पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
चित्रदीपप्रकरणम् २१५
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चित्रदीपप्रकरणम् २१५
इसका भाव है] यदि कहो कि ज्ञान होने पर ऐसी हालत हो जाती है
कि ज्ञानी के देहादि कुछ काम कर ही नहीं सकते, तो हमें यह
बात सुनकर हंसी आती है कि ज्ञानी के शरीर को अशक्त कर
देने वाला वह ज्ञान क्या हुआ ? वह तो एक रोग ही हुआ [वह
ज्ञान तो एक प्रकार 'लकवा' ( पक्षाघात) हुआ]।
तत्त्वबोधं क्षयं व्याधिं मन्यन्ते ये महाधियः ।
तेषां प्रज्ञातिविशदा किं तेषां दुःशकं वद ॥२७१॥
जो महाबुद्धि लोग तत्वबोध को एक प्रकार का क्षयरोग
मानते हैं—[कि तत्वज्ञानी के हाथ पैर उठते ही नहीं] उनकी
बुद्धि के विषय में हम क्या कहें ? उनकी बुद्धि बड़ी विशद
है। ऐसे पुरुषों को असाध्य ही क्या है ? [वे जो चाहें कह
सकते हैं]
भरतादे रवृत्तिः पुराणोक्तेति चेत्तदा ।
जक्षन् क्रीडन् रतिं विन्दन्नित्यश्रौषीर्न किं श्रुतिम्॥२७२॥
यदि कहा जाय कि 'जडभरत आदि महात्मा लोग कुछ
भी नहीं करते थे' यह बात पुराण में कही गयी है। पुराणों
का कहना है कि—ज्ञानी लोग किसी काम में प्रवृत्त होते ही
नहीं। तो हम उससे कहेंगे कि—जक्षन् क्रीडन् रममाणः स्त्रीभिर्वा
यानैर्वा ज्ञातिभिर्वा नोपजनं स्मरन्निदं शरीरम् (छा० ८–१२–३) यह
श्रुति का वाक्य क्या तुमने नहीं सुना है ? जिसमें ज्ञानी की
प्रवृत्ति का विधान किया गया है—[तुम्हारा उपर्युक्त आक्षेप
श्रुति के मर्म को न जानने के कारण से है।]
न ह्याहारादि सन्त्यज्य भरताद्याः स्थिताः क्वचित् ।
काष्ठपाषाणवत् किन्तु संगभीता उदासते ॥२७३॥
२१६ पञ्चदशी
भरतादि ने भी काष्ठ या पाषाण की तरह खान पान
आदि का परित्याग तो कभी भी नहीं किया था। किन्तु वे
लोग संगदोष के लग जाने के डर से; उदासीन रहते थे ।
[पुराणों का तात्पर्य भी उनकी उदासीनता के दिखाने में ही है ]
सङ्गी हि बध्यते लोके निःसङ्गः सुखमश्नुते ।
तेन सङ्गः परित्याज्यः सर्वदा सुखमिच्छता ॥२७४॥
लोक में देखते हैं कि सङ्ग करने वाले लोग ही बँधे फिरते
हैं। निःसंग लोगों को मौज मारते हुए पाया जाता है । इससे
जो लोग नित्य सुख की इच्छा रखते हों, उन्हें संग का परि-
त्याग सदा के लिये कर देना चाहिये ।
अज्ञात्वा शास्त्रहृदयं मूढो वक्त्यन्यथान्यथा ।
मूर्खाणां निर्णय स्त्वास्तामस्मत्सिद्धान्त उच्यते॥२७५॥
मूर्ख लोग शास्त्र के मर्म को तो पहचानते नहीं और कुछ
का कुछ कहने लगते हैं। इस कारण उनकी बात को यहीं
छोड़ कर अब हम अपनी प्रकृत बात, किंवा शास्त्र के रहस्य
का वर्णन करते हैं ।
वैराग्यबोधोपरमाः सहायास्ते परस्परम् ।
प्रायेण सह वर्तन्ते वियुज्यन्ते क्वचित् क्वचित् ॥२७६॥
शास्त्र का सिद्धान्त तो यह है कि—'वैराग्य' 'बोध' तथा
'उपरम' ये तीनों परस्पर के सहायक हैं। ये तीनों प्रायः करके
साथ ही साथ रहते हैं। कहीं कहीं तो ये अलग अलग भी
पाये जाते हैं। . .
हेतुस्वरूपकार्याणि भिन्नान्येषामसङ्करः ।
यथावदवगन्तव्यः शास्त्रार्थं प्रविविच्यता ॥२७७॥
चित्रदीपप्रकरणम् २१७
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इन [वैराग्य बोध तथा उपरम] तीनों के कारण, स्वरूप,
तथा कार्य भिन्न भिन्न हैं । इससे ये तीनों एक नहीं हैं । शास्त्रार्थ
का विवेक करने वाले लोगों को इनका भेद ठीक ठीक रीति से
समझ लेना चाहिये ।
दोषदृष्टि र्जिहासा च पुनर्भोगेष्वदीनता ।
असाधारणहेत्वाद्या वैराग्यस्य त्रयोऽप्यमी ॥२७८॥
विषयों में दोषदृष्टि, वैराग्य का मुख्य कारण होता है । विषयों
को छोड़ने की अभिलाषा, वैराग्य का 'स्वरूप' कहाता है । भोगों
के प्रति दीनता का न रहना, वैराग्य का 'फल' माना जाता है ।
श्रवणादित्रयं तद्वत् तत्वमिथ्याविवेचनम् ।
पुनर्ग्रन्थेरनुदयो बोधस्यैते त्रयो मताः ॥२७९॥
श्रवण मनन तथा निदिध्यासन, ये तीनों बोध के मुख्य
'कारण' हैं। सत्य और मिथ्या का विवेक, बोध का 'स्वरूप' होता
है । ग्रन्थि का फिर कभी भी उदय न होना, बोध का 'कार्य'
बताया जाता है ।
यमादिर्धीनिरोधश्च व्यवहारस्य संक्षयः ।
स्युर्हेत्वाद्या उपरते रित्यसंकर ईरितः ॥२८०॥
उपरति के मुख्य 'कारण' यम नियमादि हैं। बुद्धि का
निरोध हो जाना, उपरति का 'स्वरूप' है । व्यवहार का समाप्त
हो जाना, उपरति का 'फल' माना गया है । यों इन तीनों के
भेद का वर्णन किया गया ।
तत्त्वबोधः प्रधानं स्यात् साक्षान्मोक्षप्रदत्वतः ।
बोधोपकारिणावेतौ वैराग्योपरमावुभौ ॥२८१॥
२१८ पञ्चदशी
[तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय (श्वे०
३--८) इस श्रुति के आधार से कहते हैं कि--इन तीनों में]
तत्वबोध ही प्रधान है । क्योंकि यही साक्षात् मोक्ष का देने
वाला है । वैराग्य तथा उपरति ये दोनों तो इसी तत्ववोध [ज्ञान]
के सहायक होते हैं ।
त्रयोप्यत्यन्तपक्काश्चेन्महत् स्तपसः फलम् ।
दुरितेन क्वचित् किंचित् कदाचित् प्रतिबध्यते ॥२८२॥
यदि ये तीनों अत्यन्त पक्के हो जायँ तो यह मामूली पुण्यों
का फल नहीं है । [क्योंकि जब करोड़ों जन्मों में कमाये हुए
पुण्यों का परिपाक होता है तब कहीं ये तीनों इकट्ठे हो पाते
हैं। नहीं तो] प्रतिबन्ध करने वाले पाप के प्रभाव से किसी पुरुष
में किसी काल में इन तीनों में से एक आध का प्रतिबन्ध हो
जाता है ।
वैराग्योपरती पूर्णे बोधस्तु प्रतिबध्यत ।
यस्य तस्य न मोक्षोस्ति पुण्यलोकस्तपोबलात् ॥२८३॥
वैराग्य और उपरति तो पूर्ण हो चुके हों और आत्मबोध
न हुआ हो तो उस विचारे तपस्वी को मोक्ष नहीं मिलेगा ।
उस को तो उस के तपोबल से किसी पुण्यलोक की प्राप्ति हो
जायगी [भाव यही हुआ कि--तत्वज्ञान के न होने पर मोक्ष
का मिलना असम्भव ही है ।]
पूर्णे बोधे तदन्यौ द्वौ प्रतिबद्धौ यदा तदा ।
मोक्षो विनिश्चितः किन्तु दृष्टदुःखं न नश्यति ॥२८४॥
यदि किसी का ज्ञान तो पूर्ण हो चुका हो और वैराग्य
तथा उपरति उसे न हो गये हों, तो मोक्ष तो उसे मिलेगा ही,
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परन्तु उसके दृष्टदुःखों का नाश नहीं हो सकेगा। [अथवा यों
कहो कि जीवन्मुक्ति का मज़ा उसके हाथ नहीं आयेगा]
नित्यानित्यवस्तुविवेक, शमादि साधन, वैराग्य और मुमुक्षु
भाव के रहने पर ही ज्ञान की प्राप्ति होती है। ज्ञान हो जाय और
वैराग्य तथा उपरति न हों यह एक असाधारण अवस्था का वर्णन
ग्रन्थकार कर रहे हैं। हम लोग ऐसी अवस्था की कल्पना ही कर
सकते हैं। साधारणतया यह बात ठीक नहीं प्रतीत होती। परन्तु
ग्रन्थकार के अनुभवी होने के कारण इसको हम अपनी बुद्धि की
पहुँच के परे की बात मानकर चुप हो जाते हैं। इस सम्बन्ध में
द्वैतविवेक प्रकरण के ५१ से ५७ तक श्लोक देखने से इस सिद्धान्त
की पुष्टि नहीं होती। इस कारण ज्ञान हो जाने और वैराग्य तथा
उपरति न होने की बात को हमारी बुद्धि बड़ी कठिनता से स्वीकार
करती है। ऐसा मालूम होता है कि कोई ऐसी अवस्था होती होगी—
कि ज्ञानी का ज्ञान किसी विषयभक्ति के कारण दबा पड़ा रहता
होगा और मृत्यु के समय उसकी वासनायें हट जाती होंगी और
उसे मुक्ति मिल जाती होगी। साधारण सिद्धान्त तो यही है कि
विमुक्तश्च विमुच्यते अर्थात् जीवन्मुक्तों को ही विदेहमुक्ति मिलती है।
ब्रह्मलोकतृणीकारो वैराग्यस्यावधिर्मतः ।
देहात्मवत् परात्मत्वदार्ढ्ये बोधः समाप्यते ॥२८५॥
ब्रह्मलोक मिलने लगे और उसे तृणतुल्य तुच्छ समझ कर
छोड़ दिया जाय यही वैराग्य की अन्तिम दशा है। अज्ञानी लोग
जैसे देह को आत्मा समझे बैठे हैं,वैसी दृढता के साथ,पर तत्व
को आत्मा समझ लिया जाय तो बस, यहाँ पहुँच कर बोध भी
समाप्त हो जाता है । [यही बोध की हद मानी गयी हैं]
२२० पञ्चदशी
सुप्तिवद् विस्मृतिः सीमा भवेदूपरमस्य हि ।
दिशानया विनिश्चेयं तारतम्यमवान्तरम् ॥२८६॥
सोते हुए जैसे हम जगत् को भूल जाते हैं, जागते हुए भी
जब कोई इसी प्रकार जगत् को भूल जाय [मानो जगत् नाम
की कोई चीज़ ही न रही हो] बस इसी को उपरति की सीमा
समझ लेना । इनका अवान्तर न्यूनाधिकभाव तो इसी रीति से
अपनी अपनी बुद्धि से निश्चय कर लेना चाहिये ।
आरब्धकर्मनानात्वाद् बुद्धानामन्यथान्यथा ।
वर्तनं, तेन शास्त्रार्थे भ्रमितव्यं न पण्डितैः ॥२८७॥
प्रारब्ध कर्मों के नाना प्रकार का होने से, ज्ञानी लोग भी
भिन्न भिन्न प्रकार के आचरण वाले होते हैं। उनके भिन्न भिन्न
बर्तावों को देखकर शास्त्रार्थ के विषय में पण्डितों को भ्रम में
नहीं पड़ जाना चाहिये । [तत्त्वज्ञानी लोग भी रागादि वाले
होने से भिन्न प्रकार के आचरणों वाले पाये जाते हैं। फिर हम
ज्ञान को भी मुक्ति दिलाने वाला कैसे मान लें ? इस शंका का
समाधान यही है कि—ज्ञानी के शरीर के रोग या भूख आदि
जैसे उसके प्रारब्ध के फल होते हैं, इसी प्रकार ज्ञानी के राग द्वेष
आदि भी तो उसके प्रारब्ध कर्मों के ही फल हैं। इस कारण वे
रागादि, रोग आदि की तरह ही, ज्ञानी की मुक्ति का प्रतिबन्ध
नहीं कर सकते हैं।]
स्वस्वकर्मानुसारेण वर्तन्तां ते यथा तथा ।
अविशिष्टः सर्वबोधः समा मुक्तिरिति स्थितिः ॥२८८॥
सब लोगों को यह निश्चय कर रखना चाहिये कि—वे
ज्ञानी लोग अपने अपने प्रारब्ध कर्मों के अनुसार जैसा तैसा
चित्रदीपप्रकरणम् २२१
चित्रदीपप्रकरणम् २२१
बर्ताव करते हैं तो करते रहें। उन सब को जो अपने ब्रह्मत्व का
ज्ञान हुआ है वह तो सब का एक समान ही होता है और मुक्ति
भी उनकी एक समान ही होती है। [सब ही शुद्ध ब्रह्मरूप से स्थित
हो जाते हैं] यही शास्त्र की मर्यादा है।
जगच्चित्रं स्वचैतन्ये पटे चित्रमिवार्पितम् ।
मायया, तदुपेक्ष्यैव चैतन्यं परिशेष्यताम् ॥२८९॥
कपड़े पर खिंचे हुए चित्र की तरह, अपने आत्मचैतन्य में
जो जगत् रूपी चित्र, माया के प्रताप से खिंच गया है, उस
[जगतरूपी चित्र] की उपेक्षा करके [उस की ओर से अपनी
बुद्धि की आँख मींचकर] अपने आत्मचैतन्य को परिशेष
कर डालो।
चित्रदीपमिमं नित्यं येऽनुसन्दधते बुधाः ।
पश्यन्तोऽपि जगच्चित्रं ते मुह्यन्ति न पूर्ववत् ॥२९०॥
जो बुद्धिमान् लोग इस चित्रदीप नाम के प्रकरण का विचार
नित्य ही किया करेंगे, वे इस जगच्चित्र को देखकर भी, पहले की
तरह मोह को कभी प्राप्त नहीं होंगे।
इति श्रीमद्विद्यारण्यमुनिविरचितं चित्रदीपप्रकरणं समाप्तम् ।
7. Triptidipa
ओम्
तृप्तिदीपप्रकरणम्
आत्मानं चेद् विजानीयादयमस्मीति पूरुषः ।
किमिच्छन् कस्य कामाय शरीर मनुसंज्वरेत् ॥१॥
अस्याः श्रुतेरभिप्रायः सम्यगत्र विचार्यते ।
जीवन्मुक्तस्य या तृप्तिः सा तेन विशदायते ॥२॥
आत्मानं चेद्विजानीयात् वृ० ४-४-१२ इस श्रुति का अभि-
प्राय इस तृप्तिदीप नाम के प्रकरण में भले प्रकार विचारा
जायगा । उससे जीवन्मुक्त महाशयों को जो अलौकिक तृप्ति रहा
करती है वह स्पष्ट विदित हो जायगी ।
मायाभासेन जीवेशौ करोतीति श्रुतत्वतः ।
कल्पितावेव जीवेशौ ताभ्यां सर्वं प्रकल्पितम् ॥३॥
माया आभास के द्वारा जीव और ईश्वर का निर्माण किया
करती है, ऐसा श्रुतियों में कहा गया है [इसका विस्तारपूर्वक
प्रतिपादन तत्वविवेक नामक प्रकरण के १५-१६-१७ श्लोकों में है]
सो ये जीव और ईश्वर दोनों ही कल्पित हैं । इन दोनों ने शेष
सब संसार की कल्पना कर डाली है ।
ईक्षणादिप्रवेशान्ता सृष्टि रीशेन कल्पिता ।
जाग्रदादिविमोक्षान्तः संसारो जीवकल्पितः ॥४॥
ईक्षण से लेकर
तृप्तिदीपप्रकरणम् २२३
[Header]
तृप्तिदीपप्रकरणम् २२३
संकल्प किया] प्रवेश तक [कि इस जीव रूप से इसी सृष्टि में
प्रवेश कर जाऊँ] की सब सृष्टि तो ईश्वर की बनायी हुई है ।
जाग्रत् से लेकर मोक्षपर्यन्त सब संसार जीव का बनाया हुआ
है । [क्योंकि वही अपने आप को जागता हुआ या मुक्त होता
हुआ माना करता है । वह इसमें अभिमान रखता है । यदि
यह जीव साधना करके इन सब अवस्थाओं में से अपना अभि-
मान हटा ले तो जाग्रदादि संसार का एकपदे ध्वंस हो जाय ।
जाग्रदादि संसार का वर्णन तो यों है कि—यह प्राणी माया से
मोहित होकर इस मांस के झोंपड़े में अहम्भाव से निवास कर
लेता है तो फिर भले बुरे सभी काम करने लगता है । यह
जाग्रत् काल में अन्न पान आदि नाना भोगों से अपनी तृप्ति
होना मानता है। स्वप्न में यह अपनी माया से ही सम्पूर्ण लोक
को बनाता है और अपने बनाये हुए उसी से सुख दुःख भोगा
करता है । सुषुप्तिकाल में जब सब कुछ विलीन हो जाता है,
जब अज्ञान से अभिभूत हो जाता है, तब सुखरूप हुआ रहता
है । यह तो एक शरीर की जाग्रत् आदि अवस्थायें हुईं । जब
एक शरीर में निवास के कर्म समाप्त हो जाते हैं और जन्मान्तर
देनेवाले कर्मों की बारी आ जाती है तब वही जीव फिर जन्म
लेता है और फिर यों ही जागता है, सपने देखता है और सोया
करता है । यों यह जीव इन जाग्रदादि तीनों अवस्थाओं और
स्थूल, सूक्ष्म आदि तीनों शरीरों में खेल से करता फिरा करता
है । उसी जीव के कर्मों के प्रताप से यह सब विचित्र जगत्
उत्पन्न हो गया है । जाग्रत् स्वप्न सुषुप्ति आदि के इस प्रपंच को
जो तत्व प्रकाशित कर रहा है, वही ब्रह्म नाम का तत्व मैं हूँ,
२२४ पञ्चदशी
ऐसा यदि किसी को मालूम हो जाय, तो उसका बन्धनों से
छुटकारा हो जाय, उसका कल्पित संसार विलीन हो जाय ।]
भ्रमाधिष्ठानभूतात्मा कूटस्थासंगचिद्वपुः ।
अन्योन्याध्यासतोऽसङ्गधीस्थजीवोऽत्र पूरुषः ॥५॥
यद्यपि यह कूटस्थ [अविकारी] असङ्ग और चित्स्वरूप
ही है। तथापि देहेन्द्रिय आदि के अध्यास रूपी भ्रम का आधार
भी बना हुआ है। वह असङ्ग आत्मतत्व ही अन्योन्याध्यास
की पकड़ में आकर जब परमार्थदृष्टि से [ उससे ] सदा
असम्बद्ध रहने वाली बुद्धि में ठहर कर 'जीव' बन जाता
है, तब ऐसे उस जीव को ही इस श्रुति में 'पूरुष' अथवा
'पुरुष' कहा गया है ।
साधिष्ठानो विमोक्षादौ जीवोऽधिक्रियते, न तु ।
केवलो, निरधिष्ठानविभ्रान्तेः क्वाप्यसिद्धितः ॥६॥
[ जीव शब्द के अर्थ में से हम अधिष्ठानभूत कूटस्थ
चैतन्य को नहीं छोड़ सकते हैं । बुद्धि आदि की कल्पना का
अधिष्ठान कूटस्थ चैतन्य ही, जब बुद्धि में प्रतिबिम्बित हो
जाता है, तब उसे हम 'जीव' कहते हैं। केवल चिदाभास को
हम जीव नहीं कहते। क्योंकि] अधिष्ठान अर्थात् कूटस्थ
चैतन्य के सहित ही यह जीव मोक्ष या स्वर्गादि के साधनों
का अनुष्ठान करने का अधिकारी होता है। केवल चिदाभास
को मोक्षादि का अधिकार ही नहीं है। क्योंकि बिना अधि-
ष्ठान की भ्रान्ति [ आरोप्य पदार्थ ] लोक में कहीं भी देखी
नहीं जाती [ इस कारण जीव शब्द के अर्थ में हमें कूटस्थ
चैतन्य को रखना ही पड़ता है। यदि हम कूटस्थ तत्व को नहीं
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तृप्तिदीपप्रकरणम् २२५
रक्खेंगे तो मोक्ष आदि में अन्वयी कौन होगा ? अर्थात् इन
मोक्षादि को भोगने वाला कौन होगा ? क्योंकि आभास तो
यहीं नष्ट हो जाता है ।]
अधिष्ठानांशसंयुक्तं भ्रमांशमवलम्बते ।
यदा तदाहं संसारीत्येवं जीवोऽभिमन्यते ॥७॥
वह जीव जब तो अधिष्ठानांशसंयुक्त [ अर्थात् कूटस्थ
सहित ] भ्रम भाग [ किंवा चिदाभासयुक्त दोनों शरीरों ] का
अवलम्ब ले लेता है—अथवा यों कहो कि उन दोनों शरीरों
को ही अपना स्वरूप मान लेता है—तब वह समझने लग
पड़ता है कि मैं तो संसारी [क्षुद्र प्राणी] हूँ ।
भ्रमांशस्य तिरस्कारा दधिष्ठानप्रधानता ।
यदा तदा चिदात्माहमसङ्गोऽस्मीति बुध्यते ॥८॥
जब तो वही जीव भ्रमांश [ दोनों देहों सहित चिदाभास ]
का तिरस्कार कर देता है—उनको मिथ्या समझ कर उनकी
परवाह नहीं करता है और ऐसा करने से जब अधिष्ठान की
प्रधानता हो जाती है [ जब वह जीव अधिष्ठानभूत कूटस्थ
स्वरूप ही हो जाता है, जब वह शुद्ध आत्मस्थिति में आ जाता
है ] तब वह जाना करता है कि ओ हो ! 'मैं तो चिदात्मा
हूँ 'मैं तो असङ्ग हूँ ।'
नासङ्गेऽहंकृतियुक्ता कथमस्मीति चेच्छृणु ।
एको मुख्यो द्वावमुख्यौ वित्यर्थस्त्रिविधोऽहमः ॥९॥
जब कि असङ्ग चिदात्मा में [ जो कि अविषय है ] अह-
ङ्कार अथवा मैं भाव का होना ठीक ही नहीं है,तो फिर वह यह
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२२६ पञ्चदशी
[Main Text]
क्यों कर जान सकता है कि 'मैं असङ्ग हूँ' ? इसका समाधान
भी सुनो कि—अहं के तीन अर्थ हैं—एक मुख्य अर्थ है, तथा
दो उसके अमुख्य अर्थ होते हैं। [भाव यह है कि मुख्यरूप
से तो अहं प्रतीति का विषय आत्मा हो ही नहीं सकता, परन्तु
लक्षणा से उसको 'अहं' कहा ही जा सकता है।]
अन्योन्याध्यासरूपेण कूटस्थाभासयोर्वपुः ।
एकीभूय भवेन्मुख्यस्तत्र मूढैः प्रयुज्यते ॥१०॥
कूटस्थ और आभास इन दोनों का स्वरूप अन्योन्याध्यास
की आँच में पिघल कर जब एकता को प्राप्त कर लेता है तब
बस यही अहं शब्द का 'मुख्य अर्थ' कहाता है। [इसको इस
अहं का मुख्य अर्थ इसी लिये कहते हैं कि कूटस्थ और चिदा-
भास के इसी हिले मिले स्वरूप का जिनको विवेक नहीं है
वे सभी ] मूढ लोग अहं शब्द का प्रयोग इसी अर्थ में किया
करते हैं। [अधिक संख्या इसी अर्थ में अहं शब्द का प्रयोग
करने वालों की है। इसलिये इसे ही मुख्य मान लिया है]
पृथगाभासकूटस्था वमुख्यौ तत्र तत्ववित् ।
पर्यायेण प्रयुङ्क्तेऽहंशब्दं लोके च वैदिके ॥११॥
जब तो यह समझ लिया जाय कि आभास अलग है और
कूटस्थ तत्व अलग है, तब [ अलगाये हुए ] वे दोनों अहं के
अमुख्य अर्थ हो जाते हैं। क्योंकि तत्वज्ञानी लोग लौकिक
और वैदिक व्यवहारों में कभी तो कूटस्थ को अहं कहते हैं
और कभी अकेले चिदाभास को अहं कह देते हैं। [भाव यह
है कि—क्योंकि कूटस्थ और चिदाभास का जो मिश्रित रूप है
वही सार्वजनीन व्यवहार का विषय हो रहा है। इससे उसे तो
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अहं का मुख्य अर्थ मान लिया है। इन दोनों के विविक्त रूपों
का व्यवहार तो बहुत थोड़े से मनुष्य (सो भी कभी ही) करते
हैं, इससे उनको अमुख्य अर्थ कहा जाता है।]
लौकिकव्यवहारेऽहंगच्छामीत्यादिके बुधः ।
विविच्यैव चिदाभासं कूटस्थात्तं विवक्षति ॥१२॥
ज्ञानी पुरुष जब लौकिक व्यवहार में 'मैं जाता हूँ' ऐसा
बोलता है तब वह चिदाभास को कूटस्थतत्व से पृथक्
करके ही उस चिदाभास को 'अहं' नाम से कहना चाहता है।
[ज्ञानी पुरुष जब 'मैं जाता हूँ' ऐसा कहता है तब वह यह
कभी नहीं भूलता कि कूटस्थ आत्मतत्व जाने वाला पदार्थ नहीं
है। उसे यह सदा स्मरण रहता है कि यह चिदाभास ही
जाता आता है ]
असङ्गोऽहं चिदात्माहमिति शास्त्रीयदृष्टितः ।
अहंशब्दं प्रयुङ्क्तेऽयं कूटस्थे केवले बुधः ॥१३॥
वही ज्ञानी पुरुष शास्त्रीय दृष्टि को लेकर कभी कभी चिदा-
भास से हीन केवल कूटस्थ तत्व में भी 'अहं' शब्द का प्रयोग
किया करता है कि 'मैं असङ्ग हूँ' 'मैं चिदात्मा हूँ'। [यों मुख्य
तया न सही परन्तु लक्षणा से तो चिदात्मा भी अहं शब्द का अर्थ
हो ही जाता है। इसी कारण 'मैं असङ्ग हूँ' यह ज्ञान भी ठीक
हो जाता है।]
ज्ञानिताज्ञानिते त्वात्माभासस्यैव न चात्मनः ।
तथा च कथमाभासः कूटस्थोऽस्मीति बुध्यताम् ॥१४॥
ज्ञानित्व और अज्ञानित्व दोनों आत्माभास को ही होते हैं।
असङ्ग चिद्रूप आत्मा में न तो ज्ञानता ही हो सकती है और
न अज्ञानिता ही रह सकती है [क्योंकि उसे तो अज्ञान की
निवृत्ति की कुछ आवश्यकता ही नहीं होतो। इसलिये कूटस्थ तो
यह जानता ही नहीं कि मैं कूटस्थ हूँ ] फिर तुम्हें यह बताना
चाहिये कि—आभास को यह ज्ञान कैसे हो सकता है कि 'मैं
कूटस्थ हूँ' ?
नायं दोषश्चिदाभासः कूटस्थैकस्वभाववान् ।
आभासत्वस्य मिथ्यात्वात् कूटस्थत्वावशेषणात् ॥१५॥
यह दोष ठीक नहीं,चिदाभास का असली स्वरूप तो कूटस्थ
ही है। वह चिदाभास कूटस्थ से भिन्न तो सिद्ध हो ही नहीं
सकता। क्योंकि आभासत्व तो मिथ्या ही है [ज्ञान के द्वारा]
उसकी कूटस्थता को शेष रख लिया जाता है [जैसे कि दर्पण
में प्रतीत होने वाले मुखाभास का असली स्वरूप तो गरदन पर
लगा हुआ मुख ही है। इसी प्रकार इसे भी जान लो।]
कूटस्थोऽस्मीति बोधोऽपि मिथ्या चेन्नेति को वदेत्।
न हि सत्यतयाऽभीष्टं रज्जुसर्पविसर्पणम् ॥१६॥
यदि चिदाभास मिथ्या है तो उसके आश्रित रहनेवाला
'मैं कूटस्थ हूँ' यह ज्ञान भी तो मिथ्या ही होना चाहिये ? ऐसा
यदि पूछा जाय तो हम कहेंगे कि फिर इस बात का निषेध
हम कब करते हैं ? [कूटस्थ के स्वरूप के अतिरिक्त और जो
भी कुछ है वह सभी मिथ्या है। फिर इस ज्ञान को मिथ्या
मानना भी तो हमें इष्ट ही. है] देखो, रज्जु में जो सर्प कल्पित
कर लिया गया है,वह जब नष्ट होता हुआ प्रतीत हो तब उस
[विसर्पण] को कोई वास्तविक विसर्पण नहीं मानता है।
तृप्तिदीपप्रकरणम् २२९
तृप्तिदीपप्रकरणम् २२९
तादृशेनापि बोधेन संसारो हि निवर्तते ।
यक्षानुरूपो हि बलिरित्याहु लौकिका जनाः ॥१७॥
यद्यपि वह बोध मिथ्या ही है तौ भी उससे मिथ्या संसार
तो निवृत्त हो ही जायगा [ जैसे कि सुपने के झूठे व्याघ्र
को देखकर चौकने से किसी की निद्रा टूट जाती है] लोक में
कहा भी जाता है कि—जैसा यक्ष वैसी बलि, [जैसी शीतला
देवी, वैसी ही उसकी गधे की सवारी । यह इस कारण कहते
हैं कि जब यह संसार मिथ्या ही है तो यह मिथ्या बोध से भी
मर जायगा ] ।
तत्सादाभासपुरुषः सकूटस्थो विविच्य तम् ।
कूटस्थोऽस्मीति विज्ञातुमर्हती त्यभ्यधाच्छ्रुतिः ॥१८॥
[ क्योंकि कूटस्थ ही चिदाभास का निज स्वरूप है ] इस
कारण कूटस्थ सहित जो चिदाभास है वह उस कूटस्थ को
अपने मिथ्या स्वरूप से पृथक् करके [ मुख्य वृत्ति से तो नहीं
किन्तु लक्षणा वृत्ति से तो ] यह जान ही सकता है कि 'मैं
कूटस्थ हूँ' [ मेरा असली रूप कूटस्थ है ] इसी अभिप्राय को
लेकर श्रुति ने 'अस्मि' यह पद कहा है ।
असन्दिग्धाविपर्यस्तबोधो देहात्मनीक्ष्यते ।
तद्वदत्रेति निर्णैतु मयमित्यभिधीयते ॥१९॥
[मूल श्रुति के 'पुरुष' तथा 'अस्मि' इन दो पदों का व्या-
ख्यान यहां तक हो चुका । अब 'अयम्' का व्याख्यान किया
जाता है] लौकिक लोगों को इस प्रसिद्ध देहरूपी आत्मा में
संशय और विपर्यय से रहित बोध पाया जाता है [वे बिना
सन्देह और बिना विपर्यय के इस देह को मैं हूँ कहते हैं । वे
२३० पञ्चदशी
जब बड़े मेलों में घुसते हैं तब -अपने शरीरों पर कोई चिन्ह
करके नहीं घुसते। अपने शरीर के अपने होने में उन्हें कभी
सन्देह नहीं होता ] ठीक इसी प्रकार प्रत्यगात्मा के विषय में
ऐसा ही दृढ़ ज्ञान, मुक्ति को पाने के लिये आवश्यक है। इसी
बात का निर्णय करने के लिये श्रुति में 'अयम्' यह पद कहा है।
देहात्मज्ञानवज्ज्ञानं देहात्मज्ञानबाधकम्।
आत्मन्येव भवेद्यस्य स नेच्छन्नपि मुच्यते ॥२०॥
'मैं मनुष्य हूँ' ऐसा जो देहात्मविषय में लोगों का दृढ़
निश्चय पाया जाता है, उसके समान ही यदि किसी को
प्रत्यगात्मा के विषय में, देहात्मज्ञान की बाधा करने वाला ज्ञान
हो जाय [कि यही आत्मतत्व मैं हूँ। यही ब्रह्मतत्व मैं हूँ]
वह विद्वान् मुक्त होना न चाहने पर भी मुक्त हो जाता है
[क्योंकि उसका संसार का कारण अज्ञान तो ज्ञान से बाधित
हो चुका है ]
अयमित्यपरोक्षत्व-मुच्यते चेत्तदुच्यताम् ।
स्वयंप्रकाशचैतन्यमपरोक्षं सदा यतः ॥२१॥
'अयम्' का अर्थ लोक में 'अपरोक्षत्व' होता है। सो इस
श्रुति में भी 'अयं' इस शब्द से अपरोक्षता ही लिया गया है,
ऐसा यदि कोई कहे तो उसकी बात भी मान लो कि हाँ यह
अर्थ भी लिया जा सकता है। क्योंकि स्वयंप्रकाश [अर्थात् किसी
साधनान्तर की सहायता के बिना प्रतीत होने वाला] चैतन्य तो
सदा ही प्रत्यक्ष रहता है [यह हमारा सिद्धान्त ही है]
परोक्षमपरोक्षं च ज्ञानमज्ञानमित्यदः ।
नित्यापरोक्षरूपेऽपि द्वयं स्याद् दशमे यथा ॥२२॥
तृप्तिदीपप्रकरणम् २३१
तृप्तिदीपप्रकरणम् २३१
'परोक्ष' और 'अपरोक्ष' का विरोधी जोड़ा इसी प्रकार
'ज्ञान' और 'अज्ञान' का विरोधी जोड़ा, यह दोनों ही नित्य
अपरोक्ष आत्मा में भी हो ही सकते हैं। जैसे कि दशवें में ये
दोनों ही [विरोधी बातें] पाये जाते हैं।
नवसंख्याहृतज्ञानो दशमो विभ्रमात्तदा।
न वेत्ति दशमोऽस्मीति वीक्षमाणोऽपि तान्नव ॥२३॥
[दस आदमी किसी नदी को पार उतरे। उतर कर अपने
आदमियों को गिनने लगे। गिनने वाला अपने को छोड़ कर
शेष नौ को गिन लेता था। परिणाम में वे नदी के किनारे बैठ
कर दसवें को रो रहे थे कि हाय ! दसवाँ डूब गया] उस
गिनने वाले दसवें को अपना जो ज्ञान होता था उस ज्ञान को
नौ (९) की गिनती ने दबा दिया था। वह दसवां, पुरुष उन,
नौ को प्रत्यक्ष देखता भी था। परन्तु भ्रान्ति में फंसकर,
गिनने वाला अपने आप को नहीं जानता था कि 'मैं ही तो
दसवां हूँ' [शेष नवों को देखता था, परन्तु अपनी ओर उस
का ध्यान नहीं जाता था। उस का सारा ध्यान नौ ने खेंच
लिया था]।
न भाति नास्ति दशम इति स्वं दशमं तदा।
मत्वा वक्ति तदज्ञानकृतमावरणं विदुः ॥२४॥
तब वह दसवां पुरुष [यद्यपि वह स्वयं ही दशवां है, फिर
भी] अपने ही को कह बैठता है कि—दसवां न तो मुझे प्रतीत
ही होता है और न दसवां है ही। बुद्धिमान लोग इसी को तो
अज्ञान का किया हुआ आवरण [परदा] बताते हैं।
२३२ पञ्चदशी
नद्यां ममार दशम इति शोचन् प्ररोदिति ।
अज्ञानकृतविक्षेपं रोदनादिं विदुर्बुधाः ॥२५॥
अब वह दसवां मनुष्य शोक करता और रोता है कि हाय !
दसवां तो नदी में डूब मरा । बुद्धिमान् लोग इस रोदन आदि
को अज्ञान का किया हुआ विक्षेप समझते हैं ।
न मृतो दशमोऽस्तीति श्रुत्वाप्तवचनं तदा ।
परोक्षत्वेन दशमं वेत्ति स्वर्गादिलोकवत् ॥२६॥
जब कोई आप्त पुरुष आकर कहता है कि—भाई दसवां
मरा नहीं, वह तो यहीं है, तब इस आप्त वचन को सुनकर
परोक्षरूप से दसवें को जान जाता है । जैसे शास्त्र के कहने से
स्वर्गादिलोक को परोक्षरूप से जान लिया जाता है ।
त्वमेव दशमोऽसीति गणयित्वा प्रदर्शितः ।
अपरोक्षतया ज्ञात्वा हृष्यत्येव न रोदिति ॥२७॥
उस आप्त पुरुष ने, नौ को गिनने के बाद उससे कह दिया
[बता दिया] कि 'दसवां तो तू ही है' बस अब तो उसने अपरोक्ष-
रूप से अपने आपको जान लिया कि ओहो ! दसवां तो मैं ही हूँ।
अब तो वह परमहृष्ट होता है, अब वह पहले की तरह रोता नहीं है।
अज्ञानावृतिविक्षेपद्विविधज्ञानतृप्तयः ।
शोकापगम इत्येते योजनीयाश्चिदात्मनि ॥२८॥
(१) अज्ञान (२) आवरण (३) विक्षेप (४) परोक्षज्ञान
(५) अपरोक्ष ज्ञान (६) तृप्ति तथा (७) शोकनाश ये सातों
अवस्थायें जो दृष्टान्तभूत दसवें में दिखाई गयी हैं, दार्ष्टान्तिक
चिदात्मा में भी लगा लेनी चाहियें ।
तृप्तिदीपप्रकरणम् २३३
तृप्तिदीपप्रकरणम् २३३
संसारासक्तचित्तः संश्चिदाभासः कदाचन ।
स्वयंप्रकाशकूटस्थं स्वतत्त्वं नैव वेत्ययम् ॥२९॥
यह विचारा चिदाभास, संसार अर्थात् विषयोपार्जन के
ध्यान में मस्त हुआ हुआ, अपने स्वयं प्रकाश कूटस्थ आत्मतत्व
को कभी पहचानता ही नहीं [वह तो दिन रात शरीर आदि
की चाकरी में लगा रहता है, उसे आत्मतत्व को पहचानने की
फुर्सत ही नहीं है । वह अपने आत्मतत्व की बात को एक
अप्रासंगिक (बे मौक़े) बात समझता है । बात चीत चलने
पर वह आत्मतत्व को खूब ही फटकारता है, बस यही उस की
अज्ञान नाम की पहली अवस्था कहाती है]
न भाति नास्ति कूटस्थ इति वक्ति प्रसङ्गतः ।
कर्ता भोक्ताहमस्मीति विक्षेपं प्रतिपद्यते ॥३०॥
चिदात्मा के विषय की जब बात चीत चलती है तब सदा
यही कहता है कि महाशय कूटस्थ का न तो मुझे भान ही
होता है और न वह है ही [यही अज्ञान की की हुई आवरण
नाम की दूसरी अवस्था कहाती है] इसी से आत्मा को यह
कहने लगता है कि 'मैं कर्ता हूँ' 'मैं भोक्ता हूँ' यही विक्षेप नाम
की तीसरी अवस्था होने लगती है ।
अस्ति कूटस्थ इत्यादौ परोक्षं वेत्ति वार्तया ।
पश्चात् कूटस्थ एवास्मीत्येवं वेत्ति विचारतः ॥३१॥
बात चीत में जब कोई समझाता है तब उसे परोक्षज्ञान नाम
की चौथी अवस्था आ जाती है कि 'कूटस्थ है' [श्रवणादि का
जब परिपाक हो जाता है तब] पीछे से वह यह प्रत्यक्ष रूप से
१५
२६४ पञ्चदशी
जानता है कि मैं तो कूटस्थ ही हूँ । यही उसकी अपरोक्षज्ञान
नाम की पांचवीं अवस्था कहाती है ।
कर्ता भोक्तेत्येवमादिशोकजातं प्रमुञ्चति ।
कृतं कृत्यं प्रापणीयं प्राप्तमित्येव तुष्यति ॥३२॥
[कूटस्थ असङ्ग आत्मा का ज्ञान जब हो जाता है तब]
कर्ता भोक्ता आदि जितने भी शोक हैं उन सब को छोड़ देता है।
[यही शोकापगम नाम की छठी अवस्था कहाती है] । जो कुछ
करना था सो कर लिया, जो कुछ पाना था सो पा लिया, ऐसा
समझ कर वह संतुष्ट हो जाता है । [यही उसकी तृप्ति नाम की
सातवीं अवस्था कहाती है] ।
अज्ञान मावृति स्तद्वद् विक्षेपश्च परोक्षधीः ।
अपरोक्षमत्तिः शोकमोक्ष स्तृप्ति निरंकुशा ॥३३॥
अज्ञान, आवरण, विक्षेप, परोक्षज्ञान, अपरोक्षज्ञान, शोक-
राहित्य और निरङ्कुश तृप्ति [यों ये सातों अवस्थाएं इस
दाष्ट्रान्तिक में भी होती हैं]।
सप्तावस्था इमाःसन्ति चिदाभासस्य तास्वसौ ।
बन्धमोक्षौ स्थितौ, तत्र तिस्त्रो बन्धकृतः स्मृताः॥३४॥
ये सातों अवस्थाएं चिदाभास की ही हैं। [कूटस्थ की नहीं]
ये बन्ध और मोक्ष इन सातों अवस्थाओं में ही समा जाते हैं।
इन सातों में पहली तीन [अज्ञान आवरण तथा विक्षेप] अवस्थाएं
बन्ध करने वाली हैं। [पिछली चार मोक्ष की अवस्थाएं हैं] ।
न जानामीत्युदासीनव्यवहारस्य कारणम् ।
विचारप्रागभावेन युक्तमज्ञानमीरितम् ॥३५॥