चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व अग्निवेश
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
About this granth
The Charaka Samhita (चरक-संहिता) is the foundational text of Ayurvedic internal medicine. By tradition, the teachings of Punarvasu Atreya were set down by his disciple Agnivesha, revised by Charaka and later completed by Dridhabala of Kashmir. With eight sections and 120 chapters, it is counted with the Sushruta Samhita and Ashtanga Hridaya among the 'great three' of Ayurveda.
This volume covers the Sutra, Nidana and Vimana sections. It includes chapters such as Dirghanjivitiya, Apamarga-tanduliya, Matrashitiya and Mahachatushpada; the count of purgative formulations made from madana fruit and other drugs; the fifty great groups of herbs, beginning with the digestives; the classes of prepared foods and food sources; abscesses and boils; and the diagnosis of the five kinds of insanity.
As the title page states, this is the first part of the Charaka Samhita with a Hindi translation by Kaviraj Atridev Gupta, Vidyalankar, Bhishagratna, of Gurukul University, published by Bhargava Pustakalaya, Gaighat, Banaras. The preface mentions the Jalpakalpataru of Gangadhar Kaviraj and the Charakopaskara of Yogindranath Sen. This second edition has 639 pages.
करके यानी अनुपान रूप में नहीं पीना चाहिये । इस अवस्था में पिया
पानी कण्ठ, छाती ( आमाशय ) में स्थित आहारजन्य स्नेह को दूषित करके
नाना प्रकार के रोग उत्पन्न करता है ।
प्रायः उपयोग में आने वाले आहार, खान-पान का कुछ भाग यहाँ पर
कह दिया है । खानपान के सब द्रव्यो का नाम से कथन करना सम्भव नहीं है,
जिस प्रकार की कोई भी औषध रहित वनस्पति नहीं, जिस प्रकार देश वाले उसे
जैसा गुणकारी या हानि कारक कहते हों, उसके अनुसार यहां पर न कहे हुए
द्रव्य को समझना चाहिये । गुणज्ञान के विषय में और भी कहते हैं ॥३२८॥
चरः शरीरावयवाः स्वभावो धातवः क्रिया ।
लिङ्गं प्रमाणं संस्कारो मात्राचात्र परीक्ष्यते ॥ ३२९ ॥
चरोऽनूप-जलाकाश-धन्वाद्यो भक्ष्यसंविधिः ।
जलजानूपजांश्चैव जलानूपचराश्च ये ॥ ३३० ॥
गुरुभक्ष्याश्च ये सत्त्वाः सर्वे ते गुरवः स्मृताः ।
लघुभक्ष्यास्तु लघवो धन्वजाधन्वचारिणः ॥ ३३१ ॥
शरीरावयवाः सक्थि-शिर-स्कन्धाद्यस्तथा ।
सक्थिमांसाद् गुरुः स्कन्धस्ततः क्रोडस्ततः शिरः ॥ ३३२ ॥
वृषणौ चर्ममेढ्रं च श्रोणी वृक्कौ यकृद् गुदम् ।
मांसाद् गुरुतरं विद्याद्यथास्वं मध्यमस्थि च ॥ ३३३ ॥
स्वभावाल्लघवौ मुद्गास्तथा लावकपिञ्जलाः ।
स्वभावाद् गुरवो माषा वराहमहिषास्तथा ॥ ३३४ ॥
धातूनां शोणिताद्यानां गुरुं विद्याद्यथोत्तरम् ।
अलसेभ्यो विशिष्यन्ते प्राणिनो ये बहुक्रियाः ॥ ३३५ ॥
गौरवं लिङ्गसामान्ये पुंसां स्त्रीणां च लाघवम् ।
महाप्रमाणा गुरवः स्वजातौ लघवोडन्यथा ॥ ३३६ ॥
चर ( जिस स्थान पर विचरता है ), शरीरावयव ( शरीर का अंग ),
स्वभाव ( प्रकृति ), धातु ( रस, रक्तादि धातु ), क्रिया, लिंग, प्रमाण, संस्कार,
मात्रा ये बातें गुरु लघु विचार करने में देखनी चाहिये । चर, गति रूपचर
और भक्ष्य रूप चर भेद से दो प्रकार के हैं । इनमें गति रूप चर आनूप
अर्थात् जलबहुल प्रदेश में विचरने वाले, आकाश में, धन्व देश में तथा जल
आनूप दोनों देशों में विचरने वाले हैं । भक्ष्य रूप चर गुरु, शीतल पदार्थ
३७२ चरकसंहिता [ अ० २७
खाते हैं ऐसे दोनों प्रकार के प्राणी गुरु होते हैं। धन्व प्रदेश में उत्पन्न या धन्व
(रेतीले) देश में विचरने वाले तथा लघु भोजन करने वाले प्राणी लघु
होते हैं।
जांघ, शिर, स्कन्ध आदि शरीर के अवयव हैं। इनमें जंघा से स्कन्ध,
स्कन्ध से क्रोड़ और क्रोड़ से शिर, का मांस गुरु होता है। शिर से वृषण और
वृषण से इनका चर्म, फिर शिश्न, फिर श्रोणी भाग, फिर वृक्क (गुर्दे) और
फिर यकृत्, उसके पीछे गुर्दा और पीछे मध्यास्थि (मज्जा या अस्थि के ऊपर
का मांस) गुरु होता है।
स्वभाव या प्रकृति से मूंग, बटेर कपिंजल लघु होते हैं और उड़द, सूअर,
भैंस ये गुरु होते हैं। धातुओं में रक्त मांस, और मेद ये क्रमशः उत्तरोत्तर गुरु
होते जाते हैं। जो प्राणी बहुत चेष्टाशील होते हैं, वे आलसी स्वभाव वाले
प्राणियों से भिन्न अर्थात् लघु होते हैं (आलसी प्राणी गुरु होते हैं) लिंग की
दृष्टि से नर गुरु और मादा पशु लघु होते हैं, (पशुओ में यह नियम है,
परन्तु पक्षियों में नर लघु होता है।) अपनी जाति में बड़े शरीर वाले गुरु और
छोटे शरीर के प्राणी लघु होते हैं ॥ ३२६-३३६ ॥
गुरुणां लाघवं विद्यात्संस्कारात्सविपर्ययम् ।
व्रीहेर्लाजा यथा च स्युः सक्तूनां सिद्धपिण्डिकाः ॥ ३३७ ॥
अल्पादाने गुरूणां च लघूनां चातिसेवने ।
मात्राकारणमुद्दिष्टं द्रव्याणां गुरुलाघवे ॥ ३३८ ॥
गुरूणामल्पमादेयं लघूनां तृप्तिरिष्यते ।
मात्रां द्रव्याण्यपेक्षन्ते मात्रा चाग्निमपेक्षते ॥ ३३९ ॥
बलमारोग्यमायुश्च प्राणाश्चाग्नौ प्रतिष्ठिताः ।
अन्नपानेन्धनैश्चाग्निर्दीप्यते शाम्यतेऽन्यथा १ ॥ ३४० ॥
गुरुलाघवचिन्तेयं प्रायेणाल्पबलान् प्रति ।
मन्दक्रियाननारोग्यान् सुकुमारान् सुखोचितान् ॥ ३४१ ॥
दीप्ताग्नयः खराहाराः कर्मनित्या महादराः ।
ये नराः प्रति ताँश्चिन्त्यं नावश्यं गुरुलाघवम् ॥ ३४२ ॥
संस्कार द्वारा गुरु पदार्थ लघु और लघु पदार्थ गुरु बन जाते हैं। जैसे
व्रीहि (धान्य) स्वभाव से गुरु हैं, परन्तु लाजा के रूप में लघु बन जाते हैं
और सत्तू स्वभाव से लघु होने पर भी उनकी आग से पकाई पिण्डिकायें
१. ज्वल्यति व्येति चाम्यथा इति वा पाठः ।
अ० २७] सूत्रस्थानम् २७३
अ० २७] सूत्रस्थानम् २७३
गुरु होजाती हैं। गुरु पदार्थों को थोड़ा और लघु पदार्थों को अधिक सेवन
करने से वे गुरु हो जाते हैं। इसलिये गुरु लघुता के निश्चय करने में भी मात्रा
कारण है। गुरु पदार्थों को थोड़ा लेना और लघु पदार्थों को तृप्तिपूर्वक खाना
चाहिये जिससे पेट फूल न जाय, श्वास चढ़ने न लगे। द्रव्य, मात्रा अर्थात्
परिमाण की अपेक्षा करते हैं और मात्रा अग्नि की अपेक्षा करती है। बल,
आरोग्यता, आयु और प्राण अग्नि पर आश्रित हैं—अग्नि के अधीन हैं। अन्न
पान (खान, पान) रूपी इन्धन से अग्नि प्रदीप्त होती है, और खान पान के
न मिलने से वह बुझ जाती है, शान्त होजाती है। जो पुरुष अल्प बल वाले
हों, मन्द क्रिया, मन्द-चेष्टावाले, अनारोग्य, रोगी, सुकुमार अर्थात् नाजुक
प्रकृति, के आराम का जीवन व्यतीत करने वाले हैं उनके विषय में गुरु-लघु
का विचार करना चाहिये। जिनकी अग्नि प्रबल हो, जो कठिन आहार को
भी पचा सकते हों, नित्य मेहनत करने वाले, बड़े पेट वाले, जिनकी अग्नि
बढ़ी हुई हो उनके विषय में गुरु-लघु का विचार करने की आवश्यकता
नहीं है ॥ ३३७-३४२ ॥
द्विसाभिर्जुहुयान्नित्यमन्तराग्निं समाहितः ।
अन्नपानसमिद्भिर्ना मात्राकालौ विचारयन् ॥ ३४३ ॥
आहिताग्निः सदा पथ्यान्यन्तराग्नौ जुहोति यः ।
दिवसे दिवसे ब्रह्म जपत्यथ ददाति च ॥ ३४४ ॥
नरं निःश्रेयसे युक्तं सात्म्यज्ञं पानभोजने ।
भजन्ते नाऽऽमयाः केचिद्भाविनोऽप्यन्तरादृते ॥ ३४५ ॥
षट्त्रिंशतं सहस्राणि रात्रीणां हितभोजनः ।
जीवत्यनातुरो जन्तुर्जितात्मा संमतः सताम् ॥ ३४६ ॥
मनुष्य को चाहिये कि मात्रा और काल का विचार करके, हितकारी खान-
पान रूपी समिधाओं से अन्तराग्नि में नित्यप्रति संयमित चित्त से हवन करे।
जो आहिताग्नि हवन करने वाला नित्य प्रति दोनों समय अन्तराग्नि में हितकारी
अन्न की आहुति देकर ब्रह्म (ओंकार) का जप करता है और यथाशक्ति दान
करता है, जिसको खान-पान सम्बन्धी सात्म्य का ज्ञान होता है, ऐसे पुण्यवान्
पुरुष को कारण के बिना कभी भी रोग नहीं होते। इसी प्रकार संचित धर्म के
प्रभाव से जन्मान्तर में भी रोग नहीं होते। हितकर आहार करने वाला व्यक्ति
३६००० रात्रि (१०० वर्ष) पर्य्यन्त नीरोगी, जितेन्द्रिय, और सज्जनों से
पूजित होकर निवास करता है ॥ ३४३-३४६ ॥
लौकिकं कर्म यद्वृत्तौ स्वर्गौ यच्च वैदिकम् ॥ ३४८ ॥
१७४ चरकसंहिता [ अ० २८
भवन्तश्चात्र— प्राणाः प्राणभृतामन्नमन्नं लोकोऽभिधावति ।
वर्णः प्रसादः सौस्वर्यं जीवितं प्रतिभा सुखम् ॥ ३४७ ॥
तुष्टिः पुष्टिर्बलं मेधा सर्वमन्ने प्रतिष्ठितम् ।
लौकिकं कर्म यद्वृत्तौ स्वर्गौ यच्च वैदिकम् ॥ ३४८ ॥
कर्मापवर्गे यच्चोक्तं तच्चाप्यन्ने प्रतिष्ठितम् ।
अन्न, सब प्राणियों का प्राण है, सारा संसार इसी अन्न की याचना करता
है (पेट के लिये आदमी सब कुछ करता है)। अन्न में ही वर्ण, शरीर की
प्रसन्नता, सुस्वरता, जीवन, प्रतिभा, सुख, तुष्टि, हर्ष, पोषण, बल, मेधा, ये
सब बातें स्थिर हैं। सांसारिक कर्म, तथा स्वर्ग प्राप्ति में यज्ञादि जो वैदिक
मोक्षदायक यज्ञ, तप आदि कर्म हैं, वे सब अन्न में प्रतिष्ठित हैं ॥ ३४७-३४८ ॥
तत्र श्लोकः—अन्नपानगुणाः साम्या वर्गा द्वादश निश्चिताः ॥ ३४९ ॥
सगुणान्यनुपानानि गुरुलाघवसंग्रहः ।
अन्नपानविधावुक्तं तत्परीक्ष्यं विशेषतः ॥ ३५० ॥
इस अन्नपान नामक अध्याय में, अन्न-पान के गुण, बारह वर्गों में कह
दिये हैं। अनुपान के गुण, गुरु एवं लघु विषय का निरूपण किया है, इस
विधि को विचार कर प्रयोग करना चाहिये ॥ ३४९-३५० ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने अन्नपानविधिर्नाम
सप्तविंशतितमोऽध्यायः ॥ २७ ॥
अष्टाविंशोऽध्यायः
अथातो विविधाशितपीतीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब से 'विविधाशित-पीतीय' अध्याय का व्याख्यान करेंगे । जैसा भगवान्
आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥
विविधमशित-पीत-लीढ-खादितं जन्तोर्हितमन्तरग्निसन्धुक्षितबलेन
यथास्वेनोष्मणा सम्यग्विपाच्यमानं कालवदनवस्थितसर्वधातुपाकमनु-
पहतसर्वधातूष्ममारुतस्रोतस् केवलं शरीरमुपचय-बल-वर्ण-सुखायुषा
योजयति, शरीरधातूनूर्जयति । धातवो हि धात्वाहाराः प्रकृतिमनु-
वर्तन्ते ॥ ३ ॥
अ० २८ ] सूत्रस्थानम् ३७५
अ० २८ ] सूत्रस्थानम् ३७५
मनुष्य का खाया, पीया, चाटा या चबाकर हाथों से खाया भोजन, नाना
प्रकार का हितकारी पदार्थ, जाठराग्नि के प्रदीप्त बल के कारण, तथा पृथ्वी,
जल, तेज, वायु और आकाश इन पांच महाभूतों की अपनी-अपनी गरमी से
(पृथ्वी आदि के गुण वाले) आहार द्रव्यों का पाचन होता है । इस प्रकार से
पचा हुआ अन्न काल की भांति नित्य निरन्तर गति करता हुआ, सब धातुओं
के निरन्तर पाक होने से जिस शरीर में क्षीणता उत्पन्न होरही है उस शरीर की
तथा जिस शरीर में सब धातुओं की गरमी बनी हुई है, और वायुवह स्रोत
जिस शरीर में उपस्थित हैं, ऐसे सम्पूर्ण शरीर को वृद्धि करने के साथ साथ
बल, वर्ण, सुख और आयु देता है, तथा शरीर के धातुओं को तेज प्रदान
करता है । धातु ही जिनका भोजन है ऐसे रसादि धातु नित्य प्रति क्षीण होते
हुए लाये हुए भोजन रूपी धातु को लाकर स्वस्थ अवस्था में रहते हैं ॥ ३ ॥
तत्राऽऽहारप्रसादाख्यो रसः किट्टं च मलाख्यमभिनिर्वर्तते; किट्टात्
स्वेद-मूत्र-पुरीष-वात-पित्त-श्लेष्माणः कर्णाक्षि-नासिकास्य-लोम-कूप-प्रज-
नन-मलाः केश-श्मश्रु-लोम-नखादयश्चावयवाः पुष्यन्ति। पुष्यन्ति त्वाहार-
रसात् रस-रुधिर-मांस-मेदोऽस्थि-मज्ज-शुक्रौजंसि पञ्चेन्द्रियद्रव्याणि धा-
तुप्रसादसंज्ञकानि शरीर-सन्धि-बन्ध-पिच्छादयश्चावयवाः ते सर्वे एव धा-
तवोमलाख्याः प्रसादाख्याश्च रसमलाभ्यां पुष्यन्तः स्वं मानमनुवर्तन्ते
यथावयः शरीरम्। एवं रसमलौ स्वप्रमाणावस्थितौ आश्रयस्य सम
धातोर्धातुसाम्यमनुवर्तयतः; निमित्ततस्तु क्षीणवृद्धानां प्रसादाख्यानां
धातूनां वृद्धिक्षयाभ्यामाहारमूलाभ्यां रसः साम्यमुत्पादयत्यारोग्याय,
किट्टं च मलानामेवमेव। स्वमानातिरिक्ताः पुनरुत्सर्गिणः शीतोष्णपर्य-
यगुणैश्चोपचर्यमाणा मलाः शरीरधातुसाम्यकराः समुपलभ्यन्ते। तेषां
तु मलप्रसादाख्यानां धातूनां स्रोतांस्ययनमुखानि; तानि यथाविभागेन
यथास्वं धातूनापूरयन्ति। एवमिदं शरीरमशित-पीत-लीढ-खादित-
प्रभवम्, अशित-पीत-लीढ-खादित-प्रभवाश्चास्मिन् शरीरे व्याधयो
भवन्ति; हिताहितोपयोगविशेषास्त्वत्र शुभाशुभविशेषकरा भव-
न्तीति ॥ ४ ॥
इस आहार से तीन वस्तुएं बनती हैं एक प्रसाद रूपी रस, २. किट्ट, आहार
भाग और ३. मल। इनमें किट्ट भाग के पसीना, मूत्र, मल, वायु, पित्त,
कफ और कान, आंख, नाक, मुख, रोम, कूप और शिश्न के मल उत्पन्न
होते हैं। तथा केश, दाढ़ी, मूंछ, रोम (शरीर के बाल) और नख आदि अङ्ग-
३७६ चरकसंहिता [ अ० २८
सब पुष्ट होते हैं। आहार के प्रसाद रूपी रसभाग से, रस, रक्त, मांस,
मेद, अस्थि, मज्जा, शुक्र, ओज तथा पृथ्वी, अ_, तेज, वायु, आकाश (ये
पंच महाभूत तो इन्द्रियों को बनाने वाले हैं) अत्यन्त शुद्ध रूप में
स्थित धातु, शरीर को बांधने वाली स्नायु, सिरा आदि, सन्धियां, आर्तव
और दूध बनाते हैं। ये सब मल नामक धातु या प्रसाद रूप धातु रस और
मल द्वारा पुष्ट होते हुए आयु के अनुसार अपने परिणाम में बनते हैं
(अथवा कृश, स्थूल, छोटे, बड़े में अपने परिणाम से बनते हैं)। *
- आहार के रसादि धातु में बदलने के विषय में एक पक्ष यह है कि
रस, रक्त धातु में बदलता है और रक्त, मांस में, इस प्रकार आगे परिवर्तन-
होता जाता है। जिस प्रकार दही जमते हुए सम्पूर्ण दूध दही रूप में
बदलता है, इसी प्रकार सम्पूर्ण रस रक्त रूप में बदल जाता है और रक्त मांस
में इसी प्रकार आगे। दूसरे आचार्य इस परिवर्तन को 'केदार-कुल्यान्याय' से
मानते हैं। अर्थात् खेत में बहतो पानी की धार में से प्रत्येक क्यारी अपना २
पानी ले लेती है इसी प्रकार यहां पर भी अन्न से उत्पन्न रस, रस धातु में जाकर
कुछ भाग से रस बन जाता है और शेष रस भाग रक्त में जाकर रक्त के गन्ध,
वर्ण से मिल कर रक्त बन जाता है और शेष रस भाग आगे मांस धातु में
पहुंचता है, वहां मांस के गन्ध-वर्ण में मिलकर मांस बन जाता है, और इससे
अवशिष्ट रस भाग मेद में चला जाता है, वहां भी पूर्व की भाँति क्रिया होती है।
इसी प्रकार आगे २ चलता जाता है। तीसरे पक्ष वाले कहते हैं कि-अन्न
रस पृथक् २ धातुमार्ग में जाकर रसादि धातुओं का पोषण करता है, यह नहीं
कि इस धातु को पोषण करने वाला ही रक्त धातु में जाता है। रस आदि को
पोषण करने वाले स्रोत उत्तरोत्तर सूक्ष्म मुख वाले और लम्बे हैं। इस प्रकार से
रस को पोषण करने वाला भाग रसमार्ग में गमन करके रस का पोषण करता है,
एवं रक्त का पोषण करने के पीछे रक्त पोषक मार्ग में जाने से रक्त का पोषण
करता है, इस प्रकार रक्त का पोषण करने के पीछे मांस को पोषण करने वाला
रस भाग दूर एवं सूक्ष्म मार्ग में गमन करने से मांस का पोषण करता है।
इसी प्रकार आगे मेद आदि का पोषण हो जाता है। इस पक्ष में दूध आदि
वृष्य वस्तुओं से उत्पन्न रस प्रभाव से शीघ्र ही शुक्र से मिलकर शुक्र का पोषण
कर देता है, इसी प्रकार वृद्धावस्था में भी एक दोष के दुष्ट होने से अन्य धातु
दुष्ट नहीं होते, परन्तु परिणाम पक्ष में रस-धातु के दुष्ट होने से रक्त आदि
धातु भी दूषित हो जाते हैं, इसके अतिरिक्त परिणाम पक्ष में तीन चार उपवास
से शरीर की मृत्यु होनी चाहिये और एक मास के दुग्धसेवन से ही सम्पूर्ण
सं० २८ ] सूत्रस्थानम् ३४७
सं० २८ ] सूत्रस्थानम् ३४७
इस प्रकार से शरीर के अपने स्वरूप में ( न अधिक और न कम परिमाण में )
स्थित होने पर धातु-साम्यावस्था में रहते हैं। प्रसाद रूप धातुओं का क्षय या
वृद्धि जो निमित्त को लेकर होती है, वह आहार के कारण ही होती है, इस-
लिये आहार द्वारा वृद्धि और क्षय का सात्म्य उत्पन्न होकर आरोग्यता उत्पन्न
होती है इसी प्रकार किट्ट और मल भी शरीर के आरोग्य सम्पादन में सहायक
होते हैं। अपने परिमाण से अधिक बढ़े हुए किट्ट और मल को बाहर निकाल
कर तथा शीत से उत्पन्न मल में उष्ण, उष्ण से उत्पन्न मल में शीत परिचर्या
से मल शरीर के धातुओं को समानावस्था में रखते हैं। इन मल अर्थात् प्रसाद
नामक धातुओं के स्रोत गमन करने के मार्ग हैं और ये स्रोत जो जो जिन
जिनके हैं उन उन धातुओं को पूर्ण करते हैं। इस प्रकार से यह सम्पूर्ण शरीर
खाये, पिये, चाटे, चाले आहार रूपी रस से पूर्ण होता है। और रोग भी इस
शरीर में खाये, पिये, चाटे आदि भोजन से उत्पन्न होते हैं। इसमें हित
वस्तुओं का उपयोग शुभकारी और अहित वस्तुओं का उपयोग अशुभकारी
होता है ॥ ४ ॥
एवं वादिनं भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच—दृश्यन्ते हि भगवन् !
हितसमाख्यातमप्याहारमुपयुञ्जाना व्याधिमन्तश्चागदाश्च, तथैवाहित-
समाख्यातम्, एवं दृष्टे कथं हिताहितोपयोगविशेषात्मकं शुभाशु-
भविशेषमुपलभामह इति ॥ ५ ॥
तमुवाच भगवानात्रेयः—न हिताहारोपयोगिनामग्निवेश ! तन्निमित्त-
व्याधयो जायन्ते, न च केवलं हिताहारोपयोगादेव सर्वं व्याधिभयमति-
क्रान्तं भवति, सन्ति हि ऋतेऽप्यहिताहारोपयोगादन्या रोगप्रकृतयः,
तद्यथा—कालविपर्ययः, प्रज्ञापराधः, परिणामश्च, शब्द-
स्पर्श-रूप-रस- गन्धाश्चासात्म्या इति, ताश्च रोगप्रकृतयो रसान् सम्यगु-
पयुञ्जानमपि पुरुषमशुभेनोपपादयन्ति, तस्माद्धिताहारोपयोगिनोऽपि
दृश्यन्ते व्याधिमन्तः । अहिताहारोपयोगिनां पुनः कारणतो न सद्यो
दोषवान् भवत्यपचारः, न हि सर्वाण्यपथ्यानि तुल्यदोषाणि, न च सर्वे
दोषास्तुल्यबलाः, न च सर्वाणि शरीराणि व्याधिक्षमत्वे समर्थानि
भवन्ति, तदेव ह्यपथ्यं देश-काल-संयोग-वीर्य-प्रमाणातिशेगाद् भूय-
शरीर शुक्रमय ही होना चाहिये और 'केदारकुल्या न्याय, वाला पक्ष तीसरे
प्रश्न के समान ही है। इसमें भी वृष्य वस्तुएं प्रभाव से शीघ्र शुक्र को उत्पन्न
कर देती हैं।
चरकसंहिता [अ० २८
स्तरमप्यल्पं संपद्यते, स एव दोषः संसृष्टस्तेनैवैकदेशेनावस्थाने गम्भीरस्तनुप्र-
तश्चिरस्थितः प्राणाायतनसमुत्थो मर्मोपघाती वा भूयान् कष्टतमः क्षिप्र-
कारितमश्च संपद्यते, शरीराणि चातिस्थूलाण्यतिकृशाण्यनिविष्टमांसशो-
णितास्थीनि दुर्बलान्यसात्म्याहारोपचितान्यल्पाहाराण्यल्पसत्त्वानि वा
भवन्त्यव्याधिसहानि, विपरीतानि पुनर्ब्याधिसहानि, एभ्यश्चैवापथ्या-
हार-दोष-शरीर-विशेषेभ्यो व्याधयो मृदवो दारुणाः क्षिप्रासमुत्थाश्चिर-
कारिणश्च भवन्ति। अत एव च वात-पित्त-श्लेष्माणः स्थानविशेषे प्रकु-
पिता व्याधिविशेषानभिनिर्वर्तयन्त्यग्निवेश ! ॥ ६ ॥
इस प्रकार से कहते हुए आत्रेय ऋषि को अग्निवेश बोले-'हे भगवान् ।
संसार में देखने में आता है, कि जो मनुष्य हितकारी आहार का उपभोग करते
हैं, वे रोगी दिखाई देते हैं और अहितकारी भोजन करने वाले भी नीरोग
दीखते हैं।
अग्निवेश को भगवान् आत्रेय ने कहा-हे अग्निवेश ! जो मनुष्य हितकारी
अन्न खाते हैं उनको इनके कारण से उत्पन्न होने वाले रोग नहीं होते और न
केवल हित आहार का उपसेवन ही सब रोगों से बचा सकता। अहित आहार
को छोड़कर कुछ दूसरी भी रोग की प्रकृति है । यथा काल विपर्यय (ऋतुओं
का परिवर्तन ), प्रज्ञापराध और परिणाम, शब्द स्पर्श, रूप, रस, गन्ध का
असात्म्य ( अतियोग, मिथ्यायोग, या अयोग ) होना । ये रोग के कारण आहार
रसों का सम्यक् प्रकार से उपयोग करने पर भी पुरुष में अशुभ लक्षण उत्पन्न कर
देते हैं । इसलिये हितकारी आहार को सेवन करने वाले भी रोगी दिखाई देते
हैं । इसी प्रकार जो व्यक्ति अहित आहार का उपसेवन करते हैं, उनमें रोगों
के ये कारण जल्दी दोषयुक्त नहीं होते । क्योंकि सम्पूर्ण अपथ्य समान दोषकारक
नहीं हैं और सब दोष समान बल वाले भी नहीं हैं और सारे शरीर रोग को
सहन करने में समर्थ नहीं होते । इसलिये अपथ्य देश चावल पित्तकारक हैं,
यही आनूप देश के योग से अधिक अपथ्य कारक हो जाता है, काल (शरत्काल
में अपथ्य बलवान् और हेमन्त में निर्बल ), संयोग दही राब के साथ बलवान्
और शहद के साथ निर्बल ), वीर्य (संस्कार वा उष्ण करने से अपथ्यतम और
शीत से अपथ्य ), प्रमाण अर्थात् मात्रा के अतियोग से अपथ्यतम और हीन बल
से निर्बल बन जाते हैं। इसी प्रकार बहुत से कारणों के मिलने से, विरुद्ध
चिकित्सा होने से गम्भीर¹ आधयो में, शरीर के बहुत अन्दर प्रवेश कर जाने से
१. त्वङ्मांसाद्यवमुख्यानं गम्भीरं स्वन्तराश्रयम् ।
अ० २८] सूत्रस्थानम् ३७३
यहाँ पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति देवनागरी लिप्यंतरण प्रस्तुत है:
अ० २८] सूत्रस्थानम् ३७३
तथा शरीर में चिरकाल से जड़पकड जाने पर, शंख आदि दृढ प्राणाशयों में
स्थित होने से, मर्मस्थानों को पीड़ित करने से बहुत दुःख देने के कारण असाध्य
होने से, शीघ्र विकार उत्पन्न करने से अपथ्य बलवान् बन जाता है। इसी
प्रकार बहुत मोटा, बहुत कृश, जिनके मांस, रक्त, अस्थि, ढीले, निर्बल हो गये
हों जो विषम शरीर वाले हैं, जो असात्म्य आहार को सेवन करने वाले, थोड़ा
खाने वाले, अल्प सत्त्व वाले शरीर रोगों को सहन नहीं कर सकते। इनके विप-
रीत गुणों वाले शरीर व्याधि को सहन कर सकते हैं। इसलिये अपथ्य आहार,
दोष शरीर की विशेषता से रोग मृदु, दारुण, शीघ्र होने वाले, अथवा देर में
होने वाले होते हैं। इसलिये हे अग्निवेश ! वात, पित्त, कफ विशेष स्थानों में
कुपित होकर भिन्न-भिन्न प्रकार के रोगों को उत्पन्न करते हैं ॥ ५-६ ॥
तत्र रसादिषु स्थानेषु प्रकुपितानां दोषाणां यस्मिन् यस्मिन् स्थाने
ये ये व्याधयः संभवन्ति तांस्तान् यथावदनुव्याख्यास्यामः ॥ ७ ॥
अश्रद्धा चारुचिश्चास्य वैरस्यमरसज्ञता ।
हृल्लासो गौरवं तन्द्रा साङ्गमर्दो ज्वरस्तमः ॥ ८ ॥
पाण्डुत्वं स्रोतसां रोधः क्लैब्यं सादः कृशाङ्गता ।
नाशोऽग्नेरयथाकालं वलयः पलितानि च ॥ ९ ॥
रसप्रदोषजा रोगा, वक्ष्यन्ते रक्तदोषजाः ।
कुष्ठ-वीसर्ष-पिडका रक्तपित्तमसृग्दरः ॥ १० ॥
गुदमेढ्रास्यपाकश्च प्लीहा गुल्मोऽथ विद्रधी ।
नीलिका कामला व्यङ्गः पिप्लवस्तिलकालकाः ॥ ११ ॥
दद्रुश्चर्मदलं श्वित्रं पामा कोठास्रमण्डलम् ।
रक्तप्रदोषाज्जायन्ते, शृणु मांसप्रदोषजान् ॥ १२ ॥
अधिमांसार्बुदं कील-गल-शालूक-शुण्डिकाः ।
पूतिमांसालजी-गण्ड-गण्डमालोपजिह्विकाः ॥ १३ ॥
विद्यान्मांसाश्रयान्, मेदःसंश्रयांस्तु प्रचक्ष्महे ।
निन्दितानि प्रमेहाणां पूर्वरूपाणि यानि च ॥ १४ ॥
अध्यस्थि-दन्त-दन्तास्थि-भेदशूलं विवर्णता ।
केश-लोम-नख-श्मश्रु-दोषाश्चास्थिप्रकोपजाः ॥ १५ ॥
रुक् पर्वणां भ्रमो मूर्च्छा दर्शनं तमसो मताः ।
अरुषां स्थूलमूलानां पर्वजानां च दर्शनम् ॥ १६ ॥
मज्जप्रदोषजाच्छुक्रस्य दोषात्क्लैब्यमहर्षणम् ।
३८० चरकसंहिता [ सू० २८
रोगिणं वा क्लीबमल्पायुर्बिरूपं वा प्रजायते ॥ १७ ॥
न वा संजायते गर्भः पतति प्रस्रवत्यपि ।
शुक्रं हि दुष्टं सापत्यं सदारं बाधते नरम् ॥ १८ ॥
इनमें रस आदि स्थानों में कुपित वात आदि दोष, जिस जिस स्थान पर
जो जो रोग उत्पन्न करते हैं उन उन रोगों को कहते हैं—अश्रद्धा, भोजन में
श्रद्धा न होना, अरुचि ( भोजन में अरुचि, अनिच्छा ), भारीपन, तन्द्रा,
शरीर में पीड़ा, ज्वर, तम, अन्धकार, पाण्डु वर्ण स्रोतों का अवरोध, नपुंसकता,
साद ( शिथिलता ) शरीर की निर्बलता, अग्नि ( जाठराग्नि ) का नाश, बिना
समय के झुर्रियां और बालों का श्वेत होना ये रसजन्य रोग हैं ।
रक्तजन्य रोग कहते हैं-कुष्ठ, वीसर्प, पिडकायें, रक्तपित्त, रक्तप्रदर, गुद-
पाक, शिश्न का पकना, प्लीहा, गुल्म, विद्रधि नीलिका, व्यंग ( झाई ), कामला,
पिप्लुव, तिल के आकार के मस्से, दाद, चर्मदल श्वित्र, पामा, कोठ, रक्तमण्डल
( लाल लाल चक्के ) ये रक्तजन्य रोग हैं ।
मांसजन्य रोग कहते हैं-अधिमांस, अर्बुद, कील, गलशालूक, ( गले में
शोथ होने से बढ़ा हुआ मांस ) गलशुण्डिका, पूतिमांस, अलजी, गलगण्ड,
गण्डमाला, उपजिह्विका, ये मांसजन्य रोग हैं ।
मेदजन्य रोग-कहते हैं प्रमेह के निन्दित पूर्वरूप ( बालों की जटिलता,
आदि अथवा अति स्थूल पुरुष के आयु ह्रास आदि आठ रूप) ये रोग हैं अथवा
अतिस्थूलता से उत्पन्न आयु का ह्रास आदि रोग मेद जन्य है ।
अस्थि के नीचे दूसरी अस्थि आना, अधिद्न्त, दन्तभेद, दांत दुखना,
अस्थियों में शूल, केश, रोम, नख और दाढ़ी मूंछ के रंग का परिवर्तन होना
ये अस्थिजन्य रोग हैं । जोड़ों में दर्द, चक्कर, आना, मूर्छा, आँखों के सामने
अंधेरा आना, व्रण, शिर में छोटी-छोटी फुन्सियां छोटे-छोटे जोड़ों में गांठें पड़
जाना ये मज्जाजन्य रोग हैं ।
शुक्र के दोष से नपुंसकता, अहर्षण ( ध्वज के खड़े होने पर भी मैथुन में
अशक्ति ), संतान रोगी, नपुंसक या थोड़ी आयु वाली, विरूप, उत्पन्न हो,
अथवा गर्भ नहीं रहता, रहने पर गिर जाता है या तीन मास से पूर्व ही बह
जाता है । दूषित शुक्र, बच्चे और स्त्री दोनों को तकलीफ देता है ॥ १७-१८ ॥
इन्द्रियाणि समाश्रित्य प्रकुप्यन्ति यदा मलाः ।
उपघातोपघाताभ्यां योजयन्तीन्द्रियाणि ते ॥ १९ ॥
स्नायौ शिराकण्डरयोर्दुष्टाः क्लिश्नन्ति मानवम् ।
अ० २८ ] सूत्रस्थानम् ३८१
अ० २८ ] सूत्रस्थानम् ३८१
स्तम्भ-सङ्कोच-खल्लीभिर्ग्रन्थि-स्फुरण-सुप्तिभिः ॥ २० ॥
मलानाश्रित्य कुपिता भेद-शोष-प्रदूषणम् ।
दोषा मलानां कुर्वन्ति सङ्गोत्सर्गमतीव च ॥ २१ ॥
विविधादशितात्पीताद्धिताल्लीढात्खादितात् ।
भवन्त्येते मनुष्याणां विकारा य उदाहृताः ॥ २२ ॥
तेषामिच्छन्ननुत्पत्तिं सेवेत मतिमान् सदा ।
हितान्येवाशितादीनि न स्युस्तज्जास्तथाऽऽमयाः ॥ २३ ॥
जिस समय अपथ्य आहार के कारण मल कुपित होकर इन्द्रियों में स्थित
होते हैं, उस समय ये मल इन्द्रियों का नाश या इन्द्रियों को पीड़ित करने लगते
हैं। ये मल वायु, शिरा, कण्डराओं में कुपित होकर मनुष्य को बहुत कष्ट पहुं-
चाते हैं। इससे स्तम्भ, जड़ता, संकोच सिकुड़ना, खल्ली हाथ पांव का मुड़
जाना, ग्रन्थि (स्नायु आदि में गांठ), स्फुरण, धमन, और संज्ञानाश उत्पन्न
होता है। जिस समय वात आदि दोष मलों का आश्रय लेकर कुपित होते हैं,
उस समय मल का भेद (अतीसार) तथा मलों को सुखाना अथवा मलों के
रंग को विकृत करना या मलों का अवरोध अथवा अतिप्रवृत्ति उत्पन्न कर देते
हैं। जो रोग यहां पर लिखे हैं, वे नाना प्रकार के खान, पान, चाटन, खाद्य
रूप आहार द्वारा मनुष्यों में उत्पन्न होते हैं। ये रोग उत्पन्न न हों, इस इच्छा
से मनुष्य सदा हितकारक आहार का सेवन करे, जिससे कि आहारजन्य रोग
न होवें ॥ १६-२३ ॥
रसजानां विकाराणां सर्वं लङ्घनमौषधम् ।
विधिशोणितेकेऽध्याये रक्तजानां भिषग्जितम् ॥ २४ ॥
मांसजानां तु संशुद्धिः शस्त्रक्षाराग्निकर्म च ।
अष्टौनिन्दितेकेऽध्याये मेदोजानां चिकित्सितम् ॥ २५ ॥
अस्थ्याश्रयाणां व्याधीनां पञ्चकर्माणि भेषजम् ।
बस्तयः क्षीरसपोंषि तिक्तकोपहितानि च ॥ २६ ॥
मज्ज-शुक्र-समुत्थानामौषधं स्वादुतिक्तकम् ।
अन्नं व्यवायव्यायामौ शुद्धिः काले च मात्रया ॥ २७ ॥
शान्तिरिन्द्रियजानां तु त्रिमर्मीये प्रवक्ष्यते ।
स्नाय्वादिजानां प्रशमो वक्ष्यते वातरोगिके ॥ २८ ॥
न वेगान्धारणेऽध्याये चिकित्सासंग्रहः कृतः ।
मलजानां विकाराणां सिद्धिरुक्ता क्वचित्क्वचित् ॥ २९ ॥
३८२ चरकसंहिता [अ० २८
रसजन्य सब विकारों की चिकित्सा लंघन अर्थात् उपवास है। रक्तजन्य
रोगों की चिकित्सा विधिशोणित अध्याय में कहेंगे। मांसजन्य रोगों की चिकित्सा
शस्त्र, क्षार और अग्नि कर्म से होती है। मेदोजन्य रोगों की चिकित्सा 'अष्टोनि-
न्दित' अध्याय में कह दी है। अस्थियों में आश्रित रोगों की चिकित्सा पंचकर्म,
एवं तिक्त वस्तुओं से तथा दूध एवं घृत से सिद्ध बस्तियां (विशेष) चिकित्सा
हैं। मज्जा और शुक्र से उत्पन्न रोगों की चिकित्सा स्वादु, तिक्त अन्न, व्यवाय,
(स्त्री-संग) व्यायाम और समय पर मात्रानुसार वमन आदि से शुद्धि है।
इन्द्रियजन्य रोगों की चिकित्सा 'त्रिमर्मीय' अध्याय में कहेंगे। स्नायु आदि से
उत्पन्न रोगों की चिकित्सा वातरोगाधिकार में कहेंगे। मलजन्य रोगों की चिकित्सा
'न वेगान्धारणीय' अध्याय में कह दी और कहीं २ (अतिसार, ग्रहणी आदि
में) आगे भी कहेंगे ॥ २४-२६ ॥
व्यायामादूष्मणस्तैक्ष्ण्याद्धितस्यानवचारणात् ।
कोष्ठाच्छाखां मला यान्ति द्रुतत्वान्मारुतस्य च ॥ ३० ॥
तत्रस्थाश्च विलम्बन्ते कदाचिच्च समीरिताः ।
नादेशकाले कुप्यन्ति भूयो हेतुप्रतीक्षिणः ॥ ३१ ॥
निम्न कारणों से दोष शाखाओं में पहुंच जाते हैं, यथा व्यायाम से उत्पन्न
क्षोभ से कोष्ठ को छोड़कर मल शाखा में आ जाते हैं। अग्नि के तीक्ष्ण होने से
पिघले हुए दोष शाखा में आ जाते हैं। हितकारी वस्तु के अति सेवन से बहुत
बढ़े हुए दोष पानी के पूर की भांति अपने स्थान पर भरकर दूसरे स्थान पर
पहुंच जाते हैं। वायु के गतिशील होने से वायु द्वारा दूसरे स्थान पर पहुँच
जाते हैं। वहां शाखा आदि में पहुंचकर रोग उत्पन्न करने में विलम्ब करते
हैं। क्योंकि निर्बल दोष किसी प्रबल दोष की प्रेरणा के बिना कुपित नहीं हो
सकते। इसलिये उचितस्थान पर और उचित काल में ही कुपित होते हैं। वे
निर्बल दोष और कारण की प्रतीक्षा करते रहते हैं। बलवान् दोष दूसरे प्रेरक
कारण की बाट नहीं देखते। शाखाओं से दोष कोष्ठ में किस प्रकार जाते हैं
यह कहते हैं ॥ ३०-३१ ॥
वृद्ध्याभिष्यन्दनात् पाकात्स्त्रोतोमुखविशोधनात् ।
शाखां मुक्त्वा मलाः कोष्ठं यान्ति वायोश्च निग्रहात् ॥ ३२ ॥
दोषों के बढ़ने से, (अभिष्यन्द से बहने से सरल, होने से) दोष के
पकने से, स्रोतों के मुख खुल जाने से अवरोध हटने से; तथा फेंकने वाली
वायु के रुक जाने से ये स्थित दोष कोष्ठ में आजाते हैं ॥ ३२ ॥
अ० २८.] सूत्रस्थानम् २८१
अ० २८.] सूत्रस्थानम् २८१
अजातानामनुत्पत्तौ जातानां विनिवृत्तये ।
रोगाणां यो विधिर्दृष्टः सुखार्थी तं समाचरेत् ॥ ३३ ॥
सुखार्थाः सर्वभूतानां मताः सर्वाः प्रवृत्तयः ।
ज्ञानाज्ञानविशेषात्तु मार्गामार्गप्रवृत्तयः ॥ ३४ ॥
हितमेवानुरुध्यन्ते प्रपरीक्ष्य परीक्षकाः ।
रजोमोहावृतात्मानः प्रियमेव तु लौकिकाः ॥ ३५ ॥
श्रुतं बुद्धिः स्मृतिर्दाक्ष्यं धृतिर्हितनिषेवणम् ।
वाग्विborderशुद्धिः शमो धैर्यमाश्रयन्ति परीक्षकम् ॥ ३६ ॥
लौकिकं नाश्रयन्त्येते गुणा मोहरजःश्रितम् ।
तन्मूला बहुलाश्चैव रोगाः शारीरमानसाः ॥ ३७ ॥
संक्षेप से सुख की इच्छा रखने वाले पुरुष को चाहिये कि रोगों को उत्पन्न
न होने देने की जो विधि कही है, तथा उत्पन्न हुए रोगों को हटाने की जो
विधि कही है, उसका आचरण, सेवन करें । क्योंकि सब प्राणियों की सब
प्रवृत्तियां सुख प्राप्त करने की इच्छा से ही होती हैं । ज्ञान और अज्ञान के भेद
से ही मनुष्य मार्ग या अमार्ग का अनुसरण करने लगता है । परीक्षक विद्वान्
परीक्षा करके हितकारी वस्तुओं का सेवन करते हैं, रजो गुण और मोह में फंसे
साधारण-जन प्रिय पदार्थ ही चाहते हैं। श्रुत, बुद्धि, स्मृति दृढ़ता हितकारी
वस्तुओं का सेवन, वाणी की शुद्धि, शम, और धैर्य, ये गुण विवेकी पुरुष में
होते हैं । परन्तु मोह और रज से युक्त होने के कारण लौकिक, अविवेकी पुरुष-
में ये गुण नहीं होते । इसलिये इनको शारीरिक और मानसिक बहुत प्रकार के
रोग होते हैं ॥ ३३-३७ ॥
प्रज्ञापराधाद्धितानर्थान् पञ्च निषेवते ।
संधारयति वेगांश्च सेवते साहसानि च ॥ ३८ ॥
तदात्वसुखसंज्ञेषु भावेष्वज्ञोऽनुरज्यते ।
रज्यते न तु विज्ञाता विज्ञाने शमलीकृते ॥ ३९ ॥
न रागाद्नाप्यविज्ञानादाहारमुपयोजयेत् ।
परीक्ष्य हितमश्नीयाद्देहो ह्याहारसंभवः ॥ ४० ॥
आहारस्य विधावष्टौ विशेषा हेतुसंज्ञकाः ।
शुभाशुभसमुत्पत्तौ तान् परीक्ष्योपयोजयेत् ॥ ४१ ॥
परिहार्याण्यपथ्यानि सदा परिहरन्नरः ।
भवत्यनृणवां प्राज्ञः साधूनामिह पण्डितः ॥ ४२ ॥
३८४ चरकसंहिता [अ० २८
यत्तु रोगसमुत्थानमशक्यमिह केनचित् ।
परिहर्तुं, न तत्प्राप्य शोचितव्यं मनीषिणा ॥ ४३ ॥
अज्ञानी मनुष्य बुद्धि के दोष से पञ्चेन्द्रियों के अहित शब्द, स्पर्शादि विषयों
का सेवन करता है, मल मूत्रादि के वेगों को रोकता है, साहस के कामों को
करता है, प्रारम्भ में सुखदायक और परिणाम में दुःखदायक कर्मों को करता
है, इसलिये दुःख उठाता है। परन्तु ज्ञानी पुरुष ज्ञान द्वारा बुद्धि के स्वच्छ
होने से इन कामों में नहीं फंसता, अतः सुखी रहता है । राग अर्थात् आसक्ति
से (जानते हुए भी भोजन अहितकर है, फिर भी लालच से ) या अज्ञान
से भोजन को नहीं खाना चाहिये, परीक्षा करके ज्ञानपूर्वक हितकारी अन्न को
ही खाना चाहिये । क्योंकि शरीर आहार से उत्पन्न होता है। भोजन की
शुभ-अशुभ परीक्षा के लिये आठ प्रकार की परीक्षा है । ये आठ परीक्षायें
विमान स्थान अध्याय १ में प्रकृति-करण, संयोग आदि से कही हैं।
भोजन की इन आठ विशेषताओं से परीक्षा करके भोजन करना चाहिये ।
जिन अपथ्यों से मनुष्य बच सकता हो उनसे बचने का सदा यत्न करना चाहिये,
इस प्रकार करने से पुरुष अपराधरहित होता है और साधु पुरुषों में बुद्धिमान्
गिना जाता है। क्योंकि प्रारब्ध से उत्पन्न व्याधि को साधु पुरुष बुरा नहीं
मानते । जो रोग प्रारब्ध के बलवान् होने से उत्पन्न होता है वह यदि चिकित्सा
कार्य के किये असाध्य भी हो तो भी बुद्धिमान् मनुष्य को शोक, चिन्ता नहीं
करनी चाहिये ॥ ३८-४३ ॥
तत्र श्लोकाः-आहारसंभवं वस्तु रोगाश्चाऽऽहारसंभवाः ।
हिताहितविशेषाच्च विशेषः सुखदुःखयोः ॥ ४४ ॥
सहत्वे चासहत्वे च दुःखानां देहसत्त्वयोः ।
विशेषो रोगसङ्ख्याश्च धातुजा ये पृथक् पृथक् ॥ ४५ ॥
तेषां चैव प्रशमनं कोष्ठाच्छाखा उपेत्य च ।
दोषा यथा प्रकुप्यन्ति शाखाभ्यः कोष्ठमेव च ॥ ४६ ॥
प्राज्ञाज्ञयोर्विशेषश्च स्वस्थातुरहितं च यत् ।
विविधाशितपीतीये तत्सर्वं संप्रकाशितम् ॥ ४७ ॥
यह शरीर आहार से उत्पन्न होता है, रोग भी आहार से उत्पन्न होते हैं।
हित और अहित की विशेषता ही सुख दुःख में कारण है। दुःखों के सहन
करने या न सहन कर सकने में देह, सत्त्व आदि विशेषतायें धातुजन्य पृथक् २
रोग, इनकी चिकित्सा, दोष जिस प्रकार से कोष्ठ से शाखा में जाकर कुपित
अ० २९] २५ सूत्रस्थानम् १८४
अ० २९] २५ सूत्रस्थानम् १८४
होते हैं और शाखाओं से जिस प्रकार कोष्ठ में आते हैं, विशद और अविदाह
की भिन्नता, स्वस्थ और रोगी के लिये जो कुछ हितकारी है, वह सब 'विविधा-
शितपीतीय' अध्याय में कह दिया ॥ ४४-४७ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थानेऽन्नपानचतुष्के
विविधाशितपीतीया नाम अष्टाविंशोऽध्यायः समाप्तः ॥ २८ ॥
समाप्तमिदं सप्तममन्नपानचतुष्कम् ।
एकोनत्रिंशोऽध्यायः ।
अथातो दशप्राणायतनीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब आगे 'प्राणायतनीय' अध्याय का व्याख्यान करेंगे जैसा भगवान्
आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥
दशैवायतनान्याहुः प्राणा येषु प्रतिष्ठिताः ।
शङ्खौ मर्मत्रयं कण्ठो रक्तं शुक्रौजसी गुदम् ॥ ३ ॥
तानीन्द्रियाणि विज्ञानं चेतनाहेतुमामयम् ।
जानीते यः स वै विद्वान् प्राणाभिसर उच्यते ॥ ४ ॥ इति ॥
प्राण जिन स्थानों पर आश्रित हैं वे दस स्थान हैं । यथा ( १-२ ) शंख-
प्रदेश ( कनपटी ) दो, ( ३-५ ) तीन मर्म-हृदय, वस्ति और शिर, ( ६ ) कण्ठ,
( ७ ) रक्त, ( ८ ) शुक्र, ( ९ ) ओज और ( १० ) गुदा ये दस प्राणों के
स्थान हैं।
इन दस स्थानों को, इन्द्रियों ( आध्यात्मिक ), चेतनाहेतु ( आत्मा )
और रोगों के कारण, लक्षण और ओषधि-चिकित्सा को जो विद्वान् जानता है,
वही 'प्राणाभिसर' कहलाता है ॥ ३-४ ॥
द्विविधास्तु खलु भिषजो भवन्त्यग्निवेश ! प्राणानामेकेऽभिसरा
हन्तारो रोगाणां, रोगाणामेकेऽभिसरा हन्तारः प्राणानामिति ॥ ५ ॥
एवं वादिनं भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच—भगवन् ! ते कथम-
स्माभिर्वेदितव्या भवेयुरिति ॥ ६ ॥
भगवानुवाच—य इमे कुलीनाः पर्यवदातश्रुताः परिदृष्टकर्माणो
दक्षाः शुचयो जितहस्ता जितात्मानः सर्वोपकरणवन्तः सर्वेन्द्रियो-
पपन्नाः प्रकृतिज्ञाः प्रतिपत्तिज्ञास्ते प्राणानामभिसराः, हन्तारो रोगा-
३८६ चरकसंहिता [ अ० २९
नाम्, तथाविधा हि केवले शरीरज्ञाने शरीराभिनिर्वृत्ति-ज्ञान-
प्रकृति-विकार-ज्ञाने च निःसंशयाः सुख-साध्य-कृच्छ्र-साध्य-याप्य-प्रत्या-
ख्येयानां च रोगाणां समुत्थान-पूर्वरूप-लिङ्ग-वेदनोपशय-विशेष-विज्ञाने
व्यपगतसन्देहाः, त्रिविधस्याऽऽयुर्वेदसूत्रस्य ससंग्रह-व्याकरणस्य सत्रिबि-
धौषधग्रामस्य प्रवक्तारः, पञ्चत्रिंशतश्च मूलफलानां चतुर्णां च स्नेहानां
पञ्चानां च लवणानामष्टानां च मूत्राणामष्टानां च क्षीराणां क्षीरत्वग्वृ-
क्षाणां च षण्णां शिरोविरेचनादेश्च पञ्चकर्माश्रयस्यौषधगणस्याष्टाविंश-
तेश्च यवागूनां द्वात्रिंशच्चूर्णप्रदेहानां षण्णां च विरेचनशतानां पञ्चानां
च कषायशतानां, स्वस्थवृत्तावपि च भोजन-पान-नियम-स्थान-चङ्क्रमण-
शय्यासन-मात्रा-द्रव्याञ्जन-धूम-नावनाभ्यञ्जन-परिमार्जन-वेगाविधारणा-
व्यायाम-सात्म्येन्द्रिय-परीक्षोपक्रम-सद्वृत्तकुशलाः; चतुष्पादोपगृहीते च
भेषजे षोडशकले सविनिश्चये सत्रिपर्येषणे सवातकलाकलज्ञाने व्यप-
गतसन्देहाः, चतुर्विधस्य च स्नेहस्य चतुर्विंशत्युपनयस्योपकल्पनी-
यस्य चतुःषष्टिपर्यन्तस्य व्यवस्थापयितारो बहुविधानामुक्तानां च स्नेह-
स्वेद-वम्य-विरेच्यौषधोपचाराणां च कुशलाः; शिरोरोगादेश्च दोषांशवि-
कल्पजस्य व्याधिसंग्रहस्य सक्षयपिडकाविद्रधेर्द्वयानां च शोफानां बहु-
विधशोफानुबन्धानांमष्टाचत्वारिंशतश्च रोगाधिकरणानां चत्वारिंशदुत्त-
रस्य च नानात्मजस्य व्याधिशतस्य तथा विगर्हितानामतिस्थूलातिकृशानां च
सहेतुलक्षणोपक्रमाणां स्वप्नस्य च हिताहितस्यास्वप्नातिस्वप्नस्य च
सहेतूपक्रमस्य षण्णां च लङ्घनादीनामुपक्रमाणां सन्तर्पणापतर्पणजानां
च रोगाणां सरूपप्रशमनानां च शोणितजानां व्याधीनां मदमूर्च्छायसं-
न्यासानां च सकारणरूपौषधोपचाराणां कुशलाः; कुशलाश्चाऽऽहारविधि-
विनिश्चयस्य प्रकृत्या च हिताहितानामाहारविकाराणामग्र्यसंग्रहस्याऽऽ-
सवानां च चतुरशीतेः द्रव्यगुणविनिश्चयस्य रसानुरससंश्रयस्य सवि-
कल्पकवैरोधिकस्य द्वादशवर्गाश्रयस्य चान्नपानस्य सगुणप्रभावस्य सानु-
पानगुणस्य नवविधस्यार्थसंग्रहस्याऽऽहारगतेश्च हिताहितोपयोगविशेषा-
त्मकस्य च शुभाशुभविशेषस्य धात्वाश्रयाणां च रोगाणामौषधसंग्रहाणां
च दशानां च प्राणायतनानां यं च वक्ष्यामोऽर्थेदशमहामूलीये त्रिंशत्तमा-
ध्याये तत्र च कृत्स्नस्य तत्रोद्देशलक्षणस्य तन्त्रस्य च ग्रहण-धारण-विज्ञान-
प्रयोग-कर्म-कार्य-काल-कर्तृ-करण-कुशलाः कुशलाश्च स्मृति-मति-शास्त्र-संयु-
क्ति-युक्तिज्ञावस्थाऽऽत्मनः शीलगुणैरविसंवादनेन च संपाद्यनेन सर्वप्र-
अ० २६ ] सूत्रस्थानम् ३८७
अ० २६ ] सूत्रस्थानम् ३८७
जिषु चेतसो नेत्रस्य मातृ-पितृ-भ्रातृ-बन्धुवद्देवं युक्ता १ भवन्त्यग्निवेश !
प्राणानामभिसरा हन्तारो रोगाणामिति ॥ ७ ॥
वैद्यों के लक्षण—हे अग्निवेश ! वैद्य दो प्रकार के होते हैं। एक, 'प्राणा-
भिसर' प्राणों को लाने वाले और रोगों का नाश करने वाले। दूसरे 'रोगाभि-
सर' रोगों को लाने वाले और प्राणों का नाश करने वाले।
इस प्रकार से कहते हुए भगवान् आत्रेय को अग्निवेश बोले—हम इन
दोनों प्रकार के वैद्यों को किस प्रकार से किन किन लक्षणों से जान सकते हैं।
भगवान् आत्रेय ने कहा कि जो कुलीन उत्तम कुल में उत्पन्न हुए हों,
जिनकी बुद्धि व शास्त्रज्ञान निर्मल हो, जिन्होंने क्रिया-कर्म देखा हो, जो अनु-
भवी, चतुर, सदाचारी, अभ्यस्त हाथ वाले (शस्त्र चलाने में जिनको संशय
न हो, कुशल हाथवाले) जितेन्द्रिय, सर्व सामग्री से सम्पन्न, आंख, कान आदि
सब इन्द्रियों से युक्त, जो कि शरीर की नीरोगस्थिति को भली प्रकार जानते हैं,
उत्तम सूक्ष्म व परिणाम को भली प्रकार जानने वाले हों वे वैद्य प्राणरक्ष-
क एवं रोगनाशक होते हैं। इस प्रकार से वैद्य सम्पूर्ण शरीर के ज्ञान से,
वीर्य और शोणित के संयोग से शरीर किस प्रकार बनता है इसको जान,
शारीरस्थान में कहे सांख्यशास्त्र के अनुसार प्रकृति विकृति के ज्ञान को
बिना सन्देह के समझते हों, सुखसाध्य, कष्टसाध्य, याप्य वा असाध्य इन चार
प्रकार के रोगों के कारण, पूर्वरूप, लक्षण, वेदना, अनुकूल, आहार-
विहार भली प्रकार जानते हों, सम्पूर्ण आयुर्वेद के सूत्र रूप जो
त्रिविध सूत्र हेतु, लिंग, लक्षण और औषध का ज्ञान है इसको; सामान्य और
विशेष रूप से इनके संक्षेप और विस्तार को तथा तीन प्रकार की औषध दैवव्य-
पाश्रय और युक्तिव्यपाश्रय, सत्वावजय समूह को जाननेवाले, १६ प्रकार की
मूलिनी ओषधियोंको, १६ प्रकार की फलवर्ग की ओषधियों को, चार प्रकार के
स्नेहों, पांच प्रकार के नमक, आठ प्रकार के मूत्र, आठ प्रकार के दूध, छः
प्रकार के क्षीरी-वृक्षों को, शिरोविरेचनादि पंचकर्मों के औषध समूहों को, अष्टा-
दश प्रकार की यवागुओं को, ३२ प्रकार के चूर्ण या प्रदेहों को, छः सौ विरेचन,
पांच सौ कषाय, मनुष्यों की प्रकृति स्वस्थ रहे इसके लिये भोजन, पान, के
नियम, स्थान, चलना, फिरना, सोना, बैठना, मात्रा, द्रव्य, अंजन, धूमपान, नस्य,
अभ्यंजन, स्नान, वेगों को न रोकना, व्यायाम, सात्म्य, इन्द्रियपरीक्षा-उपक्रम,
सद्वृत्त में कुशल, इनके नियमों को जानने वाले, चिकित्सा के चारों पाद और
१. 'बन्धुवद्देवमुक्ता' इति पाठः ॥
३८८ चरकसंहिता [ अ० २९
षोडश अंगो में सन्देहरहित, तीन प्रकार की बासना, वायु के गुण-दोष में सन्दे-
हरहित; चार प्रकार के स्नेह, स्नेह की २४ प्रकार की विचारणा में चतुर; रस
भेद के ६४ प्रकार की योग्य योजना करने में, बहुत प्रकार के स्नेहन, स्वेदन,
वमन, विरेचन ओषधियो को यथायोग्य प्रयोग करने में कुशल, शिरोरोगादि
रोग, वातादि दोषों की अधिकता या कमी से उत्पन्न होने वाले रोगों को;
क्षय, पिड़का, तीन प्रकार की विद्रधि, शोथजन्य नाना प्रकार के रोगों को,
रोगों के ४८ प्रकरण, १४० प्रकार के वात, पित्त, कफ रोगों को निन्दित
अतिस्थूल अतिकृश पुरुषों की हेतु, लक्षण, चिकित्सा को; हितकर अहितकर
निद्रा को; अनिद्रा व अतिनिद्रा „के कारण और चिकित्सा को;- लंघनादि
छः प्रकार की चिकित्सा को, सन्तर्पण अपतर्पण से होने वाले रोगों को,
उनकी चिकित्सा को जानें, रक्तजन्य रोग, मद, मूर्च्छा और संन्यास के कारण,
लक्षण और चिकित्सा में कुशल, आहारांवेधि में कुशल, स्वभावतः पथ्यापथ्य
आहार व संस्कार से होने वाले परिवर्त्तन, चौरासी ( ८४ ) प्रकार के
आसव, रस व अनुरसात्मक द्रव्य गुण निश्चय, विकल्प में कुशल; अन्नपान के
बारह वर्ग, गुण, प्रभाव, अनुपान गुण, अन्नपानादि से, रसादि धातुओं की
उत्पत्ति किस प्रकार होती है, पथ्यापथ्य, आहार के हितकारी फल, वातादि दोष
के प्रकुपित होने से उत्पन्न होने वाले रोग और उनकी चिकित्सा, प्राणा-
यतनों के दस स्थान, इन सब विषयों में तथा अगले 'अर्थे दशमहामूलीय'
अध्याय में जो कुछ कहेंगे, उन सब में निपुण, आयुर्वेद के उद्देश, लक्षण को
जानने वाले हों, एवं आयुर्वेद शास्त्र के ग्रहण करने, ग्रहण किये हुए को धारण
करने और अर्थ से जानने, प्रयोग, चिकित्सा-प्रयोग, अनेक प्रकार से चिकित्सा
करने, कार्य-धातुओं के समान करने, काल, क्रिया, काल, कर्त्ता, भिषक् , करण
औषध में कुशल, तथा स्मरण शक्ति, बुद्धि, शास्त्रयोजना और तर्कज्ञान में समर्थ,
अपने शील, स्वभाव रूपी गुणों से सब प्राणि मात्रों में मन, आत्मा द्वारा, माता,
पिता, भाई, बन्धु, आदि के समान मैत्री भाव रखने में कुशल होते हैं, स्नेह का
व्यवहार करते हैं, हे अग्निवेश ! इस प्रकार के जो वैद्य होते हैं, वे 'प्राणा-
भिसर' अर्थात् प्राणरक्षक तथा रोगनाशक होते हैं ॥ ५-७ ॥
अतो विपर्ययेण विपरीता रोगाणामभिसरा हन्तारः प्राणानां भिष-
क्छद्मप्रतिच्छन्नाः कण्टकभूता लोकस्य प्रतिरूपकत्यक्तधर्माणो राज्ञां
प्रमादाच्चरन्ति राष्ट्राणि । तेषामिदं विशेषविज्ञानम् । अस्यर्धं वैद्यवेषेण
श्लाघमाना विशिखान्तरमनुचरन्ति कर्मलोभात्, श्रुत्वा च कस्यचिदा-
अ० २६ ] सूत्रस्थानम् ३८६
अ० २६ ] सूत्रस्थानम् ३८६
तुर्यमभितः परिवर्तन्ते, संश्रवणे चास्याऽऽत्मनो वैद्यगुणामुच्चैर्वदन्ति,
यश्चास्य वैद्यः प्रतिकर्म करोति तस्य च दोषान् मुहुर्मुहुरुदाहरन्ति,
आतुरमित्राणि च प्रहर्षणोपजापोपसेवादिभिरिच्छन्त्यात्मीकर्तुं, स्वल्पे-
च्छतां चाऽऽत्मनः ख्यापयन्ति, कर्म चाऽऽसाद्य मुहुर्मुहुरवलोकयन्ति
दाक्ष्यॆणाज्ञानमात्मनः प्रच्छादयितुकामाः, व्याधिं चापवर्तयितुमशक्नु-
वन्तो व्याधितमेवानुपकरणमपचारकमनात्मवन्तमुद्दिशन्ति, अन्त॑
गतं चैनमभिसमीक्ष्यान्यमाश्रयन्ति देशमपदेशमात्मनः कृत्वा, प्राकृत-
जनसन्निपाते चाऽऽत्मनः कौशलमकुशलवद्वर्णयन्ति, अधीरवच्च
धैर्यमपवदन्ति धीराणां, विद्वज्जनसन्निपातं चाभिसमीक्ष्य प्रतिभयमिव
कान्तारमध्वगाः परिहरन्ति दूरात्, यश्चैषां कश्चित्सूत्रावयवो भवत्यु-
पयुक्तस्तमप्रकृते प्रकृतान्तरे वा सततमुदाहरन्ति, न चानुयोगमिच्छ-
न्त्यनुयोक्तुं वा, मृत्योरिव चानुयोगादुद्विजन्ते, न चैषामाचार्यः शिष्यो
वा सब्रह्मचारी वैवादिको वा कश्चित्प्रज्ञायत इति ॥ ८ ॥
इनसे विपरीत गुण वाले वैद्य 'रोगाभिसर' अर्थात् रोगों को लानेवाले और
प्राणों का नाश करने वाले होते हैं। ये वैद्य वैद्य के वेष में लोक में कांटे के
समान दुःखदायी, बिगाड़ करने वाले, द्रोह करने वाले, धर्म का त्याग करके,
राजाओं के आलस्य से हो राष्ट्र में विचरते हैं। इन वैद्यों के विशेष लक्षण ये
हैं—ये वैद्य के समान वस्त्र धारण करके अपनी प्रशंसा करते हुए रोगी के घर
में गली में चिकित्सा कर्म के लोभ से जाते हैं, किसी को रोगी सुनकर उसको
चारों ओर से घेर बैठते हैं, और अपने गुणानुवादों को ऊंचे २ सुनाने लगते
हैं। जो पहले वैद्य चिकित्सा कर रहा है, उसके दोषों को बार २ कहते
हैं। रोगी के मित्रों को खुश करके, चापलूसी, चुगली से, सेवा आदि द्वारा
अपना बनाना चाहते हैं। और अपनी इच्छा को थोड़ा बतलाते हैं। चिकित्सा
कार्य मिलने पर बार २ इधर उधर देखते हैं। चालाकी से अपने अज्ञान को
छिपाने की चेष्टा करते हुए, रोग को अच्छा करने में अशक्त होने पर रोगी को
ही उलाहना देने लगते हैं, तुम्हारे पास साधन नहीं, सेवक नहीं, पथ्य नहीं
रखते। मरता हुआ देखकर बहाना करके दूसरे देश में चले जाते हैं। भोले
भाले आदमी को देखकर अपनी कुशलता को मूर्ख पुरुष की भांति विरुद्ध
वचनों द्वारा प्रकट करते हैं। धीर पुरुषों के सामने अधीर की भांति जोर २
से अपना धैर्य कहने लगते हैं। विद्वान् मनुष्यों को देखकर दुम दबाकर ऐसे
भाग जाते हैं, जिस प्रकार कि भयंकर भय की आशंका से जंगल के रास्ते को
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दूर से ही छोड़ देते हैं। इन लोगों को जो ज़रासा भी आयुर्वेद चिकित्सा का
सूत्र मिल जाता है, तो उसीको बेसमय या बिना मतलब के (प्रसंग के बिना
ही) बार २ बोलने लगते हैं। ये न तो स्वयं किसी से कुछ पूछते हैं और न
यह चाहते हैं कि कोई हमसे पूछे। वे प्रश्न के पूछने से मृत्यु से जैसे डर
कर भागते हैं। न तो कोई इनका आचार्य, न कोई शिष्य और न कोई
सहाध्यायी होता है ॥ ८ ॥
भिषक्छद्म प्रविश्यैव व्याधितांस्तर्कयन्ति ते ।
वीतंसमिव संश्रित्य वने शाकुन्तको द्विजान् ॥ ९ ॥
श्रुत-दृष्टि-क्रिया-काल-मात्रा-ज्ञान-बहिष्कृताः ।
वर्जनीया हि ते मृत्योश्चरन्त्यनुचरा भुवि ॥ १० ॥
वृत्तिहेतोर्भिषङ्मानपूर्णान् मूर्खविशारदान् ।
वर्जयेदातुरो विद्वान् सर्पांस्ते पीतमारुताः ॥ ११ ॥
ये तु शास्त्रविदो दक्षाः शुचयः कर्मकोविदाः ।
जितहस्ता जितात्मानस्तेभ्यो नित्यं कृतं नमः ॥ १२ ॥
रोगी को देखकर वैद्य का वेष पहिन कर रोगी के घर में घुस जाते हैं। ये
जंगल में पहुंचे चिड़ीमार की तरह पक्षियों को जाल में फंसाने वाले होते हैं।
इनको शास्त्रश्रवण, कर्मदर्शन, चिकित्सा और काल, मात्रा शास्त्र का ज्ञान नहीं
होता। ये मृत्यु के नौकर होकर पृथ्वी पर विचरते हैं, इसलिये इनको छोड़
देना चाहिये। जीविका प्राप्त करने के लिये वैद्य बने हुए, पूरे मूर्खों को,
बुद्धिमान् रोगी छोड़ देवे, क्योंकि वे वायु पिये हुए सांप के समान हैं। जो
वैद्य शास्त्रज्ञानी, कर्म में दक्ष, पवित्र, कर्मकुशल, जितहस्त, संयमी, ऐसे
प्राणाभिसर वैद्यों को नित्य प्रति नमस्कार है ॥ ९-१२ ॥
तत्र श्लोकाः—दश प्राणायतनिके श्लोकस्थानार्थसंग्रहः ।
द्विविधा भिषजश्चोक्ताः प्राणस्याऽऽयतनानि च ॥ १३ ॥
इस दश प्राणायतनीय अध्याय में सम्पूर्ण सूत्रस्थान की संक्षिप्त सूची, दो
प्रकार के वैद्य, शरीर के दस प्राणायतन ये विषय प्रतिपादन कर दिये हैं ॥१३॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने दशप्राणायतनीयो
नामैकोनत्रिंशोऽध्यायः समाप्तः ॥ २९ ॥