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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

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DevanagariSanskritpublished639 pages

About this granth

The Charaka Samhita (चरक-संहिता) is the foundational text of Ayurvedic internal medicine. By tradition, the teachings of Punarvasu Atreya were set down by his disciple Agnivesha, revised by Charaka and later completed by Dridhabala of Kashmir. With eight sections and 120 chapters, it is counted with the Sushruta Samhita and Ashtanga Hridaya among the 'great three' of Ayurveda.

This volume covers the Sutra, Nidana and Vimana sections. It includes chapters such as Dirghanjivitiya, Apamarga-tanduliya, Matrashitiya and Mahachatushpada; the count of purgative formulations made from madana fruit and other drugs; the fifty great groups of herbs, beginning with the digestives; the classes of prepared foods and food sources; abscesses and boils; and the diagnosis of the five kinds of insanity.

As the title page states, this is the first part of the Charaka Samhita with a Hindi translation by Kaviraj Atridev Gupta, Vidyalankar, Bhishagratna, of Gurukul University, published by Bhargava Pustakalaya, Gaighat, Banaras. The preface mentions the Jalpakalpataru of Gangadhar Kaviraj and the Charakopaskara of Yogindranath Sen. This second edition has 639 pages.

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३५४ चरकसंहिता [अ० २७
रोचनं दीपनं वृष्यं स्नेहनं बलवर्धनम् ।
पाकेऽम्लमुष्णं वातघ्नं मङ्गलं बृंहणं दधि ॥ २२४ ॥
पीनसे चातिसारे च शीतके विषमज्वरे ।
अरचौ मूत्रकृच्छ्रे च कार्श्ये च दधि शस्यते ॥ २२५ ॥
शरद्-ग्रीष्म-वसन्तेषु प्रायशो दधि गर्हितम् ।
रक्तपित्तकफोत्येषु विकारेष्वहितं च तत् ॥ २२६ ॥
त्रिदोषं मन्दकं, जातं वातघ्नं दधि, शुक्तकः १।
सरः, श्लेष्मानिलघ्नस्तु मण्डः स्रोतोविशोधनः ॥ २२७
शोफार्शो-ग्रहणी-दोष-मूत्र-कृच्छ्रोदरा-२रुचौ ।
स्नेहव्यापदि पाण्डुत्वे तक्रं दद्याद् गरेषु च ॥ २२८ ॥
संग्राहि दीपनं हृद्यं नवनीतं नवोद्धृतम् ।
ग्रहण्यर्शो-विकार-हन्मर्दितारुचिनाशनम् ॥ २२९ ॥
स्मृति-बुद्धयग्नि-शुक्रौजः-कफ-मेदो-विवर्धनम् ।
वात-पित्त-विषोन्माद-शोपालक्ष्मी-विषापहम् ३ ॥ २३० ॥
सर्वस्नेहोत्तमं शीतं मधुरं रसपाकयोः ।
सहस्रवीर्यं विधिभिर्घृतं कर्मसहस्रकृत् ॥ २३१ ॥
मदापस्मार-मूर्च्छाय-शोषोन्माद-गर-ज्वरान् ।
योनिकर्णशिरःशूलं घृतं जीर्णमपोहति ॥ २३२ ॥
सर्पिष्याजावि-महिषी-क्षीरवत्त्वानि निर्दिशेत् ।
पीयूषो मोरटं चैव किलाटा विविधाश्च ये ॥ २३३ ॥
दीप्ताग्नीनामनिद्राणां सर्व एते सुखप्रदाः ।
गुरवस्तर्पणा वृष्या बृंहणाः पवनापहाः ॥ २३४ ॥
विशदा गुरवो रूक्षा माहिषस्तकपिण्डकाः ।
गोरसानाभयं वर्गो नवमः परिकीर्तितः ॥ २३५ ॥
क्षीरवर्ग-दूध-मधुर, शीतल, मृदु, स्निग्ध, बहल, श्लक्ष्ण, पिच्छिल, गुरु,
मन्द, प्रसन्न इन दस गुणोंवाला गाय का दूध है। ओज के भी ये ही दस गुण हैं।
इस लिये सामान्य होने से दूध ओज को बढ़ाता है । इसलिये जीवनीय वस्तुओं
में दूध सब से अधिक श्रेष्ठ गिना जाता है । वह रसायन है ।
भैंस का दूध-गाय के दूध से भारी, गाय के दूध से ठण्डा और उसमें
स्नेह अर्थात् घी भी अधिक होता है, निद्रा न आने वाले के लिये तथा अग्नि के
बहुत बढ़ने में हितकारी है, अग्नि को कम करता है ।
१. शुक्लं इति पाठः । २. मूत्रग्रहोदरा इति पाठः । ३. ज्वरापहम् इति पाठः ।

अ० २७ } सूत्रस्थानम् ३५५

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अ० २७ } सूत्रस्थानम् ३५५
ऊंटनी का दूध रूक्ष, उष्ण, थोड़ा नमकीन, लघु, वात, कफ, आनाह
कृमि, शोफ, उदर एवं अर्श रोग में हितकारी है । एक खुर वाले घोड़ी या
गधी, खच्चर आदि जानवरों का दूध बलकारक, शरीर को स्थिर बनाने वाला,
उष्ण, अम्ल-लवण रस, रूक्ष, हाथ पांव के वातविकारों को नाश करने वाला
और लघु है । बकरी का दूध-कषाय, मधुर, शीतल, संग्राहि, लघु, रक्तपित्त-
अतीसार नाशक, क्षय, कास, ज्वर में हितकारी है । भेड़ो का दूध-हिक्का, श्वास
रोग करने वाला, गरम, पित्त कफ को उत्पन्न करता है । हथिनी का दूध बल-
कारक, गुरु, और शरीर को दृढ़ करने वाला है । स्त्रियों का दूध-जीवनीय,
बृंहणीय, शरीर के सात्म्य, स्नेहक, नस्य के लिये और रक्तपित्त में हितकारी,
आंख के दुःखने में तर्पण करने के लिये उत्तम है ।
दही के गुण—दही रुचिकारक, अग्निदीपक, वीर्यवर्धक, स्नेहन के योग्य,
बलवर्धक, विपाक में अम्ल, उष्णवीर्य, वातनाशक, मंगलकारी, बृंहण, पौष्टिक
है । पीनस, अतिसार, शीतजन्य विषमज्वर में, अरुचि, मूत्रकृच्छ्र, और स्वा-
भाविक कृशता में दही उत्तम है । शरद-ग्रीष्म और वसन्त ऋतु में दही का
खाना निन्दित है । मन्दक (जब, दही पूरी तरह न जमे उसे मन्दक कहते
हैं ) दही त्रिदोषकारक है, और ठीक तरह जमा दही वातनाशक होता है ।
सरः (दही के ऊपर की मलाई) शुक्रवर्धक (शुक्र की वृद्धि करने वाली)
है । दही का मण्ड स्वच्छ द्रवभाग (मस्तु), कफ-वात नाशक और स्रोतों को
साफ़ करने वाला है ।
छाछ के गुण—शोफ, अर्श, ग्रहणी, मूत्राघात (मूत्रावरोध), उदर रोग
अरुचि, स्नेहकर्म जन्य रोगों में, पाण्डुरोग में तथा संयोग जन्य विष में छाछ
प्रशस्त है । मक्खन-संग्राही, अग्निदीपक, हृद्य, ग्रहणी, अर्शरोग-नाशक, अर्दित
तथा अरुचि को मिटाता है । ताजा मक्खन ही अधिक प्रशस्त गुणकारी है,
पुराना नहीं ।
गाय के घी के गुण—स्मरण शक्ति, बुद्धि, अग्नि, शुक्र, ओज, कफ-मेद,
को बढ़ानेवाला, वात, पित्त, विष, उन्माद, शोष, दौर्भाग्य, अशुभ-एवं ज्वर का
नाशक है । सब स्नेहों में घी उत्तम है, शीतल, मधुर (रस एवं पाक में
मधुर) है । नाना प्रकार के कर्म करने वाले द्रव्यों से घी का संस्कार करने
पर घी सहस्रों प्रकार के, कर्म कर सकता है । मद, अपस्मार, मूर्च्छा, शोष,
उन्माद, विष, ज्वर, योनिरोग, कर्ण रोग, शिर के शूल में पुराना घी (दस साल
का पुराना--'जीर्णं तु दशवर्षातीतम्' ) प्रशस्त है । अन्य बकरी-आदि के घी
का गुण उनके दूध के समान समझना चाहिये ।

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३५६ चरकसंहिता [ अ० २७
पीयूष ( ताजी ब्याई हुई मादा पशु का दूध, खीस ), मोरट ( यही पीयूष
जब अगले दिन तक स्वच्छ नहीं होता, इसको मोरट कहते हैं ), किलाट
( जिसमें दूध से स्नेह भाग निकाल लिया जाय ) तथा इस प्रकार की अन्य
वस्तुएं जिनकी अग्नि बढ़ी हुई हो, या जिनको अनिद्र रोग हो, उनके लिये
सुखदायक हैं, गुरु, तृप्तिकारक, पौष्टिक, वीर्यवर्द्धक, वातनाशक हैं। छच्छ का
छाना या पनीर ( छच्छ या दही को कपड़े में लटका कर उसका द्रव भाग
निकाल देने पर बचा भाग ) स्वच्छ, गुरु, रूक्ष और संग्राही है। यह नवां
गोरस का वर्ग समाप्त हुआ ॥ २१६-२३५ ॥
इति गोरसवर्गः ।
अथेक्षुवर्गः ।
वृष्यः शीतः स्थिरः स्निग्धो बृंहणो मधुरो रसः ।
श्लेष्मलो भक्षितस्येक्षोर्यान्त्रिकस्तु विदह्यते ॥ २३६ ॥
शैत्यात्प्रसादान्माधुर्यात्पौण्ड्रकाद्रांशको वरः ॥
प्रभूत-कृमि-मज्जासृङ् मेदो-मांस-करो गुडः ॥ २३७ ॥
क्षुद्रो गुडश्चतुर्भागत्रिभागार्धावशेषितः ।
रसो गुरुर्यथापूर्वं धौतः स्वल्पमलो गुडः ॥ २३८ ॥
यतो मत्स्यण्डिकाखण्डशर्करा विमलाः परम् ।
यथा यथैषां वैमल्यं भवेच्छैत्यं तथा तथा ॥ २३९ ॥
वृष्याः क्षीणक्षतहिताः सस्नेहा गुडशर्कराः ।
कषायमधुराः शीताः सतिक्ता याः सशर्कराः ॥ २४० ॥
रूक्षा वम्यतिसारघ्नी छेदनी मधुशर्करा ।
तृष्णासृक्पित्तदाहेषु प्रशस्ताः सर्वशर्कराः ॥ २४१ ॥
माक्षिकं भ्रामरं क्षौद्रं पौत्तकं मधुजातयः ।
माक्षिकं प्रवरं तेषां विशेषाद् भ्रामरं गुरु ॥ २४२ ॥
माक्षिकं तैलवर्णं स्यात् श्वेतं भ्रामरमुच्यते ।
क्षौद्रं तु कपिलं विद्याद् घृतवर्णं तु पौत्तिकम् ॥ २४३ ॥
वातलं गुरु शीतं च रक्तपित्तकफापहम् ।
संधातृ छेदनं रूक्षं कषायमधुरं मधु ॥ २४४ ॥
हन्यान्मधूष्णमुष्णार्तमथवा सविषान्वयात् ।
गुरु-रूक्ष-कषायत्वाच्छैत्याच्चाल्पं हितं मधु ॥ २४५ ॥

अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३५७

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अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३५७

नातः कष्टतमं किञ्चिन्मध्वामाशाद्धि मानवम् ।
उपक्रमविरोधित्वात्सद्यो हन्याद्यथा विषम् ॥ २४६ ॥
आमे सोष्णा क्रिया कार्या सा मध्वामे विरुध्यते ।
मध्वामं दारुणं यस्मात्सद्यो हन्याद्यथा विषम् ॥ २४७ ॥
नानाद्रव्यात्मकत्वाच्च योगवाहि परं मधु ।
इतीक्षुविकृतिप्रायो वर्गोऽयं दशमो मतः ॥ २४८ ॥ •
इक्षुविकारवर्ग—गन्ने का दांतों से चूसकर खाया हुआ रस वीर्य-वर्द्धक,
शीतल, रेचक, स्निग्ध, पौष्टिक, मधुर एवं कफकारक होता है । यान्त्रिक (कोल्हू)
में पेल कर निकाला हुआ रस विदाहयुक्त हो जाता है । छिलके और गांठ के
योग से उसमें विदाह उत्पन्न होता है और बाहर धूप में वायु के योग से भी
विदाह उत्पन्न होता है । पौंण्डा (नरम छिलके का) गन्ना अधिक शीतल,
अधिक निर्मल (प्रसन्नता देने वाला) और अधिक मीठा होता है, बांस गन्ना
इससे उतर कर होता है ।
गुड़—अतिशय कृमि, मज्जा, रक्त, मेद, और मांस को बढ़ाता है । क्षुद्र
गुड़ ( काले रंग का गुड़ ), चार भाग तीन भाग और आधा भाग बचा-
कर गन्ने के रस से बनाये गुड़ की अपेक्षा पूर्वापर क्रम से गुरु हैं। अर्थात्
क्षुद्र गुड़ चार भाग से बने गुड़ से और चार भाग का गुड़ तीन भाग के
गुड़ से अधिक गुरु हैं। साफ़ करके बनाया हुआ अर्थात् थोड़े मल वाला गुड़
कम नुकसान करता । इसके पीछे मत्स्यण्डिका (राब) खांड, शक्कर, उत्तरो-
त्तर निर्मल-स्वच्छ होते जाते हैं और जिस प्रकार इनमें स्वच्छता बढ़ती है
उसी प्रकार शीतलता भी बढ़ती जाती है । अर्थात् राब से खाण्ड और खाण्ड
से शक्कर शीतल है ।
गुड़ से बनी शक्कर वीर्यवर्धक, क्षीण, उरःक्षत के रोगी के लिये हितकारी
स्नेहयुक्त होती है । धमासे के क्वाथ से बनाई शर्करा कषाय, मधुर रस, शीतल
और कुछ तिक्त होती है । मधु की शर्करा, रूक्ष, वमन, अतिसार नाशक,
छेदक (कफ आदि को तोड़ने वाली) होती है । तृष्णा रक्तपित्त और दाह रोग
में सब शर्करायें प्रशस्त हैं ।
मधु के गुण—मधु की चार जातियां हैं । यथा १. माक्षिक (बड़ी मक्खियों
या पिंगल रंग की मक्खियों से बना), २. भ्रामर (भ्रमरोंद्वारा बनाया) ३. क्षौद्र
(छोटी मक्खियों द्वारा बना) ४. पौत्तिक (पीली मक्खियों से बना श्वेत रंग का)।
इन चारों प्रकार के शहद में 'माक्षिक' शहद श्रेष्ठ है । भ्रमरों से बनाया मधु
विशेषतः गुरु होता है । माक्षिक शहद का रंग तेल के समान (पीला) और

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३५८ चरकसंहिता [ अ० २७
पौत्तिक शहद का रंग घी के समान ( सफेद ) पीला होता है । क्षौद्र शहद
श्वेत होता है' ।
मधु—वायुकारक, गुरु, शीतल, रक्त-पित्त, कफना शक, व्रणों को जोड़ने
वाला, कफ मेद आदि को उखाड़ने वाला, रूक्ष, कषाय और मधुर होता है ।
मधु नाना प्रकार के फूलों से विषैली मक्खियों द्वारा उत्पन्न किया जाता है,
इसलिये इसे गरम करके देने से अथवा गरम अवस्था में मनुष्य को देने से
मारक होता है ।* मधु गुरु, रूक्ष और कषाय रस, तथा शीतल होने से थोड़ा
सेवन करना उत्तम है । मधु के अधिक खाने से उत्पन्न आम रोग जैसा
कष्टसाध्य दूसरा रोग नहीं है । क्योंकि इसकी चिकित्सा में विरोध है । इसलिये
विष की भांति मनुष्य को शीघ्र मार देता है । क्योंकि आम-विकार में उष्ण
क्रिया करनी चाहिये, वह मधु में विरुद्ध है; और मधु के हितकारी जो शीतल
क्रिया है, वह आमरोग के विरुद्ध है । इसलिये मधुजन्य आमरोग दारुण
रोग है, इसलिये वह विष की भाँति मनुष्य को शीघ्र मार देता है । नाना
प्रकार की रस-वीर्य वाली ओषधियों के पुष्पों से उत्पन्न होने के कारण मधु में
नाना प्रकार की शक्तियां छिपी रहती हैं । इसलिये तथा प्रभाव के कारण मधु
योगवाही अर्थात् वमनकारक, आस्थापन या वृष्य कर्म करने वाले जिस
द्रव्य के साथ दिया जाता है वैसा ही कार्य करता है । इस प्रकार से यह
दसवां इक्षुविकार-वर्ग समाप्त हुआ ॥ २३६-२४८ ॥
इतीक्षुवर्गः ।
अथ कृतान्नवर्गः ।
क्षुत्तृष्णा-ग्लानि-दौर्बल्य-कुक्षिरोग-विनाशिनी २ ।
स्वेदाग्निजननी पेया वातवर्चोऽनुलोमनी ॥ २४९ ॥
तर्पणी ग्राहिणी लघ्वी हृद्या चापि विलेपिका ।
१. सुश्रुत में आठ भेद किये हैं—
'पौत्तिकं भ्रामरं क्षौद्रं माक्षिकं छात्रमेव च ।
आर्घ्यमौद्दालिकं दात्रमित्यष्टौ मधुजातयः ॥'

  • शिलाजतु, तैल आदि भी योगवाही हैं। योगवाही होने पर भी स्नेहन
    कार्य में शहद प्रयुक्त नहीं होता । वायु में रूक्षादि गुण हैं । मधु में रूक्ष,
    कषाय गुण विशेषतः स्पष्ट हैं ।
    २. रोगज्वरापहा इति पाठः ।

अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३५६

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अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३५६
मण्डः संदीपनत्यग्निं वातं चाप्यनुलोमयेत् ॥ २५० ॥
मृदूकरोति स्रोतांसि स्वेदं संजनयत्यपि ।
लङ्घितानां विरिक्तानां जीर्णे स्नेहे च तृष्यताम् ॥ २५१ ॥
दीपनत्वाल्लघुत्वाच्च मण्डः स्यात्प्राणधारणः ।
लाजपेया श्रमघ्नी तु क्षामकण्ठस्य देहिनः ॥ २५२ ॥
तृष्णातीसारशमनो धातुसाम्यकरः शिवः ।
लाजमण्डोऽग्निजननो दाहमूर्च्छानिवारणः ॥ २५३ ॥
मन्दाग्निविषमाग्नीनां बाल-स्थविर-योषिताम् ।
देयश्च सुकुमाराणां लाजमण्डः सुसंस्कृतः ॥ २५४ ॥
क्षुत्पिपासापहः पथ्यः शुद्धानां तु मलापहः ।
शृतः पिप्पलीशुण्ठीभ्यां युक्तो लाजाम्लदाडिमैः ॥ २५५ ॥
पेया ( ग्यारह गुने पानी में थोड़ी स्विन्न होने पर बनी हुई कांजी ) भूख,
प्यास, ग्लानि, दुर्बलता, उदर रोग को नष्ट करती है, स्वेदकारक, अग्नि को
बढ़ाती और वायु, मल का अनुलोमन करती है । विलेपी ( चार गुने पानी में
बनाई ) तृप्तिकारक, संग्राही लघु, हृदय के अनुकूल होती है । मण्ड ( चौदह
गुने पानी में तैयार किया ) अग्नि का दीपन और वायु का अनुलोमन करता है,
स्रोतों को कोमल करता तथा पसीना लाता है । उपवास किये, विरेचन किये,
स्नेहपान के जीर्ण होने पर, प्यास लगने पर; अग्निदीपक और लघु होने से मण्ड
का सेवन करना उत्तम है ( मण्ड, लघु और दीपक गुण वाला है ) । लाजपेया
( लाज अर्थात् खीलों से बनाई पेया ) श्रमनाशक, गले के खुश्क होजाने पर
हितकारी है । लाजमण्ड, अग्निवर्धक, दाह-मूर्च्छानाशक है । मन्दाग्नि और
विषमाग्नि वाले पुरुषों के लिये, बालक, वृद्ध, स्त्रियों को तथा कोमल-नाजुक
प्रकृति वालों को लाजमण्ड पका करके देना चाहिये * । जो भूख और प्यास
को सहन न कर सकते हों, पथ्य सेवन करते हों, वमन विरेचन से जो
शुद्ध देह वाले हों, परन्तु थोड़ा मल वमन विरेचन के पीछे रुक गया हो
इस अवस्था में पिप्पली, सोंठ, अनारदाना ( खट्टे अनार के रस ) से बनाया
लाजमण्ड अग्नि को बढ़ावा और वायु का अनुलोमन करता है ॥ २४९-२५५ ॥
सुधौतः प्रस्रुतः स्विन्नः संतप्तश्चौदनो लघुः ।
अधौतोऽप्रस्रुतोऽस्विन्नः शीतश्चाप्योदनो गुरुः ॥ २५६ ॥
भृष्टतण्डुलमिच्छन्ति गरश्लेष्मामयेष्वपि ।
मांस-शाक-वसा-तैल-घृत-मज्ज-फलौदनाः ॥ २५७ ॥

  • धनिया, पिप्पली, सोंठ, मरिच के साथ पकाना चाहिये ।
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बल्याः संतर्पणा हृद्या गुरवो बृंहयन्ति च ।
तद्वन्माषतिलं क्षीर-मुद्ग-संयोग-साधिता ॥ २५८ ॥
कुल्माषा गुरवो रूक्षा वातला भिन्नवर्चसः ।
स्विन्नभक्ष्यास्तु ये केचित्सौप्य-गोधूम-यावकाः ॥ २५६ ॥
भिषक् तेषां यथाद्रव्यमादिशेद् गुरुलाघवम् ।
अकृतं कृतयूषं च तनुं सांस्कारिकं रसम् ॥ २६० ॥
सूपमम्लमनम्लं च गुरुं विद्याद्यथोत्तरम् ।
भली प्रकार से धोये, मांड निकाले, गलाये हुये, गरम-चावल (भात )
लघु होते हैं । गलाये और ठण्डे चावल गुरु हो जाते हैं । कृत्रिम विष और
कफजन्य रोगों में भूने हुए चावलों का भात अच्छा है । पूरे न धोये, बिना
मांड उतारे, मांस, शाक, वसा, तैल, घृत, मज्जा और फल इनको मिलाकर
तैयार किये चावल बलकारक, सन्तर्पक हृदय प्रिय, गुरु और पौष्टिक होते हैं ।
इसी प्रकार उड़द, तिल, दूध, मूंग, के योग से बनाये भात भी इसी प्रकार
गुणकारक होते हैं । कुल्माष ( जौ को थोड़ा सा पकाकर ) गुरु रूक्ष, वायुका-
रक और रेचक होते हैं । स्विन्नभक्ष्या ( भाप देकर तैयार की वस्तुएँ ) जो
उड़द, मूंग, गेहुं, जौ आदि से पिठ्ठी करके बनाये जांय, वे जिस वस्तु से
बनाये जाते है उसी वस्तु के अनुसार गुरु या लघुगुण वाले होते हैं ।
अकृतयूष ( धनिया आदि मसाले से संस्कार न किया हुआ यूष ), कृत-
यूष ( मसाले से संस्कार किया ), पतला एवं सांस्कारिक [ बहुत-मांस-स्नेहादि
से संस्कृत ] मांस रस; अम्लसूप ( खट्टी दाल ) और अनम्ल सूप, ये उत्तरोत्तर
भारी हैं X अर्थात् अकृत यूष से कृतयूष भारी है, तनुमांस रस से सांस्कारिक
मांस रस भारी है । अम्ल सूप से अनम्ल सूप भारी है ॥ २५६–२६० ॥
सक्तवो वातला रूक्षा बहुवर्चोऽनुलोमिनः ॥ २६१ ॥
तर्पयन्ति नरं सद्यः पीताः सद्योबलाश्च ते ।
मधुरा लघवः शीताः सक्तवः शालिसंभवाः ॥ २६२ ॥
ग्राहिणो रक्तपित्तघ्नास्तृष्णा-च्छर्दि-ज्वरापहाः ।
सत्तू वायुकारक, रूक्ष, पुष्कल मल उत्पन्न करने वाले, वायु के अनुलो-
मक, पीने पर जल्दी ही तृप्ति करने वाले, एवं शीघ्र बलकारक हैं ॐ शालि
X अस्नेहलवणं सर्वमकृतं कटुकैर्विना ।
विज्ञेयं लवणस्नेहकटुकैः संस्कृतं कृतम् ॥
ॐ सुश्रुत ने—"पवनापहा" वायुनाशक लिखा है ।

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अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३६३
( हेमन्त धान्य ) धान्य से बनाये सक्तू, मधुर, लघु, शीतल होते हैं। वे
संग्राही, रक्तपित्त, तृष्णा, वमन, और ज्वर के नाशक हैं ॥ २६१-२६२ ॥
हन्यात् व्यधीन् यवापूपो यावको वाट्य एव च ॥ २६३ ॥
उदावर्त-प्रतिश्याय-कास-मेह-गलग्रहान् ।
धानासंज्ञास्तु ये भक्ष्याः प्रायस्ते लेखनात्मकाः ॥ २६४ ॥
शुष्कत्वात्तर्षणाश्चैव विष्टम्भित्वाच्च दुर्जराः ।
विरूढधानाः शष्कुल्यो मधुक्रीडाः सपिण्डकाः ॥ २६५ ॥
पूपाः पूपलिकाद्याश्च गुरवः पैष्टिकाः परम् ।
जौ के पूड़े, जौ की बड़ियां, वाट्य, [ भूने जौ के चावल ], ये उदावर्त्त,
प्रतिश्याय, कास, प्रमेह और गले के रोगों को मिटाती हैं। धाना (भूने जौ),
प्रायः करके लेखन, कफ आदि के उखाड़ने वाले हैं। एवं शुष्क होने से प्यास
लगाने वाले हैं। विष्टम्भी होने से देर में पचते हैं। विरूढ धाना (अंकुरित
धान्य), शष्कुली (चावलों को पीसकर तिल मिलाकर तेल में पकाने से),
मधुक्रीडा (पकाकर, घन बनाकर बीच में शहद रखने से), सपिण्डका (मधु
क्रीड़ा, पूरन पोली), पूप (पूड़े), पूपलिका (मालपूआ; पापड़ा), ये अत्यन्त
गुरु और पौष्टिक होते हैं ॥ २६३-२६५ ॥
फल-मांस-वसा-शाक-पलल क्षौद्र-संस्कृताः ॥ २६६ ॥
भक्ष्या वृष्याश्च बल्याश्च गुरवो बृंहणात्मकाः ।
वेशवारो गुरुः स्निग्धो बलोपचयवर्धनः ॥ २६७ ॥
गुरवस्तर्पणा वृष्याः क्षीरेक्षुरसपूपकाः ।
सगुडाः सतिलाश्चैव सक्षीरक्षौद्रशर्कराः ॥ २६८ ॥
वृष्या बल्याश्च भक्ष्यास्तु ते परं गुरवः स्मृताः ।
फल, मांस, वसा, शाक, पलल (तिल का चूर्ण), मधु इनके साथ बनाये
खाद्य पदार्थ वीर्यवर्धक, बलकारक, गुरु और पौष्टिक हैं। वेशवार (मांस में से
हड्डी निकाल कर पत्थर पर पिसकर पिप्पली, मरिच, गुड़ और घी के साथ पका
देने पर वेशवार बनता है) गुरु, स्निग्ध, बलशक्तिवर्धक है। दूध और गन्ने
के रस से तैयार किये खाद्य पदार्थ गुरु, तृप्तिकारक और वीर्यवर्धक है। गुड़,
तिल, दूध और शर्करा से बनाये पदार्थ वीर्यवर्धक, बलकारक, और बहुत गुरु
हैं ॥ २६६-२६८ ॥
सस्नेहाः स्नेहसिद्धाश्च भक्ष्या विविधलक्षणाः ॥ २६६ ॥
गुरवस्तर्पणा वृष्या हृद्या गौधूमिका मताः ।
संस्काराल्लघवः सन्ति भक्ष्या गोधूमपैष्टिकाः ॥ २७० ॥

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३६२ चरकसंहिता [ अ० २७
धाना-पर्पट-पूपांस्तान्बुद्ध्वा निर्दिशेत्तथा ।
गेहूं के आटे को घी आदि स्नेह में मथकर या घी आदि स्नेह में पका कर
नाना प्रकार के जो खाद्य पदार्थ बनाये जाते हैं वे सब गुरु, तृप्तिकारक,
पौष्टिक (वीर्यवर्धक) और हृदय को प्रिय होते हैं । इसी प्रकार गेहूं आदि के
जो पदार्थ अधिक अग्निसंयोग से तैयार किये जाते हैं, जो कि स्वभाव से गुरु
हैं, वे भी संस्कार द्वारा लघु बन जाते हैं । इसी प्रकार गेहूं की पीठी, धान्य
पर्पट, पूप आदि वस्तुएं भारी होने पर संस्कार के कारण लघु बन जाती हैं ।
इसलिये वैद्य को संस्कार का विचार करके गुणों का निश्चय करना
चाहिये ॥ २६६-२७० ॥
पृथुका गुरवो भृष्टानर्भक्षयेदल्पशस्तु तान् ॥ २७१ ॥
यावा विष्टभ्य जीर्यन्ति सरसा भिन्नवर्चसः ।
सूप्यान्नविकृता भक्ष्या वातला रूक्षशीतलाः ॥ २७२ ॥
सकटुस्नेहलवणानल्पशो भक्षयेत्तु तान् ।
मृदुपाकाश्च ये भक्ष्याः स्थूलाश्च कठिनाश्च ये ॥ २७३ ॥
गुरवस्ते व्यतिक्रान्तपाकाः पुष्टिवलप्रदाः ।
पृथुक (चिवड़ा) भारी होता है। भुने हुए चिवड़े को थोड़ा खाना
चाहिये । याव (जौ का बना चिवड़ा) पेट में अवरोध करके जीर्ण होते हैं ।
सरस (न भुने हुए जौ) रेचक हैं। सूप्य अन्न (मूं ग, उड़द आदि से बनी
वस्तुएं) वायुकारक, रूक्ष, शीतल होते हैं। इनको कटु रस, स्नेह (घी या
तैल), नमक के साथ थोड़ी मात्रा में खाना चाहिये । जो खाद्य पदार्थ मीठी
आँच पर बनते हैं और जो स्थूल और कठोर होते हैं, वे गुरु, एवं देर में पचते
हैं तथा पुष्टि और बल देते हैं ॥ २७१-२७३ ॥
द्रव्यसंयोगसंस्कारं द्रव्यमानं पृथक्तथा ॥ २७४ ॥
भक्ष्याणामादिशेद् बुद्ध्वा यथास्वं गुरुलाघवम् ।
नानाद्रव्यैः समायुक्तः पक्वामक्लिन्नभर्जितैः ❁ ॥ २७५ ॥
विमर्दको गुरुहृद्यो वृष्यो बलवतां हितः ।
रसाला बृंहणी वृष्या स्निग्धा बल्या रुचिप्रदा ॥ २७६ ॥
स्नेहनं तर्पणं हृद्यं वातघ्नं सगुडं दधि ।
किसी पदार्थ के गुरु या लघु होने का निश्चय उस पदार्थ के मूल स्वभाव,
संयोग, संस्कार (पकाने की विधि)), मिलने के परिणाम (राशि), आदि
सब बातों का विचार करके करना चाहिये । जिसमें ये बातें गुरु पक्ष में जाती
❁ 'पक्वा वह्निषु भर्जितैः ॥ इति वा पाठः ॥

अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३६३

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अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३६३
हों वे वस्तु गुरु समझना, जिसमें लघु पक्ष में हो वह वस्तु हल्की समझनी चाहिये ।
विमर्दक (मांस को नाना प्रकार से बनाने की विधि से), नाना प्रकार के
पदार्थों से मिला हुआ, पकाया, आम, क्लिन्न और भूने हुए मेद से
गुरु, हृदय के लिये, प्रिय, वीर्यवर्धक और बलवान् पुरुषों के लिये
हितकारी है। मलाई वाली दही को खूब मथकर इसमें दालचीनी, इलायची,
तेजपात, नागकेशर, अजवायन, गुड़, अदरक, सोंठ के साथ मिलाकर तैयार की
रसाला पुष्टिकारक, वृष्य, वीर्यवर्धक, स्निग्ध, बलकारक, रुचिकारक है। गुड़के
साथ दही स्नेहक तृप्तिकारक,हृदय के लिये प्रिय और वातनाशक है। २७४-२७६॥
द्राक्षा-खर्जूर-कोलानां गुरु विष्टम्भि पानकम् ॥ २७७ ॥
परूषकाणां क्षौद्रस्य यच्चेक्षुविकृतिं प्रति ।
तेषां कट्वम्लसंयोगाः पानकानां पृथक् पृथक् ॥२७८॥
द्रव्यमानं च विज्ञाय गुणकर्माणि निर्दिशेत् ।
कट्वम्ल-स्वादु-लवणा लघवो रागषाडवाः ॥ २७९ ॥
मुखप्रियाश्च हृद्याश्च दीपना भक्तरोचनाः ।
आम्रामलकलेहाश्च बृंहणा बलवर्धनाः ॥ २८० ॥
रोचनास्तर्पणाश्चोक्ताः स्नेहमाधुर्यगौरवात् ।
बुद्ध्वा संयोगसंस्कारं द्रव्यमानं च तच्छ्रितम् ॥ २८१ ॥
गुणकर्माणि लेहानां तेषां तेषां तथा वदेत् ।
द्राक्षा, खजूर, बेर, फालसा, शहद, गन्ने का रस इनके रस में गुड़ या
शर्कर डालकर बनाया हुआ शरबत, गुरु, मल-मूत्र का रोधक होता है। इन
शरबतों में कटु या अम्ल वस्तुओं का योग तथा द्रव्य परिमाण जानकर रोग
एवं रुचि के अनुसार पृथक् पृथक् रूप में देना चाहिये, इनके गुण कर्म पृथक्
२ होजाते हैं । गुड़ के साथ आम रस को पका तेल, सोंठ आदि मिलाकर बनाया
रस, वा अनार, दाल, फालसा, जामुन रसादि से बना मधुर पाक 'रागषाडव'
कहाता है । वह कटु, अम्ल, स्वादु नमकीन, लघु, स्वादिष्ट, हृदय को प्रिय,
अग्निदीपक और खाने में रुचिकर होता है। आम या आंवले के रस से बनाये
चाटन, पुष्टिकार्क, बलवर्द्धक, रुचिकारक, तृप्तिकारक, होते हैं, क्योंकि इनमें
स्नेह मधुरता और भारीपन होता है। द्रव्यों के संयोग संस्कार (पाक-विधि) और
द्रव्यों की मात्रा को चाटने योग्य (लेहों)में देखकर विचार कर गुण कर्म का निश्चय
करना चाहिये ॥ २७७-२८१ ॥

विद्याद्वर्गं कृतान्नानामेकाऽशतं भिषक् ॥ २८३ ॥

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३६४ चरकसंहिता [ अ० २७
रक्तपित्तकफोक्लेदि शुक्तं वातानुलोमनम् ॥ २८२ ॥
कन्दमूलफलाद्यं च तद्वद्विद्यात्सवासुतम् ।
शिण्डाकी* चाऽऽसुतं चान्यत् कालाम्लं रोचनं लघु ।
विद्याद्वर्गं कृतान्नानामेकाऽशतं भिषक् ॥ २८३ ॥
शुक्त (चुक्र)—शुद्ध पात्र में गुड़, शहद, कांजी सहित मस्तु डालकर
धान के ढेर में तीन शत रखने से शुक्त या चुक्र तैयार होता है । वह रक्त-
पित्तनाशक, कफ को पतला करने वाला, वायु का अनुलोमक होता है । शुक्त में
कन्द, मूल फल आदि डाले गये हों तो इसको 'आसुत' कहते हैं । शिण्डाकी
(सिरके में काला जीरा आदि डालने से ), आसुत, कालाम्ल (देर तक रखने
से जो अम्ल बन गया हो, अम्ल डालने से नहीं) वह रोचक और लघु होता
है । इस ग्यारहवें कृतान्नवर्ग का वैद्य अवश्य ज्ञान करे ॥ २८२-२८३ ॥
इति कृतान्नवर्गः ।
अथाऽऽहारयोगिवर्गः ।
कषायानुरसं स्वादु सूक्ष्ममुष्णं व्यवायि च ।
पित्तलं बद्धविण्मूत्रं न च श्लेष्माभिवर्धनम् ॥ २८४ ॥
वातघ्नेषूत्तमं बल्यं त्वच्यं मेधाग्निवर्धनम् ।
तैलं संयोगसंस्कारात्सर्वरोगापहं मतम् ॥ २८५ ॥
तैलप्रयोगादजरा निर्विकारा जिताश्रमाः ।
आसन्नतिबलाः संख्ये दैत्याधिपतयः पुरा ॥ २८६ ॥
ऐरण्डतैलं मधुरं गुरु श्लेष्माभिवर्धनम् ।
वातासृग्गुल्म-हृद्रोग-जीर्ण-ज्वर-हरं परम् ।
कटूष्णं सार्षपं तैलं रक्तपित्तप्रदूषणम् ।
कफशुकानिलहरं कण्डूकोठविनाशनम् ॥ २८८ ॥
पियालतैलं मधुरं गुरु श्लेष्माभिवर्धनम् ।
हितमिच्छन्ति नात्यौष्ण्यात्संयोगे वातपित्तयोः ॥ २८९ ॥
सातस्यं मधुराम्लं तु विपाके कटुकं तथा ।
उष्णवीर्यं हितं वाते रक्तपित्तप्रकोपणम् ॥ २९० ॥
कुसुम्भतैलमुष्णं च विपाके कटुकं गुरु ।
विदाहि च विशेषेण सर्वरोगप्रकोपणम् ॥ २९१ ॥

  • षाण्डाकी इति च पाठः ।

अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३६५

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अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३६५
फलानां यानि चान्यानि तेषामन्याहारसंविधौ ।
युज्यन्ते गुणकर्मभ्यां तानि ब्रूयाद्यथाफलम् ॥ २८२ ॥
मधुरो बृंहणो वृष्यो बल्यो मज्जा तथा वसा ।
यथासत्त्वं तु शैत्योष्णे वसामज्झोर्विनिर्दिशेत् ॥ २८३ ॥
तिल का तैल कषाय अनुरस, स्वादु, सूक्ष्म ( स्रोतों में घुसनेवाला ) उष्ण,
व्यवायी, छिद्रों में पहुंचने वाला ( शरीर में फैलनेवाला ), पित्तकारक, मल
मूत्र को रोकने वाला है, परन्तु कफ को बढ़ानेवाला नहीं है । वातनाशक ओष-
धियों में श्रेष्ठ, बलकारक, त्वचा के लिये हितकारी, बुद्धि, और अग्नि को बढ़ाने
वाला है, संयोग एवं संस्कार करने से सब रोगों को नाश करने वाला है।
प्राचीन काल में इस तेल के प्रयोग से दैत्याधिपति, बुढ़ापे से रहित, विकार-
शून्य, परिश्रम सहन करनेवाले, न थकने वाले, लड़ाई में बहुत बलवान् हुए थे।
( १ ) ऐरण्ड का तेल-मधुर, गुरु, कफ को बढ़ानेवाला, वातरक्त, गुल्म,
हृदय रोग, अजीर्ण और ज्वरका नाशक है । सरसो का तेल कटु, उष्ण, रक्त-
पित्त को दूषित करने वाला, कफ, शुक्र और वायु को नष्ट करने वाला, कण्डू
और कोठ का नाशक है। (सरसो के तेल को खाने से रक्त पित्त दूषित होते हैं,
मलने से नहीं ) ( ३ ) पियाल फल ( चिरौंजी ) का तैल मधुर, गुरु, कफ को
बढ़ाने वाला और बहुत गरम न होने से वात-पित्त के संम्मिलित विकारों में
उत्तम है ( ४ ) अलसी का तेल-मधुर, अम्ल, विपाक में कटु, उष्णवीर्य वात-
रोग में हितकारी, रक्त और पित्त को कुपित करने वाला है । ( ५ ) सनिये का
तेल-गरम, विपाक में कटु, गुरु, विदाही और सब रोगों को ( दोषों को ) कुपित
करने वाला है । जिन फलों से अन्य तैल तैयार किये जाते हैं, उन तैलों के
गुण उन्हीं फलों के अनुसार समझने चाहिये ।
चिरायता तिक्तक, अतिमुक्तक, बिभीतक ( बहेड़ा ) ना रियल, बेर, अख-
रोट, जीवन्ती, पियाल ( चिरौंजी ) कुसुंदार, सूर्यवल्ली, त्रपुस, ऐरावारू, ककरि
कूष्माण्ड आदि के तेल मधुर, मधुरवीर्य, मधुर विपाक वाले, वात पित्त को शान्त
करने वाले, शीतवीर्य, मार्गशोधक, मलमूत्रकारक, अग्निवर्धक होते हैं ( सुश्रुत )
मज्जा और वसा, मधुर रस, पुष्टिकारक, शुक्रवर्धक, बलकारक होता है। इनकी
शीतता और उष्णता प्राणियों के अनुसार समझनी चाहिये। जिस प्राणी का मांस
उष्ण है उसकी मज्जा भी उष्ण, जिसका मांस शीत उस प्राणी की मज्जा भी
शीत समझनी चाहिये ॥ २८४-२६३ ॥
अस्नेहं दीपनं वृष्यमुष्णं वातकफापहम् ॥ २६४ ॥
विपाकेमधुरं हृद्यं रोचनं विश्वभेषजम् ॥

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श्लेष्मला मधुरा चार्द्रा गुर्वी स्निग्धा च पिप्पली ।
सा शुष्का कफवातघ्नी कटूष्णा वृष्यसंमता ॥ २९५ ॥
नात्यर्थमुष्णं मरिचमवृष्यं लघुरोचनम् ।
छेदित्वाच्छोषणत्वाच्च दीपनं कफवातजित् ॥ २९६ ॥
वातश्लेष्मविबन्धघ्नं कटूष्णं दीपनं लघु ।
हिङ्गु शूलप्रशमनं विद्यात्पाचनरोचनम् ॥ २९७ ॥
रोचनं दीपनं वृष्यं चक्षुष्यमविदाहि च ।
त्रिदोषघ्नं समधुरं सैन्धवं लवणोत्तमम् ॥ २९८ ॥
सौक्ष्म्यादौष्ण्याल्लघुत्वाच्च सौगन्ध्याच्च रुचिप्रदम् ।
सौवर्चलं विबन्धघ्नं हृद्यमुद्गारशोधि च ॥ २९९ ॥
तैक्ष्ण्यादौष्ण्याद् व्यवायित्वाद्दीपनं शूलनाशनम् ।
ऊर्ध्वं चाधश्च वातानामानुलोम्यकरं बिडम् ॥ ३०० ॥
सतिक्तं कटु सक्षारं तीक्ष्णमुत्क्लेदि चौद्भिदम् ।
न काललवणे गन्धः सोवर्चलगुणाश्च ते ॥ ३०१ ॥
सामुद्रकं समधुरं, सतिक्तं कटु पांशुजम् ।
रोचनं लवणं सर्वं पाकि संस्र्यनिलापहम् ॥ ३०२ ॥
हृत्पाण्डु-ग्रहणी-दोष-प्लीहानाह-गलग्रहान् ।
कासं कफजमर्शांसि यावशूको व्यपोहति ॥ ३०३ ॥
तीक्ष्णोष्णो लघुरूक्षश्च क्लेदी पक्ता विदारणः ।
दाहनो दीपनश्छेत्ता सर्वः क्षारोऽग्निसंन्निभः ॥ ३०४ ॥
कारव्यः कुञ्चिकाऽजाजी यवानी धान्यतुम्बरु ।
रोचनं दीपनं वात-कफ-दौर्गन्ध्य-नाशनम् ॥ ३०५ ॥
आहारयोगिनां भक्तिनिश्चयो न तु विद्यते ।
समाप्तो द्वादशश्चायं वर्ग आहारयोगिनाम् ॥ ३०६ ॥
सोंठ—थोड़ी स्निग्ध, अग्निदीपक, वीर्यवर्धक, गरम, वातकफनाशक,
विपाक में मधुर, हृदय के लिये हितकारी, रुचिप्रिय होती है। हरी पिप्पली-कफ-
कारक, मधुर, गुरु और स्निग्ध होती है। सूखी पिप्पली कफ वातनाशक कटु,
उष्ण, वीर्यवर्धक है। काली मरिच सूखी-बहुत गरम नहीं, वीर्य को न बढ़ाने
वाली, लघु, रुचिकारक, छेदन करने वाली, कफ आदि को उखाड़ने वाली
और शोषक होने से अग्निदीपक एवं कफ-वातनाशक है। और हरी अवस्था में
स्वादु गुरु, कफवर्धक होती है। हींग वायु-कफ विबन्धनाशक, कटु, उष्ण,
अग्निदीपक, लघु, शूलनाशक, पाचक और रुचिकर है। सेन्धा नमक—रुचि-

अ० २७] सूत्रस्थानम् ३६७

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अ० २७] सूत्रस्थानम् ३६७
कारक, अग्निवर्धक, हृद्य, आँखों के लिये हितकारी, अविदाही, त्रिदोषनाशक,
कुछ मधुर और सब नमकों में श्रेष्ठ है।
सौवर्चल नमक (संचल नमक)—सूक्ष्म, उष्ण, कटु होने से तथा सुगन्धि
होने से रुचिदायक, विबन्धनाशक, हृद्य, उद्गार (डकार) को शोधन करने
वाला है। विड (काला नमक)—तीक्ष्ण, उष्ण और व्यवायी (शरीर में फैलने
वाला होने से) अग्निदीपक, शूलनाशक, एवं वायु को ऊपर या नीचे, अधोमार्ग
दोनों से अनुलोमन करने वाला है। उद्भिद् नमक-तिक्त, कटु, क्षारयुक्त,
तीक्ष्ण उत्क्लेदि अर्थात् वमन की रुचि करने वाला है। काले लवण के गुण
संचल नमक के समान हैं, परन्तु इस में संचल के समान गन्ध नहीं होती।
समुद्र के पानी से तैयार किया नमक मधुर है। पांशुज (सज्जी) जिससे धोबी
कपड़ा धोते हैं, ऐसी मिट्टी से तैयार किया नमक कटु और तिक्त होता है। सब
प्रकार के नमक रुचिकारक, अन्न या व्रण को पकाने वाले; संस्री और वात-
नाशक हैं।
जौ-क्षार—हृदय, पाण्डु, ग्रहणी रोग, प्लीहा, आनाह, गलरोग, कफजन्य
कास और अर्शरोग को नष्ट करते हैं। सब प्रकार के क्षार (टंकण, सज्जी,
पापड़ खार आदि) तीक्ष्ण, उष्ण, लघु, रूक्ष, क्लेदि, अन्न और व्रण को पकाने
वाले, पके हुए व्रण को फाड़ने वाले, जलाने वाले, अग्निवर्द्धक, कफ आदि का
छेदन करने वाले अग्नि के समान गुण वाले (उष्ण) होते हैं। कारवी (काला
जीरा,) कुंचीका (मोटा जीरा) ये रुचिकर अग्नि-दीपक, वात, कफ, दुर्गन्ध
को नाश करने वाले हैं। खान पान में किन किन द्रव्यों का व्यवहार होता है या
होना चाहिये इसका निश्चय करना कठिन है, कोई एक नियम नहीं बन सकता,
क्योंकि प्रत्येक मनुष्य की रुचि भिन्न भिन्न है। यह बारहवां आहारयोगी द्रव्यों
का वर्ग भी समाप्त हुआ ॥ २४४-३०६ ॥
इत्याहारयोगिवर्गः ।
शूकधान्यं शमीधान्यं समातीतं प्रशस्यते ।
पुराणं प्रायशो रूक्षं प्रायेणाभिनवं गुरु ॥ ३०७ ॥
यद्यदागच्छति क्षिप्रं तत्तल्लघुतरं स्मृतम् ।
निस्तुषं युक्तिसृष्टं तु सुप्यं लघु विपच्यते ॥ ३०८ ॥
शूकधान्य (चावल, गेहूँ आदि), शमीधान्य (मूंग, मसूर, उड़द
आदि) ये एक साल पुराने प्रशस्त हैं। प्रायः करके पुराने धान्य रूक्ष होते हैं।

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जो धान्य बोने पर जल्दी उग आता है (जैसे ग्रीष्म ऋतु के साठी चावल )
वह हल्का होता है और मूंग आदि दाल की वस्तुओं को सुस्वेदित करके
छिलका उतारकर थोड़ा भून लिया जावे तो ये लघु हो जाते हैं ॥ ३०७-३०८ ॥
मृतं कृशातिमेद्यं च वृद्धं बालं विषैर्हतम् ।
अगोचरमृतं व्याडसूदितं मांसमुत्सृजेत् ॥ ३०९ ॥
अतोऽन्यथा हितं मांसं बृंहणं बलवर्धनम् ।
प्रीणनः सर्वधातूनां हृद्यो मांसरसः परम् ॥ ३१० ॥
शुष्यतां व्याधिमुक्तानां कृशानां क्षीणरेतसाम् ।
बलवर्णार्थिनां चैव रसं विद्याद्यथाऽमृतम् ॥ ३११ ॥
सर्वरोगप्रशमनं यथास्वं विहितं रसम् ।
विद्यात्स्वयं बलकरं वयोबुद्धीन्द्रियायुषाम् ॥ ३१२ ॥
व्यायामनित्याः स्स्रीनित्या मद्यनित्याश्च ये नराः ।
नित्यं मांसरसाहारा नाऽऽतुराः स्युन दुर्बलाः ॥ ३१३ ॥
त्याज्य मांस— मरा हुआ, कृश दुर्बल प्राणी का, बहुत चर्बी वाला, बूढ़े
पशु का, बालक का, विष द्वारा मारा, अगोचरमृत अर्थात् अपने स्वाभाविक
स्थान को छोड़कर दूसरे प्रदेश में पले ( जलीय देश के प्राणी को मरुस्थल में
पोषण करने पर ), व्याड अर्थात् व्याघ्र या सांप आदि हिंसक पशुओं से मारे
हुए पशु का मांस त्याज्य है। इससे विपरीत प्रकार का मांस हितकारी, शरीर
का पोषक, बलकारक है। मांस रस, पुष्टिदायक, सब प्राणियों के लिये हितकारी,
हृदय को प्रिय होता है। सूखते हुए, कृश होते हुए, रोग से उठे हुए, निर्बल,
शुक्र जिनका क्षीण हो गया है, बल या कान्ति को चाहने वाले पुरुषों के लिये
मांस रस अमृत के समान है। मांस रस सब रोगों को शान्त करने वाला है,
स्वर के लिये उत्तम, आयुवर्धन, बुद्धि और इन्द्रियों के लिये हितकारी एवं
बलकारक है। जो पुरुष नित्य प्रति व्यायाम करते, स्त्री संग करते, शराब
पीते हैं और नित्य प्रति मांस रस का सेवन करते हैं, वे न रोगी होते और न
निर्बल होते हैं ॥ ३०९-३१३ ॥
कृमिवातातपहृतं शुष्कं जीर्णमनातर्वम् ।
शाकं निःस्नेहसिद्धं च वर्ज्यं यच्चापरिस्रुतम् ॥ ३१४ ॥
पुराणमामं संक्लिष्टं कृमिव्याडहिमातपैः ।
अदेशकालजं क्लिन्नं यत्स्यात्तच्छमसाधु तत् ॥ ३१५ ॥

  • उन्माद रोग में मांस का निषेध है—यथा 'उन्मादे पिशुतामिक्षाशी चा'

अ० २७ ] २४ सूत्रस्थानम् [ ३४५

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अ० २७ ] २४ सूत्रस्थानम् [ ३४५
हरितानां यथाशाकं निर्देशः साध्वसाधुषु ।
मद्याम्बुगोरसादीनां स्वे स्वे वर्गे विनिश्चयः ॥ ३१६ ॥
त्याज्य शाक—कृमि, वात, धूप से मरा (सूखा), शुष्क, पुराना, ऋतु में
उत्पन्न नहीं हुआ, और जो शाक बिना स्नेह (घी या तेल) के तैयार किया
गया हो और जिसका कि भांप कर पानी न निकाल दिया गया हो, वह शाक
त्याज्य है । जो फल पुराना, (बहुत पका), कच्चा, सड़ा, कृमि सर्प या हिंसक
पशु से खाया हुआ हो, बर्फ या धूप से खराब हो, भले देश में उत्पन्न न हुआ,
क्लिन्न (सड़ा) हो वह फल उत्तम नहीं। पकाने की विधि को छोड़कर हरित-
वर्ग को शाकों की भांति समझना चाहिये । अर्थात् इनमें पानी का निचोड़ना,
घी आदि में संस्कारित करना नहीं है। मद्य, जल, दूध आदि के अच्छे-बुरे का
निश्चय इनके अपने अपने वर्ग में कर दिया है ॥ ३१४-३१६ ॥
यदाहारगुणैः पानं विपरीतं तदिष्यते ।
अन्नानुपानं धातूनां दृष्टं यन्न विरोधि च ॥ ३१७ ॥
आसवानां समुद्दिष्टा अशीतिश्चतुरोत्तरा ।
जलं पेयमपेयं च परीक्ष्यानुपिबेद्धितम् ॥ ३१८॥
स्निग्धोष्णं मारुते शस्तं पित्ते मधुरशीतलम् ।
कफेऽनुपानं रूक्षोष्णं, क्षये मांसरसः परम् ॥ ३१९ ॥
उपवासाध्व-भाष्य-स्त्री मारुतातप-कर्मभिः ।
श्रान्तानामनुपानार्थं पयः पथ्यं यथाऽमृतम् ॥ ३२० ॥
सुरा कृशानां पुष्ट्यर्थमनुपानं प्रशस्यते ।
कार्श्यार्थं स्थूलदेहानामनुशस्तं मधूदकम् ॥ ३२१ ॥
अल्पाग्नीनामनिद्राणां तन्द्रा-शोक-भय-क्लमैः ।
मद्यमांसाचितानां च मद्यमेवानुशस्यते ॥ ३२२॥
अथानुपानकर्म प्रवक्ष्यामि-अनुपानं तर्पयति, प्रीणयति, ऊर्जयति,
पर्याप्तिमभिनिर्वर्तयति, भुक्तमवसादयति, अन्नसंघातं भिनत्ति, मार्दव-
मापायति, क्लेदयति, जरयति, सुखपरिणामितामाशुव्यवायितां चाऽऽ-
हारस्योपजनयतीति ॥३२३॥
अनुपान—जो पेय पदार्थ आहार गुण के विपरीत (यथा-उष्ण आहार के
पीछे शीत अनुपान*) तथा जो धातुओं का विरोधी न हो अपितु साम्य करने


  • अनु-पश्चात्-भोजनात् इत्यर्थः, पानं जलादिपानम् ।। दाह के पीछे मधुर, दूध वा
    खीर के पीछे कांजी (खट्टा) अनुपान न देवें, इसलिये कि धातुओं का विरोधी न हो ।
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वाला हो, वह अनुपान प्रशस्त है। 'यज्जःपुरुषीय' अध्याय में चौरासी प्रकार के
आसव कहे हैं। जल पीना हितकारी है, या नहीं इसका विचार करके हितकारी
जल पीना चाहिये। वायुदोष में स्निग्ध और उष्ण; पित्तविकार में मधुर और
शीतल; कफ में रूक्ष एवं उष्ण तथा क्षय में रस का अनुपान श्रेष्ठ है।
उपवास से, मार्ग चलने से ऊँचे या बहुत बोलने से स्त्रीसंग, वायु, धूप या पंच
कर्मों के कारण जो थके हुए हों, उनको अनुपान देने के लिये दूध अमृत के
समान पथ्य, हितकारी है। मोटे शरीर वालों को पतला बनाने के लिये पानी में
शहद मिलाकर देना उत्तम है। जिनको मन्दाग्नि हो, नींद न आती हो, तन्द्रा,
शोक, भय, श्रम से थके, मद्य मास सेवन करने वालों के लिये मद्य अनुपान
ही श्रेष्ठ है।
अनुपान के कर्म (गुण) कहते हैं—अनुपान शरीर का तर्पण करता है,
शरीर को और जीवन को पुष्ट करता है, तेज बढ़ाता है, खाये हुए भोजन से
मिलकर शरीर में मिल जाता है, खाये हुए को पचाता है, मिले हुए अन्न को
तोड़ता, पृथक् पृथक् करता है। शरीर में कोमलता है, आहार को क्लिन्न करता,
पचाता और सुख पूर्वक पचाकर शीघ्र शरीर में व्याप्त कर देता है ॥ ३२३॥
भवति चात्र—अनुपानं हितं युक्तं तर्पयत्याशु मानवम् ।
सुखं पचति चाऽऽहारमायुषे च बलाय च ॥ ३२४ ॥
योग्य हितकारी अनुपान मनुष्य को शीघ्र तर्पण कर देता है। भोजन को
सुखपूर्वक पचाता है और आयु एवं बल को बढ़ाता है ॥ ३२४ ॥
नोर्ध्वाङ्गमारुताविष्टा न हिक्का-श्वास-कासिनः ।
न गीत-भाष्याध्ययन-प्रसक्ता नोरसि क्षताः ॥ ३२५ ॥
पिबेयुरुदकं भुक्त्वा, तद्धि कण्ठोरसि स्थितम् ।
स्नेहमाहारजं हत्वा भूयो दोषाय कल्पते ॥ ३२६ ॥
अनुपानैकदेशोऽयमुक्तः प्रायोपयोगिकः ।
द्रव्यं तु न हि निर्दिष्टुं शक्यं कार्त्स्न्येन नामभिः ॥ ३२७ ॥
यथा नानौषधं किंचिद्देशजानां वचो यथा ।
द्रव्यं तत्तत्तथा वाच्यमनुक्तमिह यद्भवेत् ॥ ३२८ ॥
किनको अनुपान नहीं करना चाहिये—कण्ठ, छाती, शिर, (ऊर्ध्वांग) में
जब वायु का जोर हो, जिनको हिचकी, श्वास, कास रोग हों, गीत, भाषण,
अध्ययन में जो लगे रहते हों, जिनकी छाती में चोट लगी हो इनको भोजन

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करके यानी अनुपान रूप में नहीं पीना चाहिये । इस अवस्था में पिया
पानी कण्ठ, छाती ( आमाशय ) में स्थित आहारजन्य स्नेह को दूषित करके
नाना प्रकार के रोग उत्पन्न करता है ।
प्रायः उपयोग में आने वाले आहार, खान-पान का कुछ भाग यहाँ पर
कह दिया है । खानपान के सब द्रव्यो का नाम से कथन करना सम्भव नहीं है,
जिस प्रकार की कोई भी औषध रहित वनस्पति नहीं, जिस प्रकार देश वाले उसे
जैसा गुणकारी या हानि कारक कहते हों, उसके अनुसार यहां पर न कहे हुए
द्रव्य को समझना चाहिये । गुणज्ञान के विषय में और भी कहते हैं ॥३२८॥
चरः शरीरावयवाः स्वभावो धातवः क्रिया ।
लिङ्गं प्रमाणं संस्कारो मात्राचात्र परीक्ष्यते ॥ ३२९ ॥
चरोऽनूप-जलाकाश-धन्वाद्यो भक्ष्यसंविधिः ।
जलजानूपजांश्चैव जलानूपचराश्च ये ॥ ३३० ॥
गुरुभक्ष्याश्च ये सत्त्वाः सर्वे ते गुरवः स्मृताः ।
लघुभक्ष्यास्तु लघवो धन्वजाधन्वचारिणः ॥ ३३१ ॥
शरीरावयवाः सक्थि-शिर-स्कन्धाद्यस्तथा ।
सक्थिमांसाद् गुरुः स्कन्धस्ततः क्रोडस्ततः शिरः ॥ ३३२ ॥
वृषणौ चर्ममेढ्रं च श्रोणी वृक्कौ यकृद् गुदम् ।
मांसाद् गुरुतरं विद्याद्यथास्वं मध्यमस्थि च ॥ ३३३ ॥
स्वभावाल्लघवौ मुद्गास्तथा लावकपिञ्जलाः ।
स्वभावाद् गुरवो माषा वराहमहिषास्तथा ॥ ३३४ ॥
धातूनां शोणिताद्यानां गुरुं विद्याद्यथोत्तरम् ।
अलसेभ्यो विशिष्यन्ते प्राणिनो ये बहुक्रियाः ॥ ३३५ ॥
गौरवं लिङ्गसामान्ये पुंसां स्त्रीणां च लाघवम् ।
महाप्रमाणा गुरवः स्वजातौ लघवोडन्यथा ॥ ३३६ ॥
चर ( जिस स्थान पर विचरता है ), शरीरावयव ( शरीर का अंग ),
स्वभाव ( प्रकृति ), धातु ( रस, रक्तादि धातु ), क्रिया, लिंग, प्रमाण, संस्कार,
मात्रा ये बातें गुरु लघु विचार करने में देखनी चाहिये । चर, गति रूपचर
और भक्ष्य रूप चर भेद से दो प्रकार के हैं । इनमें गति रूप चर आनूप
अर्थात् जलबहुल प्रदेश में विचरने वाले, आकाश में, धन्व देश में तथा जल
आनूप दोनों देशों में विचरने वाले हैं । भक्ष्य रूप चर गुरु, शीतल पदार्थ

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३७२ चरकसंहिता [ अ० २७
खाते हैं ऐसे दोनों प्रकार के प्राणी गुरु होते हैं। धन्व प्रदेश में उत्पन्न या धन्व
(रेतीले) देश में विचरने वाले तथा लघु भोजन करने वाले प्राणी लघु
होते हैं।
जांघ, शिर, स्कन्ध आदि शरीर के अवयव हैं। इनमें जंघा से स्कन्ध,
स्कन्ध से क्रोड़ और क्रोड़ से शिर, का मांस गुरु होता है। शिर से वृषण और
वृषण से इनका चर्म, फिर शिश्न, फिर श्रोणी भाग, फिर वृक्क (गुर्दे) और
फिर यकृत्, उसके पीछे गुर्दा और पीछे मध्यास्थि (मज्जा या अस्थि के ऊपर
का मांस) गुरु होता है।
स्वभाव या प्रकृति से मूंग, बटेर कपिंजल लघु होते हैं और उड़द, सूअर,
भैंस ये गुरु होते हैं। धातुओं में रक्त मांस, और मेद ये क्रमशः उत्तरोत्तर गुरु
होते जाते हैं। जो प्राणी बहुत चेष्टाशील होते हैं, वे आलसी स्वभाव वाले
प्राणियों से भिन्न अर्थात् लघु होते हैं (आलसी प्राणी गुरु होते हैं) लिंग की
दृष्टि से नर गुरु और मादा पशु लघु होते हैं, (पशुओ में यह नियम है,
परन्तु पक्षियों में नर लघु होता है।) अपनी जाति में बड़े शरीर वाले गुरु और
छोटे शरीर के प्राणी लघु होते हैं ॥ ३२६-३३६ ॥
गुरुणां लाघवं विद्यात्संस्कारात्सविपर्ययम् ।
व्रीहेर्लाजा यथा च स्युः सक्तूनां सिद्धपिण्डिकाः ॥ ३३७ ॥
अल्पादाने गुरूणां च लघूनां चातिसेवने ।
मात्राकारणमुद्दिष्टं द्रव्याणां गुरुलाघवे ॥ ३३८ ॥
गुरूणामल्पमादेयं लघूनां तृप्तिरिष्यते ।
मात्रां द्रव्याण्यपेक्षन्ते मात्रा चाग्निमपेक्षते ॥ ३३९ ॥
बलमारोग्यमायुश्च प्राणाश्चाग्नौ प्रतिष्ठिताः ।
अन्नपानेन्धनैश्चाग्निर्दीप्यते शाम्यतेऽन्यथा १ ॥ ३४० ॥
गुरुलाघवचिन्तेयं प्रायेणाल्पबलान् प्रति ।
मन्दक्रियाननारोग्यान् सुकुमारान् सुखोचितान् ॥ ३४१ ॥
दीप्ताग्नयः खराहाराः कर्मनित्या महादराः ।
ये नराः प्रति ताँश्चिन्त्यं नावश्यं गुरुलाघवम् ॥ ३४२ ॥
संस्कार द्वारा गुरु पदार्थ लघु और लघु पदार्थ गुरु बन जाते हैं। जैसे
व्रीहि (धान्य) स्वभाव से गुरु हैं, परन्तु लाजा के रूप में लघु बन जाते हैं
और सत्तू स्वभाव से लघु होने पर भी उनकी आग से पकाई पिण्डिकायें
१. ज्वल्यति व्येति चाम्यथा इति वा पाठः ।

अ० २७] सूत्रस्थानम् २७३

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अ० २७] सूत्रस्थानम् २७३

गुरु होजाती हैं। गुरु पदार्थों को थोड़ा और लघु पदार्थों को अधिक सेवन
करने से वे गुरु हो जाते हैं। इसलिये गुरु लघुता के निश्चय करने में भी मात्रा
कारण है। गुरु पदार्थों को थोड़ा लेना और लघु पदार्थों को तृप्तिपूर्वक खाना
चाहिये जिससे पेट फूल न जाय, श्वास चढ़ने न लगे। द्रव्य, मात्रा अर्थात्
परिमाण की अपेक्षा करते हैं और मात्रा अग्नि की अपेक्षा करती है। बल,
आरोग्यता, आयु और प्राण अग्नि पर आश्रित हैं—अग्नि के अधीन हैं। अन्न
पान (खान, पान) रूपी इन्धन से अग्नि प्रदीप्त होती है, और खान पान के
न मिलने से वह बुझ जाती है, शान्त होजाती है। जो पुरुष अल्प बल वाले
हों, मन्द क्रिया, मन्द-चेष्टावाले, अनारोग्य, रोगी, सुकुमार अर्थात् नाजुक
प्रकृति, के आराम का जीवन व्यतीत करने वाले हैं उनके विषय में गुरु-लघु
का विचार करना चाहिये। जिनकी अग्नि प्रबल हो, जो कठिन आहार को
भी पचा सकते हों, नित्य मेहनत करने वाले, बड़े पेट वाले, जिनकी अग्नि
बढ़ी हुई हो उनके विषय में गुरु-लघु का विचार करने की आवश्यकता
नहीं है ॥ ३३७-३४२ ॥
द्विसाभिर्जुहुयान्नित्यमन्तराग्निं समाहितः ।
अन्नपानसमिद्भिर्ना मात्राकालौ विचारयन् ॥ ३४३ ॥
आहिताग्निः सदा पथ्यान्यन्तराग्नौ जुहोति यः ।
दिवसे दिवसे ब्रह्म जपत्यथ ददाति च ॥ ३४४ ॥
नरं निःश्रेयसे युक्तं सात्म्यज्ञं पानभोजने ।
भजन्ते नाऽऽमयाः केचिद्भाविनोऽप्यन्तरादृते ॥ ३४५ ॥
षट्त्रिंशतं सहस्राणि रात्रीणां हितभोजनः ।
जीवत्यनातुरो जन्तुर्जितात्मा संमतः सताम् ॥ ३४६ ॥
मनुष्य को चाहिये कि मात्रा और काल का विचार करके, हितकारी खान-
पान रूपी समिधाओं से अन्तराग्नि में नित्यप्रति संयमित चित्त से हवन करे।
जो आहिताग्नि हवन करने वाला नित्य प्रति दोनों समय अन्तराग्नि में हितकारी
अन्न की आहुति देकर ब्रह्म (ओंकार) का जप करता है और यथाशक्ति दान
करता है, जिसको खान-पान सम्बन्धी सात्म्य का ज्ञान होता है, ऐसे पुण्यवान्
पुरुष को कारण के बिना कभी भी रोग नहीं होते। इसी प्रकार संचित धर्म के
प्रभाव से जन्मान्तर में भी रोग नहीं होते। हितकर आहार करने वाला व्यक्ति
३६००० रात्रि (१०० वर्ष) पर्य्यन्त नीरोगी, जितेन्द्रिय, और सज्जनों से
पूजित होकर निवास करता है ॥ ३४३-३४६ ॥