कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
प्रथम लम्बक ८१
प्रथम लम्बक ८१
इस प्रकार प्रतिदिन करते-करते मैंने धन-संग्रह करके तीन दिनों तक लकड़हारों से सारी
लकड़ियाँ खरीद लीं ॥४५॥
एक बार भयंकर वृष्टि के कारण लकड़ियों का जंगल से आना बन्द हो गया।
तब मैंने अपनी इकट्ठी की हुई लकड़ियों को महंगे दाम पर बेचकर पर्याप्त धन कमा
लिया ॥४६॥
उस धन से एक दूकान करके व्यापार की चतुराई से मैं बहुत धनवान् हो गया। मैंने
सोने का चूहा बनाकर अपने महाजन विशाखिल को मृत चूहे के मूल्य-स्वरूप भेंट में
दिया ॥४७॥
वह भी मेरी व्यापार-बुद्धि से इतना प्रसन्न हुआ कि उसने अपनी कन्या मुझे
दे दी ॥४८॥
एक मरे हुए चूहे के आधार पर व्यापार करने के कारण मैं नगर में 'मूषक' के नाम से
विख्यात हो गया। इस प्रकार निर्धन होकर मैंने लक्ष्मी प्राप्त की ॥४९॥
यह सुनकर वहाँ एकत्र सभी बनिये आश्चर्य-चकित हो गये। बिना भीत की चित्र-रचना
करने पर किसकी बुद्धि आश्चर्य-चकित नहीं होगी ॥५०॥
मूर्ख सामवेदी ब्राह्मण की कथा
वहीं पर कहीं मशान में आग मांगता-मांगता जाता हुआ पञ्चाली ब्राह्मण खड़ा था। उस विशी
वाचालों के दलाल ने कहा—'ब्राह्मण ज्ञान के राज्य तुम्हें भोजन भी मिलता था ? सही या तुम
इस आग मांग-मांग कर क्यों जाकर औरत-मर्दों के ... चतुरता सीखो ॥५१-५२॥
मुझे चतुरता कौन सिखायेगा? —ब्राह्मण के ऐसा पूछने पर उसने कहा—'यहीं जो
बगुसिका नाम की वेश्या है उसके घर जाकर सीखो ॥५३॥
वेश्या के घर जाकर क्या करूं? —ऐसा पूछने पर ... ने कहा—'मंशाला देकर
चतुराई सिखाने को कहना तथा मांस और मद्य (मदिरा) की बात करना' ॥५४॥
यह सुनकर वह भोला ब्राह्मण तुरंत बगुसिका के घर गया और उसके द्वारा प्रमदाजन
व्यहार करने पर भीतर जाकर बैठ गया ॥५५॥
मुझे आज इस मूर्ख का ... महा मूर्खतापूर्ण स्वरूप दिखायेंगे— ...
का हाथ मांगता-मांगता उस ब्राह्मण का अभिनन्दन किया ॥५६॥
उसके ऐसा कहने पर वहाँ बैठे हुए द्यूतप्रिय हँस पड़े। तब हँसता देखकर उस कर्म के इस
प्रकार रोता गया कि जो भी बात वे लोग कहा करते उसका वह उल्टा उत्तर देता
बड़ी सरलता से व्यंग्य करते हुए कि ब्राह्मण के प्रति ऐसा व्यंग्य-उपहास होता रहा
वे लोग बहुत हँसते रहे।
वेश्या ने उस दूती द्वारा ब्राह्मण के सम्मुख उपहासपूर्वक एक सोने का सिक्का (मद्यपान हेतु) देकर
बाहर निकाल दिया ॥५७॥
११
यमचन्द्र धरं मत्वा शिरश्छेदभयाद्द्रुतम् ।
शिक्षिता लोकयात्रेति गर्जन्स निरगात्ततः ॥६०॥
तत्सकाशं ततोऽगच्छदनासो प्रेषितोऽभवत् ।
वृत्तान्तं यावदस्तस्मै सोऽपि क्षतमयापत ॥६१॥
साम सान्त्व मयोक्तं तं वेदस्यावसरोऽत्र कः ।
किं वा धाराधिरूढे हि जाड्यं वदजडे जने ॥६२॥
एव विहस्य गत्वा च तनोक्ता सा विलासिनी ।
द्विपवस्य पशोरस्य तत्सुवर्णतृणं त्यज ॥ ६३ ॥
हसन्त्या च तया त्यक्तं सुवर्णं प्राप्य स द्विजः ।
पुनर्जातमिवात्मानं मन्वानो गृहमागत ॥६४॥
एवंप्रायाण्यहं पश्यन् कौतुकानि पदे पदे ।
प्राप्तवान् राजभवनं महेन्द्रसदनोपमम् ॥६५॥
धतश्चान्तः प्रविष्टोऽहं शिष्यैरथ निवेदितः ।
भास्वान्स्थितमद्राक्षं राजानं सातवाहनम् ॥६६॥
शर्ववर्मप्रभृतिभिर्मन्त्रिभिः परिवारितम् ।
रत्नसिंहासनासीनममरैरिव वासवम् ॥६७॥
विहितस्वस्तिकारं मामुपविष्टमथासने ।
राजा कृतादरं चैव शर्ववर्मादयोऽस्तुवन् ॥६८॥
अयं ह्य भुवि ख्यातः सर्वविद्याविशारदः ।
गुणाढ्य इति नामास्य यथार्थमतएव हि ॥६९॥
इत्यादि तत्स्तुतिं श्रुत्वा मन्त्रिभिः सातवाहनः ।
प्रीतः क्षपवि सत्कृत्य मन्त्रित्वे मां न्ययोजयत् ॥७०॥
अथाहुं राजकार्याणि चिन्तयन्नवस सुखम् ।
शिष्यानध्यापयंस्तत्र कृतदारपरिग्रहः ॥७१॥
कदाचित्कौतुकाद् भ्राम्यन्स्वरं गोदावरीतटे ।
देवीकृतिरितिख्यातामुद्यानं दृष्टवानहम् ॥७२॥
तच्चातिरम्यमालोक्य क्षितिस्यमिव मन्दनम् ।
उद्यानपालः पृष्टोऽभून्मया तत्र तदागमम् ॥७३॥
१ पृष्ठे बाङ्घट = सम्पन्नः समृद्ध इत्यर्थः ।