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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

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DevanagariSanskritpublished639 pages

Page 381 of 639

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Page 381

अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३६३
हों वे वस्तु गुरु समझना, जिसमें लघु पक्ष में हो वह वस्तु हल्की समझनी चाहिये ।
विमर्दक (मांस को नाना प्रकार से बनाने की विधि से), नाना प्रकार के
पदार्थों से मिला हुआ, पकाया, आम, क्लिन्न और भूने हुए मेद से
गुरु, हृदय के लिये, प्रिय, वीर्यवर्धक और बलवान् पुरुषों के लिये
हितकारी है। मलाई वाली दही को खूब मथकर इसमें दालचीनी, इलायची,
तेजपात, नागकेशर, अजवायन, गुड़, अदरक, सोंठ के साथ मिलाकर तैयार की
रसाला पुष्टिकारक, वृष्य, वीर्यवर्धक, स्निग्ध, बलकारक, रुचिकारक है। गुड़के
साथ दही स्नेहक तृप्तिकारक,हृदय के लिये प्रिय और वातनाशक है। २७४-२७६॥
द्राक्षा-खर्जूर-कोलानां गुरु विष्टम्भि पानकम् ॥ २७७ ॥
परूषकाणां क्षौद्रस्य यच्चेक्षुविकृतिं प्रति ।
तेषां कट्वम्लसंयोगाः पानकानां पृथक् पृथक् ॥२७८॥
द्रव्यमानं च विज्ञाय गुणकर्माणि निर्दिशेत् ।
कट्वम्ल-स्वादु-लवणा लघवो रागषाडवाः ॥ २७९ ॥
मुखप्रियाश्च हृद्याश्च दीपना भक्तरोचनाः ।
आम्रामलकलेहाश्च बृंहणा बलवर्धनाः ॥ २८० ॥
रोचनास्तर्पणाश्चोक्ताः स्नेहमाधुर्यगौरवात् ।
बुद्ध्वा संयोगसंस्कारं द्रव्यमानं च तच्छ्रितम् ॥ २८१ ॥
गुणकर्माणि लेहानां तेषां तेषां तथा वदेत् ।
द्राक्षा, खजूर, बेर, फालसा, शहद, गन्ने का रस इनके रस में गुड़ या
शर्कर डालकर बनाया हुआ शरबत, गुरु, मल-मूत्र का रोधक होता है। इन
शरबतों में कटु या अम्ल वस्तुओं का योग तथा द्रव्य परिमाण जानकर रोग
एवं रुचि के अनुसार पृथक् पृथक् रूप में देना चाहिये, इनके गुण कर्म पृथक्
२ होजाते हैं । गुड़ के साथ आम रस को पका तेल, सोंठ आदि मिलाकर बनाया
रस, वा अनार, दाल, फालसा, जामुन रसादि से बना मधुर पाक 'रागषाडव'
कहाता है । वह कटु, अम्ल, स्वादु नमकीन, लघु, स्वादिष्ट, हृदय को प्रिय,
अग्निदीपक और खाने में रुचिकर होता है। आम या आंवले के रस से बनाये
चाटन, पुष्टिकार्क, बलवर्द्धक, रुचिकारक, तृप्तिकारक, होते हैं, क्योंकि इनमें
स्नेह मधुरता और भारीपन होता है। द्रव्यों के संयोग संस्कार (पाक-विधि) और
द्रव्यों की मात्रा को चाटने योग्य (लेहों)में देखकर विचार कर गुण कर्म का निश्चय
करना चाहिये ॥ २७७-२८१ ॥