चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व अग्निवेश
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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धाना-पर्पट-पूपांस्तान्बुद्ध्वा निर्दिशेत्तथा ।
गेहूं के आटे को घी आदि स्नेह में मथकर या घी आदि स्नेह में पका कर
नाना प्रकार के जो खाद्य पदार्थ बनाये जाते हैं वे सब गुरु, तृप्तिकारक,
पौष्टिक (वीर्यवर्धक) और हृदय को प्रिय होते हैं । इसी प्रकार गेहूं आदि के
जो पदार्थ अधिक अग्निसंयोग से तैयार किये जाते हैं, जो कि स्वभाव से गुरु
हैं, वे भी संस्कार द्वारा लघु बन जाते हैं । इसी प्रकार गेहूं की पीठी, धान्य
पर्पट, पूप आदि वस्तुएं भारी होने पर संस्कार के कारण लघु बन जाती हैं ।
इसलिये वैद्य को संस्कार का विचार करके गुणों का निश्चय करना
चाहिये ॥ २६६-२७० ॥
पृथुका गुरवो भृष्टानर्भक्षयेदल्पशस्तु तान् ॥ २७१ ॥
यावा विष्टभ्य जीर्यन्ति सरसा भिन्नवर्चसः ।
सूप्यान्नविकृता भक्ष्या वातला रूक्षशीतलाः ॥ २७२ ॥
सकटुस्नेहलवणानल्पशो भक्षयेत्तु तान् ।
मृदुपाकाश्च ये भक्ष्याः स्थूलाश्च कठिनाश्च ये ॥ २७३ ॥
गुरवस्ते व्यतिक्रान्तपाकाः पुष्टिवलप्रदाः ।
पृथुक (चिवड़ा) भारी होता है। भुने हुए चिवड़े को थोड़ा खाना
चाहिये । याव (जौ का बना चिवड़ा) पेट में अवरोध करके जीर्ण होते हैं ।
सरस (न भुने हुए जौ) रेचक हैं। सूप्य अन्न (मूं ग, उड़द आदि से बनी
वस्तुएं) वायुकारक, रूक्ष, शीतल होते हैं। इनको कटु रस, स्नेह (घी या
तैल), नमक के साथ थोड़ी मात्रा में खाना चाहिये । जो खाद्य पदार्थ मीठी
आँच पर बनते हैं और जो स्थूल और कठोर होते हैं, वे गुरु, एवं देर में पचते
हैं तथा पुष्टि और बल देते हैं ॥ २७१-२७३ ॥
द्रव्यसंयोगसंस्कारं द्रव्यमानं पृथक्तथा ॥ २७४ ॥
भक्ष्याणामादिशेद् बुद्ध्वा यथास्वं गुरुलाघवम् ।
नानाद्रव्यैः समायुक्तः पक्वामक्लिन्नभर्जितैः ❁ ॥ २७५ ॥
विमर्दको गुरुहृद्यो वृष्यो बलवतां हितः ।
रसाला बृंहणी वृष्या स्निग्धा बल्या रुचिप्रदा ॥ २७६ ॥
स्नेहनं तर्पणं हृद्यं वातघ्नं सगुडं दधि ।
किसी पदार्थ के गुरु या लघु होने का निश्चय उस पदार्थ के मूल स्वभाव,
संयोग, संस्कार (पकाने की विधि)), मिलने के परिणाम (राशि), आदि
सब बातों का विचार करके करना चाहिये । जिसमें ये बातें गुरु पक्ष में जाती
❁ 'पक्वा वह्निषु भर्जितैः ॥ इति वा पाठः ॥