुई हैं। क्षेमेन्द्र ने उनको
पंचतंत्र के अनुसार एक साथ ही कर दिया है। इनमें से कम-से-कम आधी कहानियां चार सौ
पचास ईस्वी से पूर्व बने हुए एक ऐसे संग्रह में विद्यमान थीं जिसका उपयोग आर्यसेन संघ नाम के
एक भिक्षु ने अपने ग्रंथ में किया था और जिसका चीनी भाषान्तर उसके शिष्य गुणवृद्धि ने ४९२
ई. में किया था। सोमदेव ने भूतों की कहानियां कहने में बड़ा रस लिया है। इसके अतिरिक्त
चोर, जुआरी, धूर्त, वेश्यागामी, चालबाज़, हुँडोड़, कपटी, बदमाश, ठग, भण्डे, रंगीले भिक्षु
आदि की कहानियों की तह जमाने में सोमदेव को अद्भुत सफलता मिली है। उनकी दृष्टि में
समाज का अर्धांश चित्र नहीं, पूरा चित्र समाया हुआ है। भले और बुरे, ऊँच और नीच, धनी और
कंगाल, धर्मात्मा और गुण्डे सभी के उभरे हुए चित्र उनके ग्रंथ में पाए जाते हैं। जैसे समुद्र सब
नदियों का स्थान है, वैसे ही मानव-स्वभाव का जितना वैचित्र्य है, उसका पूरा अंकन सोमदेव ने अपने
ग्रंथ में किया है। सोमदेव ने स्त्रियों के स्वभाव के विश्लेषण में बहुत रुचि ली है। स्त्री-चरित्र की
अनन्त कहानियां उनके संग्रह में हैं। उनके स्वभाव के गुण-दोषों का चित्रण वे खुलकर करते हैं।
११वीं शती का काश्मीर स्त्रियों के विषय में कुछ अधिक सम्मानसूचक भाव से प्रभावित नहीं था।
पतिप्रेममयी हींगला और अमर्यादित उच्छृंखलता प्रायः स्त्री-चरित्र के ऐसे पक्ष को सामने
रखती हैं जो किसी प्रकार भव्य नहीं कहा जा सकता। सोमदेव का गुण इतना ही है कि वे कुछ
भी कहने में संकोच का अनुभव नहीं करते। जैसे बरसाती नदियों की मटमैली धाराओं के ऊपर
चारों ओर का चन्दनसार आकर बहने लगता है, वैसे ही सोमदेव की कथाओं की शैली बुराइयों
को समेटकर सामने ले आती है। मानव-स्वभाव जैसा है, वैसा ही उसे दिखाना यह महान् लेखक


पाद-टिप्पणी:
१. सुशील कुमार दे, संस्कृत-साहित्य का इतिहास, पृष्ठ ४२१ पाद टिप्पणी।

की विशेषता होती है और सोमदेव इसमें पिछड़े हुए नहीं हैं। सोमदेव की अनेक कहानियां मन
पर एक बार छप जाने के बाद फिर नहीं भुलाई जा सकतीं। कहानी के विस्तार और संक्षेप की
कला में सोमदेव सिद्धहस्त थे। वे उतने ही परिमित शब्दों का प्रयोग करते हैं जितनों से पाठकों
की रुचि का विघात न हो और कहानी का रस भी अच्छी तरह अनुभव में आ सके। जब
११वीं शती में समासबहुला शैली का बोलबाला था उस समय सोमदेव ने जिस शैली का प्रयोग
किया उसे देखकर आश्चर्य होता है। उन्होंने मानो बिना समासों के सरल वाक्यों का धड़ल्ले
से निर्माण किया है, जैसे—
बबन्ध मेखलां भूम्नि हारं च जग्रहस्तने ।
नूपुरौ करयोस्तस्याः कर्णयोरपि कङ्कणौ ॥ (६१।२६)
कहानियों के सम्पुट को वे कितना छोटा बना सकते थे इसका एक नुकीला उदाहरण
तूलिक या रूई बेचनेवाले मूर्ख की कहानी है—
ध्वस्तोलूखलको देव श्रुणु वच्म्यथ तूलिकम् ।
मूर्खः कश्चित्पुमांस्तूलविक्रयायापणं ययौ ॥
अशुद्धमिति तत्सस्य न जग्राहार्य कश्चन ।
तावद्ददर्श तत्राग्नौ हेमविद्वत्प्रशोधितम् ॥
स्वर्णकारेण विक्रीतं गृहीतं ग्राहकेण च।
तद् दृष्ट्वापि स तत्तूलमिद्धेऽग्न्योधमज्जडः ।
भस्मौ चिक्षेप दग्धे च तस्मिंल्लोको जहास्तम् ।
श्रुतोऽयं तूलिको देव खर्जूरीच्छेदकं शृणु ॥ ६१।२८-३१ ॥
'हे देव ! पहलों के संबंध में मूर्ख की कहानी कह चुका अब रूईवाले की कहानी सुनिए।
कोई मूर्ख रूई बेचने बाजार में गया पर साफ न होने से उसे किसी ने लिया नहीं। तब उसने देखा
कि सुनार सोने को आग में तपाकर शुद्ध कर रहा है। उस सोने को सुनार ने बेचा और ग्राहक ने
खरीद किया। यह देखकर उसने भी अपनी रूई को साफ करने के लिए आग में डाल दिया। इससे
सब लोग उस उल्लू पर हँसने लगे। यह तूलिक की कहानी हुई, अब खजूर काटनेवाले मूर्ख की
कहानी सुनें।
इस प्रकार की तरंगित शैली में सोमदेव की छोटी कहानियां बड़ी कहानियों के सम्पुट
में कटहल के कोयों की तरह भरी हुई हैं। इसी प्रकार गंवार गो-दोहक की कहानी है। उसकी गाय
प्रति दिन पच्चीस सेर दूध देती थी। उसके यहां कोई उत्सव होने को हुआ। उसने सोचा कि एक
ही बार में उत्सव के लिए सारा दूध दुह लूंगा और महीने भर तक गाय नहीं दुही। उत्सव आने
पर जब दुहने बैठा तब उसे दूध की बूंद भी न मिली (६१।४४-४७)। पंचतंत्र के हिरण्यक चूहे,
लघुपतनक कौए, चित्रग्रीव कबूतर, मंधरुक कछुए की कहानी भी इसमें लम्बक की ६१वीं तरंग
में है जिसे सोमदेव ने प्रज्ञामिष्ठ या व्यावहारिक बुद्धिमानी की कहानी कहा है।
४

सोमदेव ने अपने वर्णन के बीच-बीच में नीति-संबंधी अनेक सूक्तियाँ डाल दी हैं। जैसे—
अर्थो हि यौवनं पुंसां तदभावश्च वार्धकम्।
तेनास्यौजौ बलं रूपमुत्साहश्चापि हीयते॥ (६।१।११६)
भवन्तिके प्रभो भूत्वा नपूर्व्वं भ्रमरास्तदम्।
मज्जन्तं च सरो हंसा मुञ्चन्त्यपि विरोदितम्॥ (६।१।११८)
शुचिनो न बिभेत्योस्ति न सन्तुष्टस्य चाशुभम्।
धीरस्य च विपन्नास्ति माहात्म्यं व्यवतामिव॥ ६।१।१२१
इस प्रकार नीति-संबंधी सूक्तियों की छौंक वर्णन के स्वाद को बढ़ा देती है और इस
युक्ति से सोमदेव ने पूरा लाभ उठाया है।
एक बार नरवाहनदत्त समुद्र के बीच में स्थित नारिकेलद्वीप से श्वेतद्वीप में आता है।
यह श्वेतद्वीप क्षीरोद समुद्र के पास था जिसे आजकल कास्पियन सागर कहते हैं। इस श्वेतद्वीप
का उल्लेख महाभारत के नारायणीय पर्व में हर्षचरित में तथा अन्य पुराणों में बहुधा आता है।
सोमदेव ने यह संकेत वहीं से अपनाया। श्वेतद्वीप में निवास करनेवाले नारायण की जो स्तुति
सोमदेव ने दी है वह स्तोत्र-विषय में भी उनकी सफलता की सूचक है (५।४२।९-१८)। स्तोत्र
साहित्य का यह चमकता हुआ नग है।
साहित्य की कितनी ही शैलियों और अभिप्रायों के बरतन में बढ़ी हुई निपुणता सोमदेव
का गुण था। कथासरित्सागर अनेकविध कहानियों का महार्णव है। उसके पूरे स्वरूप की कल्पना
कठिनाई से ही की जा सकती है। इस ग्रंथ का पठन और प्रचार अधिक होना चाहिए। भारतीयों
का विश्वास था कि कहानी सुनने से पाप नष्ट होता है। इसका अभिप्राय यही है कि अच्छी कहानी
मन के तनाव को दूर करती है और मनुष्य को फिर अपनी स्वाभाविक स्थिति में पहुँचा देती है।
यह नमक की उस चुटकी के समान है जो क्षार भोजन को स्वादिष्ट बनाती है। ऐसे ही जीवन के
अनेक व्यवहारों को करते हुए कहानी की उचित मात्रा से हम जीवन को अधिक रसपूर्ण बना सकते
हैं। सोमदेव का ग्रंथ बहुमूल्य कोशों का समूह है अर्थात् उसमें रत्नों से परिपूर्ण अनेक डिब्बे भरे
हुए हैं। चाहे वहाँ से अपनी रुचि के अनुसार हम उन्हें चुन सकते हैं।
बिहार राष्ट्रभाषा-परिषद् का यह प्रयत्न अभिनन्दन के योग्य है। इसमें कथासरित्सागर
का न केवल हिन्दी-अनुवाद बल्कि मूल संस्कृत-पाठ भी दिया गया है। इस अनुवाद का श्रेय
पं केदारनाथजी सारस्वत को है। पहले भाग में दस लम्बकों का अनुवाद उनका किया हुआ है।
अब वे नहीं रहे पर आशा है कि परिषद् इसी प्रकार से शेष लम्बकों को भी मूल और अनुवाद
के साथ प्रकाशित करेगी।
काशी-विश्वविद्यालय
शनिवार, ज्येष्ठ कृष्ण ४ सं २०१७
१४-५ १९६०
वासुदेवशरण अग्रवाल