चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व अग्निवेश
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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Read in contextअ० २७] सूत्रस्थानम् २७३
गुरु होजाती हैं। गुरु पदार्थों को थोड़ा और लघु पदार्थों को अधिक सेवन
करने से वे गुरु हो जाते हैं। इसलिये गुरु लघुता के निश्चय करने में भी मात्रा
कारण है। गुरु पदार्थों को थोड़ा लेना और लघु पदार्थों को तृप्तिपूर्वक खाना
चाहिये जिससे पेट फूल न जाय, श्वास चढ़ने न लगे। द्रव्य, मात्रा अर्थात्
परिमाण की अपेक्षा करते हैं और मात्रा अग्नि की अपेक्षा करती है। बल,
आरोग्यता, आयु और प्राण अग्नि पर आश्रित हैं—अग्नि के अधीन हैं। अन्न
पान (खान, पान) रूपी इन्धन से अग्नि प्रदीप्त होती है, और खान पान के
न मिलने से वह बुझ जाती है, शान्त होजाती है। जो पुरुष अल्प बल वाले
हों, मन्द क्रिया, मन्द-चेष्टावाले, अनारोग्य, रोगी, सुकुमार अर्थात् नाजुक
प्रकृति, के आराम का जीवन व्यतीत करने वाले हैं उनके विषय में गुरु-लघु
का विचार करना चाहिये। जिनकी अग्नि प्रबल हो, जो कठिन आहार को
भी पचा सकते हों, नित्य मेहनत करने वाले, बड़े पेट वाले, जिनकी अग्नि
बढ़ी हुई हो उनके विषय में गुरु-लघु का विचार करने की आवश्यकता
नहीं है ॥ ३३७-३४२ ॥
द्विसाभिर्जुहुयान्नित्यमन्तराग्निं समाहितः ।
अन्नपानसमिद्भिर्ना मात्राकालौ विचारयन् ॥ ३४३ ॥
आहिताग्निः सदा पथ्यान्यन्तराग्नौ जुहोति यः ।
दिवसे दिवसे ब्रह्म जपत्यथ ददाति च ॥ ३४४ ॥
नरं निःश्रेयसे युक्तं सात्म्यज्ञं पानभोजने ।
भजन्ते नाऽऽमयाः केचिद्भाविनोऽप्यन्तरादृते ॥ ३४५ ॥
षट्त्रिंशतं सहस्राणि रात्रीणां हितभोजनः ।
जीवत्यनातुरो जन्तुर्जितात्मा संमतः सताम् ॥ ३४६ ॥
मनुष्य को चाहिये कि मात्रा और काल का विचार करके, हितकारी खान-
पान रूपी समिधाओं से अन्तराग्नि में नित्यप्रति संयमित चित्त से हवन करे।
जो आहिताग्नि हवन करने वाला नित्य प्रति दोनों समय अन्तराग्नि में हितकारी
अन्न की आहुति देकर ब्रह्म (ओंकार) का जप करता है और यथाशक्ति दान
करता है, जिसको खान-पान सम्बन्धी सात्म्य का ज्ञान होता है, ऐसे पुण्यवान्
पुरुष को कारण के बिना कभी भी रोग नहीं होते। इसी प्रकार संचित धर्म के
प्रभाव से जन्मान्तर में भी रोग नहीं होते। हितकर आहार करने वाला व्यक्ति
३६००० रात्रि (१०० वर्ष) पर्य्यन्त नीरोगी, जितेन्द्रिय, और सज्जनों से
पूजित होकर निवास करता है ॥ ३४३-३४६ ॥