कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
२१६ कथासरित्सागर
२१६ कथासरित्सागर
सत्यं त्वज्जार इत्युक्त्वा विहसन्स ततो मुनिः ।
सत्यानुरोधक्लृप्तान्तं शापं तस्यामपातयत् ॥१४२॥
पापशीले ! शिलाभावं भूरिकालमवाप्नुहि !
आ वनान्तरसञ्चारिरामवालोकनादिति ॥१४३॥
वराङ्गलुब्धस्याङ्गं १ ते तत्सहस्रं भविष्यति ।
दिव्यं स्त्रीं विश्वकर्मा यां निर्मास्यति तिलोत्तमाम् ॥१४४॥
तां विलोक्य तदैवाक्ष्णां सहस्रं भविता च तत् ।
इतीन्द्रमपि तत्कालं शपति स्म स गौतमः ॥१४५॥
दत्तशापो यथाकामं तपसे स मुनिर्ययौ ।
अहल्यापि शिलाभावं दारुणं प्रत्यपद्यत ॥१४६॥
इन्द्रोऽप्यावृतसर्वाङ्गो वराङ्गैरभवत्ततः ।
अशील कस्य नाम स्यान्न खलीकारकारणम् ॥१४७॥
एवं कुकर्म सर्वस्य फलत्यात्मनि सर्वदा ।
यो यद् वपति बीजं हि लभते सोऽपि तत्फलम् ॥१४८॥
तस्मात्परविरुद्धेषु नोत्सहन्ते महाशयाः ।
एतदुत्तमसत्त्वानां विधिसिद्धं हि सव्रतम् ॥१४९॥
युवां पूर्वभगिन्यौ च देव्यौ शापच्युते उभे ।
तद्वदस्योन्यहितकृन्निर्गूढं हृदयं हि वाम् ॥ १५० ॥
एतद्वसन्तकाच्छ्रुत्वा मिथो वासवदत्तया ।
पद्मावत्या च सुतरामीर्ष्यालिशोच्यमुज्झितम् ॥१५१॥
देवी वासवदत्ता च कृत्वा साधारणं पतिम् ।
आत्मनीव प्रियं चक्रे पद्मावत्यां हितोन्मुखी ॥१५२॥
तस्या महानुभावत्वं तत्तादृङ्मगधेश्वरः ।
श्रुत्वा पद्मावतीसृष्टदूतेभ्योऽपि सुतोष सः ॥१५३॥
अभ्युपेत्य वत्सेशं मन्त्री यौगन्धरायणः ।
उपेत्य सन्निधौ देव्याः स्थितेऽन्यदवभाषत ॥१५४॥
उद्योगायाधुना देव कौशाम्बीं किं न गम्यते ।
नाशङ्का मगधेशाच्च विद्यते वञ्चितादपि ॥१५५॥
१ वराङ्ग—स्त्रियः प्रजननेन्द्रियम् ।
२ भग सहस्रमित्यर्थः।
'हे दुराचारिणी! वन में घूमते हुए रामचन्द्र के दर्शन पर्यन्त तू पत्थर हो जा' साथ
ही इन्द्र को भी शाप दिया कि 'जिस स्त्री-वरांग¹ के लोभ से तूने पाप किया है, उस
अंग के तेरे शरीर में हजारों चिह्न हो जायेंगे। इस प्रकार दोनों को शाप दे कर मुनि
स्वेच्छा से तपस्या करने चले गये। अहल्या भी कठोर शिला बन गई, इन्द्र का शरीर, भी
चारों ओर से स्त्री-योनि के चिह्नों से भर गया। दुश्चरित्रता किसकी दुर्गति का कारण
नहीं होती॥१४२-१४७॥
इसी प्रकार मनुष्य जीवन में जो भी कुकर्म करता है, उसका फल उसे जीवन में ही भोगना
है। जो जैसा बीज बोता है, वैसा ही फल प्राप्त करता है॥१४८॥
इसलिए उदार चित्तवाले व्यक्ति दूसरों के विरुद्ध कार्यों में प्रवृत्त नहीं होते। उच्च
कोटि के व्यक्तियों का यह स्वाभाविक नियम है॥१४९॥
तुम दोनों महारानियां पूर्वजन्म की दिव्य बहिनें या किसी शाप के कारण मर्त्यलोक
में आ गई हो, उसी प्रकार तुम दोनों के हृदय परस्पर सन्देह-रहित एवं शुद्ध हैं॥१५०॥
वसन्तक से इस प्रकार सुनकर दोनों रानियां के हृदय में जो थोड़ी ईर्ष्या की क्षीण रेखा-सी
थी वह भी उन्होंने मिटा दी॥१५१॥
महारानी वासवदत्ता भी पति को दोनों के लिए समान मानकर पद्मावती को इसमें उसी
प्रकार उद्यत रखती थी जैसे आत्महित में॥१५२॥
मन में कुछ शंकित मगध-नरेश ने भी रानी की महानुभावता का परिचय उसके भेजे
हुए दूतों से जानकर सन्तोष प्रकट किया॥१५३॥
किसी दिन महामन्त्री यौगन्धरायण महारानियां तथा अन्य स्नेही मित्रों के साथ बैठे
हुए नरराज के समीप आकर बोला—'महाराज ! अब कौशाम्बी क्यों नहीं चलते ? अब
तो डरे हुए भी मगध-नरेश से किसी प्रकार की शंका नहीं है॥१५४-१५५॥
१. वर = उत्तम, अंग स्त्री की जननेन्द्रिय।
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