तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
१२२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
१२२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
वाम भाग (संस्कृत पाठ)
स हि पुरुष इह विद्ययान्तर-
तमं ब्रह्म संक्रामयितुमिष्टः । तस्य
च बाह्याकारविशेषेष्वनात्मस्वा-
त्मभाविता बुद्धिरनालम्ब्य विशेषं
कंचित्सहसान्तरतमप्रत्यगात्म-
विषया निरालम्बना च कर्तु-
मशक्येति दृष्टशरीरात्मसामान्य-
कल्पनया शाखाचन्द्रनिदर्शन-
वदन्तः प्रवेशयन्नाह —
तस्येदमेव शिरः । तस्यास्य
पुरुषस्यान्नरसमय-
स्येदमेव शिरः
प्रसिद्धम् । प्राणमयादिष्वशिरसां
शिरस्त्वदर्शनादिहापि तत्प्रसङ्गो
मा भूदितीदमेव शिर इत्युच्यते ।
एवं पक्षादिषु योजना । अयं
पार्श्व-टिप्पणी (Marginal Note)
पक्ष्यात्मनान्न-
मयस्य निरूपणम्
दक्षिण भाग (हिन्दी अनुवाद)
उस पुरुषको ही यहाँ ( इस
वल्लीमें ) विद्याके द्वारा सबकी अपेक्षा
अन्तरतम ब्रह्मके पास ले जाना
अभीष्ट है । किन्तु उसकी बुद्धि,
जो बाह्याकार विशेषरूप अनात्म
पदार्थोंमें आत्मभावना किये हुए है,
किसी विशेष आलम्बनके बिना
एकाएक सबसे अन्तरतम प्रत्य-
गात्मसम्बन्धिनी तथा निरालम्बना
की जानी असम्भव है; अतः इस
दिखलायी देनेवाले शरीररूप आत्मा-
की समानताकी कल्पनासे शाखा-
चन्द्र दृष्टान्तके समान उसका
भीतरकी ओर प्रवेश कराकर श्रुति
कहती है—
उसका यह [ शिर ] ही शिर है ।
उस इस अन्नरसमय पुरुषका यह
प्रसिद्ध शिर ही [ शिर है ] ।
[ अगले अनुवाकमें ] प्राणमय आदि
शिररहित कोशोंमें भी शिरस्त्व देखा
जानेके कारण यहाँ भी वही बात
न समझी जाय [ अर्थात् इस अन्नमय
कोशको भी वस्तुतः शिररहित न
समझा जाय ] इसलिये 'यह प्रसिद्ध
शिर ही उसका शिर है'—ऐसा कहा
जाता है । इसी प्रकार पक्षादिके
विषयमें लगा लेना चाहिये । पूर्वाभि-
पाद-लेख (Footer)
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अनु० १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२३
दक्षिणो बाहुः पूर्वाभिमुखस्य | मुख व्यक्तिका यह दक्षिण [ दक्षिण
दक्षिणः पक्षः । अयं सव्यो बाहु- | दिशाकी ओरका ] बाहु दक्षिण
रुत्तरः पक्षः । अयं मध्यमो देह- | पक्ष है, यह वाम बाहु उत्तर पक्ष
भाग आत्माङ्गानाम् । "मध्यं | है तथा यह देहका मध्यभाग अङ्गों-
ह्येषामङ्गानामात्मा" इति श्रुतेः । | का आत्मा है; जैसा कि "मध्यभाग
इदमिति नाभेरधस्ताद्यदङ्गं | ही इन अङ्गोंका आत्मा है" इस
तत्पुच्छं प्रतिष्ठा । प्रतितिष्ठत्यन- | श्रुतिसे प्रमाणित होता है । और
येति प्रतिष्ठा पुच्छमिव पुच्छम् | यह जो नाभिसे नीचेका अङ्ग है
अधोलम्बनसामान्याद्यथा गोः | वही पुच्छ—प्रतिष्ठा है । इसके
पुच्छम् । | द्वारा वह स्थित होता है, इसलिये यह
एतत्प्रकृत्योत्तरेषां प्राणमया- | उसकी प्रतिष्ठा है । नीचेकी ओर
दीनां रूपकत्वसिद्धिः; मूषानिषि- | लटकनेमें समानता होनेके कारण
क्तद्रुतताम्रप्रतिमावत् । तदप्येष | वह पुच्छके समान पुच्छ है; जैसे
श्लोको भवति । तत्तस्मिन्नेवार्थे | कि गौकी पूँछ ।
ब्राह्मणोक्तेऽन्नमयात्मप्रकाशक | इस अन्नमय कोशसे आरम्भ
एष श्लोको मन्त्रो भवति ॥ १ ॥ | करके ही साँचेमें डाले हुए पिघले
| ताँबेकी प्रतिमाके समान आगेके
| प्राणमय आदि कोशोंके रूपकत्वकी
| सिद्धि होती है । उसके विषयमें ही
| यह श्लोक है; अर्थात् अन्नमय
| आत्माको प्रकाशित करनेवाले उस
| ब्राह्मणोक्त अर्थमें ही यह श्लोक
| अर्थात् मन्त्र है ॥ १ ॥
इति ब्रह्मानन्दवल्ल्यां प्रथमोऽनुवाकः ॥ १ ॥
द्वितीय अनुवाक
अन्नकी महिमा तथा प्राणमय कोशका वर्णन
अन्नाद्वै प्रजाः प्रजायन्ते । याः काश्च पृथिवीꣳ-
श्रिताः । अथो अन्नेनैव जीवन्ति । अथैनदपि यन्त्य-
न्ततः । अन्नꣳ हि भूतानां ज्येष्ठम् । तस्मात्सर्वौषधमुच्यते ।
सर्वं वै तेऽन्नमाप्नुवन्ति येऽन्नं ब्रह्मोपासते । अन्नꣳ हि
भूतानां ज्येष्ठम् । तस्मात्सर्वौषधमुच्यते । अन्नाद्भूतानि
जायन्ते । जातान्यन्नेन वर्धन्ते । अद्यतेऽत्ति च भूतानि ।
तस्मादन्नं तदुच्यत इति । तस्माद्वा एतस्मादन्नरसमयाद्-
न्योऽन्तर आत्मा प्राणमयः । तेनैष पूर्णः । स वा एष
पुरुषविध एव । तस्य पुरुषविधतामन्वयं पुरुषविधः ।
तस्य प्राण एव शिरः । व्यानो दक्षिणः पक्षः । अपान
उत्तरः पक्षः । आकाश आत्मा । पृथिवी पुच्छं प्रतिष्ठा ।
तदप्येष श्लोको भवति ॥ १ ॥
अन्नसे ही प्रजा उत्पन्न होती है। जो कुछ प्रजा पृथिवीको आश्रित
करके स्थित है वह सब अन्नसे ही उत्पन्न होती है; फिर वह अन्नसे ही
जीवित रहती है और अन्तमें उसीमें लीन हो जाती है; क्योंकि अन्न
ही प्राणियोंका ज्येष्ठ (अग्रज—पहले उत्पन्न होनेवाला) है। इसीसे
वह सर्वौषध कहा जाता है। जो लोग 'अन्न ही ब्रह्म है' इस प्रकार
उपासना करते हैं वे निश्चय ही सम्पूर्ण अन्न प्राप्त करते हैं। अन्न ही
प्राणियोंमें बड़ा है; इसलिये वह सर्वौषध कहलाता है। अन्नसे ही प्राणी
उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर अन्नसे ही वृद्धिको प्राप्त होते हैं। अन्न
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अनु० २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२५
प्राणियोंद्वारा खाया जाता है और वह भी उन्हींको खाता है । इसीसे
वह 'अन्न' कहा जाता है । उस इस अन्नरसमय पिण्डसे, उसके भीतर
रहनेवाला दूसरा शरीर प्राणमय है । उसके द्वारा यह ( अन्नमय कोश )
परिपूर्ण है। वह यह ( प्राणमय कोश ) भी पुरुषाकार ही है । उस
( अन्नमय कोश ) की पुरुषाकारताके अनुसार ही यह भी पुरुषाकार है ।
उसका प्राण ही शिर है । व्यान दक्षिण पक्ष है । अपान उत्तर पक्ष है ।
आकाश आत्मा ( मध्यभाग ) है और पृथिवी पुच्छ—प्रतिष्ठा है । उसके
विषयमें ही यह श्लोक है ॥ १ ॥
अन्नाद्रसादिभावपरिणतात्, | रसादिरूपमें परिणत हुए अन्नसे
[अन्नमयोपासन-] वा इति स्मरणार्थः, | ही स्थावर-जङ्गमस्वरूप प्रजा उत्पन्न
[फलम्] प्रजाः स्थावरजङ्ग- | होती है । 'वै' यह निपात स्मरणके
माः प्रजायन्ते । याः काश्चा- | अर्थमें है । जो कुछ प्रजा अविशेष
विशिष्टाः पृथिवीं श्रिताः पृथि- | भावसे पृथिवीको आश्रित किये हुए है
वीमाश्रितास्ताः सर्वा अन्नादेव | वह सब अन्नसे ही उत्पन्न होती है ।
प्रजायन्ते । अथो अपि जाता | और फिर उत्पन्न होनेपर वह अन्नसे
अन्नेनैव जीवन्ति प्राणान्धार- | ही जीवित रहती—प्राण धारण
यन्ति वर्धन्त इत्यर्थः । अथाप्ये- | करती अर्थात् वृद्धिको प्राप्त होती है ।
नदन्नमपियन्त्यपिगच्छन्ति । | और अन्तमें—जीवनरूप वृत्तिकी
अपिशब्दः प्रतिशब्दार्थे । | समाप्ति होनेपर वह अन्नमें ही लीन
अन्नं प्रति प्रलीयन्त इत्यर्थः । | हो जाती है । [ 'अपियन्ति' इसमें ]
अन्ततोऽन्ते जीवनलक्षणाया | 'अपि' शब्द 'प्रति' के अर्थमें है ।
वृत्तेः परिसमाप्तौ । | अर्थात् वह अन्नके प्रति ही लीन
| हो जाती है ।
कस्मात् ? अन्नं हि यस्माद् | इसका कारण क्या है ? क्योंकि
भूतानां प्राणिनां ज्येष्ठं प्रथमजम् । | अन्न ही प्राणियोंका ज्येष्ठ यानी
अन्नमयादीनां हीतरेषां भूतानां | अग्रज है । अन्नमय आदि जो इतर
| प्राणी हैं उनका कारण अन्न ही है ।
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