तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 128, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ें१२२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
वाम भाग (संस्कृत पाठ)
स हि पुरुष इह विद्ययान्तर-
तमं ब्रह्म संक्रामयितुमिष्टः । तस्य
च बाह्याकारविशेषेष्वनात्मस्वा-
त्मभाविता बुद्धिरनालम्ब्य विशेषं
कंचित्सहसान्तरतमप्रत्यगात्म-
विषया निरालम्बना च कर्तु-
मशक्येति दृष्टशरीरात्मसामान्य-
कल्पनया शाखाचन्द्रनिदर्शन-
वदन्तः प्रवेशयन्नाह —
तस्येदमेव शिरः । तस्यास्य
पुरुषस्यान्नरसमय-
स्येदमेव शिरः
प्रसिद्धम् । प्राणमयादिष्वशिरसां
शिरस्त्वदर्शनादिहापि तत्प्रसङ्गो
मा भूदितीदमेव शिर इत्युच्यते ।
एवं पक्षादिषु योजना । अयं
पार्श्व-टिप्पणी (Marginal Note)
पक्ष्यात्मनान्न-
मयस्य निरूपणम्
दक्षिण भाग (हिन्दी अनुवाद)
उस पुरुषको ही यहाँ ( इस
वल्लीमें ) विद्याके द्वारा सबकी अपेक्षा
अन्तरतम ब्रह्मके पास ले जाना
अभीष्ट है । किन्तु उसकी बुद्धि,
जो बाह्याकार विशेषरूप अनात्म
पदार्थोंमें आत्मभावना किये हुए है,
किसी विशेष आलम्बनके बिना
एकाएक सबसे अन्तरतम प्रत्य-
गात्मसम्बन्धिनी तथा निरालम्बना
की जानी असम्भव है; अतः इस
दिखलायी देनेवाले शरीररूप आत्मा-
की समानताकी कल्पनासे शाखा-
चन्द्र दृष्टान्तके समान उसका
भीतरकी ओर प्रवेश कराकर श्रुति
कहती है—
उसका यह [ शिर ] ही शिर है ।
उस इस अन्नरसमय पुरुषका यह
प्रसिद्ध शिर ही [ शिर है ] ।
[ अगले अनुवाकमें ] प्राणमय आदि
शिररहित कोशोंमें भी शिरस्त्व देखा
जानेके कारण यहाँ भी वही बात
न समझी जाय [ अर्थात् इस अन्नमय
कोशको भी वस्तुतः शिररहित न
समझा जाय ] इसलिये 'यह प्रसिद्ध
शिर ही उसका शिर है'—ऐसा कहा
जाता है । इसी प्रकार पक्षादिके
विषयमें लगा लेना चाहिये । पूर्वाभि-
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