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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

चतुर्थ लम्बक ४७९

चतुर्थ लम्बक ४७९
सबसे पहले यौगन्धरायण ने अपने पुत्र मरुभूति का इसी प्रकार क्रमशः रुमण्वान् ने हरि-
शिख को इत्यक (नित्यादित) ने गोमुख का वसन्तक ने तपन्तक का और पुरोहित शान्तिस्वर ने
अपने दोनों जुड़वाँ भतीजे शान्तिसोम और वैश्वानर नामक पिंगलिका के पुत्रों को लाकर
समर्पित कर दिया ॥९०-९१॥
उस समय सुन्दर मंगलवाद्यों के साथ आकाश से दिव्य पुष्पों की वृष्टि हुई और राजा
तथा रानी नवीन मन्त्रिमण्डल का सत्कार करके अत्यन्त आनन्दित हुए ॥९२॥
बाल्यकाल में उन छह अनन्य प्रेमी मन्त्रिपुत्रों के साथ युक्त वह राजकुमार नरवाहनदत्त
अभ्युदय के कारणभूत गुणों के समान शोभित हो रहा था ॥९३॥
अपनी विविध और सुन्दर बाल-क्रीड़ाओं से प्रेमपूर्ण हृदयवाले राजाओं की एक गोद से
दूसरी गोद में जाते हुए, एवं मुस्कुराते हुए उस राजकुमार के मुखकमल को देखते हुए वत्सराज
के दिन सानन्दपूर्वक व्यतीत होने लगे ॥९४॥
तृतीय तरंग समाप्त
महाकवि सोमदेवभट्ट-रचित कथासरित्सागर का नरवाहनदत्त-जनन नामक
चतुर्थ लम्बक समाप्त