तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 237, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनु० १० ] शाङ्करभाष्यार्थ २३१
इत्युपासीत । पर्यैणं म्रियन्ते द्विषन्तः सपत्नाः । परि
येऽप्रिया भ्रातृव्याः । स यश्चायं पुरुषे यश्चासावादित्ये
स एकः ॥ ४ ॥
अपने यहाँ रहनेके लिये आये हुए किसीका भी परित्याग न करे।
यह व्रत है । अतः किसी-न-किसी प्रकारसे बहुत-सा अन्न प्राप्त करे;
क्योंकि वह (अन्नोपासक) उस (गृहगत अतिथि) से 'मैंने अन्न
तैयार किया है' ऐसा कहता है । जो पुरुष मुख्यतः (प्रथम अवस्थामें
अथवा मुख्यवृत्तिसे यानी सत्कारपूर्वक) सिद्ध किया हुआ अन्न देता है
उसे मुख्यवृत्तिसे ही अन्नकी प्राप्ति होती है । जो मध्यतः (मध्यम आयुमें
अथवा मध्यम वृत्तिसे) सिद्ध किया हुआ अन्न देता है उसे मध्यम वृत्तिसे
ही अन्नकी प्राप्ति होती है । तथा जो अन्ततः (अन्तिम अवस्थामें अथवा
निकृष्ट वृत्तिसे) सिद्ध किया हुआ अन्न देता है उसे निकृष्ट वृत्तिसे ही
अन्न प्राप्त होता है ॥ १ ॥ जो इस प्रकार जानता है [उसे पूर्वोक्त फल
प्राप्त होता है । अब आगे प्रकारन्तरसे ब्रह्मकी उपासनाका वर्णन किया
जाता है—] ब्रह्म वाणीमें क्षेम (प्राप्त वस्तुके परिरक्षण) रूपसे [स्थित
है—इस प्रकार उपासनीय है], योगक्षेमरूपसे प्राण और अपानमें,
कर्मरूपसे हाथोंमें, गतिरूपसे चरणोंमें और त्यागरूपसे पायुमें [उपासनीय
है], यह मनुष्यसम्बन्धिनी उपासना है । अब देवताओंसे सम्बन्धित
उपासना कही जाती है—तृप्तिरूपसे वृष्टिमें, बलरूपसे विद्युत्में ॥ २ ॥
यशोरूपसे पशुओंमें, ज्योतिरूपसे नक्षत्रोंमें, पुत्रादि प्रजा, अमृतत्व और
आनन्दरूपसे उपस्थमें तथा सर्वरूपसे आकाशमें [ब्रह्मकी उपासना करे]।
वह ब्रह्म सबका प्रतिष्ठा (आधार) है—इस भावसे उसकी उपासना
करे। इससे उपासक प्रतिष्ठावान् होता है । वह महः [नामक व्याहृति
अथवा तेज] है—इस भावसे उसकी उपासना करे। इससे उपासक महान्
होता है । वह मन है—इस प्रकार उपासना करे । इससे उपासक
मानवान् (मनन करनेमें समर्थ) होता है ॥ ३ ॥ वह नमः है—इस
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