चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व अग्निवेश
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
DevanagariSanskritpublished639 pages
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३७६ चरकसंहिता [ अ० २८
सब पुष्ट होते हैं। आहार के प्रसाद रूपी रसभाग से, रस, रक्त, मांस,
मेद, अस्थि, मज्जा, शुक्र, ओज तथा पृथ्वी, अ_, तेज, वायु, आकाश (ये
पंच महाभूत तो इन्द्रियों को बनाने वाले हैं) अत्यन्त शुद्ध रूप में
स्थित धातु, शरीर को बांधने वाली स्नायु, सिरा आदि, सन्धियां, आर्तव
और दूध बनाते हैं। ये सब मल नामक धातु या प्रसाद रूप धातु रस और
मल द्वारा पुष्ट होते हुए आयु के अनुसार अपने परिणाम में बनते हैं
(अथवा कृश, स्थूल, छोटे, बड़े में अपने परिणाम से बनते हैं)। *
- आहार के रसादि धातु में बदलने के विषय में एक पक्ष यह है कि
रस, रक्त धातु में बदलता है और रक्त, मांस में, इस प्रकार आगे परिवर्तन-
होता जाता है। जिस प्रकार दही जमते हुए सम्पूर्ण दूध दही रूप में
बदलता है, इसी प्रकार सम्पूर्ण रस रक्त रूप में बदल जाता है और रक्त मांस
में इसी प्रकार आगे। दूसरे आचार्य इस परिवर्तन को 'केदार-कुल्यान्याय' से
मानते हैं। अर्थात् खेत में बहतो पानी की धार में से प्रत्येक क्यारी अपना २
पानी ले लेती है इसी प्रकार यहां पर भी अन्न से उत्पन्न रस, रस धातु में जाकर
कुछ भाग से रस बन जाता है और शेष रस भाग रक्त में जाकर रक्त के गन्ध,
वर्ण से मिल कर रक्त बन जाता है और शेष रस भाग आगे मांस धातु में
पहुंचता है, वहां मांस के गन्ध-वर्ण में मिलकर मांस बन जाता है, और इससे
अवशिष्ट रस भाग मेद में चला जाता है, वहां भी पूर्व की भाँति क्रिया होती है।
इसी प्रकार आगे २ चलता जाता है। तीसरे पक्ष वाले कहते हैं कि-अन्न
रस पृथक् २ धातुमार्ग में जाकर रसादि धातुओं का पोषण करता है, यह नहीं
कि इस धातु को पोषण करने वाला ही रक्त धातु में जाता है। रस आदि को
पोषण करने वाले स्रोत उत्तरोत्तर सूक्ष्म मुख वाले और लम्बे हैं। इस प्रकार से
रस को पोषण करने वाला भाग रसमार्ग में गमन करके रस का पोषण करता है,
एवं रक्त का पोषण करने के पीछे रक्त पोषक मार्ग में जाने से रक्त का पोषण
करता है, इस प्रकार रक्त का पोषण करने के पीछे मांस को पोषण करने वाला
रस भाग दूर एवं सूक्ष्म मार्ग में गमन करने से मांस का पोषण करता है।
इसी प्रकार आगे मेद आदि का पोषण हो जाता है। इस पक्ष में दूध आदि
वृष्य वस्तुओं से उत्पन्न रस प्रभाव से शीघ्र ही शुक्र से मिलकर शुक्र का पोषण
कर देता है, इसी प्रकार वृद्धावस्था में भी एक दोष के दुष्ट होने से अन्य धातु
दुष्ट नहीं होते, परन्तु परिणाम पक्ष में रस-धातु के दुष्ट होने से रक्त आदि
धातु भी दूषित हो जाते हैं, इसके अतिरिक्त परिणाम पक्ष में तीन चार उपवास
से शरीर की मृत्यु होनी चाहिये और एक मास के दुग्धसेवन से ही सम्पूर्ण