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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

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DevanagariSanskritpublished639 pages

Page 392 of 639

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Page 392

१७४ चरकसंहिता [ अ० २८
भवन्तश्चात्र— प्राणाः प्राणभृतामन्नमन्नं लोकोऽभिधावति ।
वर्णः प्रसादः सौस्वर्यं जीवितं प्रतिभा सुखम् ॥ ३४७ ॥
तुष्टिः पुष्टिर्बलं मेधा सर्वमन्ने प्रतिष्ठितम् ।
लौकिकं कर्म यद्वृत्तौ स्वर्गौ यच्च वैदिकम् ॥ ३४८ ॥
कर्मापवर्गे यच्चोक्तं तच्चाप्यन्ने प्रतिष्ठितम् ।
अन्न, सब प्राणियों का प्राण है, सारा संसार इसी अन्न की याचना करता
है (पेट के लिये आदमी सब कुछ करता है)। अन्न में ही वर्ण, शरीर की
प्रसन्नता, सुस्वरता, जीवन, प्रतिभा, सुख, तुष्टि, हर्ष, पोषण, बल, मेधा, ये
सब बातें स्थिर हैं। सांसारिक कर्म, तथा स्वर्ग प्राप्ति में यज्ञादि जो वैदिक
मोक्षदायक यज्ञ, तप आदि कर्म हैं, वे सब अन्न में प्रतिष्ठित हैं ॥ ३४७-३४८ ॥
तत्र श्लोकः—अन्नपानगुणाः साम्या वर्गा द्वादश निश्चिताः ॥ ३४९ ॥
सगुणान्यनुपानानि गुरुलाघवसंग्रहः ।
अन्नपानविधावुक्तं तत्परीक्ष्यं विशेषतः ॥ ३५० ॥
इस अन्नपान नामक अध्याय में, अन्न-पान के गुण, बारह वर्गों में कह
दिये हैं। अनुपान के गुण, गुरु एवं लघु विषय का निरूपण किया है, इस
विधि को विचार कर प्रयोग करना चाहिये ॥ ३४९-३५० ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने अन्नपानविधिर्नाम
सप्तविंशतितमोऽध्यायः ॥ २७ ॥

अष्टाविंशोऽध्यायः
अथातो विविधाशितपीतीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब से 'विविधाशित-पीतीय' अध्याय का व्याख्यान करेंगे । जैसा भगवान्
आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥
विविधमशित-पीत-लीढ-खादितं जन्तोर्हितमन्तरग्निसन्धुक्षितबलेन
यथास्वेनोष्मणा सम्यग्विपाच्यमानं कालवदनवस्थितसर्वधातुपाकमनु-
पहतसर्वधातूष्ममारुतस्रोतस् केवलं शरीरमुपचय-बल-वर्ण-सुखायुषा
योजयति, शरीरधातूनूर्जयति । धातवो हि धात्वाहाराः प्रकृतिमनु-
वर्तन्ते ॥ ३ ॥