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सर्वकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 358, कुल 726 में से

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पृष्ठ 358

३३८ पञ्चदशी
सब वृत्तियों की सन्धियां [जब कि एक वृत्ति नष्ट हो कर
दूसरी उत्पन्न होने को होती है] तथा सब वृत्तियों के अभाव
[जबकि कोई भी वृत्ति नहीं रहती] जिस निर्विकार चैतन्य
से प्रकाशित [ज्ञात] होते हैं, उसीको कूटस्थ कहा जाता है ।
घटे द्विगुणचैतन्यं यथा बाह्ये तथान्तरे ।
वृत्तिष्वपि, ततस्तत्र वैशद्यं सन्धितोऽखिलम् ॥२२॥
जैसे बाह्य घट में दुगना चैतन्य [एक तो घटमात्र का
भासक चिदाभास तथा दूसरा घट की ज्ञातता का भासक
ब्रह्मचैतन्य] होता है, इसी प्रकार अन्दर की अहंकारादि वृत्तियों
में भी एक तो कूटस्थ चैतन्य रहता है, दूसरा केवल वृत्तियों का
चिदाभास होता है । यों अन्दर भी दुगना चैतन्य होता है ।
दुगना चैतन्य होने के कारण ही, इन वृत्तियों में, संधियों से
अधिक स्पष्टता आगयी है । [चैतन्य की इतनी विशदता
सन्धियों में नहीं होती, जितनी कि इन वृत्तियों में होती है ।]
ज्ञातताज्ञातते न स्तो घटवद् वृत्तिषु क्वचित् ।
स्वस्य स्वेनागृहीतत्वात् तामिस्राज्ञाननाशनात् ॥२३॥
घट में जैसे ज्ञातता और अज्ञातता होती है, वैसे वृत्तियों
में कभी भी ज्ञातता और अज्ञातता नहीं होतीं । क्योंकि अपना
आपा अपने आप से गृहीत नहीं हो सकता तथा उन वृत्तियों
के उत्पन्न होते ही उनसे अज्ञान का नाश हो जाता है । [भाव
यह है कि ज्ञान की व्याप्ति से ज्ञातता और अज्ञान की व्याप्ति
से अज्ञातता होती है । वृत्तियां स्वयंप्रकाश होती हैं, इस कारण
उनमें ज्ञान की व्याप्ति नहीं होती और 'ज्ञातता' नहीं आती । वे
वृत्तियाँ जब उत्पन्न हो जाती हैं तब वे उत्पन्न होते ही