पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 356, कुल 726 में से
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धीवृत्त्याभासकुम्भानां समूहो भास्यते चिता ।
कुम्भमात्रफलत्वात् स एक आभासतः स्फुरेत् ॥१४॥
ब्रह्मचैतन्य से तो धीवृत्ति, चिदाभास तथा कुम्भ ये सब
के सब ही प्रकाशित होते हैं। चिदाभास बिचारा तो केवल
कुम्भ में ही रहने वाला एक फल है । इस कारण उस चिदा-
भास से तो वह अकेला घट ही घट भास सकता है । यों
ब्रह्मचैतन्य का तथा चिदाभास का विषयभेद भी है ।
चैतन्यं द्विगुणं कुम्भे ज्ञातत्वेन स्फुरत्यतः ।
अन्येऽनुव्यवसायाख्य माहुरेतद् यथोदितम् ॥१५॥
क्योंकि एक घट, चिदाभास और ब्रह्मचैतन्य दोनों से ही
भास्य होता है, इस कारण घट में ज्ञातता उत्पन्न होजाने पर
तो दुगना चैतन्य होजाता है । दूसरे तार्किक लोग तो ऊपर
बताये हुए इसी को अनुव्यवसाय नाम का दूसरा ज्ञान
कह देते हैं।
घटोऽयमित्यसावुक्ति राभासस्य प्रसादतः ।
विज्ञातो घट इत्युक्ति र्ब्रह्मानुग्रहतो भवेत् ॥१६॥
जब हम कहते हैं कि 'यह घट है' तब यह कहना चिदा-
भास की सहायता से होता है। जब हम कहते हैं कि 'घट
को जान लिया' तब यह कथन ब्रह्म के अनुग्रह से हुआ करता
है । [यों व्यवहार के भेद से भी चिदाभास और ब्रह्म का
भेद जान लेना चाहिये]
आभासब्रह्मणी देहाद् बहिर्यद्वद् विवेचिते ।
तद्वदाभासकूटस्थौ विविच्येतां वपुष्यपि ॥१७॥
देह से बाहर जैसे चिदाभास और ब्रह्मका विवेक यहां