तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ
पृष्ठ 131, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 131प्राणियोंद्वारा खाया जाता है और वह भी उन्हींको खाता है । इसीसे
अनु० २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२५
प्राणियोंद्वारा खाया जाता है और वह भी उन्हींको खाता है । इसीसे
वह 'अन्न' कहा जाता है । उस इस अन्नरसमय पिण्डसे, उसके भीतर
रहनेवाला दूसरा शरीर प्राणमय है । उसके द्वारा यह ( अन्नमय कोश )
परिपूर्ण है। वह यह ( प्राणमय कोश ) भी पुरुषाकार ही है । उस
( अन्नमय कोश ) की पुरुषाकारताके अनुसार ही यह भी पुरुषाकार है ।
उसका प्राण ही शिर है । व्यान दक्षिण पक्ष है । अपान उत्तर पक्ष है ।
आकाश आत्मा ( मध्यभाग ) है और पृथिवी पुच्छ—प्रतिष्ठा है । उसके
विषयमें ही यह श्लोक है ॥ १ ॥
अन्नाद्रसादिभावपरिणतात्, | रसादिरूपमें परिणत हुए अन्नसे
[अन्नमयोपासन-] वा इति स्मरणार्थः, | ही स्थावर-जङ्गमस्वरूप प्रजा उत्पन्न
[फलम्] प्रजाः स्थावरजङ्ग- | होती है । 'वै' यह निपात स्मरणके
माः प्रजायन्ते । याः काश्चा- | अर्थमें है । जो कुछ प्रजा अविशेष
विशिष्टाः पृथिवीं श्रिताः पृथि- | भावसे पृथिवीको आश्रित किये हुए है
वीमाश्रितास्ताः सर्वा अन्नादेव | वह सब अन्नसे ही उत्पन्न होती है ।
प्रजायन्ते । अथो अपि जाता | और फिर उत्पन्न होनेपर वह अन्नसे
अन्नेनैव जीवन्ति प्राणान्धार- | ही जीवित रहती—प्राण धारण
यन्ति वर्धन्त इत्यर्थः । अथाप्ये- | करती अर्थात् वृद्धिको प्राप्त होती है ।
नदन्नमपियन्त्यपिगच्छन्ति । | और अन्तमें—जीवनरूप वृत्तिकी
अपिशब्दः प्रतिशब्दार्थे । | समाप्ति होनेपर वह अन्नमें ही लीन
अन्नं प्रति प्रलीयन्त इत्यर्थः । | हो जाती है । [ 'अपियन्ति' इसमें ]
अन्ततोऽन्ते जीवनलक्षणाया | 'अपि' शब्द 'प्रति' के अर्थमें है ।
वृत्तेः परिसमाप्तौ । | अर्थात् वह अन्नके प्रति ही लीन
| हो जाती है ।
कस्मात् ? अन्नं हि यस्माद् | इसका कारण क्या है ? क्योंकि
भूतानां प्राणिनां ज्येष्ठं प्रथमजम् । | अन्न ही प्राणियोंका ज्येष्ठ यानी
अन्नमयादीनां हीतरेषां भूतानां | अग्रज है । अन्नमय आदि जो इतर
| प्राणी हैं उनका कारण अन्न ही है ।
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