कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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राजा प्रगतजित् को मैंने देखा है। वह वृद्ध है। मरप्राय हुए जाती (मालती) के पुष्प
के समान उस वृद्ध की जाति या कुल से क्या करना है ॥३१॥
हिम के समान श्वेत उस वृद्ध के संसर्ग मलिन मुखवाली तू ऐसी लगेगी जैसे हेमन्त में
हिम से मारी हुई कमलिनी शोचनीय हो जाती है ॥३२॥
इसलिए सब गए हुआ। प्रसन्नता तो तब हो जब हे कल्याणि वस्सराज उदयन तेरा
पति हो ॥३३॥
रूप से लावण्य से कुल से शौर्य से और ऐश्वर्य से उनके समान पृथ्वी पर दूसरा राजा
नहीं है ॥३३॥
हे पुत्रक! कमलनाक्षी यदि तू अपने समान उस पति से युक्त हो जाय तो विधाता का
तुझमें सौन्दर्य उत्पन्न करना सफल हो जाय' ॥३४॥
इस प्रकार सोमप्रभा के यन्त्रों के समान वाक्यों से प्रेरित कलिंगसेना का मन वत्सेश्वर
पर चला गया ॥३५॥
तब राजकन्या ने सोमप्रभा से पूछा— सखि वह वत्सराज किस वंश में उत्पन्न हुआ है
और उसका नाम उदयन कैसे हुआ ? तब सोमप्रभा बोली— सखि कहती हूँ सुनो' ॥३६–३७॥
वत्सराज की संक्षिप्त कथा
इस भूमि का भूषण वत्स नाम का देश है। उसमें दूसरी इन्द्रपुरी के समान कौशाम्बी
नाम की नगरी है ॥३८॥
उस नगरी में वत्सेश्वर राज्य करता है। अब मैं उसके वंश का वर्णन करती
हूँ सुनो ॥३९॥
पाण्डु के पुत्र अर्जुन का लड़का अभिमन्यु हुआ। चक्रव्यूह का भेदन करनेवाले जिस
अभिमन्यु ने कौरवों की सेना का संहार किया था ॥४०॥
उस अभिमन्यु द्वारा भरत-वंश को चलानेवाला परीक्षित नाम का पुत्र उत्पन्न हुआ।
परीक्षित् से सर्पसत्र (नागयज्ञ) करनेवाला पुत्र राजा जनमेजय हुआ। जनमेजय से शतानीक
नाम का राजा हुआ जिसने कौशाम्बी को अपनी राजधानी बनाया और जो देवासुर-संग्राम में
दैत्यों को मारता हुआ स्वयं भी मारा गया ॥४१ ४२॥
उस शतानीक से संसार में प्रशंसनीय सहस्रानीक नाम का राजा हुआ जो इन्द्र के रथ
भेजने पर भूमि से स्वर्ग में यातायात किया करता था ॥४३॥
उस सहस्रानीक की रानी मृगावती के गर्भ से उदयन नाम का कुलभूषण और संसार की
आँखों को आनन्द देनेवाला राजा हुआ ॥४४॥
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