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सर्वकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

पृष्ठ 129, कुल 261 में से

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पृष्ठ 129

अनु० १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२३

दक्षिणो बाहुः पूर्वाभिमुखस्य | मुख व्यक्तिका यह दक्षिण [ दक्षिण
दक्षिणः पक्षः । अयं सव्यो बाहु- | दिशाकी ओरका ] बाहु दक्षिण
रुत्तरः पक्षः । अयं मध्यमो देह- | पक्ष है, यह वाम बाहु उत्तर पक्ष
भाग आत्माङ्गानाम् । "मध्यं | है तथा यह देहका मध्यभाग अङ्गों-
ह्येषामङ्गानामात्मा" इति श्रुतेः । | का आत्मा है; जैसा कि "मध्यभाग
इदमिति नाभेरधस्ताद्यदङ्गं | ही इन अङ्गोंका आत्मा है" इस
तत्पुच्छं प्रतिष्ठा । प्रतितिष्ठत्यन- | श्रुतिसे प्रमाणित होता है । और
येति प्रतिष्ठा पुच्छमिव पुच्छम् | यह जो नाभिसे नीचेका अङ्ग है
अधोलम्बनसामान्याद्यथा गोः | वही पुच्छ—प्रतिष्ठा है । इसके
पुच्छम् । | द्वारा वह स्थित होता है, इसलिये यह
एतत्प्रकृत्योत्तरेषां प्राणमया- | उसकी प्रतिष्ठा है । नीचेकी ओर
दीनां रूपकत्वसिद्धिः; मूषानिषि- | लटकनेमें समानता होनेके कारण
क्तद्रुतताम्रप्रतिमावत् । तदप्येष | वह पुच्छके समान पुच्छ है; जैसे
श्लोको भवति । तत्तस्मिन्नेवार्थे | कि गौकी पूँछ ।
ब्राह्मणोक्तेऽन्नमयात्मप्रकाशक | इस अन्नमय कोशसे आरम्भ
एष श्लोको मन्त्रो भवति ॥ १ ॥ | करके ही साँचेमें डाले हुए पिघले
| ताँबेकी प्रतिमाके समान आगेके
| प्राणमय आदि कोशोंके रूपकत्वकी
| सिद्धि होती है । उसके विषयमें ही
| यह श्लोक है; अर्थात् अन्नमय
| आत्माको प्रकाशित करनेवाले उस
| ब्राह्मणोक्त अर्थमें ही यह श्लोक
| अर्थात् मन्त्र है ॥ १ ॥

इति ब्रह्मानन्दवल्ल्यां प्रथमोऽनुवाकः ॥ १ ॥