चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व अग्निवेश
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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Read in contextजो धान्य बोने पर जल्दी उग आता है (जैसे ग्रीष्म ऋतु के साठी चावल )
वह हल्का होता है और मूंग आदि दाल की वस्तुओं को सुस्वेदित करके
छिलका उतारकर थोड़ा भून लिया जावे तो ये लघु हो जाते हैं ॥ ३०७-३०८ ॥
मृतं कृशातिमेद्यं च वृद्धं बालं विषैर्हतम् ।
अगोचरमृतं व्याडसूदितं मांसमुत्सृजेत् ॥ ३०९ ॥
अतोऽन्यथा हितं मांसं बृंहणं बलवर्धनम् ।
प्रीणनः सर्वधातूनां हृद्यो मांसरसः परम् ॥ ३१० ॥
शुष्यतां व्याधिमुक्तानां कृशानां क्षीणरेतसाम् ।
बलवर्णार्थिनां चैव रसं विद्याद्यथाऽमृतम् ॥ ३११ ॥
सर्वरोगप्रशमनं यथास्वं विहितं रसम् ।
विद्यात्स्वयं बलकरं वयोबुद्धीन्द्रियायुषाम् ॥ ३१२ ॥
व्यायामनित्याः स्स्रीनित्या मद्यनित्याश्च ये नराः ।
नित्यं मांसरसाहारा नाऽऽतुराः स्युन दुर्बलाः ॥ ३१३ ॥
त्याज्य मांस— मरा हुआ, कृश दुर्बल प्राणी का, बहुत चर्बी वाला, बूढ़े
पशु का, बालक का, विष द्वारा मारा, अगोचरमृत अर्थात् अपने स्वाभाविक
स्थान को छोड़कर दूसरे प्रदेश में पले ( जलीय देश के प्राणी को मरुस्थल में
पोषण करने पर ), व्याड अर्थात् व्याघ्र या सांप आदि हिंसक पशुओं से मारे
हुए पशु का मांस त्याज्य है। इससे विपरीत प्रकार का मांस हितकारी, शरीर
का पोषक, बलकारक है। मांस रस, पुष्टिदायक, सब प्राणियों के लिये हितकारी,
हृदय को प्रिय होता है। सूखते हुए, कृश होते हुए, रोग से उठे हुए, निर्बल,
शुक्र जिनका क्षीण हो गया है, बल या कान्ति को चाहने वाले पुरुषों के लिये
मांस रस अमृत के समान है। मांस रस सब रोगों को शान्त करने वाला है,
स्वर के लिये उत्तम, आयुवर्धन, बुद्धि और इन्द्रियों के लिये हितकारी एवं
बलकारक है। जो पुरुष नित्य प्रति व्यायाम करते, स्त्री संग करते, शराब
पीते हैं और नित्य प्रति मांस रस का सेवन करते हैं, वे न रोगी होते और न
निर्बल होते हैं ॥ ३०९-३१३ ॥
कृमिवातातपहृतं शुष्कं जीर्णमनातर्वम् ।
शाकं निःस्नेहसिद्धं च वर्ज्यं यच्चापरिस्रुतम् ॥ ३१४ ॥
पुराणमामं संक्लिष्टं कृमिव्याडहिमातपैः ।
अदेशकालजं क्लिन्नं यत्स्यात्तच्छमसाधु तत् ॥ ३१५ ॥
- उन्माद रोग में मांस का निषेध है—यथा 'उन्मादे पिशुतामिक्षाशी चा'