चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व अग्निवेश
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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खाते हैं ऐसे दोनों प्रकार के प्राणी गुरु होते हैं। धन्व प्रदेश में उत्पन्न या धन्व
(रेतीले) देश में विचरने वाले तथा लघु भोजन करने वाले प्राणी लघु
होते हैं।
जांघ, शिर, स्कन्ध आदि शरीर के अवयव हैं। इनमें जंघा से स्कन्ध,
स्कन्ध से क्रोड़ और क्रोड़ से शिर, का मांस गुरु होता है। शिर से वृषण और
वृषण से इनका चर्म, फिर शिश्न, फिर श्रोणी भाग, फिर वृक्क (गुर्दे) और
फिर यकृत्, उसके पीछे गुर्दा और पीछे मध्यास्थि (मज्जा या अस्थि के ऊपर
का मांस) गुरु होता है।
स्वभाव या प्रकृति से मूंग, बटेर कपिंजल लघु होते हैं और उड़द, सूअर,
भैंस ये गुरु होते हैं। धातुओं में रक्त मांस, और मेद ये क्रमशः उत्तरोत्तर गुरु
होते जाते हैं। जो प्राणी बहुत चेष्टाशील होते हैं, वे आलसी स्वभाव वाले
प्राणियों से भिन्न अर्थात् लघु होते हैं (आलसी प्राणी गुरु होते हैं) लिंग की
दृष्टि से नर गुरु और मादा पशु लघु होते हैं, (पशुओ में यह नियम है,
परन्तु पक्षियों में नर लघु होता है।) अपनी जाति में बड़े शरीर वाले गुरु और
छोटे शरीर के प्राणी लघु होते हैं ॥ ३२६-३३६ ॥
गुरुणां लाघवं विद्यात्संस्कारात्सविपर्ययम् ।
व्रीहेर्लाजा यथा च स्युः सक्तूनां सिद्धपिण्डिकाः ॥ ३३७ ॥
अल्पादाने गुरूणां च लघूनां चातिसेवने ।
मात्राकारणमुद्दिष्टं द्रव्याणां गुरुलाघवे ॥ ३३८ ॥
गुरूणामल्पमादेयं लघूनां तृप्तिरिष्यते ।
मात्रां द्रव्याण्यपेक्षन्ते मात्रा चाग्निमपेक्षते ॥ ३३९ ॥
बलमारोग्यमायुश्च प्राणाश्चाग्नौ प्रतिष्ठिताः ।
अन्नपानेन्धनैश्चाग्निर्दीप्यते शाम्यतेऽन्यथा १ ॥ ३४० ॥
गुरुलाघवचिन्तेयं प्रायेणाल्पबलान् प्रति ।
मन्दक्रियाननारोग्यान् सुकुमारान् सुखोचितान् ॥ ३४१ ॥
दीप्ताग्नयः खराहाराः कर्मनित्या महादराः ।
ये नराः प्रति ताँश्चिन्त्यं नावश्यं गुरुलाघवम् ॥ ३४२ ॥
संस्कार द्वारा गुरु पदार्थ लघु और लघु पदार्थ गुरु बन जाते हैं। जैसे
व्रीहि (धान्य) स्वभाव से गुरु हैं, परन्तु लाजा के रूप में लघु बन जाते हैं
और सत्तू स्वभाव से लघु होने पर भी उनकी आग से पकाई पिण्डिकायें
१. ज्वल्यति व्येति चाम्यथा इति वा पाठः ।