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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

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DevanagariSanskritpublished639 pages

Page 400 of 639

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Page 400

३८२ चरकसंहिता [अ० २८
रसजन्य सब विकारों की चिकित्सा लंघन अर्थात् उपवास है। रक्तजन्य
रोगों की चिकित्सा विधिशोणित अध्याय में कहेंगे। मांसजन्य रोगों की चिकित्सा
शस्त्र, क्षार और अग्नि कर्म से होती है। मेदोजन्य रोगों की चिकित्सा 'अष्टोनि-
न्दित' अध्याय में कह दी है। अस्थियों में आश्रित रोगों की चिकित्सा पंचकर्म,
एवं तिक्त वस्तुओं से तथा दूध एवं घृत से सिद्ध बस्तियां (विशेष) चिकित्सा
हैं। मज्जा और शुक्र से उत्पन्न रोगों की चिकित्सा स्वादु, तिक्त अन्न, व्यवाय,
(स्त्री-संग) व्यायाम और समय पर मात्रानुसार वमन आदि से शुद्धि है।
इन्द्रियजन्य रोगों की चिकित्सा 'त्रिमर्मीय' अध्याय में कहेंगे। स्नायु आदि से
उत्पन्न रोगों की चिकित्सा वातरोगाधिकार में कहेंगे। मलजन्य रोगों की चिकित्सा
'न वेगान्धारणीय' अध्याय में कह दी और कहीं २ (अतिसार, ग्रहणी आदि
में) आगे भी कहेंगे ॥ २४-२६ ॥
व्यायामादूष्मणस्तैक्ष्ण्याद्धितस्यानवचारणात् ।
कोष्ठाच्छाखां मला यान्ति द्रुतत्वान्मारुतस्य च ॥ ३० ॥
तत्रस्थाश्च विलम्बन्ते कदाचिच्च समीरिताः ।
नादेशकाले कुप्यन्ति भूयो हेतुप्रतीक्षिणः ॥ ३१ ॥
निम्न कारणों से दोष शाखाओं में पहुंच जाते हैं, यथा व्यायाम से उत्पन्न
क्षोभ से कोष्ठ को छोड़कर मल शाखा में आ जाते हैं। अग्नि के तीक्ष्ण होने से
पिघले हुए दोष शाखा में आ जाते हैं। हितकारी वस्तु के अति सेवन से बहुत
बढ़े हुए दोष पानी के पूर की भांति अपने स्थान पर भरकर दूसरे स्थान पर
पहुंच जाते हैं। वायु के गतिशील होने से वायु द्वारा दूसरे स्थान पर पहुँच
जाते हैं। वहां शाखा आदि में पहुंचकर रोग उत्पन्न करने में विलम्ब करते
हैं। क्योंकि निर्बल दोष किसी प्रबल दोष की प्रेरणा के बिना कुपित नहीं हो
सकते। इसलिये उचितस्थान पर और उचित काल में ही कुपित होते हैं। वे
निर्बल दोष और कारण की प्रतीक्षा करते रहते हैं। बलवान् दोष दूसरे प्रेरक
कारण की बाट नहीं देखते। शाखाओं से दोष कोष्ठ में किस प्रकार जाते हैं
यह कहते हैं ॥ ३०-३१ ॥
वृद्ध्याभिष्यन्दनात् पाकात्स्त्रोतोमुखविशोधनात् ।
शाखां मुक्त्वा मलाः कोष्ठं यान्ति वायोश्च निग्रहात् ॥ ३२ ॥
दोषों के बढ़ने से, (अभिष्यन्द से बहने से सरल, होने से) दोष के
पकने से, स्रोतों के मुख खुल जाने से अवरोध हटने से; तथा फेंकने वाली
वायु के रुक जाने से ये स्थित दोष कोष्ठ में आजाते हैं ॥ ३२ ॥