तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 233, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनु० ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ २२७
देशोऽन्नस्तुतये, स्तुतिभाक्त्वं | अन्नकी स्तुतिके लिये है और अन्नकी
| स्तुतिपात्रता ब्रह्मोपलब्धिका साधन
चान्नस्य ब्रह्मोपलब्ध्युपायत्वात् । | होनेके कारण है ।
प्राणो वा अन्नम्, शरीरान्त- | प्राण ही अन्न है; क्योंकि प्राण
र्भावात्प्राणस्य । यद्यस्यान्तः- | शरीरके भीतर रहनेवाला है । जो
प्रतिष्ठितं भवति तत्तस्यान्नं भव- | जिसके भीतर स्थित रहता है वह
तीति । शरीरे च प्राणः प्रति- | उसका अन्न हुआ करता है । प्राण
ष्ठितस्तस्मात्प्राणोऽन्नं शरीरमन्ना- | शरीरमें स्थित है, इसलिये प्राण
दम् । तथा शरीरमप्यन्नं प्राणो- | अन्न है और शरीर अन्नाद है ।
ऽन्नादः । कस्मात् ? प्राणे शरीरं | इसी प्रकार शरीर भी अन्न है और
प्रतिष्ठितम्; तन्निमित्तत्वाच्छरी- | प्राण अन्नाद है; कैसे ?—प्राणमें
रस्थितेः । तस्मात्तदेतदुभयं शरीरं | शरीर स्थित है; क्योंकि शरीरकी
प्राणश्चान्न मन्नादश्च । येनान्योन्य- | स्थिति प्राणके ही कारण है अतः
स्मिन्प्रतिष्ठितं तेनान्नम् । येना- | ये दोनों शरीर और प्राण अन्न और
न्योन्यस्य प्रतिष्ठा तेनान्नादः । | अन्नाद हैं; क्योंकि वे एक दूसरेमें
तस्मात्प्राणः शरीरं चोभयमन्न- | स्थित हैं इसलिये अन्न हैं और
मन्नादं च । | क्योंकि एक दूसरेके आधार हैं
| इसलिये अन्नाद हैं । अतएव प्राण
| और शरीर दोनों ही अन्न और
| अन्नाद हैं ।
स य एवमेतदन्नमन्ने प्रति- | वह जो इस प्रकार अन्नको अन्नमें
ष्ठितं वेद प्रतितिष्ठत्यन्नादा- | स्थित जानता है, अन्न और अन्नाद-
त्मनैव । किं चान्नवानन्नादो भव- | रूपसे ही स्थित होता है तथा अन्न-
तीत्यादि पूर्ववत् ॥१॥ | वान् और अन्नाद होता है—इत्यादि
| शेष अर्थ पूर्ववत् है ॥ १ ॥
इति भृगुवल्ल्यां सप्तमोऽनुवाकः ॥७॥
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri