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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

प्रथम लम्बक ४३

Page 76Permalink

प्रथम लम्बक ४३
सबेरे उठकर उसने ब्राह्मणों का भोजन कराने तथा उनकी पूजा करने के लिए कुछ धन
लाने के लिए हिरण्यगुप्त बनिये के पास दासी को भेजा ॥४३॥
वह बनिया भी एकान्त में आकर उससे (उपकोशा से) बोला कि यदि तुम मेरी सेवा
करो तो मैं तुम्हारे पति का रखा हुआ धन तुम्हें दे दूंगा' ॥४४॥
ऐसा सुनकर और पति के रखे हुए धन में किसी की पक्की साक्षी न होने के कारण उपकोशा
दुख और क्रोध से अधीर हो गई और उसने बनिये को भी उसी दिन उसी रात के चतुर्थ प्रहर में
आने का निमन्त्रण दिया जिसे सुनकर प्रसन्न बनिया चला गया ॥४५ ४६॥
तब उसने तेल मिलाकर कुँडों में रखा हुआ बहुत-सा अलकतरा सखियों (दासियों) से
मँगाया और उसमें कस्तूरी आदि अनेक सुगन्धित द्रव्य मिलाये ॥४७॥
उस कोलतार से सने हुए उसने चार छोटे-छोटे कपड़े के टुकड़े (कमर में लपेटने के
लिए) तैयार कराये और एक बड़ा भारी सम्पूरक बनवाया जिसमें बाहर से बन्द करने की
अर्गला (कुण्डी) लगी हुई थी ॥४८॥
कुछ समय के अनन्तर उस वसन्तोत्सव के दिन रात के पहले प्रहर के समय कुमारसचिव
सुन्दर वेष धारण किये हुए सजधज के साथ आया ॥४९॥
चुपचाप घर में आये हुए उस कुमारसचिव से उपकोशा ने कहा— 'बिना स्नान किये
मैं तुम्हारा स्पर्श न करूँगी ? अतः पहले अन्दर जाकर स्नान करो ॥५०॥
उस मूर्ख ने स्नान करना स्वीकार किया तो उसे दासियों ने अन्धकारमय स्नानागार में
प्रवेश करा दिया ॥५१॥
उसे अन्दर ले जाकर दासियों ने उसके पहने कपड़े उतार लिये और कमर में लपेटने के
लिए (काजल से सना) कपड़े का एक टुकड़ा दे दिया ॥५२॥
घने अन्धकार में कुछ न देखते हुए उस पापी के मालिश करने के बहाने सिर से पैर तक
के सभी अंगों को उन सखियों (दासियों) ने तेल मिले हुए उस अलकतरे से काला कर दिया ॥५३॥
दासियां जबतक उसके एक-एक अंग को काजल से मल रही थी तबतक दूसरे पहर में
पुरोहित आ गया ॥५४॥
तब दासियों ने कहा अरे ! वररुचि का मित्र राजपुरोहित आ गया। अतः तुम ऐसे ही
जाकर इस सम्पूरक में छिप जाओ। इस प्रकार उन्होंने घबराहट के साथ उस नग्न कुमारसचिव
को, उस सम्पूरक में घुसाकर बाहर से अर्गला लगाकर बन्द कर दिया ॥५५-५६॥
दासियां पुरोहित को भी स्नान कराने के बहाने अँधेरे स्नानागार में ले गईं और उसके
कपड़े उतार कर तेल मिले हुए काजल से उसकी भी मालिश करने लगीं। इस प्रकार, एक कपड़े
का टुकड़ा लपेटा हुआ वह पुरोहित भी दासियों द्वारा मूर्ख बनाया गया। इतने में तीसरे पहर
कोतवाल भी आ गया ॥५७-५८॥