Skip to content
SarvaKosh
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

Report a copyright issue

DevanagariSanskritpublished639 pages

Page 388 of 639

Read in context
Page 388

वाला हो, वह अनुपान प्रशस्त है। 'यज्जःपुरुषीय' अध्याय में चौरासी प्रकार के
आसव कहे हैं। जल पीना हितकारी है, या नहीं इसका विचार करके हितकारी
जल पीना चाहिये। वायुदोष में स्निग्ध और उष्ण; पित्तविकार में मधुर और
शीतल; कफ में रूक्ष एवं उष्ण तथा क्षय में रस का अनुपान श्रेष्ठ है।
उपवास से, मार्ग चलने से ऊँचे या बहुत बोलने से स्त्रीसंग, वायु, धूप या पंच
कर्मों के कारण जो थके हुए हों, उनको अनुपान देने के लिये दूध अमृत के
समान पथ्य, हितकारी है। मोटे शरीर वालों को पतला बनाने के लिये पानी में
शहद मिलाकर देना उत्तम है। जिनको मन्दाग्नि हो, नींद न आती हो, तन्द्रा,
शोक, भय, श्रम से थके, मद्य मास सेवन करने वालों के लिये मद्य अनुपान
ही श्रेष्ठ है।
अनुपान के कर्म (गुण) कहते हैं—अनुपान शरीर का तर्पण करता है,
शरीर को और जीवन को पुष्ट करता है, तेज बढ़ाता है, खाये हुए भोजन से
मिलकर शरीर में मिल जाता है, खाये हुए को पचाता है, मिले हुए अन्न को
तोड़ता, पृथक् पृथक् करता है। शरीर में कोमलता है, आहार को क्लिन्न करता,
पचाता और सुख पूर्वक पचाकर शीघ्र शरीर में व्याप्त कर देता है ॥ ३२३॥
भवति चात्र—अनुपानं हितं युक्तं तर्पयत्याशु मानवम् ।
सुखं पचति चाऽऽहारमायुषे च बलाय च ॥ ३२४ ॥
योग्य हितकारी अनुपान मनुष्य को शीघ्र तर्पण कर देता है। भोजन को
सुखपूर्वक पचाता है और आयु एवं बल को बढ़ाता है ॥ ३२४ ॥
नोर्ध्वाङ्गमारुताविष्टा न हिक्का-श्वास-कासिनः ।
न गीत-भाष्याध्ययन-प्रसक्ता नोरसि क्षताः ॥ ३२५ ॥
पिबेयुरुदकं भुक्त्वा, तद्धि कण्ठोरसि स्थितम् ।
स्नेहमाहारजं हत्वा भूयो दोषाय कल्पते ॥ ३२६ ॥
अनुपानैकदेशोऽयमुक्तः प्रायोपयोगिकः ।
द्रव्यं तु न हि निर्दिष्टुं शक्यं कार्त्स्न्येन नामभिः ॥ ३२७ ॥
यथा नानौषधं किंचिद्देशजानां वचो यथा ।
द्रव्यं तत्तत्तथा वाच्यमनुक्तमिह यद्भवेत् ॥ ३२८ ॥
किनको अनुपान नहीं करना चाहिये—कण्ठ, छाती, शिर, (ऊर्ध्वांग) में
जब वायु का जोर हो, जिनको हिचकी, श्वास, कास रोग हों, गीत, भाषण,
अध्ययन में जो लगे रहते हों, जिनकी छाती में चोट लगी हो इनको भोजन