कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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सौन्दर्य की शोभिन यह कलिङ्गसेना भी सोमप्रभा के मुख से वत्सराज की रूप प्रशंसा
सुनकर उसे स्वय वरण करना चाहती है॥१५॥
इसलिए जब तक इसका विवाह नहीं होता इसी बीच शीघ्रता करते हुए तुम वत्सराज
का रूप बनाकर इससे गांधर्व विवाह कर लो। 'इस प्रकार सुन्दरी कलिङ्गसेना तुम्हारी
हो जायगी' ॥१६-१७॥
शिवजी से ऐसा आदेश पाकर और उन्हें प्रणाम करके मदनवेग कालकूट पर्वत पर, अपने
घर, चला गया॥१८॥
इसी बीच प्रतिदिन यन्त्रचालित वायुयान से रात को अपने घर आती हुई और प्रातःकाल
उज्जयिनी आती हुई और खेलती हुई सोमप्रभा से कलिङ्गसेना ने एकबार कहा॥१९-२०॥
कलिङ्गसेना के विवाह की कथा
'सखि ! मैं तुमसे जो कहती हूँ वह किसी से कहना नहीं। मैंने सुना है कि मेरे विवाह का
समय आ गया है। मुझ माँगने के लिए अनेक राजाओं ने दूत भेजे हैं। किन्तु, मेरे पिता ने
उन्हें वहाँ से लौटा दिया है॥२१-२२॥
किन्तु श्रावस्ती नगरी का राजा प्रसेनजित् है। केवल उसी के दूत को मेरे पिता ने
विशेष रूप से सत्कृत किया ॥२३॥
मेरी माता से भी सम्मति कर ली है। कुलीन होने के कारण वह मेरे माता-पिता को
सम्मत है॥२४॥
वह उस कुल में उत्पन्न हुआ है जिसमें कौरवों और पांडवों की अम्बा अम्बालिका आदि
दादियाँ उत्पन्न हुईं ॥२५॥
हे सखि इस समय मुझे पिता ने श्रावस्ती नगरी में उस प्रसेनजित् को ही दे दिया है ॥२६॥
कलिङ्गसेना से यह सुनकर सोमप्रभा आँसुओं का हार बनाती हुई रोने लगी ॥२७॥
सखी के रोने का क रण पूछने पर समस्तभूलोक को देखती हुई सोमप्रभा कहने लगी-॥२८॥
अवस्था रूप कुल चरित्र आदि जो वर में ढूँढे जाते हैं, उनमें सर्वप्रथम अवस्था ही
है। वंश आदि उसके बाद की गिनती में किये जाते हैं ॥२९॥