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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

३३६ पञ्चदशी
धीवृत्त्याभासकुम्भानां समूहो भास्यते चिता ।
कुम्भमात्रफलत्वात् स एक आभासतः स्फुरेत् ॥१४॥
ब्रह्मचैतन्य से तो धीवृत्ति, चिदाभास तथा कुम्भ ये सब
के सब ही प्रकाशित होते हैं। चिदाभास बिचारा तो केवल
कुम्भ में ही रहने वाला एक फल है । इस कारण उस चिदा-
भास से तो वह अकेला घट ही घट भास सकता है । यों
ब्रह्मचैतन्य का तथा चिदाभास का विषयभेद भी है ।
चैतन्यं द्विगुणं कुम्भे ज्ञातत्वेन स्फुरत्यतः ।
अन्येऽनुव्यवसायाख्य माहुरेतद् यथोदितम् ॥१५॥
क्योंकि एक घट, चिदाभास और ब्रह्मचैतन्य दोनों से ही
भास्य होता है, इस कारण घट में ज्ञातता उत्पन्न होजाने पर
तो दुगना चैतन्य होजाता है । दूसरे तार्किक लोग तो ऊपर
बताये हुए इसी को अनुव्यवसाय नाम का दूसरा ज्ञान
कह देते हैं।
घटोऽयमित्यसावुक्ति राभासस्य प्रसादतः ।
विज्ञातो घट इत्युक्ति र्ब्रह्मानुग्रहतो भवेत् ॥१६॥
जब हम कहते हैं कि 'यह घट है' तब यह कहना चिदा-
भास की सहायता से होता है। जब हम कहते हैं कि 'घट
को जान लिया' तब यह कथन ब्रह्म के अनुग्रह से हुआ करता
है । [यों व्यवहार के भेद से भी चिदाभास और ब्रह्म का
भेद जान लेना चाहिये]
आभासब्रह्मणी देहाद् बहिर्यद्वद् विवेचिते ।
तद्वदाभासकूटस्थौ विविच्येतां वपुष्यपि ॥१७॥
देह से बाहर जैसे चिदाभास और ब्रह्मका विवेक यहां

कूटस्थदीपप्रकरणम् · ३३७

कूटस्थदीपप्रकरणम् · ३३७
तक किया है, ठीक इसी प्रकार देह के अन्दर भी चिदाभास
का और कूटस्थ का विवेक [ ज्ञान की चलनी से ] कर
लेना चाहिये ।
अहंवृत्तौ चिदाभासः कामक्रोधादिकासु च ।
संव्याप्य वर्तते, तप्ते लोहे वह्निर्यथा तथा ॥१८॥
तपे हुए लोहे में आग की तरह, अहंवृत्ति में और काम
क्रोधादि वृत्तियों में चिदाभास व्याप्त हुआ रहता है ।
स्वमात्रं भासयेत् तप्तं लोहं नान्यत् कदाचन ।
एवमाभाससहिता वृत्तयः स्वस्वभासिकाः ॥१९॥
तपकर लाल हुआ लोहा केवल अपने आपको ही प्रका-
शित किया करता है । अन्य किसी वस्तु को प्रकाशित करने
का सामर्थ्य उसमें नहीं होता । ठीक इसी प्रकार, आभास से
युक्त वृत्तियां भी केवल अपनी ही भासक होती हैं, दूसरे
की नहीं ।
क्रमाद् विच्छिद्य विच्छिद्य जायन्ते वृत्तयोऽखिलाः ।
सर्वा अपि विलीयन्ते सुप्तिमुर्च्छासमाधिषु ॥२०॥
जितनी भी वृत्तियां हैं, वे सब क्रमसे रुक रुक कर पैदा
हुआ करती है । जब एक वृत्ति नष्ट होजाती है तब दूसरी
वृत्ति का उदय होता है । इसी प्रकार तीसरी और चौथी आदि
वृत्तियों की उत्पत्ति को भी समझना चाहिये । सुप्ति मूर्छा और
समाधि के समय तो वे सभी वृत्तियां विलीन हो जाती हैं
फिर तो उनमें से एक भी नहीं रहजाती ।
सन्धयोऽखिलवृत्तीना मभावाश्चावभासिताः ।
निर्विकारेण येनासौ कूटस्थ इति चोच्यते ॥२१॥
२१

३३८ पञ्चदशी
सब वृत्तियों की सन्धियां [जब कि एक वृत्ति नष्ट हो कर
दूसरी उत्पन्न होने को होती है] तथा सब वृत्तियों के अभाव
[जबकि कोई भी वृत्ति नहीं रहती] जिस निर्विकार चैतन्य
से प्रकाशित [ज्ञात] होते हैं, उसीको कूटस्थ कहा जाता है ।
घटे द्विगुणचैतन्यं यथा बाह्ये तथान्तरे ।
वृत्तिष्वपि, ततस्तत्र वैशद्यं सन्धितोऽखिलम् ॥२२॥
जैसे बाह्य घट में दुगना चैतन्य [एक तो घटमात्र का
भासक चिदाभास तथा दूसरा घट की ज्ञातता का भासक
ब्रह्मचैतन्य] होता है, इसी प्रकार अन्दर की अहंकारादि वृत्तियों
में भी एक तो कूटस्थ चैतन्य रहता है, दूसरा केवल वृत्तियों का
चिदाभास होता है । यों अन्दर भी दुगना चैतन्य होता है ।
दुगना चैतन्य होने के कारण ही, इन वृत्तियों में, संधियों से
अधिक स्पष्टता आगयी है । [चैतन्य की इतनी विशदता
सन्धियों में नहीं होती, जितनी कि इन वृत्तियों में होती है ।]
ज्ञातताज्ञातते न स्तो घटवद् वृत्तिषु क्वचित् ।
स्वस्य स्वेनागृहीतत्वात् तामिस्राज्ञाननाशनात् ॥२३॥
घट में जैसे ज्ञातता और अज्ञातता होती है, वैसे वृत्तियों
में कभी भी ज्ञातता और अज्ञातता नहीं होतीं । क्योंकि अपना
आपा अपने आप से गृहीत नहीं हो सकता तथा उन वृत्तियों
के उत्पन्न होते ही उनसे अज्ञान का नाश हो जाता है । [भाव
यह है कि ज्ञान की व्याप्ति से ज्ञातता और अज्ञान की व्याप्ति
से अज्ञातता होती है । वृत्तियां स्वयंप्रकाश होती हैं, इस कारण
उनमें ज्ञान की व्याप्ति नहीं होती और 'ज्ञातता' नहीं आती । वे
वृत्तियाँ जब उत्पन्न हो जाती हैं तब वे उत्पन्न होते ही

कूटस्थदीपप्रकरणम् ३३९

कूटस्थदीपप्रकरणम् ३३९

स्वविषयक अज्ञान को हटा देती हैं। यों अज्ञान की व्याप्ति भी
वृत्तियों में नहीं रहती और 'अज्ञातता' भी नहीं आती । ]
द्विगुणीकृतचैतन्ये जन्मनाशानुभूतितः ।
अकूटस्थं तदन्यत्तु कूटस्थमविकारतः ॥२४॥
सार बात तो यह है कि उस दुगुने चैतन्य में [ उन दो
प्रकार के चेतनों में]जिस चैतन्य के जन्म और नाश होते हुए
प्रतीत होते हों, उसे तो 'अकूटस्थ' मानना चाहिए। अविकारी
होने के कारण उससे भिन्न जो दूसरा चैतन्य है, उसे 'कूटस्थ'
जान लेना चाहियें ।
अन्तःकरणतद्वृत्तिसाक्षीत्यादावनेकधा ।
कूटस्थ एव सर्वत्र पूर्वाचार्यैर्विनिश्चितः ॥२५॥
'अन्तःकरण तद्वृत्तिसाक्षी चैतन्यविग्रहः। आनन्दरूपः सत्यः सन्
किं नात्मानं प्रपद्यसे' इत्यादि श्लोकों में सब जगह पूर्वाचार्यों ने
चिदाभास से भिन्न कूटस्थ का उपपादन किया है। [यह
कूटस्थ हमारा कपोलकल्पित नहीं है ]।
आत्माभासाश्रयाश्चैवं मुखाभासाश्रया यथा ।
गम्यन्ते शास्त्रयुक्तिभ्यामित्याभासश्च वर्णितः ॥२६॥
जैसे (१) मुख (२) मुखाभास तथा (३) उसका आश्रय
अर्थात् दर्पण होता है इसी प्रकार (१) कूटस्थ आत्मा (२)
आभास तथा (३) अन्तःकरण आदि उसका आश्रय होता है।
ये तीनों शास्त्र और युक्ति से जाने जाते हैं। यहाँ जो आभास
का वर्णन है उसका अभिप्राय कूटस्थ से भिन्न चिदाभास से
ही है ['मनसः साक्षी बुद्धेः साक्षी' यह शास्त्र तो बुद्धि के साक्षी
कूटस्थ का प्रतिपादन करने वाला है। 'रूपंरूपं प्रतिरूपो बभूव' (कठ

५-९) यह शास्त्र चिदाभास का प्रतिपादन करता है इन में से

३४० पञ्चदशी
५-९) यह शास्त्र चिदाभास का प्रतिपादन करता है इन में से
एक [चिदाभास] विकारी है दूसरा [कूटस्थ] अविकारी है।
यह तो २४वें श्लोक में युक्ति देकर बता चुके हैं।
बुद्धयवच्छिन्नकूटस्थो लोकान्तरगमागमौ ।
कर्तुं शक्तो घटाकाश इवाभासेन किं वद ॥२७॥
जैसे कि घट के द्वारा घटाकाश गमनागमन कर लेता है,
इसी प्रकार बुद्धि से अवच्छिन्न जो कूटस्थ है वही बुद्धि के
द्वारा लोकान्तर का गमनागमन कर लेगा। फिर यह बताओ
कि तुम इस चिदाभास को क्यों मानते हो ? [ चिदाभास की
कल्पना में तो गौरव होता है । ]
शृण्वसङ्गः परिच्छेदमात्राज्जीवो भवेन्नहि ।
अन्यथा घटकुड्याद्यै रवच्छिन्नस्य जीवता ॥२८॥
इसका उत्तर भी सुनो, कि केवल परिच्छेद हो जाने से ही
वह असङ्ग तत्व जीव नहीं हो जाता है। यों यदि केवल
परिच्छेद होने से ही वह 'जीव' हो जाता होता तब तो घट
और भित्ति आदि से परिच्छिन्न हो जाने पर भी वह जीव हो
गया होता । [जो तुम्हें भी इष्ट नहीं है ।]
न कुड्यसदृशी बुद्धिः स्वच्छत्वादिति चेत्तथा ।
अस्तु नाम परिच्छेदे किं स्वाच्छ्येन भवेत्तव ॥२९॥
यदि यह कहो कि स्वच्छ होने के कारण बुद्धि तो भित्ति
के समान नहीं है, इस कारण बुद्धि परिच्छेद कर सकती है,
भित्ति नहीं कर सकती। सो यह भी कथन निःसार ही है।
क्योंकि बुद्धि स्वच्छ है तो हुआ करे। परिच्छेद में तो स्वच्छता
का कुछ भी उपयोग नहीं है।

कूटस्थदीपप्रकरणम् ३४१

कूटस्थदीपप्रकरणम् ३४१
प्रस्थेन दारुजन्येन कांस्यजन्येन वा न हि ।
विक्रेतुस्तण्डुलादीनां परिमाणं विशिष्यते ॥३०॥
लोक में भी देख लो कि जो प्रस्थ नाम का तोलने का
पैमाना लकड़ी का बना है या जो कांसे का बनाया गया है उन
में से लकड़ी का पैमाना अस्वच्छ है कांसे का स्वच्छ है । इन
दोनों की स्वच्छता और अस्वच्छता से बेचने वाले के चावलों
के परिमाण में विशेषता या न्यूनाधिकभाव नहीं आ जाता है ।
परिमाणाविशेषेऽपि प्रतिबिम्बो विशिष्यते ।
कांस्ये यदि,तदा बुद्धावप्याभासो भवेद् बलात् ॥३१॥
कांसे के बने प्रस्थ से नापने पर यद्यपि चावलों के परि-
माण में अधिकता नहीं आती, परन्तु उसमें चावलों का प्रति-
बिम्ब तो पड़ता ही है। यही उस में लकड़ी के प्रस्थ से अधिकता
है । ऐसा यदि कहा जायगा तो हम कहेंगे कि तब तो तुम्हें
ज़बरदस्ती ही बुद्धि में भी आभास पड़ने की बात मान लेनी
पड़ेगी ।
ईषद्भासनमाभासः प्रतिबिम्बस्तथाविधः ।
बिम्बलक्षणहीनः सन् बिम्बवद् भासते हि सः॥३२॥
थोड़े भास को 'आभास' कहते हैं, वैसा ही प्रतिबिम्ब
भी होता है । उस प्रतिबिम्ब में बिम्ब का कोई भी लक्षण
[निश्चय हीं] नहीं होता । तब भी वह बिम्ब की तरह भासा
करता है । [यों 'आभास' और 'प्रतिबिम्ब' एक ही बात हो
जाती है ।]
ससङ्गत्वविकाराभ्यां बिम्बलक्षणहीनता ।
स्फूर्तिरूपत्वमेतस्य बिम्बवद् भासनं विदुः ॥३३॥

३४२ पञ्चदशी
यह चिदाभास ससङ्ग भी है और विकार युक्त भी है, इस
कारण इसमें बिम्ब के [असंगता और अविकारिता रूपी] लक्षण
तो नहीं रहते, परन्तु तो भी वह चिदाभास स्फूर्तिरूप है, यही
इसका बिम्ब की तरह भासना कहाता है । [हेतु के लक्षणों से
रहित हो और हेतु की तरह भासता हो जैसे उसे हेत्वाभास
कहते हैं, ऐसे ही बिम्ब के लक्षणों से रहित हो और बिम्ब की
तरह भासता हो, उसे 'आभास' कहा जाता है।]
नहि धीभावभावित्वादाभासोऽस्ति धियः पृथक् ।
इति चेदल्पमेवोक्तं धीरप्येवं स्वदेहतः ॥३४॥
जैसे मिट्टी के होने पर ही उत्पन्न होने वाला घट, मिट्टी
से भिन्न नहीं होता, इसी प्रकार बुद्धि के होने पर ही होने
वाला चिदाभास, बुद्धि से पृथक् नहीं होता, ऐसा यदि कहो
तो हम कहेंगे कि यह तो तुमने बहुत ही थोड़ा कहा है इस
तरह तो देह से भिन्न बुद्धि भी सिद्ध नहीं हो सकेगी [क्योंकि
देह के होने पर ही बुद्धि रहती है देह के न रहने पर नहीं रहती]
देहे मृतेऽपि बुद्धिश्चेच्छास्त्रादस्ति तथासति ।
बुद्धे रन्यश्चिदाभासः प्रवेशश्रुतिषु श्रुतः ॥३५॥
यदि कहो कि—देह के मर जाने पर भी 'सविज्ञानो भवति'
इस शास्त्र के प्रमाण से बुद्धि तो रहती ही है। तो हम कहेंगे
कि जो तुम श्रुति के बल से देह से भिन्न बुद्धि को मानते हो,
वह तुम प्रवेश श्रुतियों के बल से बुद्धि से भिन्न चिदाभास को
क्यों नहीं मान लेते हो।
धीयुक्तस्य प्रवेशश्चैन्नैतरेये धियः पृथक् ।
आत्मा प्रवेशं संकल्प्य प्रविष्ट इति गीयते ॥३६॥

कूटस्थदीपप्रकरणम् ३४३

कूटस्थदीपप्रकरणम् ३४३
यदि यह कहा जाय कि—बुद्धि से युक्त ही वह प्रवेश करता
है, सो यह ठीक नहीं। क्योंकि ऐतरेय में तो कहा गया है कि—
बुद्धि से पृथक् आत्मा ने पहले तो बुद्धि में प्रवेश का संकल्प
किया और फिर उसमें प्रविष्ट हो गया । ऐसी अवस्था में बुद्धि
रूपी उपाधि वाले आत्मा का प्रवेश मानना ठीक नहीं है।
कथंन्विदं साक्षदेहं मदृते स्यादितीरणात् ।
विदार्य मूर्धसीमानं प्रविष्टः संसरत्ययम् ॥३७॥
उस श्रुति में कहा गया है कि—इन्द्रियों और देह सहित
यह जड संसार मुझ चेतन को छोड़ कर कैसे रहेगा ? इसका
निर्वाह मुझ चेतन के बिना कैसे होगा ? यह विचार कर मूर्ध
सीमा को विदीर्ण करके [तीनों कपालों के मध्यदेश को भेद
कर] प्रविष्ट हो गया है और संसार में फंसा फिरता है।
अर्थात् जाग्रत् आदि अवस्थाओं का अनुभव कर रहा है ।
कथं प्रविष्टोऽसङ्गश्चेत् सृष्टिर्वास्य कथं वद ।
मायिकत्वं तयोस्तुल्यं विनाशश्च समस्तयोः ॥३८॥
यदि पूछो कि—जब वह असंग है तब वह प्रविष्ट ही कैसे
हो गया ? तो हम पूछेंगे कि फिर उस असंग ने सृष्टि रचना
ही कैसे कर दी ? यदि कहो कि मायिक होने से सृष्टि कर
दी तो हम कहेंगे कि मायिक होने से ही वह प्रवेश भी कर
गया है। मायिक होना तो दोनों बातों में समान ही है [कहो
सृष्टि मायिक है तो कहेंगे प्रवेश भी मायिक है]। क्योंकि
उन दोनों [सृष्टि और जीव] का विनाश भी सम ही है।
समुत्थायैष भूतेभ्यस्तान्येवानुविनश्यति ।
विस्पष्टमिति मैत्रेय्यै याज्ञवल्क्य उवाच हि ॥३९॥

३४४ पञ्चदशी
यह प्रज्ञानघन आत्मा पांच भूतों [से बने हुए इन देह
इन्द्रिय आदि उपाधियों] के सहारे से उठ खड़ा होता है [अर्थात्
जीवत्व का अभिमान करने लगता है] जब वे देहादि नष्ट होने
लगते हैं तब वह भी उनके पीछे पीछे—उन्हीं के साथ हो जाता
है [अथवा यों समझो कि उनके नष्ट हो जाने पर, उनके कारण
किये हुए,जीवत्व के अभिमान को छोड़ देता है। अर्थात् जब ये
देहादि नष्ट हो जाते हैं तब फिर उसका जीवत्व का अभिमान भी नहीं
रहता] इस रीति से याज्ञवल्क्य ने मैत्रेयी स सोपाधिकरूप को—
जिसको कि हम चिदाभास कहते हैं—स्पष्ट ही विनाशी बताया है।
अविनाश्ययमात्मेति कूटस्थः प्रविवेचितः ।
मात्राऽसंसर्ग इत्येवमसङ्गत्वस्य कीर्तनात् ॥४०॥
'अविनाशी वारेऽयमात्मानुच्छित्तिधर्मा' (बृ० ४-५-१४) इस
श्रुति में कूटस्थ को उस [चिदाभास] से भिन्न बताया है।
'मात्रासंसर्गस्त्वस्य भवति' (बृ० ४-५-१४) इस श्रुति में आत्मा
की असंगता का कीर्तन किया गया है कि—मात्रा अर्थात् देहादि
से इस आत्मा का संसर्ग कभी भी—देह धारण करने पर भी
नहीं हो पाता [आत्मा की यह असंगता ही आत्मा के अविनाशी
होने का कारण है।]
जीवापेतं वाव किल शरीरं म्रियते न सः ।
इत्यत्र न विमोक्षोऽर्थः किन्तु लोकान्तरे गतिः ॥४१॥
'जीवापेतं वाव किल शरीरं म्रियते न जीवो म्रियते' (छा० ६-११-३)
जीव से छोड़ा हुआ यह शरीर ही मरा करता है जीव नहीं
मरता। इस श्रुति में मोक्ष का वर्णन नहीं है किन्तु इसमें तो
लोकान्तर की गति का वर्णन किया गया है।

कूटस्थदीपप्रकरणम् ३४५

कूटस्थदीपप्रकरणम् ३४५
नाहं ब्रह्मेति बुध्येत स विनाशीति चेन्न तत् ।
सामानाधिकरण्यस्य बाधायामपि संभवात् ॥४२॥
प्रश्न यह है कि—वह चिदाभास यदि विनाशी है तो फिर
वह अपने को यह कैसे जानेगा कि मैं ब्रह्म हूँ ? क्योंकि विनाशी
और अविनाशी दो पदार्थ एक कैसे हो सकेंगे ? इसका उत्तर
यह है कि सामानाधिकरण्य तो बाधा में भी हो जाता है ।
सामानाधिकरण्य दो प्रकार होता है—एक मुख्य सामा-
नाधिकरण्य, दूसरा बाधसामानाधिकरण्य । सो यहां मुख्य
सामानाधिकरण्य न सही, बाधा में सामानाधिकरण्य तो हो
ही सकता है । अपने जीवभाव की बाधा करके ब्रह्मभाव का
ज्ञान उसे हो ही सकता है ।
योऽयं स्थाणुः पुमानेष पुंधिया स्थाणुधीरिव ।
ब्रह्मास्मीति धिया शेषाप्यहंबुद्धि र्निवर्त्यते ॥४३॥
'यह जो स्थाणु है यह तो पुरुष है' इस वाक्य में जैसे
पुरुषज्ञान से स्थाणुज्ञान निवृत्त हो जाता है, इसी प्रकार मैं
ब्रह्म हूं' इस बुद्धि से 'मैं कर्ता हूं मैं भोक्ता हूं' इत्यादि सभी
क्षुद्र बुद्धियां निवृत्त हो जाती हैं। ['पूर्ण अहं' से 'क्षुद्र अहं'
मार डाला जाता है]
नैष्कर्म्यसिद्धावप्येवमाचार्यैः स्पष्टमीरितम् ।
सामानाधिकरण्यस्य बाधार्थत्वमतोऽस्तु तत् ॥४४॥
वार्तिककार ने नैष्कर्म्य सिद्धि में यह बात स्पष्ट कही है
कि—सामानाधिकरण्य बाध के लिये भी होता है । इस कारण
'मैं ब्रह्म हूँ'—इस वाक्य में जो सामानाधिकरण्य है वह बाधा-
र्थक होही सकता है

३५६ पञ्चदशी
सर्वं ब्रह्मेति जगता सामानाधिकरण्यवत् ।
अहं ब्रह्मेति जीवेन समानाधिकृतिर्भवेत् ॥४५॥
जैसे 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' इस श्रुति में जगत् के साथ बाधा
में भी सामानाधिकरण्य देखा गया है, इसी प्रकार 'अहं ब्रह्म'
इस वाक्य में जीव के साथ भी सामानाधिकरण्य हो ही
सकता है।
सामानाधिकरण्यस्य बाधार्थत्वं निराकृतम् ।
प्रयत्नतो विवरणे कूटस्थस्य विवक्षया ॥४६॥
विवरणाचार्य ने जो बाधसामानाधिकरण्य का प्रयत्न-
पूर्वक खण्डन किया है उसका कारण तो यह है, कि उन्होंने तो
अहं शब्द का अर्थ कूटस्थ लिया है और यों सामानाधिकरण्य
का खण्डन करडाला है।
शोधितत्वंपदार्थो यः कूटस्थो ब्रह्मरूपताम् ।
तस्य वक्तुं विवरणे तथोक्त मितरत्र च ॥४७॥
जिस कूटस्थ के त्वं पदार्थ का शोध कर लिया गया हो
[त्वं पद के लक्ष्य जिस कूटस्थ को बुद्धि आदियों से विविक्त
कर लिया गया हो] उसी को ब्रह्मरूप बताने के लिये विवरण
में तथा अन्य ग्रन्थों में बाधसामानाधिकरण्य को हटाकर
मुख्य सामानाधिकरण्य को कहदिया है
देहेन्द्रियादियुक्तस्य जीवाभासभ्रमस्य या ।
अधिष्ठानचितिः सैषा कूटस्थात्र विवक्षिता ॥४८॥
देह इन्द्रिय और मनसे [ किंवा दोनों शरीरों से ] युक्त
जो जीवाभास रूपी भ्रम है, उस भ्रमका अधिष्ठान जो
चैतन्य है, उसी को तो वेदान्तों में 'कूटस्थ' कहा है।

कूटस्थदीपप्रकरणम् १४७

कूटस्थदीपप्रकरणम् १४७
जगद्भ्रमस्य सर्वस्य यदधिष्ठानमीरितम् ।
त्रय्यन्तेषु तदत्र स्याद् ब्रह्मशब्दविवक्षितम् ॥४९॥
तथा वेदान्तों में जिसको इस सब जगत् की कल्पना का
अधिष्ठान बताया गया है, उसीको यहां 'ब्रह्म' शब्द से कहा
गया है [ जीवत्वरूपी भ्रमका अधिष्ठान चेतन 'कूटस्थ' है
तथा जगद्रूपी भ्रम का अधिष्ठान जो चेतन है वह 'ब्रह्म'
शब्द से कहा जाता है ]
एकस्मिन्नेव चैतन्ये जगदारोप्यते यदा ।
तदा तदेकदेशस्य जीवाभासस्य का कथा ॥५०॥
जब एकही चैतन्य में इस समस्त जगत् का आरोप किया
जाता है, तब उसी जगत् के एक भाग जीवाभास [चिदाभास]
का तो कहना ही क्या ? [ उसको भी उसी में आरोपित
मान लेना चाहिये]
जगत्तदेकदेशाख्यसमारोप्यस्य भेदतः ।
तत्त्वंपदार्थों भिन्नौ स्तो वस्तुतस्त्वेकता चितेः ॥५१॥
जगत् और जगत् का एक देश [ आभास ] कहाने वाला
जो आरोपणीय पदार्थ है, उसके भेद की वजह से ही 'तत्'
और 'त्वं' पदार्थ भिन्न भिन्न हैं। असल में तो 'चिति' एक
ही है। यों उनमें औपाधिक तो भेद हैं तथा वास्तव एकता
ही है। [जगत् का ध्यान करें तब उस चेतन को तत् अर्थात्
ब्रह्म कहते हैं, देह इन्द्रिय आदि का ध्यान करें तब उस चेतन
को त्वं अर्थात् कूटस्थ कहते हैं। जगत् को और देहादि को
भूल जांय तो अकेला चेतन ही चेतन शेष रहजाता है]

३४८ पञ्चदशी
कर्तृत्वादीन् बुद्धिधर्मान् स्फूर्त्याख्यां चात्मरूपताम् ।
दधद् विभाति पुरत आभासोऽतो भ्रमो भवेत् ॥५२॥
यह जो आभास है यह कर्तृत्व भोक्तृत्व प्रमातृत्व आदि बुद्धि
के धर्मों को तथा स्फूर्ति नामके आत्माके धर्म को धारण किये
हुये, सामने दीख पड़ता है इससे भ्रम हो ही जाता है [भ्रम
स्थल की चांदी में जैसे अधिष्ठान और आरोप्य दोनों ही के
धर्म दीखते हैं और वह आरोपित [कल्पित] मानी जाती है
इसी प्रकार दोनों के धर्म दीखने से ही यह आभास कल्पित है।
का बुद्धिः कोऽयमाभासः को वात्मात्र जगत् कथम् ।
इत्यनिर्णयतो मोहः सोऽयं संसार इष्यते ॥५३॥
बुद्धि क्या वस्तु है ? आभास कौन है इन सब में आत्मा
नाम का पदार्थ कौन सा है? यह जगत् कैसे बन गया है? इन
सब बातों के स्वरूप का निर्णय जब कोई नहीं कर पाता तब
उसे मोह हो जाता है । बस इसी को संसार कहते हैं [ मुमुक्षु
लोगों को इसी मोह को हटाना है यही मोह सब अनर्थों का
मूल कारण है ]
बुद्ध्यादीनां स्वरूपं यो विविनक्ति स तत्ववित् ।
स एव मुक्त इत्येवं वेदान्तेषु विनिश्चयः ॥५४॥
बुद्धि आदि के स्वरूप का विवेक जो कर लेता है [ बुद्धि
आभास आत्मा और जगत् इन चारों को अलग अलग छांट
कर जो रख लेता है] वही ज्ञानी है, वही मुक्त है, [उसी
का अनर्थों से छुटकारा हो सकता है ] यही वेदान्तों का
निश्चय है ।

कूटस्थदीपप्रकरणम् ३४९

कूटस्थदीपप्रकरणम् ३४९
एवं च सति बन्धः स्यात् कस्येत्यादिकुतर्कजाः ।
विडम्बना दृढं खण्ड्याः खण्डनोक्तिप्रकारतः ॥५५॥
जब कि बन्ध भी अविवेकमूलक ही है और मोक्ष भी
अविवेकमूलक ही है, तब फिर अद्वैतवाद में किस का बन्ध
और किसका मोक्ष होता है ? इत्यादि तार्किकों के किये हुए कुतर्क-
मूलक परिहासों का परिहार खण्डन नामक ग्रन्थ में लिखी हुई
विधि से करना चाहिये ।
वृत्तेः साक्षितया वृत्तिप्रागभावस्य च स्थितः ।
बुभुत्सायां तथाऽज्ञोऽसीत्याभासाज्ञानवस्तुनः ॥५६॥
पुराणों में कहा है कि—कामादिवृत्तियों की उत्पत्ति जब
हो जाती है तब तो यह शिव उन वृत्तियों का साक्षी बन कर
रहता है, वृत्तियों के उदय होने से पहले वृत्ति के प्रागभाव का
साक्षी होकर रहता है,जब आत्मजिज्ञासा होती है तब जिज्ञासा
का साक्षी हो जाता है, उससे पहले तो यह शिव 'मैं अज्ञानी
हूँ' इस रूप से अनुभव में आने वाले अज्ञान का साक्षी बन
कर बैठा रहता है ।
असत्यालम्बनत्वेन सत्यः, सर्वजडस्य तु ।
साधकत्वेन चिद्रूपः, सदा प्रेमास्पदत्वतः ॥५७॥
आनन्दरूपः, सर्वार्थसाधकत्वेन हेतुना ।
सर्वसम्बन्धवत्वेन संपूर्णः शिवसंज्ञितः ॥५८॥
वह शिव क्योंकि इस असत्य जगत् का आलम्बन [अधि-
ष्ठान] है इसी से 'सत्य' है, सब जडों का साधक किंवा अव-
भासक होने से ही वह 'चिद्रूप' है, सदा प्रेम का विषय होने
से ही वह 'आनन्दरूप' है, सब अर्थों का साधक होने से तथा

३५० पञ्चदशी
सब से सम्बन्ध वाला होने से ही उसे 'संपूर्ण' कहा जाता है ।
उसी को शिव भी कहते हैं ।
इति शैवपुराणेषु कूटस्थः प्रविवेचितः ।
जीवेशत्वादिरहितः केवलः स्वप्रभः शिवः ॥५९॥
इस प्रकार जीव और ईश्वर आदि की कल्पना से रहित केवल
[अद्वितीय] स्वयंप्रकाश चैतन्यरूप जो शिव नाम का कूटस्थ तत्व
है उसी का विवेचन शैव पुराणों में किया है ।
मायाभासेन जीवेशौ करोतीति श्रुतत्वतः ।
मायिकावेव जीवेशौ स्वच्छौ तौ काचकुम्भवत् ॥६०॥
श्रुति में कहा गया है कि- माया, आभास के द्वारा 'जीव'
और 'ईश्वर' को बना लेती है । अर्थात् ये दोनों मायिक हैं।
मिट्टी का बना होने पर भी काच का घड़ा जैसे और घड़ों से
स्वच्छ होता है इसी प्रकार माया के बने होने पर भी ये दोनों
देहादियों से स्वच्छ होते हैं।
अन्नजन्यं मनो देहात्स्वच्छं यद्वत् तथैव तौ ।
मायिकावपि सर्वस्मादन्यस्मात् स्वच्छतां गतौ ॥६१॥
[देह और मन दोनों ही अन्न से बने हैं-] अन्न से उत्पन्न
होने पर भी मन जैसे देह से स्वच्छ होता है, इसी प्रकार मायिक
होने पर भी ये 'जीव' और 'ईश्वर' और सब मायिक पदार्थों
की अपेक्षा से स्वच्छ हो गये हैं।
चिद्रूपत्वं च संभाव्यं चित्त्वेनैव प्रकाशनात् ।
सर्वकल्पनशक्ताया मायाया दुष्करं न हि ॥६२॥
उन जीवेश्वरों की चिद्रूपता की सम्भावना भी अनुभव के
आधार से ही करलो- वे चिद्रूप से प्रकाशित हुए रहते हैं या

कूटस्थदीपप्रकरणम् ३५१

कूटस्थदीपप्रकरणम् ३५१
नहीं ? यह बात अपने अपने अनुभवों से ही पूछो । जो माया
सबकी कल्पना करने में समर्थ है उसके लिये दुर्घट बात कुछ
भी नहीं है । [उस माया ने ही उन दोनों मायिकों को चिद्रूप से
प्रकाशित भी कर डाला है ।]
असन्निद्रापि जीवेशौ चेतनौ खमृगौ सृजेत् ।
महामाया सृजत्येतावित्याश्चर्यं किमत्र ते ॥६३॥
हम तो देखते हैं कि—हमारी नींद भी—[जिसे हमारी
माया भी कह सकते हैं] सुपने के चेतन 'जीव' और 'ईश्वर'
को उत्पन्न कर ही लेती है । फिर महामाया चेतन जीवेश्वरों को
उत्पन्न करले, इसमें तुम्हें आश्चर्य क्यों होता है ?
सर्वज्ञत्वादिकं चेशे कल्पयित्वा प्रदर्शयेत् ।
धर्मिणं कल्पयेद् यास्याः को भारो धर्मकल्पने ॥६४॥
यह भी उस महामाया का स्वभाव ही है कि—उसने ईश्वर
में सर्वज्ञत्वादि धर्मों की कल्पना कर दिखलाई है—[उसे जीव
की तरह असर्वज्ञ नहीं रक्खा है] भला जिस माया ने धर्मी
की कल्पना कर डाली है, उसे धर्म की कल्पना करने में कौन
सी कठिनाई हो सकती है ?
कूटस्थेऽप्यतिशङ्का स्यादिति चेन्मातिशङ्क्यताम् ।
कूटस्थमायिकत्वे तु प्रमाणं न हि विद्यते ॥६५॥
जीव और ईश्वर की तरह कूटस्थ को मायिक मानना ठीक
नहीं है । क्योंकि कूटस्थ के मायिक होने का कोई भी प्रमाण
नहीं मिलता ।
वस्तुत्वं घोपयन्त्यस्य.वेदान्ताः सकला अपि ।
सपत्नरूपं वस्त्वन्यन्न सहन्तेऽत्र किंचन ॥६६॥

३५० पञ्चदशी
सब से सम्बन्ध वाला होने से ही उसे 'संपूर्ण' कहा जाता है।
उसी को शिव भी कहते हैं।
इति शैवपुराणेषु कूटस्थः प्रविवेचितः ।
जीवेशत्वादिरहितः केवलः स्वप्रभः शिवः ॥५९॥
इस प्रकार जीव और ईश्वर आदि की कल्पना से रहित केवल
[अद्वितीय] स्वयंप्रकाश चैतन्यरूप जो शिव नाम का कूटस्थ तत्व
है उसी का विवेचन शैव पुराणों में किया है।
मायाभासेन जीवेशौ करोतीति श्रुतत्वतः ।
मायिकावेव जीवेशौ स्वच्छौ तौ काचकुम्भवत् ॥६०॥
श्रुति में कहा गया है कि—माया, आभास के द्वारा 'जीव'
और 'ईश्वर' को बना लेती है। अर्थात् ये दोनों मायिक हैं।
मिट्टी का बना होने पर भी काच का घड़ा जैसे और घड़ों से
स्वच्छ होता है इसी प्रकार माया के बने होने पर भी ये दोनों
देहादियों से स्वच्छ होते हैं।
अन्नजन्यं मनो देहात्स्वच्छं यद्वत् तथैव तौ ।
मायिकावपि सर्वसदन्यस्मात् स्वच्छतां गतौ ॥६१॥
[देह और मन दोनों ही अन्न से बने हैं—] अन्न से उत्पन्न
होने पर भी मन जैसे देह से स्वच्छ होता है, इसी प्रकार मायिक
होने पर भी ये 'जीव' और 'ईश्वर' और सब मायिक पदार्थों
की अपेक्षा से स्वच्छ हो गये हैं।
चिद्रूपत्वं च संभाव्यं चित्त्वेनैव प्रकाशनात् ।
सर्वकल्पनशक्ताया मायाया दुष्करं न हि ॥६२॥
उन जीवेश्वरों की चिद्रूपता की सम्भावना भी अनुभव के
आधार से ही करलो—वे चिद्रूप से प्रकाशित हुए रहते हैं या

[कूटस्थदीपप्रकरणम् ३५१]

नहीं ? यह बात अपने अपने अनुभवों से ही पूछो। जो माया
सबकी कल्पना करने में समर्थ है उसके लिये दुर्घट बात कुछ
भी नहीं है। [उस माया ने ही उन दोनों मायिकों को चिद्रूप से
प्रकाशित भी कर डाला है ।]
अस्मन्निद्रापि जीवेशौ चेतनौ स्वप्नगौ सृजेत् ।
महामाया सृजत्येतावित्याश्चर्यं किमत्र ते ॥६३॥
हम तो देखते हैं कि—हमारी नींद भी—[ जिसे हमारी
माया भी कह सकते हैं] सुपने के चेतन 'जीव' और 'ईश्वर'
को उत्पन्न कर ही लेती है। फिर महामाया चेतन जीवेश्वरों को
उत्पन्न करले, इसमें तुम्हें आश्चर्य क्यों होता है ?
सर्वज्ञत्वादिकं चेशे कल्पयित्वा प्रदर्शयेत् ।
धर्मिणं कल्पयेद् यास्याः को भारो धर्मकल्पने ॥६४॥
यह भी उस महामाया का स्वभाव ही है कि—उसने ईश्वर
में सर्वज्ञत्वादि धर्मों की कल्पना कर दिखाई है—[उसे जीव
की तरह असर्वज्ञ नहीं रक्खा है] भला जिस माया ने धर्मी
की कल्पना कर डाली है, उसे धर्म की कल्पना करने में कौन
सी कठिनाई हो सकती है ?
कूटस्थेऽप्यतिशङ्का स्यादिति चेन्मातिशङ्क्यताम् ।
कूटस्थमायिकत्वे तु प्रमाणं न हि विद्यते ॥६५॥
जीव और ईश्वर की तरह कूटस्थ को मायिक मानना ठीक
नहीं है । क्योंकि कूटस्थ के मायिक होने का कोई भी प्रमाण
नहीं मिलता ।
वस्तुत्वं घोषयन्त्यस्य वेदान्ताः सकला अपि ।
सपत्नरूपं वस्त्वन्यन्न सहन्तेऽत्र किंचन ॥६६॥

३५२ पञ्चदशी
प्रत्युत सम्पूर्ण वेदान्त एकस्वर होकर इस कूटस्थ को ही
वास्तव पदार्थ कह रहे हैं । वे इस कूटस्थ के प्रतिपक्षी किसी
भी पदार्थ को सहन नहीं करते हैं ।
श्रुत्यर्थं विशदीकुर्मो न तर्काद्वच्मि किंचन ।
तेन तार्किकशङ्काना मत्र कोऽवसरो वद ॥६७॥
हम तो केवल श्रुति के तात्पर्य को ही विशद् करते हैं ।
तर्क के सहारे से तो हम कुछ भी नहीं कहते हैं । ऐसी अवस्था
में तार्किकों की शंकाओं का यहां अवसर ही कौनसा है ? इस
धातु का प्रयोग बहुवचन में न आने के कारण 'वच्मि' यह
प्रयोग किया है ।
तस्मात् कुतर्कं सन्त्यज्य मुमुक्षुः श्रुति माश्रयेत् ।
श्रुतौ तु माया जीवेशौ करोतीति प्रदर्शितम् ॥६८॥
इस कारण मुमुक्षु को चाहिये कि—इस दुरवगाह आत्म-
तत्त्व को जानने के लिये कुतर्क को छोड़कर श्रुति का आश्रय ले
ले । श्रुतियों में तो जीवेश्वरों को मायिक कहा ही है ।
ईक्षणादिप्रवेशान्ता सृष्टिरीशकृता भवेत् ।
जाग्रदादिविमोक्षान्तः संसारो जीवकर्तृकः ॥६९॥
ईक्षण से लेकर प्रवेश तक की सृष्टि तो ईश्वर की बनायी
हुई है । जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति, बन्ध तथा मोक्षरूपी संसार को
जीव ने बना लिया है । [इसका स्पष्टीकरण तृप्तिदीप के चतुर्थ
श्लोक में है]
असङ्ग एव कूटस्थः सर्वदा नास्य कश्चन ।
भवत्यतिशयस्तेन मनस्येवं विचार्यताम् ॥७०॥
मुमुक्षु लोग इस बात को अपने मन में सदा ही विचारा

कूटस्थदीपप्रकरणम् ३५३

कूटस्थदीपप्रकरणम् ३५३
करें कि यह कूटस्थ तो असङ्ग ही रहता है । [ जन्म जरा रोग
और मृत्यु अनादि काल से क्रमानुसार बराबर होते चले आ रहे
हैं परन्तु ] इन सब से इस कूटस्थ तत्व में कभी कुछ भी अतिशय
नहीं हो पाता है [यह तो सदा वैसे का वैसा ही बना
रहता है] ।
न निरोधो न चोत्पत्ति र्न बद्धो न च साधकः ।
न मुमुक्षु र्न वै मुक्त इत्येषा परमार्थता ॥७१॥
सब झंझट को छोड़कर परमार्थ का निचोड़ पूछो तो इतना
ही है किः—मरण और जन्म कुछ चीज़ ही नहीं हैं। बद्ध और
साधक कोई होता ही नहीं है। मुमुक्षु और मुक्त किसी को कह
ही नहीं सकते हैं ।
अवाङ्मनसगम्यं तं श्रुतिर्बोधयितुं सदा ।
जीवमीशं जगद् वापि समाश्रित्य प्रबोधयेत् ॥७२॥
वाणी और मन से अगम्य उसी तत्व का बोध कराने के
लिये श्रुति भगवती 'जीव' या 'ईश्वर' या 'जगत्' इन तीनों में
से किसी एक को पकड़ कर, उस मन वाणी के अगम्य तत्व का
बोध करा देती है । [मन वाणी के अगम्य उस तत्व का बोध
कराने के लिये श्रुतियों में 'जीव' 'ईश्वर' तथा 'जगत्' के स्वरूप
का प्रतिपादन जहां तहां किया गया है । उसका परमतात्पर्य तो
जिस किसी प्रकार उस अगम्य तत्व का बोध कराने में
ही है।]
यया यया भवेत् पुंसां व्युत्पत्तिः प्रत्यगात्मनि ।
सा सैव प्रक्रियेह स्यात् साध्वीत्याचार्यभाषितम् ॥७३॥
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