चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व अग्निवेश
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
About this granth
The Charaka Samhita (चरक-संहिता) is the foundational text of Ayurvedic internal medicine. By tradition, the teachings of Punarvasu Atreya were set down by his disciple Agnivesha, revised by Charaka and later completed by Dridhabala of Kashmir. With eight sections and 120 chapters, it is counted with the Sushruta Samhita and Ashtanga Hridaya among the 'great three' of Ayurveda.
This volume covers the Sutra, Nidana and Vimana sections. It includes chapters such as Dirghanjivitiya, Apamarga-tanduliya, Matrashitiya and Mahachatushpada; the count of purgative formulations made from madana fruit and other drugs; the fifty great groups of herbs, beginning with the digestives; the classes of prepared foods and food sources; abscesses and boils; and the diagnosis of the five kinds of insanity.
As the title page states, this is the first part of the Charaka Samhita with a Hindi translation by Kaviraj Atridev Gupta, Vidyalankar, Bhishagratna, of Gurukul University, published by Bhargava Pustakalaya, Gaighat, Banaras. The preface mentions the Jalpakalpataru of Gangadhar Kaviraj and the Charakopaskara of Yogindranath Sen. This second edition has 639 pages.
अ० ३० ] सूत्रस्थानम् ३६१
त्रिंशत्तमोऽध्यायः
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अथातोऽर्थे दशमहामूलीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब इसके आगे 'अर्थे दशमहामूलीय' नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे
जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ २ ॥
अर्थे दश महामूलाः समासक्ता महाफलाः ।
महच्चार्थश्च हृदयं पर्यायैरुच्यते बुधैः ॥ ३ ॥
हृदय जिनका मूलस्थान है ऐसी महान् कार्य करने वाली दस धमनियां
हृदय में आश्रित हैं। 'महत्' और 'अर्थ' ये हृदय के ही नामान्तर हैं ॥ ३ ॥
षडङ्गमङ्गं विज्ञानमिन्द्रियाण्यथपञ्चकम् ।
आत्मा च सगुणश्चेतश्चिन्त्यं च हृदि संश्रितम् ॥ ४ ॥
प्रतिष्ठार्थं हि भावानामेषां हृदयमिष्यते ।
गोपानसीनामागारकर्णिकेवार्थचिन्तकैः ॥ ५ ॥
तस्योपघातान्मूर्च्छायं भेदान्मरणमृच्छति ।
यद्धि तत्स्पर्शविज्ञानं धारि तत्तत्र संश्रितम् ॥ ६ ॥
तत्परस्यौजसः स्थानं तत्र चैतन्यसंग्रहः ।
हृदयं महदर्थश्चत स्मादुक्तं चिकित्सकैः ॥ ७ ॥
छः अंगोंवाला शरीर ( दो हाथ, दो पांव, शिर और ग्रीवा एवं
कटि का मध्य भाग ), विज्ञान ( निश्चयात्मक बुद्धि ), पांच ज्ञानेन्द्रियां
तथा इन इन्द्रियों के शब्द, स्पर्श आदि विषय, आत्मा, गुणयुक्त मन, चिन्त्य
( मन के विषय ) ये सब हृदय में आश्रित हैं। यहां पर यह संशय हो सकता है
कि हृदय तो दो अंगुल मात्र है, इसमें छ अंगों वाला शरीर किस प्रकार समा
सकता है। इन्द्रियां अपने आश्रितों में स्थित हैं, विषय बाह्य द्रव्यों में आश्रित
हैं। आत्मा व्यापक होने से अनाश्रित है, गुणयुक्त मन भी अनाश्रित है, ध्येय
आदि हृदय में नहीं रहते। इस सन्देह का उत्तर देते हैं कि हृदय में ये भाव
( पदार्थ ) कार्य-कारण सम्बन्ध से अविरोध रूप में रहते हैं। इनमें आधार-
आधेय-सम्बन्ध नहीं, परन्तु आश्रय-आश्रयि, अथवा अन्वय-व्यतिरेक सम्बन्ध है।
आगारकर्णिका अर्थात् घर को ढांपने के बीचमें एक बड़ी बल्ली होती है और
उसके दोनों ओर दूसरी शहतीरियां पड़ी रहती हैं, उसी प्रकार हृदय के चारों
ओर ये वस्तुयें पड़ी हैं। इस हृदय को उपघात ( चोट ) लगाने से मूर्च्छा हो
३९२ चरकसंहिता [ अ० ३०
जाती है और हृदय के विदीर्ण होने से मनुष्य मर जाता है । हृदय के नाश
होने से हृदय में आश्रित संसारी आत्मा भी नष्ट हो जाता है । स्पर्श को जो
जानता है या जिसके कारण स्पर्श ज्ञान होता है वही 'धारी' शरीर इन्द्रिय,
सत्त्व और आत्मा के संयोग ( शरीरेन्द्रियसत्त्वात्मसंयोगो धारि जीवितम् ) ये
सब हृदय में आश्रित हैं। यह हृदय परम ( श्रेष्ठ ) ओज का स्थान है,
चैतन्य विषयों में फैले हुए मन का इसी हृदय में संग्रह होता है। विषयों में
गये हुए इसी मनको हृदय में रोकने से योगी बनते हैं और योग मोक्ष का
साधन (योगो मोक्षप्रवर्तकः) है। इसलिये हृदय को महत् और इन शब्दों से
चिकित्सक कहते हैं ॥ ४-७ ॥
तेन मूलेन महता महामूला मता दश ।
ओजोवहाः शरीरेऽस्मिन् विध्यम्यन्ते समन्ततः ॥ ८ ॥
येनौजसा वर्तयन्ति प्रीणिताः सर्वजन्तवः ।
यहते सर्वभूतानां जीवितं नावतिष्ठते ॥ ९ ॥
यत्सारमादौ गर्भस्य यत्तद्गर्भरसादसः ।
संवर्तमानं हृदयं समाविशति यत्पुरा ॥ १० ॥
यस्य नाशात्तु नाशोऽस्ति धारि यद्धृदयाश्रितम् ।
यः शरीररसस्नेहः प्राणा यत्र प्रतिष्ठिताः ॥ ११ ॥
तत्फला बहुधा वा ताः फलन्तीव महाफलाः ।
धमानाद्धमन्यः स्रवणात् स्रोतांसि सरणात्सिराः ॥ १२ ॥
इस हृदय से महामूल वाली ( जिनका प्रभावस्थान बड़ा है, ऐसी ) दस
ओजवाहिनी धमनियां निकल कर इस सम्पूर्ण शरीर में फैलती हैं । जिस ओज
के पुष्ट होने पर सब प्राणी जीते हैं, जिस ओज के बिना प्राणियों का जीवन
नहीं रह सकता, जो ओज शुक्र रक्त संयोग से बने गर्भ में सारभूत है, और जो
शुक्र रक्त के संयोग से बने कलल रूप में रसरूप सार है, जो ओज हृदय के
बनने पर स्पष्ट होकर हृदय में रहता है, जिस ओज के नष्ट होने पर ( धातुओं
का क्षय न होने पर भी ) मृत्यु निश्चित है, जो कि प्राणों को धारण करने में
मुख्य है, जिस ओज में प्राण आश्रित हैं उस ओज को लेजाने वाली, ओजोवहा,
महाफला दस धमनियां हृदय का आश्रय लेकर अनेक प्रकार से फलती हैं । वे
हृदय में दस होती हुई भी शरीर में प्रतान भेदों से असंख्य बनजाती हैं ।
पूरण अर्थात् बाह्य रस द्वारा भरने से ( स्पन्दन होने से ), धमनियाँ, स्रवण
अर्थात् रस, पोष्य वस्तु का स्रवण होने से स्रोतस् और दूसरे देश या स्थान में
जाने से 'सिरा' कहलाती हैं ॥ ८-१२ ॥
अ० ३० ] सूत्रस्थानम् ३६३
अ० ३० ] सूत्रस्थानम् ३६३
तन्महत्ता महामूलास्तज्जौजः परिरक्षता ।
परिहार्या विशेषेण मनसो दुःखहेतवः ॥ १३ ॥
हृद्यं यत्स्याद्यदौजस्यं स्रोतसां यत्प्रसादनम् ।
तत्तत्सेव्यं प्रयत्नेन प्रशमो ज्ञानमेव च ॥ १४ ॥
हृदय स्थित मन की रक्षा में कारण छः अंगों वाले शरीर, बुद्धि आदि का
हृदय स्थान है। ओजोवहा धमनियाँ भी इसी हृदय से निकलती हैं, यही
हृदय इनका मूल है। इसलिये ओज की रक्षा करने के लिये मानसिक दुःखों के
कारणों से विशेष रूप में बचना चाहिये। जो वस्तु हृदय और ओज के लिये
हितकारी हो, एवं मनोवहा आदि स्रोतों को निर्मल करनेवाली हो और शान्ति
तथा तत्त्वज्ञान को देने वाली हो, उसे प्रयत्नपूर्वक सेवन करना चाहिये ।१३-१४।
अथ खल्वेकं प्राणवर्धनानामुत्कृष्टतममेकं बलवर्धनानामेकं बृंहणा-
नामेकं नन्दनानामेकं हर्षणानामेकमयनानामिति । तत्राहिंसा प्राणिनां
प्राणवर्धनानामुत्कृष्टतमं, वीर्यं बलवर्धनानां विद्या बृंहणानां, इन्द्रिय-
जयो नन्दनानां, तत्त्वावबोधो हर्षणानां, ब्रह्मचर्यमयनानामित्यायुर्वेद-
विदो मन्यन्ते ॥ १५ ॥
सेवन करने योग्य वस्तुएं कहते हैं—प्राणों को बढ़ाने के लिये सबसे
उत्कृष्ट वस्तु एक ही है (दूसरा नहीं), बल को बढ़ाने में एक; वृष्य
वस्तुओं में उत्कृष्टतम एक, श्रेय समृद्धिकारक हर्षोत्पादक में एक; मोक्षदायक
में सबसे श्रेष्ठ वस्तु एक ही है। जैसे प्राणियों के प्राणों को बढ़ाने के लिये
अहिंसा सबसे उत्कृष्ट है, बल वर्धकों में वीर्य, बृंहण वस्तुओं में विद्या, श्रेयस्कर
वस्तुओं में इन्द्रियों का संयम, हर्षोत्पादक वस्तुओं में तत्त्वज्ञान और मोक्ष-
दायक वस्तुओं में ब्रह्मचर्य ही सबसे श्रेष्ठ है, ऐसा आयुर्वेद विद्वान्
मानते हैं ॥ १५ ॥
तत्राऽऽयुर्वेदविदस्तन्त्रस्थानाध्यायप्रश्नानां पृथक्त्वेन वाक्यशो
वाक्यार्थशोऽर्थावयवशश्च प्रवक्तारो मन्तव्याः ॥ १६ ॥
अत्राऽऽह-कथं तन्त्रादीनि वाक्यशो वाक्यार्थशोऽर्थावयवशश्चेत्यु-
क्तानि भवन्तीति। अत्रोच्यते—तन्त्रमार्षं कार्त्स्न्येन यथाऽऽम्नायमुच्य-
मानं वाक्यशो भवत्युक्तम्। बुद्ध्या सम्यगनुप्रविश्यार्थतत्त्वं वाग्भि-
र्व्यास-समास-प्रतिज्ञा-हेतूदाहरणोपनय-निगमन-युक्ताभिस्त्रिविध-शिष्य-
बुद्धिगम्याभिरुच्यमानं वाक्यार्थशो भवत्युक्तम् । तन्त्रनियतानामर्थ-
दुर्गाणां पुनर्विभावनेनोक्तमर्थावयवश्रो भवत्युक्तम् ॥ १७ ॥
३६४ चरकसंहिता [ अ० ३०
जो पुरुष आयुर्वेद के ग्रन्थ, उनके स्थान, प्रसंग, अध्याय, प्रश्न उनके
अवान्तर विषय, वाक्यार्थों और अर्थावयवों का निरूपण कर सकते हों, उनको
आयुर्वेद का ज्ञाता मानना चाहिये। आयुर्वेद के ग्रन्थ में वाक्य, अर्थ और
अर्थावयव किस प्रकार से कहे जाते हैं ? यह कहते हैं, ऋषिकृत तन्त्र को
'अथ' से 'इति' पर्यन्त समस्त ग्रन्थ को पाठक्रम से पढ़ना वाक्यार्थ होता है।
अर्थतत्त्व को बुद्धि से भली प्रकार समझ कर वाणी द्वारा व्यास अर्थात् विभाग,
समास, प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण ( दृष्टान्त ), उपनय¹निगमन²तीनों प्रकार
( उत्तम मध्यम और अवमकोटि ) के शिष्य जिस युक्ति से समझ सकें इस
प्रकार से कहना वाक्यार्थशः निरूपण कहाता है। तन्त्र में आये हुए कठिन
अर्थों को पुनः पुनः व्याख्यानों द्वारा स्पष्ट करना यह 'अर्थावयवशः निरूपण'
होता है ॥ १६-१७ ॥
तत्र चेत्प्रष्टारः स्युः-चतुर्णामृक्सामयजुरथर्ववेदानां कं वेदमुप-
दिशन्त्यायुर्वेदविदः, किमायुः, कस्मादायुर्वेदः, किं चायमायुर्वेदः
शाश्वतोऽशाश्वतश्च । कति कानि चास्याङ्गानि, कैश्चायमध्येतव्यः,
किमर्थं चेति ॥ १८ ॥
तत्र भिषजा पृष्टेनैवं चतुर्णामृक्सामयजुरथर्ववेदानामात्मनोऽथ-
र्ववेदे भक्तिरादेश्या। वेदो ह्याथर्वणः स्वस्त्ययन-बलि-मङ्गल-होम-नियम-
प्रायश्चित्तोपवास-मन्त्रादि-परिग्रहाच्चिकित्सां प्राह, चिकित्सा चाऽऽयुषो
हितायोपदिश्यते ॥ १९ ॥
वेदं चोपदिश्याऽऽयुर्वाच्यं; तत्राऽऽयुश्चेतनानुवृत्तिर्जीवितमनुबन्धो
धारि चेत्येकोऽर्थः ॥ २० ॥
तत्राऽऽयुर्वेदयतीत्यायुर्वेदः । कथमिति चेदुच्यते-स्वलक्षणतः
सुखासुखतो हिताहिततः प्रमाणाप्रमाणतश्च । यतश्चाऽऽयुष्याण्याना-
युष्याणि च द्रव्यगुणकर्माणि वेदयत्यतोऽप्यायुर्वेदः ॥ २१ ॥
तत्राऽऽयुष्याण्यनायुष्याणि च द्रव्यगुणकर्माणि केवलेनोपदेक्ष्यन्ते
तन्त्रेण ॥ २२ ॥
यदि कोई पूछे कि ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद इन चारों
वेदों में से किस वेद को आयुर्वेद कहते हैं। आयुर्वेद का कौन से वेद के साथ
सम्बन्ध है ? आयु क्या है ? आयुर्वेद किस लिये है ? यह आयुर्वेद शाश्वत
१. सिद्धान्तापादितस्य साधनधर्मस्य साध्ये पुनः कथनमुपनयः ।
२. हेतुसाधितसाध्यधर्मकथनं निगमनम् ॥
अ० ३० ] सूत्रस्थानम् ३६५
अ० ३० ] सूत्रस्थानम् ३६५
( नित्य ) है या अशाश्वत ( अनित्य ) ? इस आयुर्वेद के कितने और कौन २
से अंग हैं ? आयुर्वेद किन को पढ़ना चाहिये ? और इस आयुर्वेद का प्रयो-
जन क्या है ? वैद्य से इस प्रकार प्रश्न पूछे जाने पर वैद्य को ऋग्, यजुः,
साम और अथर्व इन चारों वेदों में से अथर्व वेद में ही अपनी भक्ति ( श्रद्धा )
बतलानी चाहिये । क्योंकि अथर्ववेद ने स्वस्ति-अयन, बलि, मंगल, होम, नियम,
प्रायश्चित्त, वा उपवासादि द्वारा रोग की चिकित्सा कही है । चिकित्सा आयु की
मंगल कामना से कही जाती है, आयुर्वेद यह अथर्ववेद का एक भाग है ।
वेद सम्बन्धी विवेचन करने के पीछे ही आयुसम्बन्धी विवेचन किया जाता है ।
चैतन्यपरम्परा, जीवित, अनुबन्धन, धारि ये आयु-शब्द के समानार्थवाची हैं ।
आयुर्वेद किस लिये कहते हैं इसका उत्तर अपने लक्षण से, सुख-दुःख हित-
कारी अहितकारी, प्रमाण अप्रमाण एवं आयुवर्धक और आयुक्षयकारक द्रव्यों के
गुण कर्म सम्पूर्ण रूपमें कहे जाते हैं, इसलिये, इस शास्त्र को आयुर्वेद
कहते हैं ॥ १८-२२ ॥
तत्राऽऽयुरुक्तं स्वलक्षणतो यथावदिहैव । तत्र शरीरमानसाभ्यां
रोगाभ्यामनभिद्रुतस्यानभिभूतस्य च विशेषेण यौवनवतः समर्थानु-
गत-बल-वीर्य-यशः-पौरुष-पराक्रमस्य ज्ञान-विज्ञानेन्द्रियेन्द्रियार्थ-बल-
समुदाये वर्तमानस्य परमर्द्धि-रुचिर-विविधोपभोगस्य समृद्धसर्व्वारम्भस्य
यथेष्टविचारिणः सुखमायुरुच्यते, असुखमतो विपर्ययेण । हितैषिणः
पुनर्भूतानां परस्वादुपरस्य सत्यवादिनः शमपरस्य परीक्ष्यकारिणोऽ-
प्रमत्तस्य त्रिवर्गं परस्परेणानुपहतमुपसेवमानस्य पूजार्हसंपूजकस्य
ज्ञान-विज्ञानोपशम-शीलस्य वृद्धोपसेविनः सुनियत-राग रोषेर्ष्या-मद-
मान-वेगस्य सततं विविधप्रदानपरस्य तपो-ज्ञान-प्रशम-नित्यस्याध्यात्म-
विदस्तत्परस्य लोकमिमं चामुं चापेक्षमाणस्य स्मृतिमतो हितमायुरु-
च्यते । अहितमतो विपर्ययेण ॥ २३ ॥
आयु का लक्षण ( चेतनानुवृत्ति चेतनपरम्परा ० ) इस स्थान पर कह दिया
है । जिस मनुष्य को शारीरिक या मानसिक किसी प्रकार का रोग नहीं, शरीर
में तारुण्य भरा है, शरीर में शक्ति, बल, वीर्य और पौरुष, पराक्रम है, ज्ञान,
बुद्धि, इन्द्रिय और विषय बलवान् हैं, सम्पत्ति, प्रिय और नाना प्रकार के भोग्य
पदार्थ अनुकूल हों, सब कार्यों में जिसको सफलता मिलती हो, स्वेच्छापूर्वक
आहार-विहार करने योग्य जो मनुष्य हो, उसकी आयु सुखमय समझनी चाहिये ।
इसके विरुद्ध दुःखमय समझना । जो मनुष्य सब प्राणियों का कल्याण चाहता
१६६ चरकसंहिता [ अ० ३०
हो, जो दूसरे के धन की इच्छा नहीं करता, सत्यवादी, शान्तमन (संतोषी),
विचार कर कार्य करने वाला, उद्यमी, दूसरे को कष्ट न पहुंचावे, इस प्रकार
से जो धर्म, अर्थ, काम का सेवन करता है, पूजा के योग्य पुरुषों का जो पूजन
करता है, ज्ञान, विज्ञान, उपशम शील-स्वभाव का, वृद्ध पुरुषों का सत्संग
(सेवा) करने वाला, राग, क्रोध, ईर्ष्या, मद, मान के बेगों को दमन करने
वाला, निरन्तर नाना प्रकार के दान देने वाला, तप, ज्ञान में रत एवं सदा
शान्त चित्त रहने वाला, आत्मा के चिन्तन में दत्तचित्त, इह लोक परलोक
दोनों का ध्यान रखने वाला, उत्तम स्मरण शक्ति वाला जो पुरुष होता है,
उसकी आयु हितकारी होती है, इससे विपरीत अहित है ॥ २३ ॥
प्रमाणमायुषस्त्वर्थे न्द्रिय-मनो-बुद्धि-चेष्टादीनां विकृतिलक्षणैरुपलभ्य-
तेऽनिमित्तैः, इदमस्मात्क्षणान्मुहूर्ताद्दिवसात् त्रिपञ्चसप्तदशद्वादशाहात्प-
क्षान्मासात्षण्मासात्संवत्सराद्वा स्वभावमापत्स्यत इति । तत्र स्वभावः,
प्रवृत्तेरुपरमो, मरणमनित्यता, निरोध इत्येकोऽर्थः- इत्यायुषः प्रमाण-
मतो विपरीतमप्रमाणम् । अरिष्टाधिकारे देहप्रकृतिलक्षणमधिकृत्य
चोपदिष्टमायुषः प्रमाणमायुर्वेदे ॥ २४ ॥
प्रयोजनं चास्य- स्वस्थस्य स्वास्थ्यरक्षणमातुरस्य विकारप्र-
शमनं च ॥ २५ ॥
आयु का प्रमाण, इन्द्रियों के विषय (शब्द स्पर्शादि) मन, बुद्धि, चेष्टा
आदि के विकृत लक्षणों से जाना जाता है । लक्षण को देखकर यह कहा जा
सकता है कि अमुक मनुष्य एक मुहूर्त में, एक क्षण में, एक दिन में, तीन
दिन में, पांच दिन में, सात दिन में, बारह, पन्द्रह दिनों में महीने, छः मास में,
या साल भर में स्वभाव अर्थात् मृत्यु को प्राप्त हो जायेगा। स्वभाव, प्रवृत्ति,
उपरम, मरण, अनित्यता, निरोध ये शब्द एकार्थवाची पर्याय हैं। यह आयु
का प्रमाण है, इसके विपरीत अप्रमाण । अरिष्टाधिकार (इन्द्रियस्थान) में
देह, प्रकृति, लक्षणों के अधिकार से आयु का प्रमाण कहेंगे ॥ २४-२५ ॥
सोऽयमायुर्वेदः शाश्वतो निर्दिश्यते, अनादित्वात्स्वभावसंसिद्ध-
लक्षणत्वाद्भावस्वभावनित्यत्वाच्च । न हि नामूतकदाचिदायुषः सन्तानो
बुद्धिसन्तानो वा शाश्वतश्चाऽऽयुषो वेदिता, अनादि च सुखदुःखं
सद्रव्य-हेतु-लक्षणमपरापरयोगात्; एष चार्थसंग्रहो विभाव्यते आयु
र्वेदलक्षणमिति । गुरु-लघु-शीतोष्ण-स्निग्ध-रूक्षादीनां च द्वन्द्वानां
सामान्यविशेषाभ्यां वृद्धिह्रासौ; यथोक्तम् । गुरुभिरभ्यस्यमानैर्गुरुणा-
मुपचयो भवत्यपचयो लघूनामेवमेवेतरेषामित्येष भावस्वभावो नित्यः,
अ० ३० ] सूत्रस्थानम् ३६७
अ० ३० ] सूत्रस्थानम् ३६७
स्वलक्षणं च द्रव्याणां पृथिव्यादीनां । सन्ति तु सर्वदा गुणाश्च नित्या-
नित्याः। न ह्यायुर्वेदस्याभूत्वोत्पत्तिरुपलभ्यते, अन्यत्रावबोधोपदे-
शाभ्याम् । एतद्द्वयमधिकृत्योत्पत्तिमुपदिशन्त्येके। स्वाभाविकं चास्य
लक्षणमकृतकं, यदुक्तमिह चाऽऽष्टेऽध्याये-यथाऽग्नेरौष्ण्यमपां द्रवत्वम्।
भावस्वभावनित्यत्वमपि चास्य यथोक्तं गुरुभिरभ्यस्यमानैर्गुरूणा-
मुपचयो भवत्यपचयो लघूनामित्येवमादि ॥ २६ ॥
यह आयुर्वेद नित्य है, ऐसा माना जाता है। उसके तीन हेतु हैं, १.
अनादि होने से, २. स्वभाव सिद्ध होने से, ३. पदार्थों के गुण, धर्म नित्य होने
से। इसका विस्तार से वर्णन करते हैं। आयुर्वेद में आयुष्य का प्रतिपादन
किया है और सर्वदा ही आयु की परम्परा सन्तान-न्याय से चली आ रही है
(बिना आयु के कोई नहीं हुआ)। इसी प्रकार बुद्धि की परम्परा भी अनादि
काल से चली आ रही है। (एक मरता है, दूसरा जीवित रहता है इस प्रकार
से आयु की परम्परा चलीआरही है) इसलिये आयुष्यादि प्रतिपाद्य विषय अनादि
है। इसको प्रतिपादन करने वाला आयुर्वेद भी अनादि है। आयुर्वेद उपकरण
और आयुष्य उपकार्य है। विना उपकरण के कार्य नहीं रह सकता। इसी
प्रकार बुद्धि के भी अनादि होने से आयुर्वेद का ज्ञान भी अनादि है और
इस ज्ञान को जानने वाले भी अनादि हैं। दूसरा आरोग्यता या रोग को उत्पन्न
करने वाले, अथवा रोग के लक्षण, कारण, चिकित्सा आयुर्वेद में प्रतिपादन
किये हैं और वे अनादि है। क्योंकि सुख-दुःख अनादि काल से चला आ रहा
है, इसलिये इनको प्राप्त तथा नाश करने के भी उपाय अनादि होने चाहिये।
तीसरी गुरु, हलका, ठण्ठा, गरम, स्निग्ध, रूक्ष पदार्थों के ये गुण धर्म भी
नित्य हैं, इसलिये इन गुण धर्मों को बताने वाला आयुर्वेद भी नित्य है। पृथि-
व्यादि पंच महाभूतों के गुण धर्म नित्य हैं, परन्तु इनसे बने पदार्थ अनित्य हैं।
इसी प्रकार मिट्टी नित्य और मिट्टी से बना घड़ा अनित्य है। इस प्रकार से
मनुष्य-शरीर को बनाने वाले परिणाम नित्य हैं। और इस परिणाम रूप निर्माण
क्रिया को बतलाने वाला आयुर्वेद भी नित्य है। आयुर्वेद का एक समय
अस्तित्व नहीं था, उत्पन्न हुआ है ऐसा कहीं पर सुनने में नहीं आता। जहां
पर भी आयुर्वेद का प्रादुर्भाव लिखा है, वहां पर इसका अबोध या उपदेश
रूप से प्रतिपादन किया है कि इन्द्र के उपदेश से भरद्वाज मुनि मृत्यु लोक में
आयुर्वेद को लाये, यह उपदेश और ब्रह्मा के अन्दर जो ज्ञान का उदय हुआ
वही इसकी उत्पत्ति है। आयुर्वेद स्वाभाविक एवं अकृतक है। जैसा कि
पहले अध्याय में कहा है (हिताहितं सुखदुःखं०) । अग्नि में उष्णिमा
और पानी में तरलता स्वाभाविक है, बनाई हुई नहीं है इसी प्रकार आयुर्वेद
भी स्वाभाविक है । भाव, अर्थात् स्वभाव के अकृत अर्थात् स्वाभाविक होने
से भी आयुर्वेद नित्य है । यथा-गुरु पदार्थों के उपसेवन से गुरुता बढ़ती है ।
और लघु पदार्थों के उपसेवन से शरीर में लघुता बढ़ती है । इसलिये आयुर्वेद
भी नित्य है ॥ २६ ॥
तस्याऽऽयुर्वेदस्याङ्गान्यष्टौ । तद्यथा-कायचिकित्सा, शालाक्यं
शल्यापहर्तृकं, विष-गर-वैरोधिक-प्रशमनं, भूतविद्या, कौमारभृत्यकं,
रसायनानि, वाजीकरणमिति ॥ २७ ॥
इस आयुर्वेद के आठ अंग हैं । (१) काय चिकित्सा, (२) शालाक्य,
(३) शल्यापहर्तृक, (४) विष-गर-वैरोधिक-प्रशमन, (५) भूतविद्या, (६)
कौमार-भृत्यक, (७) रसायन और (८) वीजीकरण ये आठ अंग हैं ॥२७॥
स चाध्येतव्यो ब्राह्मण-राजन्य-वैश्यैः । तत्रानुग्रहार्थं प्राणिनां ब्राह्म-
णैरात्मरक्षार्थं राजन्यैर्वृत्त्यर्थं वैश्यैः, सामान्यतो वा धर्मार्थकामपरिग्र-
हार्धं सर्वैः । तत्र च यदध्यात्मविदां धर्मपथस्थापकानां धर्मप्रकाशकानां
वा मातृ-पितृ-बन्धु-गुरु-जनस्य वा विकारप्रशमने प्रयत्नवान् भवति
यच्चाऽऽयुर्वेदोक्तमध्यात्ममनुध्यायति वेदयत्यनुविधीयते वा सोऽप्यस्य
परो धर्मः । या पुनरीश्वराणां वसुमतां वा सकाशात्सुखोपहारनिमित्ता
भवत्यर्थावाप्तिरात्मरक्षणं च याच स्वपरिगृहीतानां प्राणिनामातुर्यादारक्षा-
सोऽस्यार्थः । यत्पुनरस्य विद्वद्बहुग्रहणयशःशरण्यत्वं च, या च
संमानशुश्रूषा, यच्चेष्टानां विषयाणामारोग्यमाधत्ते, सोऽस्य काम इति
यथाप्रशनमुक्तमशेषेण ॥ २८ ॥
यह आयुर्वेद ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य इन तीनों वर्णों को पढ़ना
चाहिये । ब्राह्मणों को प्राणियों का भला करने के लिये, क्षत्रियों को अपनी रक्षा
के लिये, वैश्यों को वृत्ति अर्थात्, जीविकोपार्जन के लिये पढ़ना चाहिये । अथवा
धर्म, अर्थ, काम रूपी पुरुषार्थों के उद्देश्य से ही सब को पढ़ना चाहिये । इनमें
जो तत्त्वज्ञान को जानने वाले, धर्मसंस्थापक, धर्मोपदेशक, माता, पिता, भाई
बन्धु, पुरजनों के रोगों को दूर करने में प्रयत्नशील होता है और जो पढ़े हुये
आयुर्वेद को दूसरों को पढ़ाता है, बतलाता है, वैसा करता है, वह इस का सर्वोत्तम
धर्म है । राजाओं या रईसों, सेठों से आरोग्यता प्रदान करने पर जो धन की
प्राप्ति होती है, आत्मरक्षा होती है, इसी प्रकार अपने आश्रयजीवी नौकर चाकर
आदि को रोग मुक्त करता है वह इसका सर्वोत्तम अर्थ है । विद्वान् लोगों द्वारा
प्राप्त यश, कीर्ति, सब लोगों का शरण में आना, अभयप्रदाता होना, आदर
सत्कार लोगों से प्राप्त होना, प्रिय विषयों में आरोग्यता का प्राप्त होना यह इसका
सर्वोत्तम काम है । इस प्रकार से सब प्रश्नों का पूरा २ उत्तर देदिया ॥२८॥
अथ भिषगादित एव भिषजा प्रष्टव्योऽष्टविधं भवति । तद्यथा-तन्त्रं
तन्त्रार्थं स्थानानि स्थानार्थानध्यायानध्यायर्थान् प्रश्नार्थं श्चेति । पृष्टेन
चैतद्वक्तव्यमशेषेण वाक्यशो वाक्यार्थशोऽर्थावयवशश्चेति ॥ २९ ॥
वैद्य परीक्षा के लिये वैद्य से आठ प्रश्न पूछे । यथा तन्त्र, तन्त्रार्थ, स्थान
स्थानों के अर्थ, अध्याय और अध्याय के अर्थ, प्रश्न और प्रश्नार्थ । पूछे जाने
पर वैद्य को सम्पूर्ण रूप से वाक्य, वाक्यार्थ, अर्थावयव रूप से पूर्णतया
कहना चाहिये ॥ २९ ॥
तत्राऽऽयुर्वेदः शाखा विद्या सूत्रं ज्ञानं शास्त्रं लक्षणं तन्त्रमित्य-
नर्थान्तरम् ॥ ३० ॥
तन्त्रार्थः पुनः स्वलक्षणैरुपदिष्टः, स चार्थः प्रकरणैर्विभाव्यमानो
भूय एव शरीर-वृत्ति-हेतु-व्याधि-कर्म-कार्य-काल-कर्तृ-करण-विधि-विनि-
श्चयाइशप्रकरणः, तानि च प्रकरणानि केवलेनोपदेक्ष्यन्ते तन्त्रेण ॥३१॥
इसमें आयुर्वेद, शाखा, सूत्र, ज्ञान, शास्त्र, लक्षण व तन्त्र ये सब एकार्थ-
वाची शब्द हैं । तन्त्र का अर्थ "आयुर्वेदयतीत्यायुर्वेदः” आयु-जिससे जानी जाती
है वह आयुर्वेद-इस प्रकार अपने लक्षणों से कह दिया । हित अहित आयुरूप
लक्षण है और यह अर्थ प्रकरण भेद से बहुत प्रकार का है । यथा शरीर (पञ्च
महाभूतों का समुदायरूप होने से अवयवादि भेद से बहुत प्रकार का है ),
हेतु ( असात्म्येन्द्रियार्थसंयोग , प्रज्ञापराध, परिणाम ), व्याधि ( धातुवैषम्य ),
कर्म ( चिकित्सा ), कार्य ( आरोग्यता ), काल (ऋतु आदि), कर्त्ता ( भिषक् ),
करण ( भेषज ), विधि ( उपकल्पना विधान जिसे काल, द्रव्य और व्याधि
की अपेक्षा से समझना चाहिये ) । इन प्रकरणों से ग्रन्थ सम्पूर्ण रूप से भली
प्रकार सुगठित होता है । ये प्रकरण तन्त्र में सम्पूर्ण रूप से कहे जावेंगे ३०-३१
तन्त्रस्यास्याष्टौ स्थानानि । तद्यथा-श्लोक-निदान-विमान-शारीरे-
न्द्रिय-चिकित्सित-कल्पसिद्धि-स्थानानि । तत्र त्रिंशदध्यायकं श्लोकस्थानं
अष्टाध्यायकानि निदान-विमान-शारीरस्थानानि, द्वादशकमिन्द्रियाणां,
त्रिंशकं चिकित्सितानां द्वादशके कल्पसिद्धिस्थाने इति ॥ ३२ ॥
इस तन्त्र के आठ स्थान हैं यथा-१. सूत्र ( श्लोक ) स्थान, २. निदान-
स्थान, ३. विमानस्थान, ४. शारीरस्थान, ५. इन्द्रियस्थान, ६. चिकित्सास्थान,
४०० चरकसंहिता [ अ० ३०
७. कल्पस्थान और ८. सिद्धिस्थान। इनमें श्लोकस्थान ३० अध्यायों का,
निदान, विमान और शारीरस्थान, आठ २ अध्यायों के इन्द्रियस्थान बारह का
चिकित्सास्थान तीस का, कल्प और सिद्धिस्थान बारह२ अध्यायों के हैं ॥३२॥
भवन्ति चात्र—
द्वे त्रिंशके द्वादशकत्रयं च त्रीण्यष्टकान्येषु समाप्तिरुक्ता ।
श्लोकौषधारिष्ट-विकल्प-सिद्धि-निदान-मानाश्रय-संज्ञकेषु ॥३३॥
स्वे स्वे स्थाने यथास्वे च स्थानार्थ उपदेक्ष्यते ।
सविंशमध्यायशतं शृणु नामक्रमागतम् ॥ ३४ ॥
दीर्घञ्जीवोऽप्यपामार्गतण्डुलारग्वधादिकौ ।
षड्विरेकाश्रयश्चेति चतुष्को भेषजाश्रयः ॥ ३५ ॥
मात्रातस्याशितीयौ च न वेगान्धारणे तथा ।
इन्द्रियोपक्रमश्चेति चत्वारः स्वास्थ्यवृत्तिकाः ॥ ३६ ॥
खुड्डाकश्च चतुष्पादो महास्तिस्रैषणस्तथा ।
सह वातकलाक्येन विद्यान्निर्देशिकान् बुधः ॥ ३७ ॥
स्नेहनस्वेदमाध्यायौ युभौ यश्चापकल्पनः ।
चिकित्साप्राभृतश्चैव सर्व्वा एवापकल्पनाः ॥ ३८ ॥
कियन्तः शिरसीयंश्च त्रिशोफाष्टोदरादिकौ ।
रोगाध्याया महांश्चैव रोगाध्यायचतुष्टयम् ॥ ३६ ॥
अष्टौनिन्दितसंख्यातस्तथा लंबनतर्पणौ ।
विधिशोणितकश्चेति व्याख्यातास्तत्र योजनाः ॥ ४० ॥
यज्जःपुरुषसंख्यातो भद्रकाप्यान्नपानिकौ ।
विविधाशितपीतीयश्चत्वारोऽन्नविनिश्चये ॥ ४१ ॥
दशप्राणायतनिकस्तथाऽथैर्दशमूलिकः ।
द्वावेतौ प्राणदेहार्थौ प्रोक्तौ वैद्यगुणाश्रयौ ॥ ४२ ॥
औषधस्वस्थनिर्देशकल्पनारोगयोजनाः
चतुष्काः षट् क्रमेणोक्ताः सप्तमश्चान्नपानिकः ॥ ४३ ॥
द्वौ चान्त्यौ संग्रहस्यायाविति त्रिंशत्कमर्थवत् ।
श्लोकस्थानं समुद्दिष्टं तन्त्रस्यास्य शिरः शुभम् ॥ ४४ ॥
चतुष्काणां महार्थानां स्थानेऽस्मिन् संग्रहः कृतः ।
श्लोकार्थः संग्रहार्थश्च श्लोकस्थानमतः स्मृतम् ॥ ४५ ॥
इस ग्रन्थ में तीस तीस अध्याय के सूत्र और चिकित्सास्थान हैं। बारह २
अ० ३० ] २६ सूत्रस्थानम् ४०१
अ० ३० ] २६ सूत्रस्थानम् ४०१
अध्याय के तीन अरिष्ट (इन्द्रिय), कल्प और सिद्धि स्थान, आठ-२ अध्याय के
निदान, विमान और शारीर ये तीन स्थान हैं। श्लोक, औषध, अरिष्ट, विकल्प,
सिद्धि, निदान, विमान और आश्रय नामक १२० अध्यायों में ग्रन्थ समाप्त
हुआ है। अपने २ स्थान में यथायोग्य स्थानों का उपदेश तत्त्वार्थ सहित
कहेंगे। इन १२० अध्यायों के क्रम से नाम सुनो—
दीर्घञ्जीवितीय, अपामार्गतण्डुलीय, आरग्वधीय, षड्विरेचनशताश्रितीय, इन
चार अध्यायों में 'औषध-चतुष्क' का निरूपण किया है। मात्राशितीय, तस्या-
शितीय, नवेगानधारणीय और इन्द्रियोपक्रमणीय ये चार स्वास्थ्य-चतुष्क हैं।
खुड्डाकचतुष्पाद, महाचतुष्पाद, तिस्त्रैषणीय और वातकलाकलीय ये चार निर्देश
चतुष्क (कर्त्तव्य अकर्त्तव्य विषयक) हैं। स्नेहन, स्वेदन, उपकल्पनीय और
चिकित्सा प्राभृतीय ये चार कल्पनाचतुष्क हैं। कियन्तःशिरसीय, त्रिशोथीय,
अष्टोदरीय, महारोगाध्याय—ये चार रोगचतुष्क हैं। अष्टौनिन्दितीय लंघन-बृंहणीय
सन्तर्पणीय और विधिशोणितीय ये चार योजनाचतुष्क हैं। यज्जःपुरुषीय, आत्रे-
यभद्रकाप्यीय, अन्नपानीय, विविधाशितपीतीय ये चार अन्नपान-चतुष्क हैं। दश
प्राणायतनीय और अर्थे-दशमहामूलीय इन पिछले दोनों अध्यायों में प्राण,
ओज, धमनी और वैद्यों के गुणों का निरूपण किया है। इस प्रकार से इस
सूत्रस्थान में औषध-चतुष्क, स्वास्थ्य-चतुष्क; निर्देश-चतुष्क, कल्पना-चतुष्क;
रोग-चतुष्क; योजना-चतुष्क, अन्नपान-चतुष्क तथा पहले दो अध्यायों में इन
अठाईस अध्यायों की सूची है। इस प्रकार से सूत्रस्थान के तीस अध्यायों में
इन विषयों का वर्णन किया है। जिस प्रकार मनुष्य के सब अंगों में श्रेष्ठ
मस्तिष्क है उसी प्रकार से सब ग्रन्थों में यह श्रेष्ठ है। इस सूत्र स्थान में उप-
योगी चतुष्कों का संग्रह किया है। श्लोक रूप में संग्रह होने के कारण इसको
'श्लोकस्थान' कहते हैं ॥ ३३-४५ ॥
ज्वराणां रक्तपित्तस्य गुल्मानां मेहकुष्ठयोः ।
शोषोन्मादनिदाने च स्यादपस्मारिणां च यत् ॥ ४६ ॥
इत्यध्यायाष्टकमिदं निदानस्थानमुच्यते ।
ज्वर निदान, रक्तपित्त निदान, गुल्म निदान, प्रमेह निदान, कुष्ठ निदान,
शोष निदान, उन्माद निदान और अपस्मार निदान—ये आठ अध्याय निदान-
स्थान में हैं ॥ ४६ ॥
रसेषु त्रिविधे कुक्षौ ध्वंसे जनपदस्य च ॥ ४७ ॥
त्रिविधे रोगविज्ञाने स्रोतःस्वपि च वर्तने ।
गिजतीय—ये आठ अध्याय हैं ॥ ४७-४८ ॥
४०२ चरकसंहिता [ अ० ३०
रोगानीके व्याधिरूपे रोगाणां च भिषग्जिते ॥ ४८ ॥
अष्टौ विमानान्युक्तानि मानार्थानि महर्षिणा ।
विमान स्थान में रस विमान, त्रिविधकुक्षीय, जनपदोद्ध्वंसनीय, त्रिवि-
धरोग-विशेषविज्ञानीय, स्रोतोविमान, रोगानीक, व्याधिरूपीय और रोगभिष-
गिजतीय—ये आठ अध्याय हैं ॥ ४७-४८ ॥
कतिधापुरुषीयं च गोत्रेणातुल्यमेव च ॥ ४९ ॥
खुड्डीका महती चैव गर्भावक्रान्तिरुच्यते ।
पुरुषस्य शरीरस्य विचयौ द्वौ विनिश्चितौ ॥ ५० ॥
शरीरसंख्या सूत्रं च जातेरष्टमसमुच्यते ।
इत्युद्दिष्टानि मुनिना शारीराण्यत्रिसूनुना ॥ ५१ ॥
शारीर स्थान में कतिधापुरुषीय, अतुल्यगोत्रीय, खुड्डीकागर्भावक्रान्ति, पुरुष-
विचय, शारीरविचय, शरीरसंख्या और जातिसूत्रीय ये आठ अध्याय हैं ॥ ४९-५१॥
वर्णस्वरीयः पुष्पाह्वयस्तृतीयः परिमर्षणः ।
तथैव चेन्द्रियानीकः पूर्वरूपिक एव च ॥ ५२ ॥
कतमानिशरीरीयः पन्नरूपोऽप्यवाक्शिराः ।
यस्य श्यावनििमत्तश्च सद्योमरण एव च ॥ ५३ ॥
अणुज्योतिरिति ख्यातस्तथा गोमयचूर्णवान् ।
द्वादशाध्यायकं स्थानमिन्द्रियाणां प्रकीर्तितम् ॥ ५४ ॥
वर्णस्वरीय, पुष्पितक, परिमर्षणीय, इन्द्रियानीक, पूर्वरूपीय, कतमानि
शरीराणि, पन्नरूपीय, अवाक्शिरसीय, यस्यश्यावनििमत्तीय, सद्योमरणीय, अणु-
ज्योतीय और गोमयचूर्णीय ये बारह अध्याय इन्द्रियस्थान में हैं ॥ ५२-५४ ॥
अभयामलकीयं च प्राणकामीयमेव च ।
करप्रचितिकं वेदसमुत्थानं रसायनम् ॥ ५५ ॥
संयोगशरमूलीयमासक्तक्षीरिकं तथा ।
माषपर्णभृतीयं च पुमाञ्जातबलादिकम् ॥ ५६ ॥
चतुष्कद्वयमप्येतदध्यायद्वयमुच्यते ॥
रसायनमिति ज्ञेयं वाजीकरणमेव च ॥ ५७ ॥
ज्वराणां रक्तपित्तस्य गुल्मानां मेहकुष्ठयोः ।
शोषोन्मादेऽप्यपस्मार-क्षत-शोफोदराशसाम् ॥ ५८ ॥
ग्रहणीपाण्डुरोगाणां श्वासकासातिसारिणाम् ।
छर्दिर्वीसर्पतृष्णानां विषमद्यविकारिणाम् ॥ ५९ ॥
त्रिंशच्चिकित्सितान्युक्त्वाऽन्यतः कल्पाम् परं शृणु ।
द्विव्रणीयं त्रिमर्मीयमूरुस्तम्भिकमेव च ।
वातरोगे वातरक्ते योनिव्यापदि चैव यत् ॥ ६० ॥
त्रिंशच्चिकित्सितान्युक्त्वाऽन्यतः कल्पाम् परं शृणु ।
अभयामलकीय, प्राणकामीय, करप्रचितीय, आयुर्वेदसमुत्थानीय, संयोग-
शरमूलीय, आसिक्तक्षीरीय, माषपर्ण, पुमाञ्जातबलादिक इन भिन्न २ आठ
प्रकरणों के दो अध्याय हैं । इनमें पहिले चार प्रकरणों में रसायनाध्याय और
दूसरे चार में वाजीकरणाध्याय कहा है । इसके पीछे ज्वरचिकित्सा, रक्तपित्त-
चिकित्सा, गुल्म-चिकित्सा, प्रमेह-चिकित्सा कुष्ठ, शोष, उन्माद, अपस्मार,
उरःक्षत, शोफ, उदर, अर्श, ग्रहणी, पाण्डुरोग, श्वास, कास, अतीसार, छर्दि,
वीसर्प, तृष्णा, विषरोग, मद्यरोग, द्विव्रणीय, त्रिमर्मीय, ऊरुस्तम्भ, वातव्याधि, वात-
रक्त इस प्रकार से कुल मिलाकर चिकित्सा स्थान में तीस अध्याय हैं ॥५५-६०॥
फलजीमूतकेक्ष्वाकु-कल्पो धामार्गवस्य च ॥ ६१ ॥
पञ्चमो वत्सकस्योक्तः षष्ठश्च कृतवेधने ।
श्यामात्रिवृतयोः कल्पस्तथैव चतुरङ्गुले ॥ ६२ ॥
तिल्वकस्य सुधायाश्च सप्तलाशङ्खिनीषु च ।
दन्तीद्रवन्त्योः कल्पश्च द्वादशोऽयं समाप्यते ॥ ६३ ॥
मदनफलकल्प जीमूतककल्प, ईक्ष्वाकुकल्प, धामार्गवकल्प, वत्सक-
कल्प, कृतवेधनकल्प, श्यामात्रिवृत्कल्प, महावृक्षकल्प, सप्तलाशंखिनीकल्प, और
दन्ती-द्रवन्तीकल्प ये बारह अध्याय कल्पस्थान में हैं ॥ ६१-६३ ॥
कल्पना पञ्चकर्माख्या बस्तिमूत्रा तथैव च ।
स्नेहव्यापदिकी सिद्धिर्नेत्रव्यापदिकी तथा ॥ ६४ ॥
सिद्धिः शोधनयोश्चैव बस्तिसिद्धिस्तथैव च ।
प्रासृती मर्मसंख्याता सिद्धिर्बस्त्याश्रया च या ॥ ६५ ॥
फलमात्रा तथा सिद्धिः सिद्धिश्चोत्तरसंज्ञिता ।
सिद्धयो द्वादशैवैतास्तन्त्रं चासु समाप्यते ॥ ६६ ॥
सिद्धिस्थान, कल्पसिद्धि, पंचकर्मीय सिद्धि, बस्तिसूत्रीय सिद्धि, स्नेहव्याप-
दिक सिद्धि, नेत्रव्यापदिक सिद्धि, वमनविरेचन-व्यापत्सिद्धि, बस्तिव्यापदिक
सिद्धि, प्रसृतयोगिकसिद्धि, त्रिमर्मीय सिद्धि, बस्ति सिद्धि, फलमात्र सिद्धि, और
उत्तर सिद्धि—ये बारह अध्याय सिद्धि स्थान में हैं। इस प्रकार से यह ग्रन्थ
समाप्त होता है ॥ ६४-६६ ॥
स्वे स्वे स्थाने तथाऽध्याये चाध्यायार्थः प्रवक्ष्यते ।
तं ब्रूयात्सर्वतः सर्वं यथास्वं ह्यर्थसंग्रहात् ॥ ६७ ॥
४०४ चरकसंहिता [ अ० ३०
प्रत्येक अध्याय में वर्णित विषयों का निरूपण संग्रह रूप से प्रत्येक अध्याय
के अन्त में दे दिया है और जो मुख्य विषय आया है, उसको स्थान २ पर
संक्षिप्त रूप से फिर कह दिया है। इसलिये एक अध्याय का वर्णन जो यत्र
तत्र आया है, वह सब वर्णन उसी एक अध्याय का समझना चाहिये ॥ ६७ ॥
पृच्छा तन्त्राद्यथाङ्गानां विधिना प्रश्न उच्यते ।
प्रश्नार्थे युक्तिमांस्तत्र तन्त्रेणैवार्थनिश्चयः ॥ ६८ ॥
निरुक्तं तन्त्रणातन्त्रं स्थानमर्थप्रतिष्ठया ।
अधिकृत्यार्थमध्यायानामसंज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ ६९॥
इति सर्वं यथाप्रश्नमष्टकं संप्रकाशितम् ।
कात्स्न्येन चोक्तस्तन्त्रस्य संग्रहः सुविनिश्चितः ॥ ७० ॥
ग्रन्थ के प्रारम्भ करने में सामान्य विशेष रूप से अथवा पूर्वापरविरोध से
रहित जो विचार करना है उसका नाम 'प्रश्न' और विचार पूर्वक किये हुए
प्रश्न का शास्त्र के आधार से युक्तिपूर्वक जो निर्णय है उसका नाम 'प्रश्नार्थ'
है। जिसमें अनेक विषय एक साथ में एकत्र किये गये हों उसका नाम 'तन्त्र'
है। तन्त्र अर्थात् शास्त्र में मुख्य मुख्य विषयों में से एक एक भाग को जो
पृथक् पृथक् लेकर प्रतिपादन किया है उसका नाम 'अध्याय' है (जैसे-दीर्घे-
जीवितीय, अपामार्गतण्डुलीय इत्यादि प्रत्येक विषय के अनुक्रम में निर्दिष्ट भाग
का नाम अध्याय है)। इस प्रकार तन्त्र, तन्त्रार्थ, स्थान स्थानार्थ आदि जो
आठ प्रश्न किये उनका उत्तर दे दिया है। यह सम्पूर्ण ग्रन्थ का
संक्षेप है ॥ ६८-७० ॥
सन्ति पाङ्गविकोत्पाताः संक्षोभं जनयन्ति ये ।
वर्तकानामिबोत्पाताः सहसैवाविभाविताः ॥ ७१ ॥
तस्मात्तान् पूर्वसंजल्पे सर्वत्राष्टकमादिशेत् ।
परावरपरीक्षार्थं तत्र शास्त्रविदां बलम् ॥ ७२ ॥
शब्दमात्रेण तन्त्रस्य केवलस्यैकदेशिकाः ।
भ्रमन्त्यल्पबलास्तन्त्रे ज्याशब्देनैव वर्तकाः ॥ ७३ ॥
पशुः पशूनां दौर्बल्यात्कश्चिन्मध्ये वृकायते ।
ससत्त्वं वृकमासाद्य प्रकृतिं भजते पशुः ॥ ७४ ॥
तद्वदज्ञोऽज्ञमध्यस्थः कश्चिन्मौखर्यसाधनः ।
स्थापयत्याप्तमात्मानमाप्तं त्वासाद्य भिद्यते ॥ ७५ ॥
वस्त्रमूर्ढ इवोर्णाभिरबुद्धिरबहुश्रुतः ।
किं व वक्ष्यति संजल्पे कुण्डभेदी जडो यथा ॥ ७६ ॥
अ० ३० ] सूत्रस्थानम् ४०५
अ० ३० ] सूत्रस्थानम् ४०५
कुछ ऐसे भी मनुष्य हैं जो शास्त्र के थोड़े से भाग को पढ़कर विद्वानोंमें उत्पात
करते हैं। सहसा उड़कर जिस प्रकार बटेर पक्षी उत्पात करने लगते हैं, उसी प्रकार
ये अर्धपठित वैद्य भी उत्पात किया करते हैं। इसलिये प्रथम जल्प (वाद-विवाद में)
तन्त्र, तन्त्रार्थ आदि आठ प्रश्नों को पूछना चाहिये। अपने से श्रेष्ठ या हीन
की परीक्षा करने के लिये यही आठ प्रश्न असली शास्त्र को जानने वालों के बल
हैं। थोड़े बल वाले, जिन्होंने शास्त्र का कुछ थोड़ा सा भाग ही देखा होता
है वे इन प्रश्नों से इस प्रकार से भाग खड़े होते हैं जिस प्रकार धनुष की डोरी
की टंकार से बटेरें भाग जाते हैं। जैसे कोई पशु निर्बल पशुओं में अपने को
भेड़िया मानकर बोलने लगता है, परन्तु जब कोई बलवान् पशु सामने आ
जाता है, तब वह पुनः अपने असली रूप में आजाता है, वह जो होता है
वही बन जाता है। इसी प्रकार अपने मुख से प्रशंसा करने वाला मूर्ख मूर्खों
में बैठकर अपना पाण्डित्य दिखाने लगता है, परन्तु जब कोई पण्डित विद्वान्
सामने आखड़ा होता है, तब यह अबुद्धि मूढ़, अवहुश्रुत, कुण्डभेदी (दुष्ट-
अध्योनि ), जड़ मूर्ख, वाद प्रतिवाद में क्या कहेगा ? कुछ भी नहीं। जिस
प्रकार मकड़ी के जाल में फंसा कीड़ा कुछ नहीं कर सकता उसी प्रकार यह
मूढ़ भी विद्वान् के सामने कुछ नहीं कर सकता ॥ ७१-७६ ॥
सद्वृत्तन विगृह्णीयाद्द्विषत्यल्पश्रुतैरपि ।
हन्यात्प्रश्नाष्टकेनादावितरांस्त्वात्ममानिनः ॥ ७७ ॥
दम्भिनो मुखरा ह्यज्ञाः प्रभूताबद्धभाषिणः ।
प्रायः प्रायेण सुमुखाः सन्तो युक्ताल्पभाषिणः ॥ ७८ ॥
तत्त्वज्ञानप्रकाशार्थमहङ्कारमनाश्रिताः ।
परन्तु जो निरभिमानी सच्चे वैद्य हों वे यदि थोड़े भी पढ़े लिखे हों तो
भी उनके साथ शिष्टाचार, सम्मानपूर्वक बरतना चाहिये और जो आत्माभि-
मानी हों उनको इन आठ प्रश्नों से परास्त करना चाहिये। ऐसे पुरुष प्रायः
दम्भी, अपनी मुख से अपनी श्लाघा करने वाले, मूर्ख, बहुत एवं असम्बद्ध,
प्रसंगरहित बोलने वाले होते हैं और जो अच्छे विद्वान् होते हैं वे थोड़ा और
उचित प्रसंग में ही बोलते हैं, वे तत्त्वज्ञान का प्रकाश करने के लिये बोलते हैं
और अहंकार का आश्रय नहीं लेते हैं ॥ ७७-७८ ॥
स्वल्पाधाराञ्छमुखरान्मर्षयेन्न विवादिनः ॥ ७९ ॥
परो भूतेष्वनुक्रोशस्तत्त्वज्ञाने परा दया ।
येषां तेषामसद्वादनिग्रहे निरता मतिः ॥ ८० ॥
४०६ चरकसंहिता [ अ० ३०
परन्तु जो अपने तत्त्वज्ञान को दिखाने के लिये अहंकार के कारण आये
हों, जो थोड़े पढ़े हों, उन मूर्ख आत्मप्रशंसकों की कभी उपेक्षा नहीं करनी
चाहिये। जिनकी प्राणीमात्र पर कृपा और तत्त्वज्ञान में दया है उनकी असद्-
वाद के रोकने में सदा मति रहती है। क्योकि इस प्रकार न करने से असद्
वैद्यों को उत्तेजन मिलकर संसार का अपकार होता है। इसलिये इनको
निग्रह करने में सदा तत्पर रहना चाहिये ॥ ७६-८० ॥
असत्पक्षाश्रितवार्तिर्दम्भपारुष्यसाधनाः ।
भवन्त्यनाप्ताः स्वे तन्त्रे प्रायः परविकत्थकाः ॥ ८१ ॥
तान् कालपाशसदृशान्वर्जयेच्छास्त्रदूषकान् ।
प्रशम-ज्ञान-विज्ञान-पूर्णाः सेव्या भिषक्तमाः ॥ ८२ ॥
खोटे ( असत् ) पक्ष को लेकर विवाद करना, मुझको समय नहीं है,
फिर पूछना ऐसा बहाना करने वाले, पूछने पर शिर दुखता है, दाम्भिक, पूछने
पर गुस्से या जोर से उत्तर दे और दूसरों की व्यर्थ निन्दा करने वाले अपने
तन्त्र में अनभिज्ञ होते हैं। इस प्रकार के शास्त्र को बदनाम करने वालों को
मृत्यु के फांसों के समान दूर से ही छोड़ देना चाहिये। जो शान्त, ज्ञान-विज्ञान
से परिपूर्ण हों ऐसे उत्तम वैद्यों की सेवा करनी चाहिये ॥ ८१-८२ ॥
समग्रं दुःखमायत्तमविज्ञाने द्वयाश्रयम् ।
सुखं समग्रं विज्ञाने विमले च प्रतिष्ठितम् ॥ ८३ ॥
इदमेवमुदारार्थमज्ञानार्थप्रकाशकम् ।
शास्त्रं दृष्टिप्रनष्टानां यथैवाऽऽदित्यमण्डलम् ॥ ८४ ॥ इति ।
सब प्रकार के दुःखों का कारण शारीरिक और मानसिक ज्ञान का अभाव
है। शरीर और मन सम्बन्धी ज्ञान न होने से सब रोग होते हैं।
इन दोनों के विशुद्ध ज्ञान से सम्पूर्ण सुख-आरोग्य मिलता है।
यह शास्त्र अति गम्भीर, दोनों लोकों में हितकारी अर्थ को बतलाता है,
तथा अज्ञात वस्तु को प्रकाशित करता है, परन्तु जिस प्रकार नेत्रहीन पुरुष
चमकते हुए सूर्य का कुछ भी उपयोग नहीं कर सकता, इसी प्रकार शास्त्रहीन
व्यक्तियों के लिये यह कुछ काम नहीं दे सकता ॥ ८३-८४ ॥
तत्र श्लोकाः- अर्थे दश महामूलाः संज्ञा चैषां यथा कृता ।
अयनान्ताः षडर्थाश्च रूपं वेदविदां च यत् ॥ ८५ ॥
सप्तप्रश्नाष्टकश्चैव परिप्रश्नः सनिर्णयः ।
यथा वाच्यं यदर्थं च यद्विद्याच्चैकदेशिकः ॥ ८६ ॥
अ० ३० ] सूत्रस्थानम् ४०७
अ० ३० ] सूत्रस्थानम् ४०७
अर्थे दशमहामूले सर्वमेतत्प्रकाशितम् ।
संग्रहश्चायमध्यायस्तन्त्रस्यास्यैव केवलः ॥ ८७ ॥
यथा सुमनसां सूत्रं संग्रहार्थं विधीयते ।
संग्रहार्थं तथाऽर्थानामृषिणा संग्रहः कृतः ॥ ८८ ॥
हृदय से सम्बन्धित दस धमनियां, 'महामूला' इस संज्ञा होने के कारण,
आयुवर्द्धक, छः उत्तम उपाय, आयुर्वेद का स्वरूप, सात व आठ प्रश्न विशेष,
वाक्यांश, अर्थौघ, निर्णय और अधूरे वैद्य, इतने विषयों का निरूपण इस
'अर्थे दशमहामूलीय' अध्याय में किया है । इस ग्रन्थ में वर्णित सब विषयों का
संक्षिप्त निरूपण भी इस अध्याय में किया है । जिस प्रकार कि फूलों की माला
को गूंथने के लिये सूत्र की आवश्यकता होती है उसी प्रकार सब विषयों का
संग्रह करने के लिये ऋषि ने यह सूत्र (सूत्रस्थान) बनाया है ॥ ८५-८८ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने अर्थे दशमहामूलीयो
नाम त्रिंशत्तमोऽध्यायः ॥ ३० ॥
अग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते इयताऽवधिना सर्वं सूत्रस्थानं समाप्यते ॥
इति सूत्रस्थानं समाप्तम् ।
निदानस्थानम्
निदानस्थानम्
प्रथमोऽध्यायः
अथातो ज्वरनिदानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब इसके आगे ज्वरनिदान का व्याख्यान करेंगे जैसा कि भगवान् आत्रेय
ने कहा था२ ॥ १-२ ॥
इह खलु हेतुर्निमित्तमायतनं कर्ता कारणं प्रत्ययः समुत्थानं निदान-
मित्यनर्थान्तरम् । तत्तिविधं-असात्म्येन्द्रियार्थसंयोगः, प्रज्ञापराधः
परिणामश्चेति ॥ ३ ॥
निदान के पर्य्याय—इस निदान स्थान में हेतु, निमित्त, आयतन, कर्त्ता
कारण, प्रत्यय, समुत्थान ये निदान शब्द के पर्यायवाची शब्द हैं । निदान
अर्थात् रोगों की उत्पत्ति का कारण तीन प्रकार का है, १. असात्म्येन्द्रियार्थ-
संयोग, २. प्रज्ञापराध ( बुद्धि का दोष ) और ३. परिणाम ( काल ) ॥ ३ ॥
अतस्त्रिविधिविकल्पा व्याधयः प्रादुर्भवन्त्याग्नेय-सौम्य-वायव्याः ।
द्विविधाश्चापरे राजसास्तामसाश्च । तत्र व्याधिरामयो गद आतङ्को
यक्ष्मा ज्वरो विकारो रोग इत्यनर्थान्तरम् ॥ ४ ॥
इसलिये रोग भी तीन प्रकार के ही होते हैं । १. आग्नेय ( पित्तजन्य )
२. सौम्य ( कफजन्य ), और ३. वायव्य ( वायुजन्य ) । ये शारीरिक रोग के
१. जिससे रोग जाना जाय उसका नाम 'निदान' है ।
'निश्चित्य दीयते प्रतिपाद्यते व्याधिरनेनेति निदानम्' ॥ जेज्जट ॥
२. संक्षेप में लिंग को निर्देश करने वाला सूत्रस्थान कहने के पश्चात् हेतु
और लिंग को बतलाने वाला 'निदानस्थान' कहते हैं । क्योंकि हेतु और लिंग
को जानकर की हुई चिकित्सा फलवती होती है । हेतु सन्निकृष्ट, विप्रकृष्ट,
व्यभिचार और प्रधान भेद से चार प्रकार का है । विस्तार के लिये
मधुकोष देखिये ।
तस्योपलब्धिर्निदान-पूर्वरूप-लिङ्गोपशय-संप्राप्तितः ॥५॥
भेद हैं। मानसिक रोग भी दो प्रकार के हैं। १. राजस (रजोगुण से उत्पन्न
हुए), और २. तामस, (तमोगुण से उत्पन्न हुए)।
रोग के पर्याय—व्याधि, आमय, गद, आतंक, यक्ष्मा, ज्वर, विकार और
रोग ये सब शब्द एक ही अर्थ (रोग) को कहते हैं ॥ ४ ॥
तस्योपलब्धिर्निदान-पूर्वरूप-लिङ्गोपशय-संप्राप्तितः ॥५॥
निदान पंचक अर्थात् रोगज्ञान के पांच उपाय—१. निदान २. पूर्वरूप, ३.
लिंग (रूप), ४. उपशय और ५. सम्प्राप्ति, इन पांच उपायों से रोग पहिचाना
जाता है ॥ ५ ॥
तत्र निदानं कारणमित्युक्तमग्रे पूर्वरूपं प्रागुत्पत्तिलक्षणं व्याधेः ।
रोगों के कारण को निदान कहते हैं, यह पहिले कह चुके हैं। रोग के
उत्पन्न होने से पूर्व जो लक्षण उत्पन्न होते हैं, उनको 'पूर्वरूप' कहते हैं। (जैसे
जंभाई का आना, अंगों का टूटना, शिर का दुखना आदि ये ज्वर के पूर्वरूप
हैं।) रोग के आगे चलनेवाले लक्षण पूर्वरूप हैं। जैसे राजा के आने की
सूचना राजा के आगे चलने वाले लोगों से मिल जाती है।
प्रादुर्भूतलक्षणं पुनर्लिङ्गं, तत्र लिङ्गमाकृतिर्लक्षणं चिह्नं संस्थानं
व्यञ्जनं रूपमित्यनर्थान्तरमस्मिन्नर्थे ।
रोग के उत्पन्न होने पर जो लक्षण स्पष्ट होते हैं, जिन लक्षणों से रोग का
भान होने लगता है, उनको लिंग कहते हैं। इसके लिंग, आकृति, लक्षण,
चिह्न, संस्थान, व्यञ्जन और रूप ये सब पर्यायवाची हैं।
उपशयः पुनर्हेतुव्याधिविपरीतानां विपरीतार्थकारिणां चौषधा-
हारविहाराणामुपयोगः सुखानुबन्धः ।
उपशय—हेतुविपरीत, व्याधि-विपरीत और विपरीतार्थकारी, औषध,
आहार और विहार का सुखोत्पत्ति के लिये सेवन करना 'उपशय' १ है।
१. उपशय द्वारा गूढ़ लिंगों, चिन्हों वाली व्याधि की परीक्षा की जाती है।
जैसे 'मलेरिया' और 'कालाज़ार' रोग में। इनमें मलेरिया कुनीन से चला
जाता है, परन्तु कालाज़ार नहीं जाता। इसका विवरण नीचे लिखे प्रकार
से जानें।
औषध—जैसे शीत कफ ज्वर में सोंठ
हेतुविपरीत { अन्न—जैसे श्रम-वातजन्य ज्वर में मांस रस और चावल ।
विहार—जैसे दिन में सोने से उत्पन्न कफ ज्वर में रात
को जागना ।
४१० चरकसंहिता [ अ० १
संप्राप्तिर्जातिरागतिरित्थन्त्वन्तरं व्याधेः। सा संख्या-प्राधान्य-विधि-
विकल्प-बल-काल-विशेषैर्भिद्यते । संख्या तावद्यथा—अष्टौ ज्वराः, पञ्च
गुल्माः, सप्त कुष्ठान्येवमादिः। प्राधान्यं पुनर्दोषाणां तरतमाभ्यां योगेनोप-
लभ्यते । तत्र द्वयोस्तरस्त्रिषु तम इति । विधिर्नाम द्विविधा व्याधयो
निजागन्तुभेदेन, त्रिविधास्त्रिदोषभेदेन, चतुर्विधाः साध्यासाध्य-मृदुदा-
रुण-भेदेन । समवेतानां पुनर्दोषाणामंशांश-बल-विकल्पोऽस्मिन्नर्थे । बल-
कालविशेषः पुनर्व्याधीनामृतवहोरान्त्राऽऽहार-काल-विधि-विनियतो
भवति । तस्माद् व्याधीन् भिषगनुपहतसत्त्वबुद्धिर्हेत्वादिभिर्भावैर्यथा-
वदनुबुध्येत ॥ ६ ॥
इत्यर्थसंग्रहो निदानस्थानस्योद्दिष्टो भवति, तं विस्तरेण भूयस्तरम-
तोऽनुव्याख्यास्यामः ॥ ७ ॥
व्याधि की सम्प्राप्ति, जाति और आगति ये तीनों शब्द एक ही अर्थ के
व्याधिविपरीत ⎧ औषध-जैसे अतिसार में पाठा स्तम्भन ।
⎨ अन्न-जैसे अतिसार में मसूर ।
⎩ विहार-जैसे उदावर्त्त में प्रवाहण ।
हेतु- ⎧ औषध-जैसे वातजन्य शोथ में दशमूल ।
व्याधिविपरीत ⎨ अन्न-जैसे शीत ज्वर में ज्वरनाशक यवागू ।
⎩ विहार-जैसे दिन में सोने से उत्पन्न तन्द्रा में रात्रिजागरण ।
हेतु- ⎧ औषध-जैसे पित्तजन्य शोथ में गरम उपनाह ( पुल्टिस )
विपरीतार्थकारी ⎨ अन्न-जैसे पित्तजन्य शोथ में विदाही अन्न ।
⎩ विहार-जैसे वातोन्माद में भय बतलाना ।
व्याधि- ⎧ औषध-जैसे छर्दि में मैनफल से वमन कराना ।
विपरीतार्थकारी ⎨ अन्न-जैसे अतिसार में दूध से विरेचन ।
⎩ विहार-जैसे छर्दि में प्रवाहण ।
हेतु-व्याधि- ⎧ औषध-जैसे अग्नि से जलने पर अगुरुका लेप ।
विपरीतार्थकारी ⎨ अन्न-जैसे मदात्यय रोग में मद्यपान ।
⎩ विहार-जैसे भ्रमजनित मूरुवात में पानी में तैरना ।